(कहानी) पारदर्शी
राजश्री की रात आँखों में ऐसे रिस-रिस के बीती कि सुब्ह उसका सिर दर्द से फटा जा रहा था। इतनी बेचैन तो वह कभी नहीं हुई। ये क्या हो रहा है उसके साथ ? क्यों अजीब-अजीब घट रहा है। सब उसकी समझ से परे था। कहीं वह अपना मानसिक संतुलन न खो बैठे। वह बेहद चिन्तित और डरी हुई थी। उसके मन में तो वह विचार आया भर था कि सिरफिरा शराबी पड़ौसी जो अपनी निरीह पत्नी को जब-तब दरिन्दे की तरह मारता पीटता रहता है, बाहर बिल्डिंग के चारों ओर नशे में गालियाँ बकता घूमा करता है, निरन्तर प्रलाप करता कभी पेड़ के नीचे खड़ा तो कभी गेट के पास आने जाने वालों के साथ झगड़ा करता बैठा रहता है – उसे ईश्वर सबक़ क्यों नहीं देता और उसके हाथ पैर क्यों नहीं तोड़ देता ! शाम को पता चला कि उस शराबी का ऐसा भयंकर एक्सीडेन्ट हुआ कि दोनों पैरों और दाँए हाथ में मल्टीप्ली फ्रैक्चर हो गए थे। उसकी पत्नी की विडम्बना ये कि वही उस आततायी पति की देख भाल कर रही थी जो ठीक होने के बाद इनाम में उसे मार पीट के अलावा कुछ और देने वाला नहीं था। राज सच में थोड़े ही चाहती थी कि शराबी के हाथ पैर टूट जाए, वो तो उसकी निरीह पत्नी की हालत देख गुस्से में उसके मन में विचार भर आया था कि इतना अन्याय करने वाले को ईश्वर दंडित क्यों नहीं करता।
इसके अलावा राज इसलिए भी परेशान थी कि पिछले पाँच वर्षों से वह लगातार महसूस कर रही है और महसूस ही नहीं कर रही अपितु अपने होशो हवास में देख रही है कि उसके अन्दर कुछ तो ऐसा घट रहा है जो उसकी ‘सोच’ को ‘सच’ बनाते देर नहीं करता। वह सोचने से घबराने लगी है। उसके दिमाग़ में विचार कौंधा नहीं कि और उधर उसके घटने की प्रक्रिया शुरु हुई। पहले तो वह बेख़बर थी, शुरु में तो उसका ध्यान ही नहीं गया इस ओर, लेकिन एक बार एक निकट संबंधी के लिए उसने अपने मन में आई बात को यूं ही कह दिया और वह सच हो गई।
वह बात 4 वर्ष पहले की है। उसके चाचा की बेटी का कहीं रिश्ता नहीं हो पा रहा था। वे सोच में डूबे थे कि कहाँ से कैसे योग्य वर ढूँढ कर लाए अपनी बेटी के लिए। उनकी चिन्ता को दूर करती राज एक दिन यूँ ही उन्हें ढाढस बँधाती बोली –
“अरे चाचा जी क्यों चिन्ता करते है, आपकी बेटी के लिए तो दूल्हा ख़ुद चलकर घर आएगा और इसे सात समुन्दर पार ले जाएगा।“
ठीक एक महीने बाद कुछ ऐसा ही घटा। किसी जान पहचान वाले के माध्यम से टोरंटो(कनाडा) में सैटिल्ड एक सॉफ़्टवेयर इंजीनियर ने घर आकर चाचा जी की बेटी को पसन्द किया और एक सप्ताह के अन्दर शादी करके सच में सात समुन्दर पार ले गया। चाचा और चाची की तो ख़ुशी का ठिकाना न था। उन्होंने राज की भविष्यवाणी पर पूरी तरह गौर किया और इनाम के रूप में सबको घर परिवार में उसकी इस दिव्य वाणी की बारे में बार – बार बताया। तब राज ने पहली बार अपने शब्दों के सच होने पे गौर किया।पर फिर भी उसे यूँ ही कही गई बात के सच हो जाने में कोई चमत्कार जैसी बात नज़र नहीं आई।उसे यह मात्र एक इत्तेफ़ाक भर लगा। ख़ैर, वह बात आई गई हो गई। पर राज ने इस घटना को मात्र एक संयोग के रूप में लिया।
इस सुखद होनी के 6 माह बाद, एक बार उसके मन में अनायास ही अपनी ममेरी बहन, जो विवाह के आठ साल बीत जाने पर भी माँ न बन सकी थी, उसके लिए ख़्याल आया, बल्कि उसने दिल से उसके लिए चाहा कि ‘काश ! भगवान उसकी गोद भर दे, और एक ही बार में बेटी – बेटा दोनों उसकी गोद में डाल दे।‘ दो- तीन महीने बाद उसे पता चला कि उसकी ममेरी बहन सच में माँ बनने वाली है। राज की ख़ुशी का ठिकाना न रहा। इस बार वह ख़ुद-ब-ख़ुद अपने मन में आए इस विचार की खोजबीन करना चाहती थी और मन में उत्सुक्ता से भरी हुई थी कि जुड़वा बच्चे होते हैं क्या उसकी ममेरी बहन के और वह भी –एक बेटा और बेटी.... ! समय आने पर राज को पता चला कि उसकी बहन ने जुड़वा बच्चों को जन्म दिया है और वो भी - एक बेटा और बेटी को....। राज के आश्चर्य का ठिकाना न रहा। अच्छे ख़्याल के सच होने की बात तो स्वीकार्य थी, स्वागत योग्य थी, लेकिन अप्रिय सोच के सच में परिणत होने पर राज बहुत अधिक परेशान और विचलित होती। जैसे दो वर्ष पूर्व उसके मन में अक्सर बालकनी से सामने नीचे दिखाई देने वाली बस्ती के एक छोटे से मकान को देख कर न जाने क्यूं यह विचार बार-बार आता कि वह जल्द ही गिरने वाला है, जबकि वह अच्छी ख़ासी हालत में था। राज के दुख का पारावार न रहा, जब उसने देखा कि एक दिन वह मकान आधे से अधिक ढह गया था और जो बचा था, वह भी गिरनाऊ था। ऐसी न जाने उसके मन में आई कितनी बाते सच होती रहती। धीरे- धीरे इन्तहा ये हो गई कि वह अपनी सोचों से घबराने लगी थी। लेकिन दिलो दिमाग में 24 घंटे में हज़ारों विचार आते हैं, जाते हैं, उन पे राज कैसे काबू पा सकती थी। फलत: वह रात – दिन तनावग्रस्त रहने लगी और स्वयं को अप्रिय घटनाओं के घटने का कारण मानने लगी। इस कारण से वह अनेक बार गहरे अवसाद में डूब जाती। फिर किसी तरह वह अपने को उस अवसाद से उबारती।अपना अधिकतम समय पढ़ने लिखने और अन्य कामों में बिताती, अपने मन को अधिक से अधिक कामों में उलझाए रखती। पर उसके दिलोदिमाग़ की यह ग्रन्थि सुलझाए नहीं सुलझ रही थी।
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दोपहर का सन्नाटा था। राज आराम से बिस्तर पे लेटी ‘बी.बी. लाल’ की किताब “सरस्वती फ़्लोज़ ऑन” पढ़ रही थी। इतने में हवा के एक तेज़ झोके ने मेज़ पर रखे पन्नों को कमरे में इधर उधर उड़ाया, राज झपट कर उठी और पन्नों को समेटा। खिड़की बंद की और फिर से पढ़ने में डूब गई। पढ़ते- पढ़ते उसे कुछ देर के लिए न जाने कैसे झपकी सी आ गई। किन्तु दिन में सोने की आदत न होने के कारण वह 5 मि. में ही उठ बैठी। उसे “गायत्री मंत्र“ पर प्रकाशित एक पुस्तक का अंग्रेज़ी में अनुवाद करके “विभूति मिशन“ को अगले हफ़्ते तक देना था। वह उठी, मुँह पर ठन्डे पानी के छींटे डाले और फ़्रेश होकर अपने को अनुवाद के काम पे कमर कस के केन्द्रित किया। आज वह शेष काम पूरा करके ही दम लेगी। तीन घन्टे वह ऐसी काम पे टूटी कि उसे समय का भी ध्यान नहीं रहा। घड़ी 4 बजा रही थी। वह तो दोपहर का खाना ही न बना पाई, न खा पाई। पेट में चूहे गदर मचाए थे। काम तो पूरा हो गया था। बस टाइप वह कल – परसों करेगी, यह सोचती वह उठी और कुकर में पुलाव चढ़ाया। डाइनिंग टेबल पे रखे फलों से सेब उठाकर खाने लगी कि पुलाव बनने तक पेट को कुछ सहारा होए और सेब खाते –खाते वह अपने अधूरे पड़े प्रोजेक्ट के बारे में सोच-विचार करने लगी।
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राज को आज डैक्कन लाइब्रेरी जाना था। वह सड़क के किनारे खड़ी ऑटो मिलने का इन्तज़ार कर रही थी। 2 मि. बाद एक ऑटो मिल गया और वह तुरन्त डैक्कन लाइब्रेरी के लिए रवाना हो गई। लाइब्रेरी में शोध संबंधी जो सन्दर्भ पुस्तक वह खोज रही थी, पता चला कि वह 15 दिन के लिए किसी मिसेज़ बैनर्जी के पास है। राज बड़ी सोच में पड़ी कि अब क्या करे, 15 दिन तक काम यूँ ही पड़ा रहेगा। ‘राधाकमल मुखर्जी’ की पुस्तक उसे हर हाल में जल्द से जल्द चाहिए थी। कुछ देर राज निष्क्रिय सी बैठी सोचती रही। अन्य नामी लेखकों की किताबें भी उसने उलट पलट कर देखी कि सम्भवत उनसे कुछ बात बन सके, लेकिन अपेक्षित सन्दर्भ उनमें नहीं मिल सके। सोच में डूबी वह उठी और पुस्तकालयाध्यक्ष के पास जाकर ‘राधाकमल मुखर्जी’ की पुस्तक का नाम, अपना फ़ोन नंबर नोट करा दिया जिससे कि रिटर्न होने पर, वह पुस्तक उसे बिना किसी देरी के तुरन्त मिल जाए। वह किताब बार-बार उसके ज़हन में उभर रही थी। दो दिन बाद ही, सुब्ह ग्यारह बजे के लगभग उसके पास लाइब्रेरी से फ़ोन आया कि ‘राधाकमल मुखर्जी’ की पुस्तक वापिस आ गई है और उसके लिए रिज़र्व रख दी गई है।
“क्या”…………..,
राज ख़ुशी और आश्चर्य से भरी और कुछ भी न कह सकी। वह सोच में भर गई कि जो पुस्तक 15 दिन के लिए इश्यूड हो, वह एकाएक वापिस कैसे आ गई ? राज झटपट तैयार होकर लाइब्रेरी पहुँची और किताब अपने नाम इश्यू कराई। फिर भी उससे रहा नहीं गया और उसने पुस्तकालयाध्यक्ष से पूछ ही लिया –
“यह तो 15 दिनके लिए इश्यूड थी, इतनी जल्दी कैसे मिल गई ? “
पुस्तकालयाध्यक्ष भी थोड़ा आश्चर्य अभिव्यक्त करते बोले –
“पता नहीं, मिसेज़ बैनर्जी तो जब भी कोई पुस्तक ले जाती हैं तो कभी ड्यू टाइम से पहले नहीं लाती, बल्कि कई बार तो ड्यू डेट पे वापिस लाकर रिइश्यू करा कर ले जाती हैं। पर इस बार तो वे 2 ही दिन में किताब ले आई और बिना कुछ कहे लौटाकर चली गईं। “
राज मन ही मन कुछ सूत्र टटोलती, खोजती सी घर पहुँची। उसकी यह इच्छा कैसी चमत्कारी रूप से पूर्ण हुई ! वह उत्साह से भरी घर के पास की दुकान से कुछ ताज़ी सब्ज़ी, और फल लेने के लिए उतर गई। साथ ही उसने टोफू, फ़्रोज़न मटर, पास्ता, मैक्रोनी भी ख़रीदा। अब उसका सारा ध्यान किताब में पड़ा था। सो उसने लंच में शार्टकट लेते हुए वेजिटेबल पास्ता बनाया और भुक्कड़ की तरह किताब पे टूट पड़ी। लंच में अभी दो घंटे बाकी थे। तब तक उसने ज़रूरी सन्दर्भ खोज निकाले और अपने शोध प्रपत्र में उनका उल्लेख भी बक़ायदा कर डाला। शोध प्रपत्र को शुरू से आख़िर तक, ध्यान से निरीक्षक की तरह पढ़ा, ख़ास जगहों पे कुछ काट छाँट की और अपने उस लम्बे लेख को अन्तिम रूप दिया। इस लिखत पढ़त में 2 बज गए थे। अंगड़ाई तोड़ती राज अपने मनपसन्द लंच – पास्ता को अनुगृहीत करने उठी, तो देखा बेचारा ठन्डा होकर जम गया था। ख़ैर, उसकी अपनी मूर्खता थी कि लंच का बोझ निबटाने के चक्कर में उसे पास्ता जैसी चीज़ इतनी जल्दी बना कर नहीं रखनी चाह्ए थी और बनाई थी तो 10 -15 मि. में उसे खा लेना चाहिए था। इसलिए बिना मुँह बनाए राज ने उसे माइक्रोवेव में कुछ सैकेंड के लिए निवाया किया और खा लिया। पेट तो भर गया था, लेकिन मुंह का स्वाद ठीक करने के लिए उसने कीनू और कीवी का जूस गिलास में डाला और सिप करती बालकनी में बैठ गई। ऊपर के फ़्लोर के नानावती दम्पत्ती के एक दो कपड़े, हवा ने उड़ाकर पास के पेड़ की शाख़ पे लटका दिए थे। वे बेचारे लावारिस से उस पे झूल रहे थे। नीचे आस पड़ौस के बच्चे आइस पाइस खेल रहे थे, तो दो नन्ही लड़कियाँ पाटिका खेल रही थीं। दुनिया के झमेलों से दूर वे कितने ख़ुश और रचनात्मकता के साथ खेल की बारीकियों में व्यस्त थे...। बच्चों को देख कर राज बड़ी देर तक मन ही मन चिहुँकती सी बैठी रही और उनकी एक-एक हरकत पर गौर करती रही। तभी नीले फ़्रॉक वाली बच्ची उसे बार –बार चोट खाई, मुँह से ख़ून निकलती नज़र आने लगी। जब कि ऐसा कुछ नहीं था, वह अच्छी ख़ासी खेल रही थी। देखते ही देखते वह बच्ची न जाने कैसे पलटी खाकर औंधे मुँह गिरी और उसके मुँह से ख़ून निकलने लगा, शायद दाँत टूट गया था, एक हाथ छिल गया था, कंकड़ो पे गिरने से खरोंचे आ गई थी। “तौबा, तौबा, ये क्या हुआ, पर कैसे हुआ... “ राज अपनी सोच से परेशान हो उठी। क्यों आया उसके मन में चोट का ख़्याल, क्यों वो नन्ही बच्ची बुरी तरह चोट खा गई।राज को लगा कि उसके कारण उस बच्ची के इतनी चोट लगी, न उस बच्ची के लिए कोई विचार मन में आता और न बच्ची इस बुरी तरह गिरती। राज अपराधी सा महसूस करती, अपना मेडिसिन किट उठाकर नीचे दौड़ी। उस बच्ची के डिटॉल और एन्टीसॅप्टिक क्रीम लगाकर पट्टी बाँधी। उसे प्यार से गले लगाया, किसी तरह वह सुबुकती बच्ची चुप हुई। ऊपर अपने फ़्लैट में वापिस लौटती राज के ज़हन में फिर वैसे ही अनगिनत सवाल उठने लगे, जैसे कि अक्सर उसकी सोच के सच होने पे उठा करते है। पर कोई हल, कोई जवाब उसे न मिल पाया। उसका मन इस घटना के बाद इतना अशान्त रहा कि वह रात भर कोई काम नहीं कर पाई।
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आज बहुत दिनों बाद कल्पी, राजश्री के पास पूरे दिन के लिए आ रही थी। 6 महीने पहले वे दोनों मिली थी। राज बहुत ख़ुश थी कि आज एक लम्बे समय के बाद वह कल्पी से ढेर सारी बातें करेगी, उसकी सुनेगी, कुछ अपनी कहेगी। सुब्ह ठीक 10 बजे बिना किसी देरी के कल्पी, राजश्री के घर पहुँच गई। जैसे ही राजश्री ने दरवाज़ा खोला, कल्पी ‘राज राज’ कहती उससे लिपट गई। खिलखिलाती कल्पी, राज के हाथ में मिठाई का डिब्बा, फल और एक गिफ़्ट पैकेट पकड़ाती बोली –
“ले सम्भाल ये सामान अरे दुष्ट, 6 महीने बहुत लम्बा समय हो गया रे राज ! आज जी भर के बातें करेगें ।“
“क्यों नहीं, क्यों नहीं, पर मैडम ये सब लाने की क्या ज़रूरत थी ? अगर खाली हाथ आती तो क्या मेरे घर में तुझे एंटरी नहीं मिलती !” – राज मिठाई, फल वगैहरा मेज़ पर रखती बोली। इतने में फिर बच्ची की तरह किलकती कल्पी ने राज को बाँहों में भर लिया।
राज उसकी सख़्त गिरफ़्त से अपने को छुड़ाती बोली –
“अरे बस कर, बहुत हो गया प्यार, मेरी पसलियाँ चटकाएगी क्या ज़ालिम ?”
खी,खी,खी करती कल्पी अपनी गिरफ़्त ढीली करती बोली –
“चल छोड़ा, पर एक शर्त पे कि फटाफट अपने हाथ की एसप्रेसो कॉफ़ी पिलानी होगी।“
राज को तो अपनी ज़िन्दादिल, नटखट सहेली की फ़रमाइश का पहले से ही अंदाज़ा था, सो उसने कॉफ़ी फेट कर रखी थी। राज ने तुरत दो कप कॉफ़ी बनाई और दोनो सखियाँ बालकनी में रखी केन चेयर्स में जम गई। ख़ूब दुनिया जहान की बातें होती रही। राज ने बातों को विराम देते हुए कहा –
“1 बजने से पहले ज़रा लंच की तैयारी कर लूँ। यूँ तो तेरा मनपसन्द राजमा और गोभी –आलू की सब्ज़ी मैंने बना ली है, पर एक सब्ज़ी और तुझसे बात करते-करते बना लूँगी। मशरूम, टोफ़ू और मटर की मिक्स वेजिटेबल खा लेगी न ? और हाँ ज़ीरा राइस बनाऊँ या सादा चावल ?”
कल्पी आँखें फैला कर बोली – “क्या मुझे पेटू समझा है ? इतना तो बना लिया है, तो अब और कुछ बनाने की कोई ज़रूरत नहीं।“
“नहीं, नहीं, मैं बाक़ायदा तेरे स्वागत में शानदार और लज़ीज़ लंच तैयार करना चाहती हूँ। कब-कब तू आती है, आज मुझे अपने दिल के अरमान पूरे करने दे बस।“ राज के इस प्यार के आगे कल्पी मुस्कुराती चुप रही। बातों ही बातों में लंच तैयार हो गया। एक भी बजने ही वाला था, तो राज ने टेबल लगा दी। गरम गरम फुलके बना कर दोनो सहेलियाँ खाने बैठ गई। कल्पी ने स्वाद में खाना कुछ ज़्यादा खा लिया। चेयर से उठती कल्पी बोली –
“कुछ अधिक खा लिया राज, हाजमोला है क्या ?”
राज ने शेल्फ़ की तरफ़ इशारा करते कहा –
“वो देख, हाजमोला की शीशी रखी है, वहाँ से उठा ले। वरना थोड़ी देर में आधा कप अदरक- इलायची की चाय ले लेना।“
इसके बाद दोनो बैडरूम में आराम से पसर गई। राज ने जगजीत सिंह की ग़ज़लों का सी.डी. लगा दिया। राज ने पास ही रखी सौंफ़ इलायची की काँच की प्लेट कल्पी के आगे कर दी और ख़ुद भी दो इलायची मुँह में डालकर ईज़ी चेयर में अधलेटी हो गई। कल्पी बिस्तर पे पसर गई। दोनों नेता, अभिनेता, संगीत और नई प्रकाशित किताबों पर ढेर सारी बातों से लेकर घर परिवार की बातों पे आ गई। कल्पी निराशा भरे स्वर में बेहद उदासी के साथ बोली –
“राज, नरेन्द्र की मुम्बई पोस्टिंग हो जाने से मैं बहुत परेशान हूँ। माँ – बाबू जी के कारण और बेटे का बी.एस-सी फ़ाइनल होने के कारण मैं मुम्बई रह नहीं पा रही हूँ। नरेन्द्र के बिना घर बाहर के सारे काम करने, सम्हालने में बड़ी दिक्कत महसूस होती है। दूसरे मुम्बई में नरेन्द्र का ऑफ़िशियल घर इतना बड़ा और खुला नहीं है कि हम सब आराम से रह सके। ख़ासतौर से माँ- बाबू जी तो पूना का पुश्तैनी बड़ा घर छोड़ कर कहीं और रहना ही नहीं चाहते और हम उन्हें इस उम्र में अकेला छोड़ना नहीं चाहते। नरेन्द्र की सेहत भी होटल का खाना खाकर ठीक नहीं चल रही। काश कि उसका पूना तबादला हो पाता। लेकिन 3 साल से पहले ट्रान्सफ़र के बारे में सोचना ही बेकार है। वैसे भी नरेन्द्र एम.डी. की पोस्ट पे है और उसे मुम्बई की नई ब्रांच का काम ज़िम्मेदारी से सम्भालना है, ब्रांच ठीक से स्थापित करनी है।“
राज कल्पी के चेहरे पे चढ़ती उतरती उदासी और चिन्ता को गौर से पढ़ रही थी। तभी वह कल्पी का हाथ अपने हाथ में लेकर आश्वासन देती बोली –
“अरे इतनी चिन्ता में मत घुल, ईश्वर ने चाहा तो नरेन्द्र बहुत जल्द ही वापिस पूना आ जायेगा।“
“नहीं राज, ये तो एकदम असम्भव है। मैंने कारण बताया न । अभी तो एक साल ही हुआ है। दो साल पूरे हो गए होते तो तब भी थोड़ी उम्मीद की जा सकती थी, पर अभी तो तबादला नामुमकिन है।“
राज कहीं दूर शून्य में खोई बोली – “सब्र रख, सब्र, हो सकता है कि वह अगले ही महीने पूना आ जाए... !”
कल्पी व्यंग्य से तिरछी मुस्कान के साथ लम्बी साँस लेती बोली –
“उंह, अगले ही महीने पूना आ जाए... ! तू भी न, दिन में ख़्वाब देखना बंद कर, राज। अच्छा, 4 बजने वाला है अब मैं चलती हूँ। माँ - बाबू जी भी राह देखते होगें।“
“चाय तो पीती जा” – राज ने उसका हाथ पकड़ते हुए कहा।
“अरे, माई डियर, अभी खाना हज़म नहीं हुआ, चाय की सच में कोई गुंजाइश नहीं।“ यह कहते कहते कल्पी ने अपना पर्स उठा लिया। राज उसे विदा करने नीचे गई। कल्पी आदत की मारी राज के गले लग गई और उसे घर जल्दी आने का स्नेह सिक्त निमन्त्रण देकर अपनी मारुति सुज़ुकी में बैठ गई। राज तब तक खड़ी देखती रही जब तक उसकी कार आँखों से ओझल नहीं हो गई। सहेली से विदा होने के अकेलेपन को साथ लिए वह अपने फ़्लैट में लौटी। अपने लिए एक कप कॉफ़ी बनाई। कॉफ़ी पीकर अपने शेष काम को पूरा करने में जुट गई। रात 9 बजे तक काम पूरा होने की खुशी में राज थकी होने पर भी, सुकून भरी स्फूर्ति से भरी हुई थी।
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आज सोमवार था। राज कुछ ज़रुरी खरीदारी करने भीड़ भरे मार्केट में 'ईशान्या मॉल' पहुँची। शॉपिंग करके दोनों हाथों में कैरी बैग पकड़े, वह ऑटो खोज ही रही थी कि तभी पास एक कार इतनी तेजी से निकली कि वह घबरा गई। उसने नज़र भर के उस के किशोर चालक को हैरत भरे गुस्से से देखा। उसके मन में बिजली की सी गति से विचार कौंधा कि यह लड़का अभी के अभी ज़रूर अपनी कार को और अपने को तहस नहस करेगा। हे ईश्वर, इसकी रक्षा कर ! यह विचार जिस विद्युत गति से आया और गया, उसी गति से वो 'मारुति' चालक पास ही क्रॉसिंग पर रेड लाइट हो जाने के कारण कार पे संतुलन खो देने से, ब्रेक लगाते-लगाते भी अपने आगे धीमी होती ‘इनोवा’ से इस बुरी तरह टकराया कि उसकी कार का अगला आधा हिस्सा विशालकाय ‘इनोवा’ के अन्दर घुस गया। देखते ही देखते भीड़ लग गई, ट्रैफ़िक रुक गया, चौराहे पे तैनात ट्रैफ़िक पुलिस तुरन्त दुर्घटना स्थल पर आ गई। लोगों की सहायता से पुलिस ने सिर से ख़ून बहते उस किशोर को बड़ी कठिनाई से निकाला और उसे जीप में डाल कर अस्पताल ले गई। उसकी जान बच गई थी, वह दर्द से कहरा रहा था। ईश्वर की मेहरबानी कि बेवकूफ़ी से रैश ड्राइविंग करते अंजाने में मरने को तैयार उस नौजवान की जान बच गई थी। राज धड़कते दिल से, खौफ़ खाई सी सब कुछ ऐसे देख रही थी, जैसे उसके सामने घटना चक्र की रील चल रही हो – पहले उसके दिलोदिमाग़ में घटना फ़्लैश होती है और फिर वैसा ही सच में घट जाता है...। वह भूली सी, मूर्तिवत, हाथों में कैरी बैग पकड़े खड़ी की खड़ी रह गई। तभी उसके सामने खड़ा ऑटो का बारम्बार बजता हॉर्न उसे सोच से बाहर लाया –“मैडम कब से हॉर्न पे हॉर्न बजा रहा हूँ, किधर जाने का ?”
राज सकपकायी सी ‘’हाँ हाँ चलो कोरेगाँव पार्क चलो’’ ; बोली और अपना सामान ऑटो में रख कर कुछ सहज सी हुई। पर उसके मन में हलचल मची हुई थी। घर पहुँच कर, पसीने से तर बतर, वह बाथरूम में घुस गई और सिर पे शॉवर खोलकर, बहुत देर तक उसके नीचे निश्चेष्ट खड़ी भीगती रही। अगर वो किशोर, किसी का बेटा, मर जाता तो, हे ईश्वर क्या होता.....उसकी माँ, उसके पिता तो अधमरे हो जाते। नहीं कभी दुश्मन के साथ भी हे ईश्वर ऐसा न करे....मेरे मन वह विचार आया ही क्यूँ और अगर आ भी गया था तो सच क्यूँ हो गया... क्यूँ क्यूँ क्यूँ.....?????????????
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शुक्रवार को अचानक कल्पी का फ़ोन आया। वह लगभग शोर मचाती सी बोली –
“अरे कहाँ है तू, कब से 10 बार फ़ोन कर चुकी हूँ, तू है कि उठाती ही नहीं है। मुझे तो चिंता होने लगी थी कि तू सही सलामत तो है।“
“नहीं, वो क्या था कल्पी कि मैं फ़ोन वाइब्रेटर पे लगाकर काम में लगी थी, सो मुझे पता ही नहीं चला तेरी कॉल का। सॉरी...चल बता कैसे फ़ोन किया।“ - राज सफाई देती सी बोली I
कल्पी उधर से खिलखिलाती बोली –
“ओ मेरी राज, तेरे मुँह में घी शक्कर....तू बड़ी धुरंधर भविष्यवक्ता है रे... तेरी अंजाने में कही हुई बात सच हो गई – पता है नरेन्द्र का ट्रांसफर पूना हो गया। वह अगले महीने पूना की ईस्ट स्ट्रीट ब्रांच में ज्वाइन करेगा। ये तो चमत्कार से भी ज़्यादा बड़ा चमत्कार हो गया राज…..!”
सहसा ही राज के मुँह से निकला –
“नरेन्द्र का ट्रांसफर पूना हो गया, मज़ाक तो नहीं कर रही तू। तू तो कह रही थी कि ट्रांसफर किसी भी हाल में हो ही नहीं सकता, फिर कैसे हो गया कल्पी…?”
कल्पी उधर से ख़ुशी के आवेग में चिहुँकी –
“एक राजश्री नाम की पहुँची हुई भविष्यद्रष्टा ने कहा था कि नरेन्द्र अगले ही महीने पूना आ जाएगा... ! तो वह आ गया बस मुझे तो इतना पता है, इससे अधिक न मुझे पता और न मैं जानना चाहती हूँ।“
राज एक बार फिर आश्चर्य में डूबी थी, बेहद हैरान थी कि उसके मन में सहसा ही आए विचार सच कैसे होते जाते है। जो हुआ, अच्छा हुआ, पर असम्भव बात कैसे घटी । ये घटनाएँ विकट प्रश्न बनती जा रही थीं राज के लिए। पहेली, नितान्त उलझी पहेली।
अगले दिन राज मानव मनोविज्ञान के प्रोफ़ैसर डॉ. सब्बरवाल से समय लेकर मिलने गई। उसने अपने साथ पिछले 5 वर्ष से घट रही घटनाओं की विस्तार से चर्चा की और कारण जानना चाहा कि ऐसा क्यों होता है कि कोई खास विचार मन में आया और वह सच होने लगता है...!!?? साथ ही वह अपने दिमाग में कौंधने वाली दुर्घटना आदि के विचार के सच घटित हो जाने पर स्वयं को दोषी मानती है और कई दिनों तक डिप्रेशन में रहती है।डॉ. सब्बरवाल ने बड़ी सहजता से अपने गुरू गम्भीर स्वर में राज को समझाते हुए कहा –
‘‘परेशान मत होइए। टेक इट वाइज़ली। नो स्ट्रैस प्लीज़ अदरवाइज़ इट विल इफ़ैक्ट यू एडवर्सली। कुछ व्यक्तियों की सुपरनैचुरल फ़ैक्ल्टीज़ स्वत: ही इतनी डैवॅलप्ड होती हैं, कि उन्हें जाने अंजाने घटनाओं का पूर्वाभास हो जाता है। वे जान कर कुछ नहीं सोचते, अचानक से विचार उनके मन में कौंधते हैं और वे कभी तुरंत, तो कभी एक सप्ताह में, तो कभी महीने, दो महीने में सच में घट जाते हैं। मेरी राय में आप Larry Dossey की पुस्तक Power of Premonitions पढ़िए। आपको अपने कई सवालों का जवाब उससे मिलेगा। Havard University के प्रोफ़ैसर Peter Eli Gordon ने भी इस विषय में काफ़ी महत्वपूर्ण तथ्य प्रस्तुत किए हैं। भारतीय दार्शनिक ‘पी.एन. हक्सर’ ने भी ‘प्रिमोनीशन’ के बारे में बहुत कुछ लिखा है। इनके अलावा अमरीकन दार्शनिक Albert Balz, Thomas Edison ने ‘प्रिमोनीशन’ को लेकर अपने बारीक निरीक्षणों का उल्लेख किया है।
'' लेकिन मेरे दिमाग में अनजाने विचार आते ही क्यों है, सर ? क्या ये एक इत्तेफ़ाक है ?'' - राज परेशान होती बोली I
प्रो सब्बरवाल उसे समझाते बोले - '' ‘प्रिमोनीशन’ भावी घटनाओं की पूर्व चेतावनी या पूर्वाभास होता है, जो विचार, ख़्याल या सपने के रूप में आता है। ये ‘इत्तेफ़ाक’ नहीं होते, वरन उनसे कहीं अधिक भविष्य में घटने वाली सच्ची घटनाएँ होती हैं। ‘’
राज ने फिर तर्क किया - ''पूर्वाभास क्यों होते हैं मि. सब्बरवाल ?
प्रो सब्बरवाल राज को धैर्य बंधाते समझाने लगे - ''अधिकतर दार्शनिकों का मत है कि घटनाओं के पूर्वाभास जीवन बचाने के लिए होते हैं और यह बात भी सच है कि यदि हम कमज़ोर मनस इंसान से इस तरह के पूर्वाभासों का ज़िक्र करते हैं तो वे किसी की मौत का कारण भी बन सकते हैं। अनेक बार पूर्वाभास स्पष्ट नहीं होते और न उनकी व्याख्या की जा सकती है। ‘प्रिमोनीशन’ ‘’एक्स्ट्रा सॅन्सरी परसॅप्शन्स’’ का वह रूप है जिसे हम ‘’इन्स्टिंक्ट’’ या भावी घटना का एक तीव्र आभास कह सकते हैं। ये एक तरह की ‘’इन्ट्यूटिव वॉर्निग’’ होती हैं जो अवचेतन मनस पे अंकित हो जाती हैं और कभी-कभी व्यक्ति को नियोजित कार्यों को करने से मनोवैज्ञानिक तरह से रोकती हैं। इसे बहुत से चिन्तक विशिष्ट घटनाओं की ‘भविष्यवाणी ‘ भी कहते हैं। साइंस इसके स्टेटस को अस्वीकार करता है। लेकिन दार्शनिकों का मानना है कि प्रिमोनीशन और प्रौफॅसी को व्यर्थ की चीज़ मानकर नज़रअन्दाज़ नहीं करना चाहिए। क्योंकि घटनाओं के पूर्वाभास की जानकारी और उनका सही घटना - प्रमाणित करता है कि ‘’प्रिमोनीशन’’ में तथ्य है, इसकी अर्थवत्ता है । इस तरह से यह साइंस के लिए एक चेतावनी है क्योंकि यह सृष्टि की गतिविधियों के साथ मानव मन के सघन संबंध का संकेत देती है। यह आन्तरिक शक्तियों और सृष्टि में स्पन्दित अलौकिक शक्तियों एवं उसके चक्र के अन्तर्संबंध का विज्ञान है।''
''सर, क्या औरों को भी ऐसे ‘’प्रिमोनीशन’’ हुए हैं ? या यह मेरे साथ ही घट रहा है ?'' - राज चिंतित सी बोली.
''नहीं मैडम ऐसा नहीं है. कहा जाता है कि ‘नॉस्ट्रेडम’ ने अपनी मृत्यु की ‘’पूर्व घोषणा’’ कर दी थी। जुलाई 1, 1566 को जब एक पुरोहित उनसे मिलने आया और जाने लगा तो नॉस्ट्रेडम ने उससे अपने बारे में कहा कि ‘वह कल सूर्योदय होने तक मर चुका होगा।
इसी तरह ‘एब्राहम लिंकन’ ने अपनी मौत का सपना देखा और अपनी पत्नी व अंगरक्षक को, अपने क़त्ल से कुछ घंटे पहले इस बारे में बताया। ‘मार्क ट्वेन’ ने पहले से यह बता दिया था कि Halley’s Comet उसकी मृत्यु के दिन दिखाई देगा जैसे कि यह वो दिन था जिस दिन उसका जन्म हुआ था। दुर्भाग्यग्रस्त ‘टाइटैनिक’ जहाज जो आइसबर्ग पे अटक जाने के कारण 1912 में समुद्र में विलीन हो गया था, कहा जाता है कि उसके अनेक यात्रियों को जहाज के अवरुध्द होकर डूब जाने का पूर्वाभास काफ़ी समय पहले हो गया था। फिर भी अन्य लोगों ने व जहाज के सुरक्षा दल ने कुछ यात्रियों के इस पूर्व संकेत की अवहेलना की। उसके बाद ‘टाइटैनिक’ के साथ जो घटा वह अपने में एक आँसू भरा इतिहास था।‘’
डॉ सब्बरवाल से बतचीत करके राज को लगा कि पूर्वाभास कोई निरर्थक या हँसी में उड़ा देने वाली जानकारी नहीं है। यह एक गहरे अध्ययन और शोध का विषय है। राज ने डॉ.सब्बरवाल के कहे अनुसार पूर्वाभास से संबंधित किताबें पढ़ी और उसके सोच में एक ठहराव आया। उसने गहराई से अपने पूर्वाभासों का अध्ययन शुरू किया। धीरे-धीरे कुछ समय बाद उसे लगा कि वह एक शान्त, निस्पन्द पथ पर बढ़ रही है। उसके मन पहले की तरह तनाव, चिन्ता और अवसाद नहीं था, वरन् पूर्वाभास को सहजता से लेने का साहस और मनोबल विकसित हो रहा था। साथ ही उसने ईश्वर प्रदत्त अपनी इस शक्ति से दूसरों की मदद करने की ठानी ।
मई की उमस भरी दोपहरी थी. राज पढते पढते सो गई थी । दो बजे के लगभग वह चौंक कर उठी । अभी अभी ताज़ा देखा सपना उसकी आँखों में रह - रह कर लहरा रहा था, उसके दिलोदिमाग पे हावी था । वह तुरंत अपने पडौसी नैयर परिवार को वह सब बताने को आकुल हो उठी थी, जो उसने उनके बारे में स्वप्न में देखा था । लेकिन इतनी दुपहरी में उसने जाना ठीक नहीं समझा और वह बेसब्री से शाम होने का इंतज़ार करने लगी । ख्यालों में सपने पर तर्क-वितर्क करती वह बाथरूम में गई और मुहं पर खूब ठन्डे पानी के छींटें मारे । फ्रिज से आरेंज जूस निकाला और थोड़ा सा गिलास में डालकर कमरे आ गई । ५ बजते ही वह झटपट मिसेज़ नैयर के घर गई । एक लंबे समय के बाद उसे देख कर मिसेज़ नैयर उसका स्वागत करती बोली –
‘’ आओ राज, बड़े दिनों बाद आई हो । कैसी हो ?
राज उखडी सी बोली – ‘ठीक हूँ. आप से कुछ ज़रूरी बात करनी थी ।’
यह सुन कर मिसेज़ नैयर कुछ हैरत से भरी पूछने लगी – ‘सब ठीक ठाक तो है न ?’
राज ने कोई भी भूमिका न बांधते हुए सीधे अपने सपने के सन्दर्भ में उनसे कहा – ‘देखिए भाभी जी, आप नैयर भाई साहब को तेरह जून को नीले रंग की कार से कहीं मत जाने दीजिएगा ।
मिसेज़ नैयर अविश्वास से भरी, कुछ - कुछ राज की बात पे भरोसा करती बोली –
‘’ ठीक है, नहीं जाने दूंगी, पर ऎसी क्या बात है जो तुम उन्हें रोकना चाहती हो....!
राज ने कहा – ‘’वो मैं तेरह जून को ही बताना चाहूंगी ।‘’और कुछ देर बैठ कर वापिस आ गई ।
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तेरह जून रात आठ बजे, राज के पास मिसेज़ नैयर का फोन आया कि –
‘’राज, मैं तुम्हारा किन शब्दों में शुक्रिया दूं.....राज, सच में तुमने इनकी जान बचा ली । आज सुबह नैयर साहब अपने एक दोस्त के साथ गोवा का लिए निकलने वाले थे । मुझे तुम्हारी
बात ध्यान थी, सो मैंने इनसे पूछा कि कैसे जा रहे हो ? तो ये बोले – कपिल शर्मा की ‘कार से !’
फिर मैंने कार का रंग जानना चाहा तो , ये मेरी मजाक बनाते बोले कि अब तुम उसकी ‘शेप’, उसकी ‘मेक’ और नंबर भी पूछोगी, क्यों.....क्या मुझ पर किसी तरह का शक है तुम्हें ??
मैं उनकी बातों को उडाती हुई अपने सवाल पे अडी रही तो, वे मुस्कुराते बोले – ‘’नीले रंग की कार है ।’’तो ये फिर बोले – ‘भई अब तो बताओ कि तुम ये सब क्यों जानना चाहती हो ??’
मेरा दिल तो अनजानी आंशका से भर गया । मैं बस इनके ‘न जाने के’ पीछे पड़ गई । ये बड़े नाराज़ हुए । इतना कि - गुस्से में खाना तक नहीं खाया दोपहर का । तभी चार बजे इनके एक जानने वाले ने फोन करके बताया कि जिस कार से ये गोवा जाने वाले थे, वह बीच रास्ते में ट्रक से टकरा जाने के कारण, बुरी तरह दुर्घटनाग्रस्त हो गई है और शर्मा जी की हालत गंभीर है । यह सुनते ही इनका सारा गुस्सा फना हो गया और फ़ोन रख के ये तुरंत मेरे पास आकर बोले – थैंक्यू ! आज तो सच में, तुमने मेरी जान बचा ली ।मैं यूं ही गुस्से में भरा बैठा, तुम्हें कोस रहा था । तब मैंने इन्हें तुम्हारे बारे में बताया । ये कह रहे है कि क्या तुम भविष्य वक्ता हो ...?? क्या हम अभी तुमसे मिलने, तुम्हें दिली शुक्रिया देने आ सकते हैं क्योकि फिर इन्हें अपने मित्र शर्मा को देखने अस्पताल जाना है ।
राज अपने पडौसी परिवार को एक भयावह दुःख की छाया से बचा ले गई थी और मन में बेशुमार सुकून महसूस कर रही थी । साथ ही, सम्भवत: यह उसके सुख और चैन से भरे आगामी जीवन का मार्ग था जो उसे प्रो सब्बरवाल ने दिखाया था । क्योंकि अब वह अपने पूर्वाभासों से बेचैन न होकर, उनके माध्यम से दूसरों की मदद कर, अंदर होने वाली स्वच्छ तरल अनुभूति को सदा के लिए सहेज लेना चाहती थी।
Saturday, July 17, 2010
(कहानी) ‘’ब्रैड पिट आई लव यू ’’
’’ललिता, सामने की खिड़की बन्द करके काम कर। कितनी बार समझाया है कि पड़ौस के दुमंजले घर से यह कमरा साफ़ नज़र आता है, और वे दोनो भाई हर पल आते-जाते अपनी खिड़की से ज़रूर इस कमरे पे नज़र डालते रहते हैं” - ताई जी का भारी स्वर तीर सा ललिता के कानों से टकराया।
‘’ठीक है ताई जी” – यह कहती ललिता बेमन से उठी और खिड़की के पल्ले ढुका कर फिर से अपनी किताबों में रम गई। लेकिन अब रह-रह कर उसका मन सामने वाली खिड़की को खोलने की ओर लपकने लगा। अभी तक वह बड़े चैन और सुकून से पढ़ रही थी, पर अब उसका सारा ध्यान खिड़की पे अटक के रह गया। ‘’ वह खिड़की खोल कर क्यों नहीं पढ़ सकती...?? क्योंकि ताई जी को शक़ है कि सामने के घर के लड़के मुझे न देखे या उन्हें मुझे पे शक़ है कि मैं उन लड़को के कारण यहाँ बैठकर पढ़ने का ढोंग कर रही हूँ। हुँह, मुझ पर इतना भी भरोसा नहीं.... क्या मैं अच्छी लड़की नहीं हूँ ? क्या पड़ौसी लड़के ख़राब हैं, अग़र मेरी उन पे नज़र पड़ जायेगी तो गुनाह हो जायेगा...? ’’– ललिता का मन कैक्टस के ढेर सारे कांटेनुमा सवालों में टुकड़े – टुकड़े होकर पढाई से छिटक गया । उसके दिलो –दिमाग में समाजशास्त्र की जगह यह दूसरा ही समाजशास्त्र घूमने लगा। तरह-तरह के ख्याल उसे काटने लगे।
तभी फिर थोड़ी देर में ताई जी का एक नया आदेश आंगन से कूदता - फांदता कमरे में आ खड़ा हुआ – ‘’ललिता, चल उठ जा, 4 बज रहें हैं। एक प्याली गरम-गरम चाय तो पिला ज़रा।‘’
3 बजे पढ़ने बैठी ललिता का मन वैसे ही खिड़की बन्द करने के आदेश को लेकर पढ़ाई से उचटा था और वह उसे फिर से किताब में लगाने के लिए जूझती बैठी थी। इतने में चाय की फरमायश हो गई। उसने सोचा, चलो इससे अच्छा तो चाय ही बना दूँ। वह एक खालीपन के साथ उठी, रसोई में गई, चाय बनाई और बड़े प्यार से ताई जी को लाकर दी। घूंट भरती ताई जी मुँह बिचकाती बोली –
‘’अरे,,रे,,रे कितनी कसैली चाय बनाई है, चीनी भी कम। बेटा कोई तो काम ठीक से कर लिया कर।‘’
ललिता को लगा कि वह एकदम नकारा और अयोग्य है।
‘’अच्छा जा छत पर से सूखे कपड़े उतार ला’’ – ताई जी खाट पे अपने पैरों को सीधा करती बोली।
ललिता छत पर एक-एक करके कपड़े करीने से उतारने के साथ-साथ तह भी बनाती जा रही थी कि ताई जी का हिटलर स्वर फिर लहराया – ‘’अरे ओ लड़की कहाँ अटक गई, क्या इतनी देर लगती है कपड़े उतारने में।‘’
ललिता तुरन्त आंगन में नीचे झाँकती बोली – ‘’टाइम तो लगता है थोड़ा, ताई जी, बस आ ही रही हूँ ।‘’
उसने देखा कि ताई जी खाट से उठ कर, आंगन में बीचों बीच खड़ी, टकटकी लगाए, उसे छत पे खोज लेने को परेशान थीं। ‘’ऐसा क्यों करती हैं ताई जी। मुझ पे रत्ती भर भी भरोसा नहीं किसी बात का’’.....ललिता का मन सूखे खड़न्क पत्ते की तरह दिशाहीन सा इधर उधर गिरता पड़ता कहीं दूर उड़ गया। बाकी कपड़ों को वह बिना तह बनाए ऐसे ही ले आई। ताई जी उसे हड़काती सी बोली –
‘’देख, ख़बरदार जो ज़रा भी आसपड़ौस के लड़को की नज़र तुझ पे पड़ी या फिर तूने उनकी ओर नज़र उठाकर भी देखा। ज़माना बड़ा ख़राब है। तू नहीं समझती।‘’
ललिता सोचने लगी कि समझाने का ये ढंग तो बड़ा मारक है। ये मुझे हर रोज़ इस तरह समझाती हैं या कोंचती हैं या इतना टोक-टोक कर लड़को की ओर देखने की प्यास मन में जगाती हैं। मैं कहाँ किसी लड़के को देखने को आतुर हूँ, लेकिन जब ये इस तरह ख़बरदार करती हैं तो ज़रूर मन करता है कि अभी छत पे या खिड़की पे जाऊँ और आसपड़ौस के हर लड़के को बार-बार देखूँ।
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ललिता आखिरी लैक्चर अटैन्ड करके घर लौटी तो अपने कमरे को अस्त-व्यस्त देख असमंजस में पड़ गई। मेज़ की किताबें, पलंग की चादर, अलमारी की कॉपियाँ सभी, अपनी –अपनी जगह से हिली हुई थी। ड्रॉअर से भी छेड़छाड़ की गई थी। वह गुस्से से भन्नाई सी हो गई, लेकिन ताई जी से कुछ पूछना महाभारत को न्यौता देना था। खैर, मन मारकर उसने खुद को ही समझा लिया। किताबें, कॉपी सब क़ायदे से लगाकर रखीं। फिर सबसे नीचे की किताब खोलकर ‘ब्रैड पिट ’ की तस्वीर देखी कि सही सलामत तो है, उसे सही सलामत देखकर वह चिहुँक उठी और हौले से बोली - ‘’ब्रैड पिट आई लव यू ’’। उसे आज तक भारतीय फ़िल्मी सितारों के अलावा कोई और पसंद नहीं आया. पहली बार ऐसा हुआ है कि उसे कोई हालीवुड स्टार इतना भाया है.
ललिता ने मुँह हाथ धोकर खाना खाया। ताऊ जी आज ऑफ़िस नहीं गए थे, सो थोड़ी देर उनसे बैठकर बातें की। ताऊ जी भी सख्त थे, पर ताई जी की तरह बात पे बात पे टुक-टुक नहीं करते थे। ललिता को रह-रह कर माँ की याद सताती। बी.ए. करने तक उसे ताई जी की तानाशाही, अपमानजनक व्यवहार तो झेलना होगा। उसका किशोर मन इस व्यवहार और अजीब माहौल से मानसिक रूप से रुग्ण सा रहने लगा था। कितना अपने मन को समझाए, लेकिन मन विद्रोह करने पे उतारू हो जाता था कितनी बार तो। पर वह कैसे स्वयं को नियंत्रित करती थी, बस वही जानती थी। उसे लगता कहीं ये जंग उसे ले न डूबे। लेकिन तुरंत वह काउंटर लाजिक करती – ‘नहीं, वह तो एक मज़बूत, समझदार लड़की है। चाहे कुछ भी हो, वह ताई जी के घर में अपनी वजह से विस्फोट नहीं होने देगी। घरेलू लड़ाई-झगड़े के कारण वह माँ-बाबू जी के लिए समस्या नहीं बनेगी।‘
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आज कॉलिज में फंक्शन है। ललिता ने ताई जी से कहा – ‘’ताई जी, आज लौटने में थोड़ी देर हो जायेगी, फंक्शन है और प्रिंसिपल साहब का आदेश है कि सभी छात्र-छात्राओं को उपस्थित रहना है। ‘’
सुनते ही ताई जी लगभग भड़कती सी बोली – ‘’अरे वाह, प्रिंसिपल साहब का आदेश है, वे आदेश देना तो जानते हैं, पर क्या लड़कियों की हिफाज़त करना भी जानते हैं ?’’
“ताई जी और लड़कियाँ भी तो होंगी वहाँ, मैं कोई अकेले थोड़े ही होऊँगी। हम सब इकठ्ठे वापिस आएगीं। सीमा का भाई भी लौटते समय साथ होगा तो डर की कोई बात नहीं।“
‘’क्या कहा, सीमा का भाई भी लौटते समय साथ होगा तो डर की कोई बात नहीं – तब तो डर की सारी बात है। भाई तो उसका है, तेरा थोड़े ही है। नहीं तू नहीं जाएगी, बताए देती हूँ।‘’
ललिता ने अपनी खीझ को ज़ब्त करते हुए ताई जी को काफ़ी आश्वस्त करने की कोशिश की, लेकिन सब ढाक के तीन पात रहा। ताई जी तो न मानी, अन्त में हार कर उसे ही उनकी बात माननी पड़ी। व्यर्थ के शक़ शुबहा के कारण ललिता रुक तो गई पर उसके अन्दर घुमड़ता विद्रोह पहले से अधिक सघन हो गया था आज। छोटी-छोटी बातों पे उसे घुटना पड़ता था, मन मसोस कर रह जाना पड़ता था। वह कई बार सोचती कि वह यहाँ ग्रेजुएशन करने आई है या अपने अस्तित्व को कुचलने.....!!??
उसके साथ की सभी लड़कियाँ ख़ूब मस्त, खिली-खिली और प्रफुल्लित रहती थी। हर लड़की का दोस्त था, सिवाय उसके और इस कारण से उसकी कई बार मज़ाक भी बनती थी। पर वह अपनी खिल्ली को फूंक मार कर उड़ा देती थी। उसका युवा मन भी सपनों के राजकुमार के ख्यालों में डूबा रहना चाहता पर ख्यालों में भी ताई जी उभर उभर आती। वह ‘’प्रिन्स चार्मिंग’’ के ख्याल से ही काँप जाती और अपने को गुनहगार समझती। पर हॉलीवुड हीरो ब्रैड पिट के ख्याल से अपने को जुदा न कर पाती थी । बहुत ही अच्छा लगता था उसे । हाँलाकि पूरे दो साल में उसकी दो ही मूवीज़ उसने किसी तरह ताऊ जी की उदारता के कारण दिन के शो में अपनी सहेलियों के साथ देखी थी। उसे ब्रैड पिट पे एक तरह से ‘’क्रश’’ ही था। उसने महसूस किया था कि जब-जब ताई जी उसे किसी भी बात पे फटकारती तो वह बहुत अकेली हो जाती और उसका मन होता कि कोई पुरुष उसे अभय दान दे, पल भर के लिए भरपूर ख़ुशी उसके जीवन में उड़ेल दे और जब भी वह ऐसा सोचती तो पुरुष के ख्याल मात्र से ‘’ब्रैड पिट’’ उसकी आँखों के सामने आकर खड़ा हो जाता। वह उसका रक्षक, उसका साथी, उसका हमराज़ कैसे हो सकता है – वह मन ही मन ख़ुद पे हँसती भी, पर ऐसा अक्सर उसके साथ घटता। जहाँ भी उसे ब्रैड पिट की तस्वीर दिखती वह उसे सँजोकर अपनी ड्रॉअर में या अलमारी की किताबों में छुपाकर रखती। क्रूर ताई जी ने यद्यपि कई बार ब्रैड पिट की तस्वीर हाथ लग जाने पर, फाड़कर फेंकी, पर ललिता का मन भी उसकी तस्वीर लाए बिना नहीं मानता। किसी लड़के से वह बात नहीं करती थी, दोस्ती तो बहुत दूर की चीज़ थी, लेकिन क्या वह अपने मनपसन्द हीरो की तस्वीर भी नहीं रख सकती थी, इस पाबन्दी से वह किसी भी क़ीमत पे समझौता करने को तैयार न थी। वह तर्क करती - यह तो सरासर ज़्यादती है। एक ओर ताई जी का हिटलरी विद्रोह, तो दूसरी ओर ललिता के किशोर मन का विद्रोह जो उसके न चाहते हुए भी सीली आग की तरह न बुझता, न भड़कता – लगातार सुलगता रहता।
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किसी तरह ललिता के ग्रेजुएशन के तीन साल कटे और वह अनेक कुंठाओं से भरी अपने माँ-बाबू जी के पास नहटौर लौटी। माँ-बाबू जी से मिलकर वह कई दिनों तक जी भर के रोई। अग़र अपने ही शहर के कॉलिज में ग्रेजुएशन की सुविधा होती तो उसके बाबू जी कभी भी उसे ताई जी के पास पढ़ने न भेजते। अपनी होनहार बेटी को वे ग्रेजुएशन अवश्य कराना चाहते थे, इसलिए ही मजबूर होकर उनहोंने भेजा । उसके बाद अच्छा घर देख कर उसकी शादी करना चाहते थे। उनका विश्वास था कि सँस्कारी परिवार का सँस्कारी लड़का मिल गया तो एम. ए. तो ललिता शादी के बाद भी कर सकती है। माँ के कैंसर पीड़ित होने के कारण ललिता का विवाह उसकी माँ की ख़ासमख़ास इच्छा ही नहीं, बल्कि एक दुआ थी, प्रार्थना जैसी थी। वह अपने जीते जी अपनी प्यारी बेटी का घर बसा हुआ देखना चाहती थी। जीवन में ललिता का एक ही ‘’पैशन ’’ था – उच्चतम शिक्षा हासिल करना, ख़ूब पढ़ना- लिखना। लेकिन उसी उत्कट अभिलाषा को उसे, हालात से मजबूर माँ- बाबूजी के कारण बेदर्दी से दबा-दबाकर सुलाना पड़ा और शादी के लिए हाँ करनी पड़ी। पहली बार उसने अपने माँ- बाबू जी के घर में स्वयं को वैसे ही ग़ुमनाम सन्नाटे से भरा पाया, जैसे कि अक्सर वह ताई जी के घर में उस पे हावी हो जाया करता था। वह निहायत अकेली, बेचारी और कुछ भी कर पाने में अशक्त निर्जीव सी बिस्तर पे औंधे मुँह पड़ी थी कि तभी उसके दुखी मन और अकेलपन का साथी, ब्रैड पिट उसकी आँखों में उतरना शुरू हुआ। उसने मानो आँखें मूँद कर, उसे नज़रबंद कर लेना चाहा। वह बहुत देर तक एक मीठे एहसास से भरी यूँ ही पड़ी रही। फिर हौले से उसके नाज़ुक होंठ खुले और वह बुदबुदायी - ‘’ब्रैड पिट आई लव यू ’’। एक गुनगुना एहसास उसे सरापा सिहरा गया। कुछ देर बाद शीतल सुकून से भरी वह एकदम तनाव मुक्त हो गई।
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एक साल बीतने से पहले ही ललिता का रिश्ता एक अच्छे ख़ानदान में हो गया। लड़का सॉफ़्टवेयर इंजीनियर था। जुलाई में ललिता का रिज़ल्ट भी आ गया। उसने प्रथम श्रेणी में बी.ए. पास किया था। माँ बाबू जी की खुशी का ठिकाना न था। ललिता तो एम.ए. करने के लिए लालायित थी। पर माँ की दिन पे दिन बिगड़ती हालत के आगे उसके पास अपनी इच्छा कुर्बान करने के अलावा और कोई निदान न था।
मनोहरलाल जी ने अपनी क्षमता से बढ़कर, बड़ी धूमधाम से अपनी इकलौती बेटी की शादी की। ललिता की शादी के 6-7 महीने बाद, माँ भी दुनिया से विदा हो गई। ललिता के दुख का पारावार न था। उसे रह-रह कर हावका आता कि काश, ग्रेजुएशन के कारण उसे माँ से तीन साल दूर न रहना पड़ता, तो वह माँ के साथ अधिकतम समय गुज़ार सकती थी। उसे लगता कि उसने माँ को भी खोया, ग्रेजुएशन फ़र्स्ट डिवीज़न में पास किया तो क्या हुआ, एम.ए. करने से भी वंचित रही। एक तरह का खालीपन उसे घेरे रहता। ताई जी के घर रह कर वह हमेशा हर छोटी-छोटी बात के लिए तरसती रही, उनके ताने और डाँट खाती रही। घर वापिस आकर माँ बाबू जी के कारण आगे पढ़ने की सहज इच्छा भी उसे त्यागनी पड़ी। त्याग जैसे उसके व्यक्तित्व का हिस्सा बन गया था। उस पे एक अजीब एकाकी किस्म का जुनून हावी होता जा रहा था। अपने ’’पैशन ’’ को दफ़न कर, वह शादी के बाद ससुराल ज़रूर आ गई थी, पर अकेली नहीं – अपने ’’क्रश ’’ ब्रैड पिट को भी साथ ले आई थी। कभी-कभी वह मन ही मन सिहर उठती कि ये कैसा जुनून है या मानसिक रिश्ता है जो किस कारण से इतनी सघनता से कायम होता जा रहा है....!!
एक अवचेतन अवस्था में जैसे वह एक के बाद एक सारे काम करती जा रही थी। शादी, विदाई, सुहागरात और फिर रोज़मर्रा की दिनचर्या। पति शशांक ने जब उसे पहली रात को छुआ तो उसे अच्छा नहीं लगा, वह शरमाहट से नहीं, बल्कि कड़ुवाहट से भरी सकुचाई। दूर सरकी। उसे लगा कि वह अपने ‘’प्रिंस चार्मिंग’’ (ब्रैड पिट) के साथ बेवफ़ाई कर रही है। लेकिन उसके बाद हर रात, शशांक के स्पर्श से धीरे-धीरे वह अवचेतन अवस्था में तैरने लगती और अवचेतना की हर लहर के साथ एक दूसरी ललिता जी उठती। शशांक उसके लिए ‘ब्रैड पिट’ में रूपान्तरित हो जाता । ललिता उसकी बाँहों में जिस प्यार और मधुरता से समाती, उसे देखकर शशांक कभी सोच भी नहीं सकता था कि वह अपनी पत्नी द्वारा इस तरह छला जा रहा है कि जिसका एहसास न उसे ख़ुद को है और न छलने वाली को। उन दोंनो के बीच एक अजनबी रिश्ता, अजनबी ढंग से रोज़ प्यार के अन्तरंग क्षणों में जन्म लेता और सुब्ह होने तक मर जाता । ललिता शशांक की पत्नी होकर भी पत्नी नहीं बन पाई थी। शशांक के साथ प्रेम से सराबोर पलों में भी ब्रैड पिट उसके साथ होता। सोते-सोते अनेक बार तानाशाह ताई जी पैर पटकती, उसे कोंचती सपने में चली आती, तो वह झट से पास लेटे शशांक से लिपट जाती और बड़बड़ाती – ‘’मुझे अकेला मत छोड़ना, मुझे अकेला मत छोड़ना.....।’’ नींद से जागा शशांक भी उसे बाँहों में भरकर प्यार से थपथपाता आश्वस्त करता और ब्रैड पिट के ख़्यालों में रची- बसी ललिता, शशांक की बाँहों में समाती चली जाती। वह उससे इस तरह लिपटी, बाँहों में सिमटी पुन: नींद में खो जाती।
धीरे-धीरे, बीतते समय के साथ ललिता हर पल, पर दिन शशांक और ब्रैड पिट के पृथक अस्तित्व के साथ पूरे होशो-हवास में जीने लगी। अब वह अवचेतना में नहीं अपितु, चेतनावस्था में अपने ‘’प्रिंस चार्मिग’’(ब्रैड पिट) के साथ रहती और जीती थी। वह उसका फ़ुलटाइम ’’आब्शैसन ’’ बन चुका था। जो पहले उसके अवसाद और निराशा का साथी था, अब वह हर क्षण साथ दिलोदिमाग में बना रहता था और उसे कोमल, रुमानी एहसास से भरे रखता।
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‘’ललिता, आज शाम को एक दोस्त के घर डिनर पे जाना है , मैं 8 बजे घर आ जाऊँगा, तुम तैयार रहना’’ – तैयार होते हुए शशांक ने ललिता से कहा।
ललिता ने सूनी आँखों से शशांक को देखते हुए -‘’हाँ ठीक है’’ – कहा और रसोई में चली गई।
ललिता का वैवाहिक जीवन सुखी था। हर तरह की सुख सुविधा थी। शशांक के माता-पिता दूसरे शहर में रहते थे। शशांक से उसे कोई शिकायत न थी। वह अपनी ओर से उसका ख़्याल रखता। जब समय मिलता तो बाहर घुमाने भी ले जाता। फिर भी उन दोंनो के बीच एक अधूरापन था जो तीन वर्ष बीत जाने पर भी उनके वैवाहिक जीवन को सम्पूर्ण नहीं बना पाया था।
शशांक को पता था कि ललिता ब्रैड पिट की फैन है, सो उसने उसकी फ़िल्मों की डी.वी.डी उसके लिए लाकर दी थी जिससे उसके पीछे वह अकेली बोर न होए बल्कि अपने मनपसन्द हीरो की मूवीज़ देखे। ब्रैड पिट की दीवानी ललिता उसकी एक-एक फ़िल्म को कई-कई बार देखती और ‘’ब्रैड पिट आई लव यू ’’, ‘’ब्रैड पिट आई लव यू ’’,‘’ब्रैड पिट आई लव यू ’’...न जाने कितनी बार कहती। नतीजा ये हुआ कि ब्रैड पिट और भी भयंकर रूप से उसके दिलोदिमाग़ में गड़ गया। सोते-जागते, काम करते – हर पल ब्रैड पिट ललिता के ख़्यालों में बना रहता। इन्तहा ये हो गई कि अब वह शशांक की अवहेलना करने लगी।वह अपनी ज़हनी दुनिया में जीती। उसने अपनी एक अलग ही काल्पनिक दुनिया बना ली थी, जिसमें ब्रैड पिट होता और वह होती। यहाँ तक कि उसने शशांक के पास सोना भी बन्द कर दिया। शुरु-शुरु में उसके व्यवहार की बेरुखी शशांक दिनभर काम में लगे रहने के कारण अधिक नहीं जान पाया था, लेकिन उसके गैरो की तरह अलग सोने पर, छूने पे छिटक के अलग हो जाने पर शशांक का माथा ठनका। उसने बहुत सोचा पर उसे कोई कारण दूर-दूर तक नज़र नहीं आया। उसके मन शक उपजा कि शादी से पहले किसी और से तो ललिता प्यार नहीं करती थी...या कहीं अब कोई और तो उसके जीवन में नहीं आ गया....?? वह परेशान रहने लगा। ऑफिस जाता पर काम से उखड़ा-उखड़ा रहता। एक दो बार वह शक़ से बिंधा अचानक घर भी लौट-लौट आया कि कहीं ललिता अपने किसी प्रेमी के साथ उसके पीछे रंगरेलियाँ तो नहीं मना रही। पर घर में उसको अकेला पाकर उसका शक़ भी ग़लत निकला। अब वह और भी परेशान रहने लगा। उधऱ ललिता अपने में बड़ी मगन रहती। खूब सजी सँवरी, खुश रहती लेकिन उसके साथ न कहीं जाती, न उसके निकट आती।
ललिता शशांक में ब्रैड पिट का व्यक्तित्व, उसकी सी मुस्कुराहट, उसके हाव-भाव, उसके देखने का खास अन्दाज़ खोजती और ये सब न पाकर उस पे खीजती। उसके साथ ऱूखा व्यवहार करती। रविवार के दिन तो वह न लंच बनाती, न डिनर । शशांक को डबलरोटी और ऑमलेट पे गुज़ारा करना पड़ता। दरअस्ल ललिता के लिए शशांक को छुट्टी के दिन घर में झेलना मुश्किल हो जाता था। सारे दिन शशांक का यूँ घर में बने रहना उसे नाग़वार लगता । उसके सामने डी.वी.डी. पे ब्रैड पिट की फ़िल्म देखने में भी उसे ख़लल पड़ती महसूस होती, सो वह न डी.वी.डी. देखती, न खाना बनाती,न शशांक से बात करती, यानी के पूरी तरह उसकी उपेक्षा करती और इस हद तक कि शशांक को अपनी अस्तित्वहीनता का एहसास होने लगता। उसके अलावा कौन ललिता के जीवन मे छा गया था जिसके कारण वह उसकी इस बुरी तरह उपेक्षा करती है - वह अक्सर सोचता। पर कुछ समझ न पाता ।
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शशांक ने उसे खुश करने के लिए एक दिन ऑफ़िस से लौटकर डी.वी.डी. पर ब्रैड पिट की फ़िल्म देखनी चाही। तभी उसके हाथ से डी.वी.डी. फ़र्श पे गिरा और चटक गया। यह देखकर ललिता शशांक पर ऐसी आगबबूला हुई कि वह अवाक् देखता रह गया। ब्रैड पिट का डी.वी.डी. ही टूटा था - ब्रैड पिट को तो कुछ नहीं हुआ था। एकाएक शशांक के मन में एक विचार ने दस्तक दी कि उसकी पत्नी ब्रैड पिट के प्रेम में तो गिरफ़्तार नहीं है ? क्योकि ब्रैड पिट का डी.वी.डी. चटकने पर उसने जैसी प्रतिक्रया दी थी वह साफ़-साफ़ बता गई थी कि ललिता ब्रैड पिट के साथ एक ऐसा सघन ज़हनी रिश्ता बनाए हुए है कि उसके आगे वह सारी दुनिया कुर्बान कर सकती है।
ललिता को अपनी फ़ैन्टेसी पे नियन्त्रण नहीं था। शशांक सोचने लगा कि ललिता में यह भावनात्मक असन्तुलन किस कारण से उपजा है जिसका नकारात्मक असर उन दोंनो के वैवाहिक जीवन पे पड़ रहा था। उसकी कौन सी इच्छाओं का दमन हुआ है कि वह कभी बिखरी, कभी उखड़ी, कभी उचटी तो कभी अपने आप में मगन रहती है । उसका होना, न होना तो ललिता के लिए मायने ही नहीं रखता । ललिता का यह मात्र रूखापन था या बेवफाई, शशांक समझने में असमर्थ था। अपने किसी मित्र से इस समस्या को बाँटने में उसे अपमान महसूस होता था। माता-पिता से वह इस बात का ज़िक्र तक भी नहीं करना चाहता था। बहरहाल शशांक ने किसी से कुछ न कह कर ललिता की उस अजीबोग़रीब बेरुखी का बोझ इसी तरह ख़ामोशी से सहने का इरादा किया, इस ख़्याल से कि कभी तो वो दिन आएगा, जब ललिता का दिल उस बेगुनाह पर पिघलेगा।
वह दयनीय बना सोचता कि -‘’ ब्रैड पिट तो मैं बन नहीं सकता, अब यही दुआ की जा सकती है कि ललिता को ब्रैड पिट में - मैं नज़र आने लगूँ या मुझमें उसे ब्रैड पिट नज़र आने लगे । ‘’
रात के 2 बजे थे । ललिता गहरी नींद की आग़ोश में थी पर शशांक से नींद कोसो दूर थी। सिगरेट पीता वह, दूसरे बिस्तर पे सोई ललिता के पास पडी कुर्सी पे जा बैठा। उसके दिमाग़ में अनवरत विचारों के छल्ले और होंठो पे धुएँ के छल्ले बन रहे थे कि तभी ललिता ने खूबसूरत अँगड़ाई ली और करवट बदलती बोली - ‘’ब्रैड पिट आई लव यू.....प्लीज़ डोन्ट लीव मी एवर.... ’’
शशांक जो उस समय सिगरेट की तरह सुलग रहा था, ललिता के वे शब्द सुनकर मनो वह राख होने लगा था... उसके मन में आया कि वह ललिता को झिंझोड़ कर जगाए और कहे – ‘’बट, आई मस्ट लीव यू फॉर एवर…….’’ यह बेरुखाई है या बेवफाई.....वह बुझा बुझा कुछ भी समझ पाने में असमर्थ था ।
(कहानी) जनवादी न्याय
जनवादी, समाजवादी, क्रान्तिकारी कार्यकर्ता, स्थानीय तीन विद्यालयों के संस्थापक, महिला एवं
बालोध्दार गैरसरकारी संस्था के अध्यक्ष – यानी कुल मिलाकर एक ‘ बहुआयामी सामाजिक व्यक्तित्व ‘।
नाम ‘ सम्मान राय ‘। सम्मान राय के घनिष्ठ मित्र ‘ ज्ञानेश्वर द्विवेदी ’, जो शहर के प्रख्यात डिग्री कॉलिज
में समाजशास्र के विभागाध्यक्ष थे और खासे जाने माने प्रतिष्ठित साहित्यकार भी।
सोशल एक्टिविस्ट संयोगिता आज एकबार फिर सुलग उठी। उसकी परिचिता, नवनियुक्त प्रवक्ता ‘नन्दिनी’
तथाकथित जनवादी, समाजवादी, लोकप्रिय व्यक्तित्व सम्मान राय और उनके हमराज़, हमनशीं ज्ञानेश्वर
द्विवेदी की हवस का शिकार बन गहरे अवसाद में डूबी थी। प्रतिरोध करने पर नौकरी जाने से अधिक,
सामाजिक छवि पे हमेशा के लिए आँच आने का भय उसका दम घोट रहा था। अपने रुतबे का इस्तेमाल
करते हुए, मि.राय ने नन्दिनी को आवश्यक कार्य के छद्म जाल में फँसाकर जिस तरह छिन्न-भिन्न
किया था – वह उस घटना को दिलोदिमाग़ से मिटा देने के लिए मौत को गले लगाना चाहती थी। इस
योजना के पीछे मास्टर माइन्ड था - ज्ञानेश्वर द्विवेदी का। बामुश्किल संयोगिता ने नन्दिनी को
सम्भाला। इससे पूर्व एक संघर्षरत युवती को लेखन के क्षेत्र में पाँव जमाने को आतुर देख इन दोनो
शातिरों ने मिलकर उसे कामक्रीड़ा का खिलौना बनाया था। इस ‘ दुर्घटना ‘ के बाद वह अनुभवहीन
युवती अपने असली लक्ष्य से भटककर इन दो जनवादी महानुभावों द्वारा देहभोग के दलदल में ऐसी
धँसती गई कि चाह कर भी कभी उबर न पाई।
सम्मान राय और ज्ञानेश्वर द्विवेदी के समाजवादी – परोपकारी रूप के पीछे छिपा कामलोलुप भेड़िया
शिकार दबोचने के लिए हर पल मुँह बाए तैयार रहता था। उनका यह असली रूप उनके ख़ासमख़ास
2)
लोगों तक ही उजागर था, वरना शेष पर वे अपनी ऊँची छवि की धाक जमाए आदर और सराहना के
पात्र बनते रहते थे। तीन वर्ष पूर्व केरल के ग़रीब घर की किशोरी ‘कुंजमणि’ दिल्ली के नामी अस्पताल
में नौकरी पाने के लिए सम्मान राय के पशु की ऐसी बलि चढ़ी कि तब से अब तक बलि चढ़ते-चढ़ते
बेचारी चरमरा गई है लेकिन वह दानव आज भी अपने दोस्त द्विवेदी के साथ उस निरीह को चूसने से
बाज़ नहीं आता। ये तो मात्र कुछ उजागर क़िस्सों का ही हवाला है, दबे छिपे किस्सों की तो शायद गणना
ही नहीं हो सकेगी।
इन दोनों महानुभावों की कुत्सित हरकतों की शिकार नारियाँ अक्सर बदनामी के डर से
मूक बनी जीती रही हैं या फिर इनके चंगुल से बच निकलने के चक्कर में शहर छोड़ कर, कहीं गुमनाम
ज़िन्दगी जीने के लिए मजबूर हुई हैं। जब 2005 में वन्दना नाम की कॉलेज छात्रा ने फाँसी लगाकर
आत्महत्या कर ली थी, तो सम्मान राय और ज्ञानेश्वर द्विवेदी का नाम इस हादसे को लेकर बहुत उछला
किन्तु कहा जाता है कि बाद में पुलिस ने इनसे बहुत मोटी रक़म डकार कर मामला ऐसा रफ़ा-दफा
किया कि आज तक उसकी मौत का सही कारण पता नहीं चल पाया ।
प्रखर और संवेदनशील संयोगिता किसी के भी साथ होने वाले ऐसे शोषण और अन्याय का
विस्तृत ब्यौरा अपने दिलोदिमाग़ में ख़ामोशी से दर्ज़ करती जा रही थी और उस सही वक्त की तलाश में
रहती थी कि कब अन्यायियों को निरीह लोगों के शोषण का दण्ड दे। उसका सोचना था कि ‘सम्मान
राय’ और ‘ज्ञानेश्वर द्विवेदी ‘ का पाप-कुम्भ जब गले तक भर जाएगा तो वह उसे फोड़कर चकनाचूर कर
देने का नेक काम करते देर नहीं करेगी और उसे व उसके उतने ही नीच साथी ‘ज्ञानेश्वर द्विवेदी ‘ को
ऐसा सबक़ सिखायेगी कि वे दोंनो औरत की रुह से भी काँपेगें। संयोगिता ने सोचा कि ऐसी शातिर
छलिया जोड़ी को छल से ही दबोचा जाना न्यायोचित है। इन दोनो को वह पलायन का कोई मौका नहीं देना चाहती थी।
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दिन भर के काम से थकी, संयोगिता एक कप कॉफ़ी पीने के लिए कनॉटप्लेस के कॉफ़ीहाउस में एक
कोने की टेबल पे अपेक्षाकृत शान्त सी जगह देखकर बैठ गई। कॉफी की प्रतीक्षा करती बैठी थी कि तभी
सम्मान राय अपने दल-बल सहित कुछ दूरी पर कुर्सियों पे जम गए। अब तक संयोगिता की कॉफ़ी आ
गई थी। पलक झपकते ही सम्मान राय की टेबल पर भी कॉफ़ी और स्नैक्स आ गए। उन सबकी कॉफ़ी
और स्नैक्स पर ‘सैक्स’ की दबे स्वर में चर्चा होने लगी। उन लोगों का दबा स्वर भी इतना ऊँचा था कि
संयोगिता तक उनकी बातें स्पष्ट पहुँच रहीं थी। वह जंगली झुंड औपचारिकतावश बीच-बीच में राजनीति
और सामाजिक मुद्दों को भी घसीट रहा था, पर घूम फिर कर अपने चहेते विषय पे उतर आता था।कभी
कोड मिश्रित भाषा में तो, कभी बकबक की मदहोशी में खुल्लमखुल्ला वे सब चटखारे ले लेकर नारी
चर्चा करने में लगे पड़े थे। संयोगिता उनकी गिरी हुई सोच, उनकी बुध्दि की कंगाली से छटपटा रही
थी। स्त्री और पुरुष के सहज पाक रिश्ते को सम्मान राय और उनके परममित्र ज्ञानेश्वर द्विवेदी
अपने चाटुकारों के साथ मिलकर जिस तरह कीचड़ से मथ रहे थे, उसे सुनकर संयोगिता जिस तरह
आगबबूला हो रही थी, उसे तो बस वही जानती थी। उसे लगा कि ये मनुष्य हैं या पशु ! क्या ईश्वर
मनुष्य के रूप में ऐसे निकृष्ट जीव भी बना सकता है ? उसे वे पशु जाति में भी - निपट ‘जंगली
जानवर’ नज़र आए, जिनके समाज में न रिश्ते होते हैं, न बंधन, न सोच, न विवेक - बस सारे कार्य
देह के स्तर पर होते हैं। जब वे जठराग्नि और कामाग्नि से आन्दोलित होते हैं तो सीधे सामने वाले
को अपना निवाला बनाते हैं। संयोगिता को लगा ऐसे ही कुछ पशु कॉफ़ी हाउस में धरना दिए बैठे
है जो नग्न वार्तालाप से अपनी चिरज्वलन्त और अतृप्त कामक्षुधा को बहला रहे हैं। संयोगिता ने
अपनी कॉफ़ी कड़वाहट के साथ गटकी और वहाँ से तीर की तरह उठ सीधे बाहर आ गई। सामाजिक
कार्यकर्ता के रूप में संयोगिता की पहचान अभी धीरे-धीरे बन रही थी। निश्चित रूप से उस क्षेत्र की
वह आने वाले समय की एक अद्भुत साहसी सैनिक थी। पीड़ित नारी हित में वह सम्मान राय और
ज्ञानेश्वर द्विवेदी जैसे घटिया लोगों के घिनौने चेहरे समाज के सामने उघाड़ देना चाहती थी। वह
अक्सर यह सोचकर हैरान होती कि समाज का चिन्तनशील, संवेदनशील वर्ग ऐसे नक़ली जनवादी और
समाजवादी लोगों की कुत्सित गतिविधियों से वाक़िफ़ होकर भी, उनके ख़िलाफ़ और पीड़ितों के पक्ष में
कोई दमदार क़दम क्यों नहीं उठाता ? क्यों ऐसे वाकयों को नज़रअन्दाज़ करते बैठा रहता है ? समाज
के लोग सम्मान राय और ज्ञानेश्वर द्विवेदी जैसे गुनहगारों का क्या सोचकर लिहाज करते चले जाते हैं
और वे बेशर्म एक के बाद एक गुनाहों का ढेर लगाते जाते हैं। यदि समाज का संभ्रान्त विचारशील वर्ग
हर उम्र की औरतों के साथ घटती हैवानी वारदातों को सिर्फ़ अपनी आलोचना, अफ़सोस और भर्त्सना
तक सीमित न रख, उनके विरोध में दृढ़ संकल्प के साथ उठ खड़ा होए तो निश्चित रूप से सम्मान राय
और ज्ञानेश्वर द्विवेदी जैसे ‘ रुग्ण तत्वों ‘ की हिम्मत टूटे, उनकी बेलगाम ज़ुबान खुलने से पहले
हज़ार बार सोचे और वे औरतों के प्रति अपना नज़रिया बदलने पे विवश होए। संयोगिता का आक्रोश
मात्र खेद या गुनहगारों की आलोचना तक ही सिमट कर नहीं रह जाना चाहता था, अपितु वह पूरे
दम-ख़म से उन दानवों को ऐसी धूल चटा देना चाहती थी कि भविष्य में वे जनवादी-समाजवादी
मुलम्मे को चढ़ाए सारी एय्याशी करना भूल जाए।
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“क्या मैं अन्दर आ सकती हूँ “ – संयोगिता ने सम्मान राय के विशाल कार्यालय परिसर में बने
पंचसितारा शैली में सजे धजे ऑफ़िस के विज़िटर रूम में हर कूटनीति के साथ धड़ल्ले से प्रवेश
किया। विज़िटर रूम से अटैच्ड, अपने ग्लेज़ड कमरे में सम्मान राय ने अतिथि कक्ष में आने जाने वाले
अतिथियों पे – ख़ास तौर से महिला अतिथियों पे सरसरी नज़र डालते रहने के लिए शातिर प्रबन्ध
किया हुआ था। कोई उन्हें भा गई तो क्रम भंग करके वे इन्टरकॉंम से सेक्रेटरी को आदेश देकर
उसे अपने कमरे में पहले बुला लेने की ख़ास अनुकम्पा करते थे। संयोगिता के साथ भी उन्होने
यही किया। मुश्किल से वह पाँच मिनट ही विज़िटर रूम में बैठी थी कि तभी अन्दर उसके लिए बुलावा
आ गया। छरहरी देहयष्टि वाली संयोगिता आत्मविश्वास के ऊपर भोलेपन का मुखौटा चढ़ाए, सम्मान
राय के भव्य कक्ष में पहुँची। सम्मान राय उसे अपने प्रेम छलकाते नेत्रों से निगलते हुए, औपचारिक
शालीनता का छींटा देते हुए बोले –
“आइए, आइए,बैठिए। आपका शुभनाम ?“
“ जी, संयोगिता ‘’
“कहिए में आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ ?”
“सर, आप ऐसा कहकर मुझे शर्मिन्दा मत कीजिए प्लीज़। मैं तो बस एक छोटी सी मदद की
आशा से आपके पास आई हूँ।“
“ अरे, नहीं, नहीं छोटी क्यों भरपूर मदद लीजिए, हम तो है ही समाज सेवा को समर्पित। वैसे आप करती
क्या हैं – समाज-सेविका, शिक्षिका, लेखिका या (मन ही मन में - मृग मरीचिका) “ – सम्मान राय
चाटुकार की भाँति बोले।
“जी मैं स्वैच्छिक कार्यकर्ता हूँ “ – संयोगिता ने लजाने का नाटक करते हुए कहा – “हाल ही में
अनाथाश्रम के बच्चों के मनोविज्ञान के अध्ययन के लिए जब मैं उनके आश्रम गई तो मैंने उनका
जीवन रोज़मर्रा की छोटी-छोटी सुविधाओं से रहित पाया। उस तंग हालत में उन्हें यूँ जीते देख मेरा
दिल भर आया। मैंने आपकी अनेक बार अनेक लोगो से बड़ी प्रशंसा सुनी थी कि आप ज़रूरतमन्दों
के मसीहा हैं, सो मैं उन बच्चों के लिए आशा सँजोए आप के पास आई हूँ कि यदि आप कुछ
आर्थिक सहायता कर दें तो वे बच्चे बेहतर जीवन जी सकते हैं।“
संयोगिता के मीठे स्वर से इस तरह अपनी प्रशंसा सुनकर सम्मान राय बड़े गदगद हुए। ऐसी संस्थाओं
को लाख दो लाख रुपये देना उनके लिए कोई बड़ी बात नहीं थी। उनका मन तो बल्लियों उछल रहा था
कि इस दान-राशि से इस ‘कोमलांगी’ को उपकृत करके, आने वाले समय में इसका रसपान करने का
मौका ज़रूर हाथ लगेगा। उनकी मन ही मन अपनी अलग ही प्लानिंग चल रही थी। सम्मान महाशय ने
बिना किसी देरी के इन्टरकॉम पर अपनी सेक्रेटरी को अन्दर आने का आदेश दिया। सेक्रेटरी के अन्दर
आने पर वे संयोगिता से बोले –
“क्यों मैडम, पचास हज़ार, अस्सी हज़ार या एक लाख - कितने का चैक दूँ ”
“सर, जो आप आसानी से दे सकें – पचास से भी काम चल जायेगा, मैं सोचती हूँ “ – संयोगिता संकोच
से बोली।
“एक लाख से कम भी क्या देना” –सम्मान राय ने संयोगिता को अपनी दानवीरता में लपेटने की दिली
इच्छा से सेक्रेटरी को एक लाख का चैक तैयार करने का आदेश दिया और दो कप कॉफ़ी भेजने के ले
भी कहा।
पैनी बुध्दिवाली संयोगिता मन ही मन सम्मान राय पे मुस्कुराती अपने अगले पैतरे के लिए तैयार हो
चुकी थी। कॉफ़ी के कारण वह उस हीन व्यक्ति के साथ अब और अधिक देर वहाँ बैठकर अपना समय
नहीं गंवाना चाहती थी, सो उसने ज्यों ही उठना चाहा, सम्मान राय लगभग उसे जैसे पकड़ कर बैठाने
को आतुर सा बोला –
“अरे, आप कहाँ चली मैडम, सेक्रेटरी चैक यही लाकर देगी। कॉफ़ी भी आती होगी।“
“नहीं सर आपके और भी मिलने वाले बाहर इन्तज़ार करते बैठे हैं, कॉफ़ी फिर कभी सही, आपने इतनी
बड़ी राशि दी, इतना ही बहुत है और चैक के लिए मैं विज़िटर रूम में प्रतीक्षा कर लूंगी। “
“अरे,रे,रे,रे ये आप क्या कह रही हैं, विज़िटर रूम में क्यों, आप यही प्रतीक्षा करेगी। बस चैक आता ही
होगा और कॉफ़ी भी। देखिए, ज़रूरतमन्दों की तन,मन,धन से मदद करना हमारा फ़र्ज है। भविष्य में भी
कभी भी किसी तरह की मदद की आवश्यक्ता हो तो आप बेझिझक मेरे पास आइए।“
इतने मे कॉफ़ी आ गई । संयोगिता को न चाहते हुए भी रुकना पड़ा। कॉफ़ी पीते हुए सम्मान राय
संयोगिता के बारे में व्यक्तिगत जानकारी हासिल करता रहा। संयोगिता ने भी जानबूझकर सम्मान राय
को ऐसी जानकारी दी कि उसे वह एक निरीह, अकेली और अपने कार्यक्षेत्र में आगे बढ़ने की इच्छुक
नज़र आई। कुछ ही क्षणों में चैक भी आ गया । सम्मान राय ने अपने हस्ताक्षर करके बड़े ही
विनम्र अन्दाज़ में संयोगिता को चैक थमाया।संयोगिता झटपट उठ खड़ी हुई। उसे जाने के लिए उतावला
हुआ देख, सम्मान राय हड़बड़ाया सा बोला –
“हाँ, अपना फोन नम्बर, और पता सेक्रेटरी को नोट करा दीजिएगा और सम्पर्क में रहिएगा । और यह
भी याद रखिएगा कि आपका और मेरा कार्यक्षेत्र लगभग एक सा ही है। हम दूसरों की सेवा करते हुए
बहुत आगे निकल सकते हैं।“
“जी, जी, क्यों नहीं, आपने सही फ़रमाया। में जल्द ही आपसे मिलूँगी। अच्छा, सर बहुत-बहुत धन्यवाद”
और वह नमस्कार करती वहाँ से तुरन्त निकल गई।
बाहर सम्मान राय की वफ़ादारी से ड्यूटी बजाने वाली सेक्रेटरी ने तेज़ी से जाती संयोगिता को
“एक्सक्यूज़ मी” कह कर रोका और उसका फोन नम्बर और पता डायरी में नोट किया तथा रजिस्टर में
चैक प्राप्ति के हस्ताक्षर भी लिए।संयोगिता तो अपना मोबाइल नंबर देने को तैयार ही थी जिससे आगे
की योजना कामयाब हो सके।
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दो दिन बाद संयोगिता के मोबाइल पे एक अपरिचित नम्बर से कॉल आई। संयोगिता ने “हैलो” कहा
तो उधर से पुरुष स्वर लहराया – “ संयोगिता जी मैं सम्मान राय बोल रहा हूँ कैसी हैं आप ?
“जी मैं ठीक हूँ” – उसे मन में कोसती संयोगिता ने छोटा सा जवाब थमाया।
“यह मेरा व्यक्तिगत मोबाइल नंबर है, आप सेव कर लीजिएगा। ऐसा है कि शनीवार को मैंने शहर के
समाजसेवी कार्यकर्ताओं व कुछ परिचित मित्रों को रात्रि भोज पर बुलाया है, आप भी उसमे सादर
निमंत्रित हैं।“ सम्मान राय रस घोलते से बोले।
“सर, मैं इस पार्टी मैं क्या करूँगी। मैं किसी को जानती भी नहीं” – संयोगिता ने संवाद जड़ा।
“अरे संयोगिता जी, इसलिए तो आपका आना और भी ज़रूरी है। इस पार्टी में सबसे आपका
परिचय हो जाएगा। देखिए आपको आना ही है।“
“जी, अच्छा आ जाऊँगी “ – अपनी अगली चाल के लिए तैयार संयोगिता ने सम्मान राय को आशस्वत
करते हुए कहा।
संयोगिता की योजना कामयाबी की ओर बढ़ रही थी। वह अदम्य जोश से भरी थी, किन्तु पूरे होश के
साथ....। नारी उध्दार के नाम पे नारी का जंगली जानवर की तरह शोषण करने वाले तथाकथित
शिक्षित, सभ्य, विचारशील, समाजवादी, जनवादी उन दो प्रतिष्ठित मर्दों का घिनौना रूप वह शीघ्र ही
समाज के सामने लाने वाली थी। सम्मान राय और ज्ञानेश्वर द्विवेदी की कामक्रीड़ा की बलि चढ़ी, कलपती
आत्मा और देह का बोझ ढोती नारियों की ओर से संयोगिता उन दोंनो के मुँह पे हमेशा के लिए एक
ऐसा करारा तमाचा जड़ने को कटिबध्द थी, जो हमेशा उन्हे काली करतूतों की याद दिला कर, उन्हें इतना
भयबिध्द करे कि भविष्य में वे नारियों का शोषण करना भूल जाएँ। साथ ही प्रतिरोध न कर सकने
वाली स्त्रियाँ और कुछ कर पाने में असमर्थ हों तो कम से कम आत्मरक्षा की तो हिम्मत जुटा पाए।
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इन चार दिनों में संयोगिता ने बेहद समझदारी और चतुरता से सम्मान राय और ज्ञानेश्वर द्विवेदी के
ख़िलाफ़ ‘भांडाफोड़ अभियान’ की पूरी तैयारी कर ली थी। इन्तज़ार की घड़ी बीती और शनीवार का दिन
भी आ पहुँचा। 8 बजे तक संयोगिता सम्मान राय के आलीशान बंगले के खूबसूरत लॉन में आयोजित
पार्टी में पहुँच गई।
संयोगिता ने देखा कि महाशय ने लम्बी चौड़ी पार्टी न रख कर, सिर्फ़ 20-25 लोगों की छोटी सी
डिनर पार्टी रखी थी। अब तो वह अच्छी तरह समझ गई थी कि यह डिनर मात्र उसे चंगुल में फंसाने
का एक बहाना थी। सो वह भी तैयार थी अपने वार के लिए। आज उसे देखना था कि कौन बाज़ी
मारता है – नारियों के भक्षक सम्मान राय और ज्ञानेश्वर द्विवेदी या नारी जाति की रक्षक वह
स्वयं......!
पार्टी बड़े ढंग से शुरू और ख़त्म हु ई। सम्मान राय ने सबसे संयोगिता का परिचय करवाया।
10 बजे तक वह भी सबसे औपचारिक बातें करती अपने को व्यस्त रखती वहाँ बनी रही। जैसे जैसे
समय आगे खिसकने लगा उसने अपने घर जाने की आतुरता दिखाई, तो सम्मान राय और साथ-साथ
ज्ञानेश्वर द्विवेदी भी निहायत ही तहज़ीबदार लहज़े में उससे कुछ देर और रुकने का निवेदन करने
लगे। उसने एक दो बार तो अपनी विवशता जताई,लेकिन बाद में उन पे एहसान करती रुकने को तैयार
हो गई। सम्मान राय ने उसे यह कहकर और निश्चिन्त किया कि उनका ड्राइवर उसे घर तक छोड़ कर
आएगा। सम्मान राय और ज्ञानेश्वर द्विवेदी ने उसके रुकने पर पक्की मोहर लगाने के लिए यह भी
कहा कि एक ज़रूरी सोशल प्रोजेक्ट है,जिसे उन दोनो को उसके साथ डिस्कस करना है और ऐसी चर्चा
सबके जाने के बाद शान्ति से ही हो सकती है। संयोगिता उनके एक-एक दाँव पेंच को भाँपती हुई,
आज्ञाकारी बालिका की तरह सिर हिलाती उनकी हाँ में हाँ मिलाती रही ।
कुछ ही देर में एक-एक करके सारे मेहमान चले गए। बस वे दो महान जनवादी-समाजवादी आत्माएँ
और संयोगिता - वहाँ रह गए। सम्मान राय और ज्ञानेश्वर द्विवेदी संयोगिता को सप्रेम ड्रॉइंगरूम में ले
गए। आदत के अनुसार सम्मान राय ने अपने ख़ानसामा से तीन कप कॉफ़ी लाने को कहा। कॉफ़ी किसे
पीनी थी। कॉफ़ी आने पर ख़ानसामा को छुट्टी दे दी गई। यह तो आगे की गतिविधियों की भूमिका थी,
संयोगिता अच्छी तरह जानती थी। सम्मान राय सोफे में धंसा समाज-सेवा की परियोजना की दिखावटी
चर्चा करने लगा और ज्ञानेश्वर द्विवेदी पास बैठा एक पत्रिका के पन्ने पलटता रहा। भूमिका बने वे पल
धीरे-धीरे आगे सरकने लगे। संयोगिता ने लॉन से अन्दर आते हुए अपने नियत सहायकों को फोन
कर दिए थे कि वे दलबल सहित बंगले के आस-पास तैयार रहें। इतने में ज्ञानेश्वर द्विवेदी उठकर
अन्दर गया और चुपचाप शराब के दो पेग चढ़ाकर आया, क्योंकि जब वह ड्रॉइंगरूम में वापिस आया
तो सोफे पे बैठते समय शराब की तीखी गंध की लहर संयोगिता तक पहुँच गई थी। इसके बाद
सम्मान महाशय अन्दर गए और सोमरस पान करके आए। पर वे साथ में मुँह में इलायची चबाते आए।
दोनों को बद् दुआ देती संयोगिता मन ही मन कह रही थी कि देखते हैं कि कौन किसको मात देता
है। अभी पता चल जाएगा। दोनों फिर से बेसिर पैर की समाजसेवा की बातें करने लगे। इतने में दोनो
पर शराब का सुरूर चढ़ने लगा था। सम्मान राय संयोगिता से मुख़ातिब हो बोला –
“संयोगिता जी, क्या मैं आपको “तुम “ कह सकता हूँ ?”
“ “क्यों नहीं सर, आप इतने बड़े हैं.....” - संयोगिता ने उसे मूर्ख बनाते हुए कहा।
यह संयोगिता के निकट आने की छूट का पहला संकेत था। । सम्मान राय और ज्ञानेश्वर द्विवेदी जैसे
बेशर्म लोगों को कोई स्त्री एक इंच छूट दे तो, दूसरी तीसरी बड़ी छूट तो वे स्वयं झपट लेते हैं।
सम्मान राय और ज्ञानेश्वर द्विवेदी सोमरस के मद से बहके-बहके, क़तरा-क़तरा खुलते जा रहे थे।
उनके अन्दर विलोड़ित वासना की तरंगों ने अब उछल-उछल कर पछाड़ खानी शुऱू कर दी थी। संयोगिता
सतर्क थी। इस शह और मात की जंग में एकाएक उभरी स्थिति में कहीं-कही वह भी छोटी-मोटी मात
खाने को मानसिक रूप से तैयार थी। किन्तु अन्तत: वह उन दोनों को प्रतिशोध की आग से भरे अपने
वार के आगे पूरी तरह पराजित देखना चाहती थी। तभी सम्मान राय होंठो पे एक कुटिल मुस्कान और
आँखों में काम के शोले लिए संयोगिता के पास आया और पलक झपकते ही उसकी कमर में हाथ
डालकर, उसे अपनी बाँहों में भर लिया। संयोगिता कसमसाई और अपने को उसकी जकड़ से छुड़ाती
बोली –
“अरे, आप ये क्या कर रहे हैं... छोड़िए मुझे...”
“ कुछ नहीं, थोड़ा तुम्हें दुलार रहा हूँ, तुम हो ही इतनी प्यारी.... “
“ सर, प्लीज़ दूर हटिए, छोड़िए मुझे....आप तो मुझसे सोशल प्रोजेक्ट डिस्कस कर रहे थे। ये आप को
एकाएक क्या हो गया ?? छोड़िए मुझे.......मुझे घर जाना है।“
“चली जाना, चली जाना, पर ज़रा हमें कृतार्थ तो कर दो डियर.. “– सम्मान राय , ज्ञानेश्वर की तरफ़
अर्थपूर्ण नज़रों से देखता और भद्देपन से ठहाका लगाता बोला।
संयोगिता की कलाई पे कामभाव से अभिभूत सम्मान राय की हाथ-तोड़ पकड़ ने संयोगिता के काँच के
नाज़ुक कड़े को इतनी ज़ोर से चटकाया कि वह तड़ाक से दो टुकड़ों में खिल गया और उसने अपने टूटे
नुकीले कोनों से उसकी कलाई पे एक अर्ध्दगोलाकार रक्तरंजित लकीर खींच दी। संयोगिता ने दर्द को
ज़ब्त करते हुए, पूरा ज़ोर लगाते हुए सम्मान राय की पकड़ से ज्योंहि अपना हाथ छुड़ाया, तो उस
वहशी ने उसकी बाँह लगभग भींचते हुए पकड़ ली। इस पकड़-धकड़ में इस बार संयोगिता के ब्लाउज़
की बाँह पे लगी लेस उधड़ कर लटक गई।
“ चलो डार्लिग गर्ल, बैडरूम में चलो, अच्छे बच्चे ज़िद नहीं करते, बड़ों का कहना मानते हैं.. ऐ, ज्ञान
किधर गया तू.. “
तभी एकाएक उठकर अन्दर गया ज्ञानेश्वर बैडरूम से बोला – “बड़े भाई, मैं यहाँ शुभ काम की शुरुआत के
लिए तैयार हूँ आप ‘’ उर्वशी ‘’ को बस अन्दर ले आइए।“
सम्मान राय संयोगिता के साथ लपट झपट करता बैडरूम में घुसा तो संयोगिता ने ऊपर से नीचे तक
निर्वस्त्र खड़े ज्ञानेश्वर को देख कर लज्जा से मुँह मोड़ लिया। उत्तेजना से बौराये सम्मान राय ने भी खींच-
खींचकर अपना चीर हरण शुरु कर दिया। इससे पहले की उन दोनो में से कोई संयोगिता पे झपट्टा
मारता और उसका चीरहरण शुरू करता, प्रत्युतपन्नमति संयोगिता अपने ‘’तुरत न्याय अभियान’’
के प्रति सचेत होती, स्वयं को अपने ‘ मिशन ‘ पे साधती, बहाने से वॉशरूम में चली गई और वहाँ
से अब तक बंगले के बाहर पहुँच चुके प्रतिनिधि अख़बारों और टी.वी. चैनलों के रिपोर्टर्स को मोबाइल
से तुरन्त ड्रॉइंगरूम औऱ वहाँ से बिना किसी देरी के बैडरूम में धावा बोलने का संकेत दिया। बाहर तैयार
चार पाँच विभिन्न एन.जी.ओ. के कार्यकर्ताओं सहित रिपोर्टर्स की भीड़ टी.वी. कैमरो सहित धड़धड़ाते हुए
अन्दर आ गई।
उन सबके आने का शोर सुनते ही वॉशरूम से संयोगिता भी शेरनी बनी उन सबके बीच पहुँच गई और
उसने सम्मान राय व ज्ञानेश्वर के शटाक-शटाक करारे-करारे दो तीन तमाचे जड़ दिए और वहाँ
उपस्थित भीड़ को उसने, अपने साथ हुई ज़ोर ज़बरदस्ती और उन दोनो की बदनीयती का प्रमाण देते हुए
अपनी कटी हुई कलाई और ब्लाउज़ की बाँह की उधड़ी लेस दिखाई। वह रोष से भरी भीड़ से मुख़ातिब
होकर बोली कि अग़र वह अपनी सुरक्षा के प्रति सतर्क न होती और हिम्मत से काम न लेती तो, आज
उसके साथ भी वैसी ही अनहोनी घटती, जैसी अन्य कई औरतों के साथ घट चुकी थी। दोंनो उस भीड़
को देख कर वैसे ही हतबुध्दि से खड़े थे, उस पर संयोगिता के तमाचों से और भी सकपका
गए। दोंनो नग्न मर्दों की ‘बेचारी’ सूरत देखने लायक थी। संयोगिता की आँखों के सामने इन दोनों की
हवस की शिकार बनी औरतों का दर्द और नन्दिता का अवसाद से भरा चेहरा घूम गया। इन
छिछोरों का कॉफ़ी हाउस वाला घटिया वार्तालप उसके कानों में गूँजने लगा। क्रोध से तमतमाई दुर्गा
रूप धारण किए वह बोली –
“चालबाज़ो, सोशल प्रोजेक्ट के बहाने मुझे पार्टी में बुलाकर अपनी हवस का शिकार बनाना चाहते थे ?
उस दिन कॉफ़ी हाउस में बैठे क्या कह रहे थे कि औरत भोगने के लिए होती है। वासना शान्त करने
का ख़ूबसूरत यंत्र होती है। और ये हज़रत – ज्ञानेश्वर द्विवेदी छात्रों को आदर्श का पाठ पढ़ाते हैं,
समाजशास्त्र पढ़ाकर समाज के मार्गदर्शक बनते हैं और ख़ुद ये क्या गुल खिला रहे हैं – इनका कहना है
कि स्त्रियाँ मर्दों को चूस डालती हैं। हर जवान और सुन्दर लड़की चाहती है कि उसे रेप किया जाए।“
संयोगिता ने ज्ञानेश्वर द्विवेदी को ताड़ना देते हुए कहा –
“तू नारी मुक्ति का पक्षधर बनता है और घोषणा करता है कि नारी की मुक्ति की यात्रा देह से शुरू
होती है। जब वह उन्मुक्त होकर अपनी देह का उपयोग करती है, बस तभी से उसकी मुक्ति यात्रा रफ़्तार
पकड़ लेती है। औऱ सम्मान राय, तूने उसके जननी रूप की खिल्ली उड़ाई –उसके उदात्त जननी रूप को
बाज़ारू बना दिया। उसे सामूहिक सम्भोग की वस्तु करार कर दिया तूने ? तू माँ के ममत्व, बहन के
स्नेह, बेटी की मासूमियत सबको घोल कर पी गया, नीच, पापी...। तुम दोनो ने मिलकर उस पे भोग
की चीज़ का ठप्पा लगा दिया। नाम “सम्मान राय” और काम स्त्री को हर तरह से हर रूप में
अपमानित करना.....! दिन के उजाले में जलसों, सामाजिक समारोहों में नारी उध्दार की, नारी मुक्ति की
बड़ी-बड़ी बातें बनाना और रात के अँधेरे में उसी नारी की इज़्ज़त से खेलना। “
सम्मान राय और ज्ञानेश्वर ऐसे हो रहे थे कि काटो तो खून नहीं। दोंनो कुन्द बुध्दि से आँखें नीची
किए जड़वत् खड़े थे। आज तक ऐसी मात उन्होंने कभी नहीं खाई थी। तभी भीड़ में से एक महिला
संस्थान की सदस्या तैश खाई आगे आकर उन दोनो पे चिल्लाई –
“तुम दोनो नारी मुक्ति के दिन रात डंके पीटते थे। इन प्रोफैसर जनाब ने नारी मुक्ति पे बड़े-बड़े लेख
और कहानियाँ लिख कर नाम भी कमाया, पर अब ये नारी शक्ति का भी जायज़ा ले लें। संयोगिता जी
आपने आज इन दो जानवरों के असली चेहरों से हमें वाकिफ़ कराके बहुत बड़ा धर्म का काम किया है।“
वह पुन: ज्ञानेश्वर द्विवेदी की तरफ़ पलटी और चीखती सी बोली –
“नीच, तेरी दृष्टि नारी की देह तक ही अटक के रह गई। तेरी कुत्सित सोच औरत को 24 घन्टे, 365
दिन मात्र कामांगना के रूप में ही देख पाई, इसके लिए वो दोषी नहीं बल्कि तेरा मैला मन ज़िम्मेदार
है। लम्पट,तू काम,वासना, नारी देह और भोग के अलावा कुछ और न सोच पाता है और न देख पाता
है। “ अब उसने सम्मान राय को घूरते हुए कहा –
“ और तुझे सीता, सावित्री, पार्वती, दुर्गा के रूप में नारी का सौम्य, कर्तव्यनिष्ठ, समर्पित, कलुषनाशक
खरा रूप कभी याद नहीं आया, बस ज़हन में उसका भोग्या रूप ही अठखेलियाँ करता रहा.....“
तभी संयोगिता गरजती बोली – “क्योंकि इन दोंनो का “मायोपिक विज़न” उसके आगे कुछ देख ही नहीं
पाता। ये उन शूकरों की भाँति हैं, जो पल छिन घूरे में घुसे रहते हैं। अबोध, कमज़ोर, विवश, कमउम्र
स्त्रियों को समाज के ऐसे ही ठेकेदार कॉलगर्ल, बारगर्ल, वेश्या, हर तरह के मार्ग का पाथेय बना कर
उनकी इज़्ज़त लूटा करते है, उनके जीवन के साथ खिलवाड़ करते हैं, और इतना ही नहीं, उनसे अपना
उल्लू सीधा करके, उन्हें तरह-तरह से बदनाम करने से भी बाज़ नहीं आते। कमज़ोर और परिस्थिति की
शिकार औरतें तुम जैसों का निवाला बन के रह जाती है - चाहते हुए भी न बदला ले पाती है, और न
किसी तरह का विद्रोह कर पाती हैं। उनकी उस विवश चुप्पी के पीछे तुम पापियों के लिए ऐसी बददुआएँ
सुलगती रहती हैं, जिनके कारण बदला लेने के लिए हम जैसी दबंग महिलाएँ तुम्हारे सामने आकर खड़ी
हो जाती हैं। ऐ फ़रेबी समाजवादी, जनवादी चिन्तक, विचारक, लेखक, समाजसुधारक, दलितों के मसीहा
आज तुम दोनो के कुकर्मों का पिटारा दुनिया के सामने खुलने जा रहा है। आज हम सब तुम्हें
अनावृत कर, तुम्हारे घृणित व कुत्सित अन्तरतम को चाक करके सबके सामने दिखाने जा रहे हैं
जिससे समाज तुम्हारी हीन हरकतों के लिए तुम दोंनो को कड़ी से कड़ी सज़ा दे और तुम्हारी जैसी
सोच वाले, नारी से जुड़े हर पवित्र रिश्ते की बलि चढ़ाकर, उसे निगलने की लालसा रखने वाले और लोग
भी तुम दोंनो का यह हश्र देख कर चेत जाए और पहले से ही तौबा कर लें।“
कवरेज करता एक टी.वी, रिपोर्टर कैमरा घुमाता व रिकार्डिंग करता बोला –
“एक बड़ी पुरानी, बार-बार दोहराई जाने वाली कहावत है कि ‘भगवान के घर में देर है, अँधेर नहीं’,
सो आज बहादुर और सजग संयोगिता जी ने एक बार फिर यह कहावत सही सिध्द कर दिखाई है। “
संयोगिता फिर भड़की – “अरे तुम्हारी नज़र सिर्फ कचरा खोजने में माहिर है, उसमे सिर्फ और सिर्फ
कचरा ही क्यों समाता है ? तुम्हारी आँखें अच्छाई देखने और सोचने की क्षमता से रहित क्यों है। क्या
अच्छाई की चौंध वे झेल नहीं पाती ? तुम दोंनो अपने मनोमस्तिष्क का इलाज करवाओ, तुम रुग्ण हो।
काले दिल, काली सोच, काले भाव, काले विचार, काली करतूतों वाले दरिन्दों अब ख़ामोश क्यों हो, आओ,
काली माँ के इस रूप को भी गले लगाओ,जब तुम्हें हर तरह की कलौंस से इतना प्यार है तो डर क्यों
रहे हो, क्यों इतने भयग्रस्त हो अब ? तुम दोनो के पसीने क्यों छूट रहे हैं। ये अबला नाम की ‘ बला ’
अब तुम दोंनो से झेली नही जा रही ? अब तक नारी को बहुत भोगा, अब तुम दोंनो दण्ड भोगो। तुम
जैसे विकट पापियों को तो नरक भी जगह देता घबराएगा। अच्छा हो कि तुम्हे किसी भी लोक में जगह
न मिले। तुम सदियों तक त्रिशंकु की तरह अधर में लटके रहो, अधर में भटकते इधर से उधऱ रेगते
रहो। ये सृष्टि, ये प्रकृति तुम जैसे लम्पटों को समय आने पर इसी तरह दण्डित करती है।”
उत्तेजित भीड़ ने, ख़ासतौर से शहर के सक्रिय महिला संगठनों की महिलाओं ने बदले की आग से
भभकते हुए सम्मान राय और ज्ञानेश्वर द्विवेदी को जूतों और चप्पलों से इस आक्रामक ढंग से पीटा
कि उनके सिर, चेहरे, पीठ, कमर, हाथ-पैर - यानी अंग-प्रत्यंग पे जमकर जूते चप्पल छापे। फिर उन्हें
पीटते-पीटते ड्रॉइंगरूम में खदेड़ दिया। हांलाकि उनमें से किसी के भी मन में उन दोंनो को शारीरिक
ताड़ना देने का कोई विचार नहीं था, लेकिन उनकी ताज़ी घिनौनी और लम्पट हरकत ने उस रात्रि
बेला में भीड़ के मन मे शनै:-शनै: स्थायी भाव “क्रोध” को जाग्रत करने के लिए “आलम्बन विभाव”
का कार्य किया तथा उनके गिड़गिड़ाने,हाथ जोड़-जोड़ कर माफ़ी माँगने, सबसे मुँह छुपाने जैसी हरकतों
ने तथा वहाँ के जोशीले वातावरण ने “उद्दीपन विभाव” का कार्य किया और इस तरह जब भीड़ के मन
में ख़ासतौर से महिलाओं के मन में जब “रौद्र रस” का उद्रेक हुआ तो फिर उस रस के तालमेल में
तरह-तरह के अंग संचालन (अपराधी को हाथो,पैरों से पीटना), जूता, चप्पल प्रहार, अपशब्दों की बौछार
– ये “अनुभाव” तो उछल कर बाहर आते ही। वे तो रौद्र रस के उद्रेक की अपरिहार्य प्रतिक्रिया थी।
कुछ क्षण पूर्व संयोगिता के साथ जो उन दोनो ने उसे अपनी हवस का शिकार बनाने के लिए छेड़खानी
की थी और जो “रसीले सम्वाद अपने मुखारविन्द से” बोले थे, जो संयोगिता ने प्रमाण स्वरूप सबको
मोबाइल का रिकॉर्डर ऑन करके सुना दिए थे – वे सब “संचारी भाव“ का काम कर रहे थे। उस ख़ूबसूरत
ड्रॉइंगरूम में “श्रृंगार के संयोग रस” के अधूरे उद्रेक को छिन्न-भिन्न करता जो एकाएक “रौद्र रस” का
विस्फोट हुआ था –उससे वह सजीला ड्रॉइंगरूम भयानक मैदाने जंग में बदल गया था। उस जंग में वीर
योध्दाओं का नेतृत्व कर रही थी “तेजस्वी वारांगनाएँ “ और सम्मान राय व ज्ञानेश्वर द्विवेदी बारम्बार
वीरगति को प्राप्त होने से बच-बच निकलते असहाय बालकों की भाँति अपना बचाव करने में लगे थे। ये
था ऐसे छद्मवेषी लम्पट दरिन्दों के साथ जनता का “जनवादी न्याय “ जिसे हमेशा रंगे हाथों पकड़े जाने
वाले गुनहगारों को मौके पे उपस्थित जनता स्वयं हाथों हाथ देती है और जो बहुत स्वभाविक भी है। ये
तो “एक्शन-रियेक्शन कैमिस्ट्री” होती है जो स्वत: घटती है और उद्रेक के उपरान्त शान्त हो जाती है।
जो न्याय स्वत: घटित होता है, वही सच्चा और खरा होता है तथा गुनहगारों को सबसे अधिक ग्लानि
से भरने वाला होता है। कुछ ऐसी ही ग्लानि से अभिभूत थे उस समय, उस रात के नायक - सम्मान
राय और ज्ञानेश्वर द्विवेदी। तभी संयोगिता ने कहीं से एक तौलिया और चादर खोजकर दोंनो को तन
ढकने का एक मौका दिया।
मीडिया फोटोग्राफ़र्स ने हर कोण से, उन दोंनो के हर हाव-भाव के भरपूर फोटो कैमरे में कैद किए।
पत्रकार, एन.जी.ओ कार्य कर्ताओ और टी.वी. रिपोर्टर्स सम्मान राय और ज्ञानेश्वर द्विवेदी की शान में
छंटे-छंटे कसीदे पढ़ रहे थे। उस आधी रात में उस शानदार बंगले में ज़लज़ला आया हुआ था।
सम्मान राय और ज्ञानेश्वर द्विवेदी जो अब तक कई बार संयोगिता व अन्य सब लोगों के सामने
हाथ जोड़-जोड़कर दया की भीख माँग चुके थे, अब जड़प्राय: से, सिर झुकाए दोंनो हाथों से माथा
पकड़े बैठे थे। लगता था नारी शक्ति के आगे वे दोंनो गूँगे हो गए थे, उनके सारे शब्द चुक गए थे।
अब तक भीड़ में से कुछ सचेत लोग पुलिस को भी फोन कर चुके थे। सो उस इलाके के थाना इंचार्ज
वहाँ पहुँच चुके थे। वे व्यंग्य और तिरस्कार से सम्मान राय और समाज में उतने ही इज़्ज़तदार,
बल्कि उनसे उधिक सुशिक्षित ज्ञानेश्वर द्विवेदी को देख रहे थे। उन्होंने अपना फ़र्ज़ निबाहते हुए, सबसे
पहले उन गुनहगारों को अपनी बाहरी नग्नता को ढकने के लिए कपड़े पहनने का आदेश दिया। फिर वह
वहाँ उपस्थित उत्तेजित भीड़ से बोले –
“देखिए आप लोगों ने अपना कर्त्तव्य निबाह लिया, अब मुझे अपनी कार्यवाही करने दीजिए और इसके
लिए उन मुझे मैडम के बयान दर्ज़ करने होगे, जो इनकी आज की एक-एक हरकत की चश्मदीद गवाह हैं।“
तभी संयोगिता आगे आकर बोली - “चश्मदीद गवाह तो हूँ ही, इन दोनो का एक-एक सम्वाद भी मेरे
इस मोबाइल मे कैद है, इंस्पैक्टर साहब। “
थाना इंचार्ज संयागिता को उसकी हिम्मत और समझदारी के कारण सराहना भरी नज़रों से देखता, बड़े
अदब से बोला –
“बहुत ख़ूब मैडम। आप निश्चिन्त रहें, इनको इनके किए की सज़ा ज़रूर मिलेगी। थोड़ी दिर के लिए
आपको भी थाने चलना होगा रिपोर्ट लिखाने के लिए। कानून की मदद करने वाले की हम बड़ी क़द्र करते
हैं।“ यह कह कर थाना इंचार्ज ने अपने कांन्स्टेबल को इशारा किया और उसने तुरंत सम्मान राय व
उनके परम् हितैषी मित्र ज्ञानेश्वर द्विवेदी के हाथों में हथकड़ी पहना दी। ये सब कार्यवाही होते-होते रात
का 1 बज गया था। ज्ञानेश्वर द्विवेदी और सम्मान राय अब सरकारी मेहमान बन गए थे। अगले दिन
सम्मान राय और ज्ञानेश्वर द्विवेदी अख़बार की सुर्ख़ियाँ बन चुके थे। सभी प्रमुख चैनलों पे कल रात उनके
बैडरूम और ड्रॉइंगरूम में उमड़े ज़लज़ले का कवरेज बार-बार ज़ोरदार कमेन्टरी के साथ दिखाया जा रहा
था। उनके सिर से पाँव तक के सारे हाव-भाव को कैमरा बारीकी से टीवी स्क्रीन पर तैराता था।हर घर में
उनकी काली करतूतो पे थू थू हो रही थी। उनके साथ-साथ हर कोई टी.वी. पर संयोगिता की झलक पाने
को उत्सुक था। संयोगिता रातों-रात सेलिब्रिटी सोशल एक्टिविस्ट बन गई थी। बहरहाल अगले दिन
इतवार होने के कारण उनकी ज़मानत भी सम्भव नहीं थी, इसलिए दोनों महाशयों को जेल में ही समय
काटना था। ज्ञानेश्वर द्विवेदी और सम्मान राय के परिचित उनकी ज़मानत न करवा पाने के कारण
बिलबिला रहे थे। वे ‘सम्माननीय’ गुनहगार शनीवार की रात से लेकर सोमवार की दोपहर तक सलाख़ों
के पीछे अपमान के बड़े-बड़े घूंट पीते रहे।
इसके बाद वकील, कानून, अदालत –जैसा कि सब जानते ही है, इनकी कार्यवाही, वकालत के स्याह को
सफ़ेद, सफ़ेद को स्याह करने के दाँव-पेंच, इन सबकी की एक लम्बी प्रक्रिया जन्म लेने वाली थी,लेकिन
उन शातिर लम्पटों के ख़िलाफ़ “जनवादी न्याय” तो हो ही गया था। अदालत का न्याय लम्बी चौड़ी
प्रक्रिया का मोहताज होता है, पर जनता का न्याय तमाम सत्यों को समेटे हुए - त्वरित और खरा
होता है।
आने वाले समय में एक नंबर के मक्कार, चालबाज़ ज्ञानेश्वर द्विवेदी और सम्मान राय अपने बचाव में
वकील के द्वारा कितनी भी दलीलें पेश करते रहे, अपने को बेगुनाह साबित करने की नाकामयाब कोशिश
करते रहे, फ़िलहाल उनका असली सच तो दुनिया के सामने उजागर हो ही गया था। कैमरे में कैद
उनके निर्वस्त्र शरीर, उनके रिकॉर्डेड सम्वाद, उनके खिसयाये चेहरे, संयोगिता से दया की भीख माँगते
उनके कांपते हाथ – किस-किस चीज़ की वे कानून के बल पर काट करेगे। इसके आगे अपने बचाव के
लिए कुछ भी करते रहे, उससे किसी को कुछ लेना देना न था। “जनवादी न्याय” उन दोंनो को गुनहगार
सिध्द कर चुका था। वे किसी को मुँह दिखाने लायक नहीं रहे थे। उनकी अन्तरात्मा अन्दर ही अन्दर
उन्हें धिक्कार रही थी।
X X X X X X X X X X X X X X X
विपक्ष के वकील ने सम्मान राय और ज्ञानेश्वर द्विवेदी के पिछले अनेक ‘’ रेप ‘’अपराधों का कच्चा चिठ्ठा
भी, संयोगिता के एवं महिला एन.जी.ओ और नेशनल वुमेन कमीशन के सहयोग से बीन-बीन कर
इकठ्ठा कर लिया था और सबूतों व गवाहों सहित उनका भी खुलासा अदालत में कर दिया गया था।
ज्ञानेश्वर द्विवेदी और सम्मान राय के ख़िलाफ़ सबूत इतने ठोस और इतने प्रत्यक्ष थे कि कानूनी कार्यवाही
के बाद कुछ माह उपरान्त, इंडियन पीनल कोड की धारा 6 Immoral Traffic (Prevention) Act, धारा 354
( Molestation) धारा 376 व 377 ( Rape) के तहत वे दोनों अदालत द्वारा अपराधी घोषित किए गए।
सम्मान राय का जनवादी, समाजवादी, क्रान्तिकारी कार्यकर्ता, स्थानीय तीन विद्यालयों के संस्थापक,
महिला एवं बालोध्दार गैरसरकारी संस्था के अध्यक्ष वाला बहुआयामी रूप हमेशा के लिए ढेर हो गया
था और उसके लिए, उसकी घटिया करतूतों के कारण आजीवन कारावास का सम्मान घोषित किया गया
था। ज्ञानेश्वर द्विवेदी को विश्वविद्यालयी आचार संहिता के आधार पर रेप जैसे अक्षम्य आरोप के
सिध्द हो जाने के कारण कॉलेज के गरिमामय पद से तो हाथ धोना ही पड़ा, साथ ही सम्मान राय के
साथ उसे भी आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई गई।
अदालत के इस न्याय ने भले ही देर से, पर उस दिन हादसे के तुरन्त बाद हुए “जनवादी न्याय” के
औचित्य पे पक्की मोहर लगा दी थी।
’’ललिता, सामने की खिड़की बन्द करके काम कर। कितनी बार समझाया है कि पड़ौस के दुमंजले घर से यह कमरा साफ़ नज़र आता है, और वे दोनो भाई हर पल आते-जाते अपनी खिड़की से ज़रूर इस कमरे पे नज़र डालते रहते हैं” - ताई जी का भारी स्वर तीर सा ललिता के कानों से टकराया।
‘’ठीक है ताई जी” – यह कहती ललिता बेमन से उठी और खिड़की के पल्ले ढुका कर फिर से अपनी किताबों में रम गई। लेकिन अब रह-रह कर उसका मन सामने वाली खिड़की को खोलने की ओर लपकने लगा। अभी तक वह बड़े चैन और सुकून से पढ़ रही थी, पर अब उसका सारा ध्यान खिड़की पे अटक के रह गया। ‘’ वह खिड़की खोल कर क्यों नहीं पढ़ सकती...?? क्योंकि ताई जी को शक़ है कि सामने के घर के लड़के मुझे न देखे या उन्हें मुझे पे शक़ है कि मैं उन लड़को के कारण यहाँ बैठकर पढ़ने का ढोंग कर रही हूँ। हुँह, मुझ पर इतना भी भरोसा नहीं.... क्या मैं अच्छी लड़की नहीं हूँ ? क्या पड़ौसी लड़के ख़राब हैं, अग़र मेरी उन पे नज़र पड़ जायेगी तो गुनाह हो जायेगा...? ’’– ललिता का मन कैक्टस के ढेर सारे कांटेनुमा सवालों में टुकड़े – टुकड़े होकर पढाई से छिटक गया । उसके दिलो –दिमाग में समाजशास्त्र की जगह यह दूसरा ही समाजशास्त्र घूमने लगा। तरह-तरह के ख्याल उसे काटने लगे।
तभी फिर थोड़ी देर में ताई जी का एक नया आदेश आंगन से कूदता - फांदता कमरे में आ खड़ा हुआ – ‘’ललिता, चल उठ जा, 4 बज रहें हैं। एक प्याली गरम-गरम चाय तो पिला ज़रा।‘’
3 बजे पढ़ने बैठी ललिता का मन वैसे ही खिड़की बन्द करने के आदेश को लेकर पढ़ाई से उचटा था और वह उसे फिर से किताब में लगाने के लिए जूझती बैठी थी। इतने में चाय की फरमायश हो गई। उसने सोचा, चलो इससे अच्छा तो चाय ही बना दूँ। वह एक खालीपन के साथ उठी, रसोई में गई, चाय बनाई और बड़े प्यार से ताई जी को लाकर दी। घूंट भरती ताई जी मुँह बिचकाती बोली –
‘’अरे,,रे,,रे कितनी कसैली चाय बनाई है, चीनी भी कम। बेटा कोई तो काम ठीक से कर लिया कर।‘’
ललिता को लगा कि वह एकदम नकारा और अयोग्य है।
‘’अच्छा जा छत पर से सूखे कपड़े उतार ला’’ – ताई जी खाट पे अपने पैरों को सीधा करती बोली।
ललिता छत पर एक-एक करके कपड़े करीने से उतारने के साथ-साथ तह भी बनाती जा रही थी कि ताई जी का हिटलर स्वर फिर लहराया – ‘’अरे ओ लड़की कहाँ अटक गई, क्या इतनी देर लगती है कपड़े उतारने में।‘’
ललिता तुरन्त आंगन में नीचे झाँकती बोली – ‘’टाइम तो लगता है थोड़ा, ताई जी, बस आ ही रही हूँ ।‘’
उसने देखा कि ताई जी खाट से उठ कर, आंगन में बीचों बीच खड़ी, टकटकी लगाए, उसे छत पे खोज लेने को परेशान थीं। ‘’ऐसा क्यों करती हैं ताई जी। मुझ पे रत्ती भर भी भरोसा नहीं किसी बात का’’.....ललिता का मन सूखे खड़न्क पत्ते की तरह दिशाहीन सा इधर उधर गिरता पड़ता कहीं दूर उड़ गया। बाकी कपड़ों को वह बिना तह बनाए ऐसे ही ले आई। ताई जी उसे हड़काती सी बोली –
‘’देख, ख़बरदार जो ज़रा भी आसपड़ौस के लड़को की नज़र तुझ पे पड़ी या फिर तूने उनकी ओर नज़र उठाकर भी देखा। ज़माना बड़ा ख़राब है। तू नहीं समझती।‘’
ललिता सोचने लगी कि समझाने का ये ढंग तो बड़ा मारक है। ये मुझे हर रोज़ इस तरह समझाती हैं या कोंचती हैं या इतना टोक-टोक कर लड़को की ओर देखने की प्यास मन में जगाती हैं। मैं कहाँ किसी लड़के को देखने को आतुर हूँ, लेकिन जब ये इस तरह ख़बरदार करती हैं तो ज़रूर मन करता है कि अभी छत पे या खिड़की पे जाऊँ और आसपड़ौस के हर लड़के को बार-बार देखूँ।
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ललिता आखिरी लैक्चर अटैन्ड करके घर लौटी तो अपने कमरे को अस्त-व्यस्त देख असमंजस में पड़ गई। मेज़ की किताबें, पलंग की चादर, अलमारी की कॉपियाँ सभी, अपनी –अपनी जगह से हिली हुई थी। ड्रॉअर से भी छेड़छाड़ की गई थी। वह गुस्से से भन्नाई सी हो गई, लेकिन ताई जी से कुछ पूछना महाभारत को न्यौता देना था। खैर, मन मारकर उसने खुद को ही समझा लिया। किताबें, कॉपी सब क़ायदे से लगाकर रखीं। फिर सबसे नीचे की किताब खोलकर ‘ब्रैड पिट ’ की तस्वीर देखी कि सही सलामत तो है, उसे सही सलामत देखकर वह चिहुँक उठी और हौले से बोली - ‘’ब्रैड पिट आई लव यू ’’। उसे आज तक भारतीय फ़िल्मी सितारों के अलावा कोई और पसंद नहीं आया. पहली बार ऐसा हुआ है कि उसे कोई हालीवुड स्टार इतना भाया है.
ललिता ने मुँह हाथ धोकर खाना खाया। ताऊ जी आज ऑफ़िस नहीं गए थे, सो थोड़ी देर उनसे बैठकर बातें की। ताऊ जी भी सख्त थे, पर ताई जी की तरह बात पे बात पे टुक-टुक नहीं करते थे। ललिता को रह-रह कर माँ की याद सताती। बी.ए. करने तक उसे ताई जी की तानाशाही, अपमानजनक व्यवहार तो झेलना होगा। उसका किशोर मन इस व्यवहार और अजीब माहौल से मानसिक रूप से रुग्ण सा रहने लगा था। कितना अपने मन को समझाए, लेकिन मन विद्रोह करने पे उतारू हो जाता था कितनी बार तो। पर वह कैसे स्वयं को नियंत्रित करती थी, बस वही जानती थी। उसे लगता कहीं ये जंग उसे ले न डूबे। लेकिन तुरंत वह काउंटर लाजिक करती – ‘नहीं, वह तो एक मज़बूत, समझदार लड़की है। चाहे कुछ भी हो, वह ताई जी के घर में अपनी वजह से विस्फोट नहीं होने देगी। घरेलू लड़ाई-झगड़े के कारण वह माँ-बाबू जी के लिए समस्या नहीं बनेगी।‘
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आज कॉलिज में फंक्शन है। ललिता ने ताई जी से कहा – ‘’ताई जी, आज लौटने में थोड़ी देर हो जायेगी, फंक्शन है और प्रिंसिपल साहब का आदेश है कि सभी छात्र-छात्राओं को उपस्थित रहना है। ‘’
सुनते ही ताई जी लगभग भड़कती सी बोली – ‘’अरे वाह, प्रिंसिपल साहब का आदेश है, वे आदेश देना तो जानते हैं, पर क्या लड़कियों की हिफाज़त करना भी जानते हैं ?’’
“ताई जी और लड़कियाँ भी तो होंगी वहाँ, मैं कोई अकेले थोड़े ही होऊँगी। हम सब इकठ्ठे वापिस आएगीं। सीमा का भाई भी लौटते समय साथ होगा तो डर की कोई बात नहीं।“
‘’क्या कहा, सीमा का भाई भी लौटते समय साथ होगा तो डर की कोई बात नहीं – तब तो डर की सारी बात है। भाई तो उसका है, तेरा थोड़े ही है। नहीं तू नहीं जाएगी, बताए देती हूँ।‘’
ललिता ने अपनी खीझ को ज़ब्त करते हुए ताई जी को काफ़ी आश्वस्त करने की कोशिश की, लेकिन सब ढाक के तीन पात रहा। ताई जी तो न मानी, अन्त में हार कर उसे ही उनकी बात माननी पड़ी। व्यर्थ के शक़ शुबहा के कारण ललिता रुक तो गई पर उसके अन्दर घुमड़ता विद्रोह पहले से अधिक सघन हो गया था आज। छोटी-छोटी बातों पे उसे घुटना पड़ता था, मन मसोस कर रह जाना पड़ता था। वह कई बार सोचती कि वह यहाँ ग्रेजुएशन करने आई है या अपने अस्तित्व को कुचलने.....!!??
उसके साथ की सभी लड़कियाँ ख़ूब मस्त, खिली-खिली और प्रफुल्लित रहती थी। हर लड़की का दोस्त था, सिवाय उसके और इस कारण से उसकी कई बार मज़ाक भी बनती थी। पर वह अपनी खिल्ली को फूंक मार कर उड़ा देती थी। उसका युवा मन भी सपनों के राजकुमार के ख्यालों में डूबा रहना चाहता पर ख्यालों में भी ताई जी उभर उभर आती। वह ‘’प्रिन्स चार्मिंग’’ के ख्याल से ही काँप जाती और अपने को गुनहगार समझती। पर हॉलीवुड हीरो ब्रैड पिट के ख्याल से अपने को जुदा न कर पाती थी । बहुत ही अच्छा लगता था उसे । हाँलाकि पूरे दो साल में उसकी दो ही मूवीज़ उसने किसी तरह ताऊ जी की उदारता के कारण दिन के शो में अपनी सहेलियों के साथ देखी थी। उसे ब्रैड पिट पे एक तरह से ‘’क्रश’’ ही था। उसने महसूस किया था कि जब-जब ताई जी उसे किसी भी बात पे फटकारती तो वह बहुत अकेली हो जाती और उसका मन होता कि कोई पुरुष उसे अभय दान दे, पल भर के लिए भरपूर ख़ुशी उसके जीवन में उड़ेल दे और जब भी वह ऐसा सोचती तो पुरुष के ख्याल मात्र से ‘’ब्रैड पिट’’ उसकी आँखों के सामने आकर खड़ा हो जाता। वह उसका रक्षक, उसका साथी, उसका हमराज़ कैसे हो सकता है – वह मन ही मन ख़ुद पे हँसती भी, पर ऐसा अक्सर उसके साथ घटता। जहाँ भी उसे ब्रैड पिट की तस्वीर दिखती वह उसे सँजोकर अपनी ड्रॉअर में या अलमारी की किताबों में छुपाकर रखती। क्रूर ताई जी ने यद्यपि कई बार ब्रैड पिट की तस्वीर हाथ लग जाने पर, फाड़कर फेंकी, पर ललिता का मन भी उसकी तस्वीर लाए बिना नहीं मानता। किसी लड़के से वह बात नहीं करती थी, दोस्ती तो बहुत दूर की चीज़ थी, लेकिन क्या वह अपने मनपसन्द हीरो की तस्वीर भी नहीं रख सकती थी, इस पाबन्दी से वह किसी भी क़ीमत पे समझौता करने को तैयार न थी। वह तर्क करती - यह तो सरासर ज़्यादती है। एक ओर ताई जी का हिटलरी विद्रोह, तो दूसरी ओर ललिता के किशोर मन का विद्रोह जो उसके न चाहते हुए भी सीली आग की तरह न बुझता, न भड़कता – लगातार सुलगता रहता।
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किसी तरह ललिता के ग्रेजुएशन के तीन साल कटे और वह अनेक कुंठाओं से भरी अपने माँ-बाबू जी के पास नहटौर लौटी। माँ-बाबू जी से मिलकर वह कई दिनों तक जी भर के रोई। अग़र अपने ही शहर के कॉलिज में ग्रेजुएशन की सुविधा होती तो उसके बाबू जी कभी भी उसे ताई जी के पास पढ़ने न भेजते। अपनी होनहार बेटी को वे ग्रेजुएशन अवश्य कराना चाहते थे, इसलिए ही मजबूर होकर उनहोंने भेजा । उसके बाद अच्छा घर देख कर उसकी शादी करना चाहते थे। उनका विश्वास था कि सँस्कारी परिवार का सँस्कारी लड़का मिल गया तो एम. ए. तो ललिता शादी के बाद भी कर सकती है। माँ के कैंसर पीड़ित होने के कारण ललिता का विवाह उसकी माँ की ख़ासमख़ास इच्छा ही नहीं, बल्कि एक दुआ थी, प्रार्थना जैसी थी। वह अपने जीते जी अपनी प्यारी बेटी का घर बसा हुआ देखना चाहती थी। जीवन में ललिता का एक ही ‘’पैशन ’’ था – उच्चतम शिक्षा हासिल करना, ख़ूब पढ़ना- लिखना। लेकिन उसी उत्कट अभिलाषा को उसे, हालात से मजबूर माँ- बाबूजी के कारण बेदर्दी से दबा-दबाकर सुलाना पड़ा और शादी के लिए हाँ करनी पड़ी। पहली बार उसने अपने माँ- बाबू जी के घर में स्वयं को वैसे ही ग़ुमनाम सन्नाटे से भरा पाया, जैसे कि अक्सर वह ताई जी के घर में उस पे हावी हो जाया करता था। वह निहायत अकेली, बेचारी और कुछ भी कर पाने में अशक्त निर्जीव सी बिस्तर पे औंधे मुँह पड़ी थी कि तभी उसके दुखी मन और अकेलपन का साथी, ब्रैड पिट उसकी आँखों में उतरना शुरू हुआ। उसने मानो आँखें मूँद कर, उसे नज़रबंद कर लेना चाहा। वह बहुत देर तक एक मीठे एहसास से भरी यूँ ही पड़ी रही। फिर हौले से उसके नाज़ुक होंठ खुले और वह बुदबुदायी - ‘’ब्रैड पिट आई लव यू ’’। एक गुनगुना एहसास उसे सरापा सिहरा गया। कुछ देर बाद शीतल सुकून से भरी वह एकदम तनाव मुक्त हो गई।
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एक साल बीतने से पहले ही ललिता का रिश्ता एक अच्छे ख़ानदान में हो गया। लड़का सॉफ़्टवेयर इंजीनियर था। जुलाई में ललिता का रिज़ल्ट भी आ गया। उसने प्रथम श्रेणी में बी.ए. पास किया था। माँ बाबू जी की खुशी का ठिकाना न था। ललिता तो एम.ए. करने के लिए लालायित थी। पर माँ की दिन पे दिन बिगड़ती हालत के आगे उसके पास अपनी इच्छा कुर्बान करने के अलावा और कोई निदान न था।
मनोहरलाल जी ने अपनी क्षमता से बढ़कर, बड़ी धूमधाम से अपनी इकलौती बेटी की शादी की। ललिता की शादी के 6-7 महीने बाद, माँ भी दुनिया से विदा हो गई। ललिता के दुख का पारावार न था। उसे रह-रह कर हावका आता कि काश, ग्रेजुएशन के कारण उसे माँ से तीन साल दूर न रहना पड़ता, तो वह माँ के साथ अधिकतम समय गुज़ार सकती थी। उसे लगता कि उसने माँ को भी खोया, ग्रेजुएशन फ़र्स्ट डिवीज़न में पास किया तो क्या हुआ, एम.ए. करने से भी वंचित रही। एक तरह का खालीपन उसे घेरे रहता। ताई जी के घर रह कर वह हमेशा हर छोटी-छोटी बात के लिए तरसती रही, उनके ताने और डाँट खाती रही। घर वापिस आकर माँ बाबू जी के कारण आगे पढ़ने की सहज इच्छा भी उसे त्यागनी पड़ी। त्याग जैसे उसके व्यक्तित्व का हिस्सा बन गया था। उस पे एक अजीब एकाकी किस्म का जुनून हावी होता जा रहा था। अपने ’’पैशन ’’ को दफ़न कर, वह शादी के बाद ससुराल ज़रूर आ गई थी, पर अकेली नहीं – अपने ’’क्रश ’’ ब्रैड पिट को भी साथ ले आई थी। कभी-कभी वह मन ही मन सिहर उठती कि ये कैसा जुनून है या मानसिक रिश्ता है जो किस कारण से इतनी सघनता से कायम होता जा रहा है....!!
एक अवचेतन अवस्था में जैसे वह एक के बाद एक सारे काम करती जा रही थी। शादी, विदाई, सुहागरात और फिर रोज़मर्रा की दिनचर्या। पति शशांक ने जब उसे पहली रात को छुआ तो उसे अच्छा नहीं लगा, वह शरमाहट से नहीं, बल्कि कड़ुवाहट से भरी सकुचाई। दूर सरकी। उसे लगा कि वह अपने ‘’प्रिंस चार्मिंग’’ (ब्रैड पिट) के साथ बेवफ़ाई कर रही है। लेकिन उसके बाद हर रात, शशांक के स्पर्श से धीरे-धीरे वह अवचेतन अवस्था में तैरने लगती और अवचेतना की हर लहर के साथ एक दूसरी ललिता जी उठती। शशांक उसके लिए ‘ब्रैड पिट’ में रूपान्तरित हो जाता । ललिता उसकी बाँहों में जिस प्यार और मधुरता से समाती, उसे देखकर शशांक कभी सोच भी नहीं सकता था कि वह अपनी पत्नी द्वारा इस तरह छला जा रहा है कि जिसका एहसास न उसे ख़ुद को है और न छलने वाली को। उन दोंनो के बीच एक अजनबी रिश्ता, अजनबी ढंग से रोज़ प्यार के अन्तरंग क्षणों में जन्म लेता और सुब्ह होने तक मर जाता । ललिता शशांक की पत्नी होकर भी पत्नी नहीं बन पाई थी। शशांक के साथ प्रेम से सराबोर पलों में भी ब्रैड पिट उसके साथ होता। सोते-सोते अनेक बार तानाशाह ताई जी पैर पटकती, उसे कोंचती सपने में चली आती, तो वह झट से पास लेटे शशांक से लिपट जाती और बड़बड़ाती – ‘’मुझे अकेला मत छोड़ना, मुझे अकेला मत छोड़ना.....।’’ नींद से जागा शशांक भी उसे बाँहों में भरकर प्यार से थपथपाता आश्वस्त करता और ब्रैड पिट के ख़्यालों में रची- बसी ललिता, शशांक की बाँहों में समाती चली जाती। वह उससे इस तरह लिपटी, बाँहों में सिमटी पुन: नींद में खो जाती।
धीरे-धीरे, बीतते समय के साथ ललिता हर पल, पर दिन शशांक और ब्रैड पिट के पृथक अस्तित्व के साथ पूरे होशो-हवास में जीने लगी। अब वह अवचेतना में नहीं अपितु, चेतनावस्था में अपने ‘’प्रिंस चार्मिग’’(ब्रैड पिट) के साथ रहती और जीती थी। वह उसका फ़ुलटाइम ’’आब्शैसन ’’ बन चुका था। जो पहले उसके अवसाद और निराशा का साथी था, अब वह हर क्षण साथ दिलोदिमाग में बना रहता था और उसे कोमल, रुमानी एहसास से भरे रखता।
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‘’ललिता, आज शाम को एक दोस्त के घर डिनर पे जाना है , मैं 8 बजे घर आ जाऊँगा, तुम तैयार रहना’’ – तैयार होते हुए शशांक ने ललिता से कहा।
ललिता ने सूनी आँखों से शशांक को देखते हुए -‘’हाँ ठीक है’’ – कहा और रसोई में चली गई।
ललिता का वैवाहिक जीवन सुखी था। हर तरह की सुख सुविधा थी। शशांक के माता-पिता दूसरे शहर में रहते थे। शशांक से उसे कोई शिकायत न थी। वह अपनी ओर से उसका ख़्याल रखता। जब समय मिलता तो बाहर घुमाने भी ले जाता। फिर भी उन दोंनो के बीच एक अधूरापन था जो तीन वर्ष बीत जाने पर भी उनके वैवाहिक जीवन को सम्पूर्ण नहीं बना पाया था।
शशांक को पता था कि ललिता ब्रैड पिट की फैन है, सो उसने उसकी फ़िल्मों की डी.वी.डी उसके लिए लाकर दी थी जिससे उसके पीछे वह अकेली बोर न होए बल्कि अपने मनपसन्द हीरो की मूवीज़ देखे। ब्रैड पिट की दीवानी ललिता उसकी एक-एक फ़िल्म को कई-कई बार देखती और ‘’ब्रैड पिट आई लव यू ’’, ‘’ब्रैड पिट आई लव यू ’’,‘’ब्रैड पिट आई लव यू ’’...न जाने कितनी बार कहती। नतीजा ये हुआ कि ब्रैड पिट और भी भयंकर रूप से उसके दिलोदिमाग़ में गड़ गया। सोते-जागते, काम करते – हर पल ब्रैड पिट ललिता के ख़्यालों में बना रहता। इन्तहा ये हो गई कि अब वह शशांक की अवहेलना करने लगी।वह अपनी ज़हनी दुनिया में जीती। उसने अपनी एक अलग ही काल्पनिक दुनिया बना ली थी, जिसमें ब्रैड पिट होता और वह होती। यहाँ तक कि उसने शशांक के पास सोना भी बन्द कर दिया। शुरु-शुरु में उसके व्यवहार की बेरुखी शशांक दिनभर काम में लगे रहने के कारण अधिक नहीं जान पाया था, लेकिन उसके गैरो की तरह अलग सोने पर, छूने पे छिटक के अलग हो जाने पर शशांक का माथा ठनका। उसने बहुत सोचा पर उसे कोई कारण दूर-दूर तक नज़र नहीं आया। उसके मन शक उपजा कि शादी से पहले किसी और से तो ललिता प्यार नहीं करती थी...या कहीं अब कोई और तो उसके जीवन में नहीं आ गया....?? वह परेशान रहने लगा। ऑफिस जाता पर काम से उखड़ा-उखड़ा रहता। एक दो बार वह शक़ से बिंधा अचानक घर भी लौट-लौट आया कि कहीं ललिता अपने किसी प्रेमी के साथ उसके पीछे रंगरेलियाँ तो नहीं मना रही। पर घर में उसको अकेला पाकर उसका शक़ भी ग़लत निकला। अब वह और भी परेशान रहने लगा। उधऱ ललिता अपने में बड़ी मगन रहती। खूब सजी सँवरी, खुश रहती लेकिन उसके साथ न कहीं जाती, न उसके निकट आती।
ललिता शशांक में ब्रैड पिट का व्यक्तित्व, उसकी सी मुस्कुराहट, उसके हाव-भाव, उसके देखने का खास अन्दाज़ खोजती और ये सब न पाकर उस पे खीजती। उसके साथ ऱूखा व्यवहार करती। रविवार के दिन तो वह न लंच बनाती, न डिनर । शशांक को डबलरोटी और ऑमलेट पे गुज़ारा करना पड़ता। दरअस्ल ललिता के लिए शशांक को छुट्टी के दिन घर में झेलना मुश्किल हो जाता था। सारे दिन शशांक का यूँ घर में बने रहना उसे नाग़वार लगता । उसके सामने डी.वी.डी. पे ब्रैड पिट की फ़िल्म देखने में भी उसे ख़लल पड़ती महसूस होती, सो वह न डी.वी.डी. देखती, न खाना बनाती,न शशांक से बात करती, यानी के पूरी तरह उसकी उपेक्षा करती और इस हद तक कि शशांक को अपनी अस्तित्वहीनता का एहसास होने लगता। उसके अलावा कौन ललिता के जीवन मे छा गया था जिसके कारण वह उसकी इस बुरी तरह उपेक्षा करती है - वह अक्सर सोचता। पर कुछ समझ न पाता ।
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शशांक ने उसे खुश करने के लिए एक दिन ऑफ़िस से लौटकर डी.वी.डी. पर ब्रैड पिट की फ़िल्म देखनी चाही। तभी उसके हाथ से डी.वी.डी. फ़र्श पे गिरा और चटक गया। यह देखकर ललिता शशांक पर ऐसी आगबबूला हुई कि वह अवाक् देखता रह गया। ब्रैड पिट का डी.वी.डी. ही टूटा था - ब्रैड पिट को तो कुछ नहीं हुआ था। एकाएक शशांक के मन में एक विचार ने दस्तक दी कि उसकी पत्नी ब्रैड पिट के प्रेम में तो गिरफ़्तार नहीं है ? क्योकि ब्रैड पिट का डी.वी.डी. चटकने पर उसने जैसी प्रतिक्रया दी थी वह साफ़-साफ़ बता गई थी कि ललिता ब्रैड पिट के साथ एक ऐसा सघन ज़हनी रिश्ता बनाए हुए है कि उसके आगे वह सारी दुनिया कुर्बान कर सकती है।
ललिता को अपनी फ़ैन्टेसी पे नियन्त्रण नहीं था। शशांक सोचने लगा कि ललिता में यह भावनात्मक असन्तुलन किस कारण से उपजा है जिसका नकारात्मक असर उन दोंनो के वैवाहिक जीवन पे पड़ रहा था। उसकी कौन सी इच्छाओं का दमन हुआ है कि वह कभी बिखरी, कभी उखड़ी, कभी उचटी तो कभी अपने आप में मगन रहती है । उसका होना, न होना तो ललिता के लिए मायने ही नहीं रखता । ललिता का यह मात्र रूखापन था या बेवफाई, शशांक समझने में असमर्थ था। अपने किसी मित्र से इस समस्या को बाँटने में उसे अपमान महसूस होता था। माता-पिता से वह इस बात का ज़िक्र तक भी नहीं करना चाहता था। बहरहाल शशांक ने किसी से कुछ न कह कर ललिता की उस अजीबोग़रीब बेरुखी का बोझ इसी तरह ख़ामोशी से सहने का इरादा किया, इस ख़्याल से कि कभी तो वो दिन आएगा, जब ललिता का दिल उस बेगुनाह पर पिघलेगा।
वह दयनीय बना सोचता कि -‘’ ब्रैड पिट तो मैं बन नहीं सकता, अब यही दुआ की जा सकती है कि ललिता को ब्रैड पिट में - मैं नज़र आने लगूँ या मुझमें उसे ब्रैड पिट नज़र आने लगे । ‘’
रात के 2 बजे थे । ललिता गहरी नींद की आग़ोश में थी पर शशांक से नींद कोसो दूर थी। सिगरेट पीता वह, दूसरे बिस्तर पे सोई ललिता के पास पडी कुर्सी पे जा बैठा। उसके दिमाग़ में अनवरत विचारों के छल्ले और होंठो पे धुएँ के छल्ले बन रहे थे कि तभी ललिता ने खूबसूरत अँगड़ाई ली और करवट बदलती बोली - ‘’ब्रैड पिट आई लव यू.....प्लीज़ डोन्ट लीव मी एवर.... ’’
शशांक जो उस समय सिगरेट की तरह सुलग रहा था, ललिता के वे शब्द सुनकर मनो वह राख होने लगा था... उसके मन में आया कि वह ललिता को झिंझोड़ कर जगाए और कहे – ‘’बट, आई मस्ट लीव यू फॉर एवर…….’’ यह बेरुखाई है या बेवफाई.....वह बुझा बुझा कुछ भी समझ पाने में असमर्थ था ।
(कहानी) जनवादी न्याय
जनवादी, समाजवादी, क्रान्तिकारी कार्यकर्ता, स्थानीय तीन विद्यालयों के संस्थापक, महिला एवं
बालोध्दार गैरसरकारी संस्था के अध्यक्ष – यानी कुल मिलाकर एक ‘ बहुआयामी सामाजिक व्यक्तित्व ‘।
नाम ‘ सम्मान राय ‘। सम्मान राय के घनिष्ठ मित्र ‘ ज्ञानेश्वर द्विवेदी ’, जो शहर के प्रख्यात डिग्री कॉलिज
में समाजशास्र के विभागाध्यक्ष थे और खासे जाने माने प्रतिष्ठित साहित्यकार भी।
सोशल एक्टिविस्ट संयोगिता आज एकबार फिर सुलग उठी। उसकी परिचिता, नवनियुक्त प्रवक्ता ‘नन्दिनी’
तथाकथित जनवादी, समाजवादी, लोकप्रिय व्यक्तित्व सम्मान राय और उनके हमराज़, हमनशीं ज्ञानेश्वर
द्विवेदी की हवस का शिकार बन गहरे अवसाद में डूबी थी। प्रतिरोध करने पर नौकरी जाने से अधिक,
सामाजिक छवि पे हमेशा के लिए आँच आने का भय उसका दम घोट रहा था। अपने रुतबे का इस्तेमाल
करते हुए, मि.राय ने नन्दिनी को आवश्यक कार्य के छद्म जाल में फँसाकर जिस तरह छिन्न-भिन्न
किया था – वह उस घटना को दिलोदिमाग़ से मिटा देने के लिए मौत को गले लगाना चाहती थी। इस
योजना के पीछे मास्टर माइन्ड था - ज्ञानेश्वर द्विवेदी का। बामुश्किल संयोगिता ने नन्दिनी को
सम्भाला। इससे पूर्व एक संघर्षरत युवती को लेखन के क्षेत्र में पाँव जमाने को आतुर देख इन दोनो
शातिरों ने मिलकर उसे कामक्रीड़ा का खिलौना बनाया था। इस ‘ दुर्घटना ‘ के बाद वह अनुभवहीन
युवती अपने असली लक्ष्य से भटककर इन दो जनवादी महानुभावों द्वारा देहभोग के दलदल में ऐसी
धँसती गई कि चाह कर भी कभी उबर न पाई।
सम्मान राय और ज्ञानेश्वर द्विवेदी के समाजवादी – परोपकारी रूप के पीछे छिपा कामलोलुप भेड़िया
शिकार दबोचने के लिए हर पल मुँह बाए तैयार रहता था। उनका यह असली रूप उनके ख़ासमख़ास
2)
लोगों तक ही उजागर था, वरना शेष पर वे अपनी ऊँची छवि की धाक जमाए आदर और सराहना के
पात्र बनते रहते थे। तीन वर्ष पूर्व केरल के ग़रीब घर की किशोरी ‘कुंजमणि’ दिल्ली के नामी अस्पताल
में नौकरी पाने के लिए सम्मान राय के पशु की ऐसी बलि चढ़ी कि तब से अब तक बलि चढ़ते-चढ़ते
बेचारी चरमरा गई है लेकिन वह दानव आज भी अपने दोस्त द्विवेदी के साथ उस निरीह को चूसने से
बाज़ नहीं आता। ये तो मात्र कुछ उजागर क़िस्सों का ही हवाला है, दबे छिपे किस्सों की तो शायद गणना
ही नहीं हो सकेगी।
इन दोनों महानुभावों की कुत्सित हरकतों की शिकार नारियाँ अक्सर बदनामी के डर से
मूक बनी जीती रही हैं या फिर इनके चंगुल से बच निकलने के चक्कर में शहर छोड़ कर, कहीं गुमनाम
ज़िन्दगी जीने के लिए मजबूर हुई हैं। जब 2005 में वन्दना नाम की कॉलेज छात्रा ने फाँसी लगाकर
आत्महत्या कर ली थी, तो सम्मान राय और ज्ञानेश्वर द्विवेदी का नाम इस हादसे को लेकर बहुत उछला
किन्तु कहा जाता है कि बाद में पुलिस ने इनसे बहुत मोटी रक़म डकार कर मामला ऐसा रफ़ा-दफा
किया कि आज तक उसकी मौत का सही कारण पता नहीं चल पाया ।
प्रखर और संवेदनशील संयोगिता किसी के भी साथ होने वाले ऐसे शोषण और अन्याय का
विस्तृत ब्यौरा अपने दिलोदिमाग़ में ख़ामोशी से दर्ज़ करती जा रही थी और उस सही वक्त की तलाश में
रहती थी कि कब अन्यायियों को निरीह लोगों के शोषण का दण्ड दे। उसका सोचना था कि ‘सम्मान
राय’ और ‘ज्ञानेश्वर द्विवेदी ‘ का पाप-कुम्भ जब गले तक भर जाएगा तो वह उसे फोड़कर चकनाचूर कर
देने का नेक काम करते देर नहीं करेगी और उसे व उसके उतने ही नीच साथी ‘ज्ञानेश्वर द्विवेदी ‘ को
ऐसा सबक़ सिखायेगी कि वे दोंनो औरत की रुह से भी काँपेगें। संयोगिता ने सोचा कि ऐसी शातिर
छलिया जोड़ी को छल से ही दबोचा जाना न्यायोचित है। इन दोनो को वह पलायन का कोई मौका नहीं देना चाहती थी।
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दिन भर के काम से थकी, संयोगिता एक कप कॉफ़ी पीने के लिए कनॉटप्लेस के कॉफ़ीहाउस में एक
कोने की टेबल पे अपेक्षाकृत शान्त सी जगह देखकर बैठ गई। कॉफी की प्रतीक्षा करती बैठी थी कि तभी
सम्मान राय अपने दल-बल सहित कुछ दूरी पर कुर्सियों पे जम गए। अब तक संयोगिता की कॉफ़ी आ
गई थी। पलक झपकते ही सम्मान राय की टेबल पर भी कॉफ़ी और स्नैक्स आ गए। उन सबकी कॉफ़ी
और स्नैक्स पर ‘सैक्स’ की दबे स्वर में चर्चा होने लगी। उन लोगों का दबा स्वर भी इतना ऊँचा था कि
संयोगिता तक उनकी बातें स्पष्ट पहुँच रहीं थी। वह जंगली झुंड औपचारिकतावश बीच-बीच में राजनीति
और सामाजिक मुद्दों को भी घसीट रहा था, पर घूम फिर कर अपने चहेते विषय पे उतर आता था।कभी
कोड मिश्रित भाषा में तो, कभी बकबक की मदहोशी में खुल्लमखुल्ला वे सब चटखारे ले लेकर नारी
चर्चा करने में लगे पड़े थे। संयोगिता उनकी गिरी हुई सोच, उनकी बुध्दि की कंगाली से छटपटा रही
थी। स्त्री और पुरुष के सहज पाक रिश्ते को सम्मान राय और उनके परममित्र ज्ञानेश्वर द्विवेदी
अपने चाटुकारों के साथ मिलकर जिस तरह कीचड़ से मथ रहे थे, उसे सुनकर संयोगिता जिस तरह
आगबबूला हो रही थी, उसे तो बस वही जानती थी। उसे लगा कि ये मनुष्य हैं या पशु ! क्या ईश्वर
मनुष्य के रूप में ऐसे निकृष्ट जीव भी बना सकता है ? उसे वे पशु जाति में भी - निपट ‘जंगली
जानवर’ नज़र आए, जिनके समाज में न रिश्ते होते हैं, न बंधन, न सोच, न विवेक - बस सारे कार्य
देह के स्तर पर होते हैं। जब वे जठराग्नि और कामाग्नि से आन्दोलित होते हैं तो सीधे सामने वाले
को अपना निवाला बनाते हैं। संयोगिता को लगा ऐसे ही कुछ पशु कॉफ़ी हाउस में धरना दिए बैठे
है जो नग्न वार्तालाप से अपनी चिरज्वलन्त और अतृप्त कामक्षुधा को बहला रहे हैं। संयोगिता ने
अपनी कॉफ़ी कड़वाहट के साथ गटकी और वहाँ से तीर की तरह उठ सीधे बाहर आ गई। सामाजिक
कार्यकर्ता के रूप में संयोगिता की पहचान अभी धीरे-धीरे बन रही थी। निश्चित रूप से उस क्षेत्र की
वह आने वाले समय की एक अद्भुत साहसी सैनिक थी। पीड़ित नारी हित में वह सम्मान राय और
ज्ञानेश्वर द्विवेदी जैसे घटिया लोगों के घिनौने चेहरे समाज के सामने उघाड़ देना चाहती थी। वह
अक्सर यह सोचकर हैरान होती कि समाज का चिन्तनशील, संवेदनशील वर्ग ऐसे नक़ली जनवादी और
समाजवादी लोगों की कुत्सित गतिविधियों से वाक़िफ़ होकर भी, उनके ख़िलाफ़ और पीड़ितों के पक्ष में
कोई दमदार क़दम क्यों नहीं उठाता ? क्यों ऐसे वाकयों को नज़रअन्दाज़ करते बैठा रहता है ? समाज
के लोग सम्मान राय और ज्ञानेश्वर द्विवेदी जैसे गुनहगारों का क्या सोचकर लिहाज करते चले जाते हैं
और वे बेशर्म एक के बाद एक गुनाहों का ढेर लगाते जाते हैं। यदि समाज का संभ्रान्त विचारशील वर्ग
हर उम्र की औरतों के साथ घटती हैवानी वारदातों को सिर्फ़ अपनी आलोचना, अफ़सोस और भर्त्सना
तक सीमित न रख, उनके विरोध में दृढ़ संकल्प के साथ उठ खड़ा होए तो निश्चित रूप से सम्मान राय
और ज्ञानेश्वर द्विवेदी जैसे ‘ रुग्ण तत्वों ‘ की हिम्मत टूटे, उनकी बेलगाम ज़ुबान खुलने से पहले
हज़ार बार सोचे और वे औरतों के प्रति अपना नज़रिया बदलने पे विवश होए। संयोगिता का आक्रोश
मात्र खेद या गुनहगारों की आलोचना तक ही सिमट कर नहीं रह जाना चाहता था, अपितु वह पूरे
दम-ख़म से उन दानवों को ऐसी धूल चटा देना चाहती थी कि भविष्य में वे जनवादी-समाजवादी
मुलम्मे को चढ़ाए सारी एय्याशी करना भूल जाए।
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“क्या मैं अन्दर आ सकती हूँ “ – संयोगिता ने सम्मान राय के विशाल कार्यालय परिसर में बने
पंचसितारा शैली में सजे धजे ऑफ़िस के विज़िटर रूम में हर कूटनीति के साथ धड़ल्ले से प्रवेश
किया। विज़िटर रूम से अटैच्ड, अपने ग्लेज़ड कमरे में सम्मान राय ने अतिथि कक्ष में आने जाने वाले
अतिथियों पे – ख़ास तौर से महिला अतिथियों पे सरसरी नज़र डालते रहने के लिए शातिर प्रबन्ध
किया हुआ था। कोई उन्हें भा गई तो क्रम भंग करके वे इन्टरकॉंम से सेक्रेटरी को आदेश देकर
उसे अपने कमरे में पहले बुला लेने की ख़ास अनुकम्पा करते थे। संयोगिता के साथ भी उन्होने
यही किया। मुश्किल से वह पाँच मिनट ही विज़िटर रूम में बैठी थी कि तभी अन्दर उसके लिए बुलावा
आ गया। छरहरी देहयष्टि वाली संयोगिता आत्मविश्वास के ऊपर भोलेपन का मुखौटा चढ़ाए, सम्मान
राय के भव्य कक्ष में पहुँची। सम्मान राय उसे अपने प्रेम छलकाते नेत्रों से निगलते हुए, औपचारिक
शालीनता का छींटा देते हुए बोले –
“आइए, आइए,बैठिए। आपका शुभनाम ?“
“ जी, संयोगिता ‘’
“कहिए में आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ ?”
“सर, आप ऐसा कहकर मुझे शर्मिन्दा मत कीजिए प्लीज़। मैं तो बस एक छोटी सी मदद की
आशा से आपके पास आई हूँ।“
“ अरे, नहीं, नहीं छोटी क्यों भरपूर मदद लीजिए, हम तो है ही समाज सेवा को समर्पित। वैसे आप करती
क्या हैं – समाज-सेविका, शिक्षिका, लेखिका या (मन ही मन में - मृग मरीचिका) “ – सम्मान राय
चाटुकार की भाँति बोले।
“जी मैं स्वैच्छिक कार्यकर्ता हूँ “ – संयोगिता ने लजाने का नाटक करते हुए कहा – “हाल ही में
अनाथाश्रम के बच्चों के मनोविज्ञान के अध्ययन के लिए जब मैं उनके आश्रम गई तो मैंने उनका
जीवन रोज़मर्रा की छोटी-छोटी सुविधाओं से रहित पाया। उस तंग हालत में उन्हें यूँ जीते देख मेरा
दिल भर आया। मैंने आपकी अनेक बार अनेक लोगो से बड़ी प्रशंसा सुनी थी कि आप ज़रूरतमन्दों
के मसीहा हैं, सो मैं उन बच्चों के लिए आशा सँजोए आप के पास आई हूँ कि यदि आप कुछ
आर्थिक सहायता कर दें तो वे बच्चे बेहतर जीवन जी सकते हैं।“
संयोगिता के मीठे स्वर से इस तरह अपनी प्रशंसा सुनकर सम्मान राय बड़े गदगद हुए। ऐसी संस्थाओं
को लाख दो लाख रुपये देना उनके लिए कोई बड़ी बात नहीं थी। उनका मन तो बल्लियों उछल रहा था
कि इस दान-राशि से इस ‘कोमलांगी’ को उपकृत करके, आने वाले समय में इसका रसपान करने का
मौका ज़रूर हाथ लगेगा। उनकी मन ही मन अपनी अलग ही प्लानिंग चल रही थी। सम्मान महाशय ने
बिना किसी देरी के इन्टरकॉम पर अपनी सेक्रेटरी को अन्दर आने का आदेश दिया। सेक्रेटरी के अन्दर
आने पर वे संयोगिता से बोले –
“क्यों मैडम, पचास हज़ार, अस्सी हज़ार या एक लाख - कितने का चैक दूँ ”
“सर, जो आप आसानी से दे सकें – पचास से भी काम चल जायेगा, मैं सोचती हूँ “ – संयोगिता संकोच
से बोली।
“एक लाख से कम भी क्या देना” –सम्मान राय ने संयोगिता को अपनी दानवीरता में लपेटने की दिली
इच्छा से सेक्रेटरी को एक लाख का चैक तैयार करने का आदेश दिया और दो कप कॉफ़ी भेजने के ले
भी कहा।
पैनी बुध्दिवाली संयोगिता मन ही मन सम्मान राय पे मुस्कुराती अपने अगले पैतरे के लिए तैयार हो
चुकी थी। कॉफ़ी के कारण वह उस हीन व्यक्ति के साथ अब और अधिक देर वहाँ बैठकर अपना समय
नहीं गंवाना चाहती थी, सो उसने ज्यों ही उठना चाहा, सम्मान राय लगभग उसे जैसे पकड़ कर बैठाने
को आतुर सा बोला –
“अरे, आप कहाँ चली मैडम, सेक्रेटरी चैक यही लाकर देगी। कॉफ़ी भी आती होगी।“
“नहीं सर आपके और भी मिलने वाले बाहर इन्तज़ार करते बैठे हैं, कॉफ़ी फिर कभी सही, आपने इतनी
बड़ी राशि दी, इतना ही बहुत है और चैक के लिए मैं विज़िटर रूम में प्रतीक्षा कर लूंगी। “
“अरे,रे,रे,रे ये आप क्या कह रही हैं, विज़िटर रूम में क्यों, आप यही प्रतीक्षा करेगी। बस चैक आता ही
होगा और कॉफ़ी भी। देखिए, ज़रूरतमन्दों की तन,मन,धन से मदद करना हमारा फ़र्ज है। भविष्य में भी
कभी भी किसी तरह की मदद की आवश्यक्ता हो तो आप बेझिझक मेरे पास आइए।“
इतने मे कॉफ़ी आ गई । संयोगिता को न चाहते हुए भी रुकना पड़ा। कॉफ़ी पीते हुए सम्मान राय
संयोगिता के बारे में व्यक्तिगत जानकारी हासिल करता रहा। संयोगिता ने भी जानबूझकर सम्मान राय
को ऐसी जानकारी दी कि उसे वह एक निरीह, अकेली और अपने कार्यक्षेत्र में आगे बढ़ने की इच्छुक
नज़र आई। कुछ ही क्षणों में चैक भी आ गया । सम्मान राय ने अपने हस्ताक्षर करके बड़े ही
विनम्र अन्दाज़ में संयोगिता को चैक थमाया।संयोगिता झटपट उठ खड़ी हुई। उसे जाने के लिए उतावला
हुआ देख, सम्मान राय हड़बड़ाया सा बोला –
“हाँ, अपना फोन नम्बर, और पता सेक्रेटरी को नोट करा दीजिएगा और सम्पर्क में रहिएगा । और यह
भी याद रखिएगा कि आपका और मेरा कार्यक्षेत्र लगभग एक सा ही है। हम दूसरों की सेवा करते हुए
बहुत आगे निकल सकते हैं।“
“जी, जी, क्यों नहीं, आपने सही फ़रमाया। में जल्द ही आपसे मिलूँगी। अच्छा, सर बहुत-बहुत धन्यवाद”
और वह नमस्कार करती वहाँ से तुरन्त निकल गई।
बाहर सम्मान राय की वफ़ादारी से ड्यूटी बजाने वाली सेक्रेटरी ने तेज़ी से जाती संयोगिता को
“एक्सक्यूज़ मी” कह कर रोका और उसका फोन नम्बर और पता डायरी में नोट किया तथा रजिस्टर में
चैक प्राप्ति के हस्ताक्षर भी लिए।संयोगिता तो अपना मोबाइल नंबर देने को तैयार ही थी जिससे आगे
की योजना कामयाब हो सके।
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दो दिन बाद संयोगिता के मोबाइल पे एक अपरिचित नम्बर से कॉल आई। संयोगिता ने “हैलो” कहा
तो उधर से पुरुष स्वर लहराया – “ संयोगिता जी मैं सम्मान राय बोल रहा हूँ कैसी हैं आप ?
“जी मैं ठीक हूँ” – उसे मन में कोसती संयोगिता ने छोटा सा जवाब थमाया।
“यह मेरा व्यक्तिगत मोबाइल नंबर है, आप सेव कर लीजिएगा। ऐसा है कि शनीवार को मैंने शहर के
समाजसेवी कार्यकर्ताओं व कुछ परिचित मित्रों को रात्रि भोज पर बुलाया है, आप भी उसमे सादर
निमंत्रित हैं।“ सम्मान राय रस घोलते से बोले।
“सर, मैं इस पार्टी मैं क्या करूँगी। मैं किसी को जानती भी नहीं” – संयोगिता ने संवाद जड़ा।
“अरे संयोगिता जी, इसलिए तो आपका आना और भी ज़रूरी है। इस पार्टी में सबसे आपका
परिचय हो जाएगा। देखिए आपको आना ही है।“
“जी, अच्छा आ जाऊँगी “ – अपनी अगली चाल के लिए तैयार संयोगिता ने सम्मान राय को आशस्वत
करते हुए कहा।
संयोगिता की योजना कामयाबी की ओर बढ़ रही थी। वह अदम्य जोश से भरी थी, किन्तु पूरे होश के
साथ....। नारी उध्दार के नाम पे नारी का जंगली जानवर की तरह शोषण करने वाले तथाकथित
शिक्षित, सभ्य, विचारशील, समाजवादी, जनवादी उन दो प्रतिष्ठित मर्दों का घिनौना रूप वह शीघ्र ही
समाज के सामने लाने वाली थी। सम्मान राय और ज्ञानेश्वर द्विवेदी की कामक्रीड़ा की बलि चढ़ी, कलपती
आत्मा और देह का बोझ ढोती नारियों की ओर से संयोगिता उन दोंनो के मुँह पे हमेशा के लिए एक
ऐसा करारा तमाचा जड़ने को कटिबध्द थी, जो हमेशा उन्हे काली करतूतों की याद दिला कर, उन्हें इतना
भयबिध्द करे कि भविष्य में वे नारियों का शोषण करना भूल जाएँ। साथ ही प्रतिरोध न कर सकने
वाली स्त्रियाँ और कुछ कर पाने में असमर्थ हों तो कम से कम आत्मरक्षा की तो हिम्मत जुटा पाए।
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इन चार दिनों में संयोगिता ने बेहद समझदारी और चतुरता से सम्मान राय और ज्ञानेश्वर द्विवेदी के
ख़िलाफ़ ‘भांडाफोड़ अभियान’ की पूरी तैयारी कर ली थी। इन्तज़ार की घड़ी बीती और शनीवार का दिन
भी आ पहुँचा। 8 बजे तक संयोगिता सम्मान राय के आलीशान बंगले के खूबसूरत लॉन में आयोजित
पार्टी में पहुँच गई।
संयोगिता ने देखा कि महाशय ने लम्बी चौड़ी पार्टी न रख कर, सिर्फ़ 20-25 लोगों की छोटी सी
डिनर पार्टी रखी थी। अब तो वह अच्छी तरह समझ गई थी कि यह डिनर मात्र उसे चंगुल में फंसाने
का एक बहाना थी। सो वह भी तैयार थी अपने वार के लिए। आज उसे देखना था कि कौन बाज़ी
मारता है – नारियों के भक्षक सम्मान राय और ज्ञानेश्वर द्विवेदी या नारी जाति की रक्षक वह
स्वयं......!
पार्टी बड़े ढंग से शुरू और ख़त्म हु ई। सम्मान राय ने सबसे संयोगिता का परिचय करवाया।
10 बजे तक वह भी सबसे औपचारिक बातें करती अपने को व्यस्त रखती वहाँ बनी रही। जैसे जैसे
समय आगे खिसकने लगा उसने अपने घर जाने की आतुरता दिखाई, तो सम्मान राय और साथ-साथ
ज्ञानेश्वर द्विवेदी भी निहायत ही तहज़ीबदार लहज़े में उससे कुछ देर और रुकने का निवेदन करने
लगे। उसने एक दो बार तो अपनी विवशता जताई,लेकिन बाद में उन पे एहसान करती रुकने को तैयार
हो गई। सम्मान राय ने उसे यह कहकर और निश्चिन्त किया कि उनका ड्राइवर उसे घर तक छोड़ कर
आएगा। सम्मान राय और ज्ञानेश्वर द्विवेदी ने उसके रुकने पर पक्की मोहर लगाने के लिए यह भी
कहा कि एक ज़रूरी सोशल प्रोजेक्ट है,जिसे उन दोनो को उसके साथ डिस्कस करना है और ऐसी चर्चा
सबके जाने के बाद शान्ति से ही हो सकती है। संयोगिता उनके एक-एक दाँव पेंच को भाँपती हुई,
आज्ञाकारी बालिका की तरह सिर हिलाती उनकी हाँ में हाँ मिलाती रही ।
कुछ ही देर में एक-एक करके सारे मेहमान चले गए। बस वे दो महान जनवादी-समाजवादी आत्माएँ
और संयोगिता - वहाँ रह गए। सम्मान राय और ज्ञानेश्वर द्विवेदी संयोगिता को सप्रेम ड्रॉइंगरूम में ले
गए। आदत के अनुसार सम्मान राय ने अपने ख़ानसामा से तीन कप कॉफ़ी लाने को कहा। कॉफ़ी किसे
पीनी थी। कॉफ़ी आने पर ख़ानसामा को छुट्टी दे दी गई। यह तो आगे की गतिविधियों की भूमिका थी,
संयोगिता अच्छी तरह जानती थी। सम्मान राय सोफे में धंसा समाज-सेवा की परियोजना की दिखावटी
चर्चा करने लगा और ज्ञानेश्वर द्विवेदी पास बैठा एक पत्रिका के पन्ने पलटता रहा। भूमिका बने वे पल
धीरे-धीरे आगे सरकने लगे। संयोगिता ने लॉन से अन्दर आते हुए अपने नियत सहायकों को फोन
कर दिए थे कि वे दलबल सहित बंगले के आस-पास तैयार रहें। इतने में ज्ञानेश्वर द्विवेदी उठकर
अन्दर गया और चुपचाप शराब के दो पेग चढ़ाकर आया, क्योंकि जब वह ड्रॉइंगरूम में वापिस आया
तो सोफे पे बैठते समय शराब की तीखी गंध की लहर संयोगिता तक पहुँच गई थी। इसके बाद
सम्मान महाशय अन्दर गए और सोमरस पान करके आए। पर वे साथ में मुँह में इलायची चबाते आए।
दोनों को बद् दुआ देती संयोगिता मन ही मन कह रही थी कि देखते हैं कि कौन किसको मात देता
है। अभी पता चल जाएगा। दोनों फिर से बेसिर पैर की समाजसेवा की बातें करने लगे। इतने में दोनो
पर शराब का सुरूर चढ़ने लगा था। सम्मान राय संयोगिता से मुख़ातिब हो बोला –
“संयोगिता जी, क्या मैं आपको “तुम “ कह सकता हूँ ?”
“ “क्यों नहीं सर, आप इतने बड़े हैं.....” - संयोगिता ने उसे मूर्ख बनाते हुए कहा।
यह संयोगिता के निकट आने की छूट का पहला संकेत था। । सम्मान राय और ज्ञानेश्वर द्विवेदी जैसे
बेशर्म लोगों को कोई स्त्री एक इंच छूट दे तो, दूसरी तीसरी बड़ी छूट तो वे स्वयं झपट लेते हैं।
सम्मान राय और ज्ञानेश्वर द्विवेदी सोमरस के मद से बहके-बहके, क़तरा-क़तरा खुलते जा रहे थे।
उनके अन्दर विलोड़ित वासना की तरंगों ने अब उछल-उछल कर पछाड़ खानी शुऱू कर दी थी। संयोगिता
सतर्क थी। इस शह और मात की जंग में एकाएक उभरी स्थिति में कहीं-कही वह भी छोटी-मोटी मात
खाने को मानसिक रूप से तैयार थी। किन्तु अन्तत: वह उन दोनों को प्रतिशोध की आग से भरे अपने
वार के आगे पूरी तरह पराजित देखना चाहती थी। तभी सम्मान राय होंठो पे एक कुटिल मुस्कान और
आँखों में काम के शोले लिए संयोगिता के पास आया और पलक झपकते ही उसकी कमर में हाथ
डालकर, उसे अपनी बाँहों में भर लिया। संयोगिता कसमसाई और अपने को उसकी जकड़ से छुड़ाती
बोली –
“अरे, आप ये क्या कर रहे हैं... छोड़िए मुझे...”
“ कुछ नहीं, थोड़ा तुम्हें दुलार रहा हूँ, तुम हो ही इतनी प्यारी.... “
“ सर, प्लीज़ दूर हटिए, छोड़िए मुझे....आप तो मुझसे सोशल प्रोजेक्ट डिस्कस कर रहे थे। ये आप को
एकाएक क्या हो गया ?? छोड़िए मुझे.......मुझे घर जाना है।“
“चली जाना, चली जाना, पर ज़रा हमें कृतार्थ तो कर दो डियर.. “– सम्मान राय , ज्ञानेश्वर की तरफ़
अर्थपूर्ण नज़रों से देखता और भद्देपन से ठहाका लगाता बोला।
संयोगिता की कलाई पे कामभाव से अभिभूत सम्मान राय की हाथ-तोड़ पकड़ ने संयोगिता के काँच के
नाज़ुक कड़े को इतनी ज़ोर से चटकाया कि वह तड़ाक से दो टुकड़ों में खिल गया और उसने अपने टूटे
नुकीले कोनों से उसकी कलाई पे एक अर्ध्दगोलाकार रक्तरंजित लकीर खींच दी। संयोगिता ने दर्द को
ज़ब्त करते हुए, पूरा ज़ोर लगाते हुए सम्मान राय की पकड़ से ज्योंहि अपना हाथ छुड़ाया, तो उस
वहशी ने उसकी बाँह लगभग भींचते हुए पकड़ ली। इस पकड़-धकड़ में इस बार संयोगिता के ब्लाउज़
की बाँह पे लगी लेस उधड़ कर लटक गई।
“ चलो डार्लिग गर्ल, बैडरूम में चलो, अच्छे बच्चे ज़िद नहीं करते, बड़ों का कहना मानते हैं.. ऐ, ज्ञान
किधर गया तू.. “
तभी एकाएक उठकर अन्दर गया ज्ञानेश्वर बैडरूम से बोला – “बड़े भाई, मैं यहाँ शुभ काम की शुरुआत के
लिए तैयार हूँ आप ‘’ उर्वशी ‘’ को बस अन्दर ले आइए।“
सम्मान राय संयोगिता के साथ लपट झपट करता बैडरूम में घुसा तो संयोगिता ने ऊपर से नीचे तक
निर्वस्त्र खड़े ज्ञानेश्वर को देख कर लज्जा से मुँह मोड़ लिया। उत्तेजना से बौराये सम्मान राय ने भी खींच-
खींचकर अपना चीर हरण शुरु कर दिया। इससे पहले की उन दोनो में से कोई संयोगिता पे झपट्टा
मारता और उसका चीरहरण शुरू करता, प्रत्युतपन्नमति संयोगिता अपने ‘’तुरत न्याय अभियान’’
के प्रति सचेत होती, स्वयं को अपने ‘ मिशन ‘ पे साधती, बहाने से वॉशरूम में चली गई और वहाँ
से अब तक बंगले के बाहर पहुँच चुके प्रतिनिधि अख़बारों और टी.वी. चैनलों के रिपोर्टर्स को मोबाइल
से तुरन्त ड्रॉइंगरूम औऱ वहाँ से बिना किसी देरी के बैडरूम में धावा बोलने का संकेत दिया। बाहर तैयार
चार पाँच विभिन्न एन.जी.ओ. के कार्यकर्ताओं सहित रिपोर्टर्स की भीड़ टी.वी. कैमरो सहित धड़धड़ाते हुए
अन्दर आ गई।
उन सबके आने का शोर सुनते ही वॉशरूम से संयोगिता भी शेरनी बनी उन सबके बीच पहुँच गई और
उसने सम्मान राय व ज्ञानेश्वर के शटाक-शटाक करारे-करारे दो तीन तमाचे जड़ दिए और वहाँ
उपस्थित भीड़ को उसने, अपने साथ हुई ज़ोर ज़बरदस्ती और उन दोनो की बदनीयती का प्रमाण देते हुए
अपनी कटी हुई कलाई और ब्लाउज़ की बाँह की उधड़ी लेस दिखाई। वह रोष से भरी भीड़ से मुख़ातिब
होकर बोली कि अग़र वह अपनी सुरक्षा के प्रति सतर्क न होती और हिम्मत से काम न लेती तो, आज
उसके साथ भी वैसी ही अनहोनी घटती, जैसी अन्य कई औरतों के साथ घट चुकी थी। दोंनो उस भीड़
को देख कर वैसे ही हतबुध्दि से खड़े थे, उस पर संयोगिता के तमाचों से और भी सकपका
गए। दोंनो नग्न मर्दों की ‘बेचारी’ सूरत देखने लायक थी। संयोगिता की आँखों के सामने इन दोनों की
हवस की शिकार बनी औरतों का दर्द और नन्दिता का अवसाद से भरा चेहरा घूम गया। इन
छिछोरों का कॉफ़ी हाउस वाला घटिया वार्तालप उसके कानों में गूँजने लगा। क्रोध से तमतमाई दुर्गा
रूप धारण किए वह बोली –
“चालबाज़ो, सोशल प्रोजेक्ट के बहाने मुझे पार्टी में बुलाकर अपनी हवस का शिकार बनाना चाहते थे ?
उस दिन कॉफ़ी हाउस में बैठे क्या कह रहे थे कि औरत भोगने के लिए होती है। वासना शान्त करने
का ख़ूबसूरत यंत्र होती है। और ये हज़रत – ज्ञानेश्वर द्विवेदी छात्रों को आदर्श का पाठ पढ़ाते हैं,
समाजशास्त्र पढ़ाकर समाज के मार्गदर्शक बनते हैं और ख़ुद ये क्या गुल खिला रहे हैं – इनका कहना है
कि स्त्रियाँ मर्दों को चूस डालती हैं। हर जवान और सुन्दर लड़की चाहती है कि उसे रेप किया जाए।“
संयोगिता ने ज्ञानेश्वर द्विवेदी को ताड़ना देते हुए कहा –
“तू नारी मुक्ति का पक्षधर बनता है और घोषणा करता है कि नारी की मुक्ति की यात्रा देह से शुरू
होती है। जब वह उन्मुक्त होकर अपनी देह का उपयोग करती है, बस तभी से उसकी मुक्ति यात्रा रफ़्तार
पकड़ लेती है। औऱ सम्मान राय, तूने उसके जननी रूप की खिल्ली उड़ाई –उसके उदात्त जननी रूप को
बाज़ारू बना दिया। उसे सामूहिक सम्भोग की वस्तु करार कर दिया तूने ? तू माँ के ममत्व, बहन के
स्नेह, बेटी की मासूमियत सबको घोल कर पी गया, नीच, पापी...। तुम दोनो ने मिलकर उस पे भोग
की चीज़ का ठप्पा लगा दिया। नाम “सम्मान राय” और काम स्त्री को हर तरह से हर रूप में
अपमानित करना.....! दिन के उजाले में जलसों, सामाजिक समारोहों में नारी उध्दार की, नारी मुक्ति की
बड़ी-बड़ी बातें बनाना और रात के अँधेरे में उसी नारी की इज़्ज़त से खेलना। “
सम्मान राय और ज्ञानेश्वर ऐसे हो रहे थे कि काटो तो खून नहीं। दोंनो कुन्द बुध्दि से आँखें नीची
किए जड़वत् खड़े थे। आज तक ऐसी मात उन्होंने कभी नहीं खाई थी। तभी भीड़ में से एक महिला
संस्थान की सदस्या तैश खाई आगे आकर उन दोनो पे चिल्लाई –
“तुम दोनो नारी मुक्ति के दिन रात डंके पीटते थे। इन प्रोफैसर जनाब ने नारी मुक्ति पे बड़े-बड़े लेख
और कहानियाँ लिख कर नाम भी कमाया, पर अब ये नारी शक्ति का भी जायज़ा ले लें। संयोगिता जी
आपने आज इन दो जानवरों के असली चेहरों से हमें वाकिफ़ कराके बहुत बड़ा धर्म का काम किया है।“
वह पुन: ज्ञानेश्वर द्विवेदी की तरफ़ पलटी और चीखती सी बोली –
“नीच, तेरी दृष्टि नारी की देह तक ही अटक के रह गई। तेरी कुत्सित सोच औरत को 24 घन्टे, 365
दिन मात्र कामांगना के रूप में ही देख पाई, इसके लिए वो दोषी नहीं बल्कि तेरा मैला मन ज़िम्मेदार
है। लम्पट,तू काम,वासना, नारी देह और भोग के अलावा कुछ और न सोच पाता है और न देख पाता
है। “ अब उसने सम्मान राय को घूरते हुए कहा –
“ और तुझे सीता, सावित्री, पार्वती, दुर्गा के रूप में नारी का सौम्य, कर्तव्यनिष्ठ, समर्पित, कलुषनाशक
खरा रूप कभी याद नहीं आया, बस ज़हन में उसका भोग्या रूप ही अठखेलियाँ करता रहा.....“
तभी संयोगिता गरजती बोली – “क्योंकि इन दोंनो का “मायोपिक विज़न” उसके आगे कुछ देख ही नहीं
पाता। ये उन शूकरों की भाँति हैं, जो पल छिन घूरे में घुसे रहते हैं। अबोध, कमज़ोर, विवश, कमउम्र
स्त्रियों को समाज के ऐसे ही ठेकेदार कॉलगर्ल, बारगर्ल, वेश्या, हर तरह के मार्ग का पाथेय बना कर
उनकी इज़्ज़त लूटा करते है, उनके जीवन के साथ खिलवाड़ करते हैं, और इतना ही नहीं, उनसे अपना
उल्लू सीधा करके, उन्हें तरह-तरह से बदनाम करने से भी बाज़ नहीं आते। कमज़ोर और परिस्थिति की
शिकार औरतें तुम जैसों का निवाला बन के रह जाती है - चाहते हुए भी न बदला ले पाती है, और न
किसी तरह का विद्रोह कर पाती हैं। उनकी उस विवश चुप्पी के पीछे तुम पापियों के लिए ऐसी बददुआएँ
सुलगती रहती हैं, जिनके कारण बदला लेने के लिए हम जैसी दबंग महिलाएँ तुम्हारे सामने आकर खड़ी
हो जाती हैं। ऐ फ़रेबी समाजवादी, जनवादी चिन्तक, विचारक, लेखक, समाजसुधारक, दलितों के मसीहा
आज तुम दोनो के कुकर्मों का पिटारा दुनिया के सामने खुलने जा रहा है। आज हम सब तुम्हें
अनावृत कर, तुम्हारे घृणित व कुत्सित अन्तरतम को चाक करके सबके सामने दिखाने जा रहे हैं
जिससे समाज तुम्हारी हीन हरकतों के लिए तुम दोंनो को कड़ी से कड़ी सज़ा दे और तुम्हारी जैसी
सोच वाले, नारी से जुड़े हर पवित्र रिश्ते की बलि चढ़ाकर, उसे निगलने की लालसा रखने वाले और लोग
भी तुम दोंनो का यह हश्र देख कर चेत जाए और पहले से ही तौबा कर लें।“
कवरेज करता एक टी.वी, रिपोर्टर कैमरा घुमाता व रिकार्डिंग करता बोला –
“एक बड़ी पुरानी, बार-बार दोहराई जाने वाली कहावत है कि ‘भगवान के घर में देर है, अँधेर नहीं’,
सो आज बहादुर और सजग संयोगिता जी ने एक बार फिर यह कहावत सही सिध्द कर दिखाई है। “
संयोगिता फिर भड़की – “अरे तुम्हारी नज़र सिर्फ कचरा खोजने में माहिर है, उसमे सिर्फ और सिर्फ
कचरा ही क्यों समाता है ? तुम्हारी आँखें अच्छाई देखने और सोचने की क्षमता से रहित क्यों है। क्या
अच्छाई की चौंध वे झेल नहीं पाती ? तुम दोंनो अपने मनोमस्तिष्क का इलाज करवाओ, तुम रुग्ण हो।
काले दिल, काली सोच, काले भाव, काले विचार, काली करतूतों वाले दरिन्दों अब ख़ामोश क्यों हो, आओ,
काली माँ के इस रूप को भी गले लगाओ,जब तुम्हें हर तरह की कलौंस से इतना प्यार है तो डर क्यों
रहे हो, क्यों इतने भयग्रस्त हो अब ? तुम दोनो के पसीने क्यों छूट रहे हैं। ये अबला नाम की ‘ बला ’
अब तुम दोंनो से झेली नही जा रही ? अब तक नारी को बहुत भोगा, अब तुम दोंनो दण्ड भोगो। तुम
जैसे विकट पापियों को तो नरक भी जगह देता घबराएगा। अच्छा हो कि तुम्हे किसी भी लोक में जगह
न मिले। तुम सदियों तक त्रिशंकु की तरह अधर में लटके रहो, अधर में भटकते इधर से उधऱ रेगते
रहो। ये सृष्टि, ये प्रकृति तुम जैसे लम्पटों को समय आने पर इसी तरह दण्डित करती है।”
उत्तेजित भीड़ ने, ख़ासतौर से शहर के सक्रिय महिला संगठनों की महिलाओं ने बदले की आग से
भभकते हुए सम्मान राय और ज्ञानेश्वर द्विवेदी को जूतों और चप्पलों से इस आक्रामक ढंग से पीटा
कि उनके सिर, चेहरे, पीठ, कमर, हाथ-पैर - यानी अंग-प्रत्यंग पे जमकर जूते चप्पल छापे। फिर उन्हें
पीटते-पीटते ड्रॉइंगरूम में खदेड़ दिया। हांलाकि उनमें से किसी के भी मन में उन दोंनो को शारीरिक
ताड़ना देने का कोई विचार नहीं था, लेकिन उनकी ताज़ी घिनौनी और लम्पट हरकत ने उस रात्रि
बेला में भीड़ के मन मे शनै:-शनै: स्थायी भाव “क्रोध” को जाग्रत करने के लिए “आलम्बन विभाव”
का कार्य किया तथा उनके गिड़गिड़ाने,हाथ जोड़-जोड़ कर माफ़ी माँगने, सबसे मुँह छुपाने जैसी हरकतों
ने तथा वहाँ के जोशीले वातावरण ने “उद्दीपन विभाव” का कार्य किया और इस तरह जब भीड़ के मन
में ख़ासतौर से महिलाओं के मन में जब “रौद्र रस” का उद्रेक हुआ तो फिर उस रस के तालमेल में
तरह-तरह के अंग संचालन (अपराधी को हाथो,पैरों से पीटना), जूता, चप्पल प्रहार, अपशब्दों की बौछार
– ये “अनुभाव” तो उछल कर बाहर आते ही। वे तो रौद्र रस के उद्रेक की अपरिहार्य प्रतिक्रिया थी।
कुछ क्षण पूर्व संयोगिता के साथ जो उन दोनो ने उसे अपनी हवस का शिकार बनाने के लिए छेड़खानी
की थी और जो “रसीले सम्वाद अपने मुखारविन्द से” बोले थे, जो संयोगिता ने प्रमाण स्वरूप सबको
मोबाइल का रिकॉर्डर ऑन करके सुना दिए थे – वे सब “संचारी भाव“ का काम कर रहे थे। उस ख़ूबसूरत
ड्रॉइंगरूम में “श्रृंगार के संयोग रस” के अधूरे उद्रेक को छिन्न-भिन्न करता जो एकाएक “रौद्र रस” का
विस्फोट हुआ था –उससे वह सजीला ड्रॉइंगरूम भयानक मैदाने जंग में बदल गया था। उस जंग में वीर
योध्दाओं का नेतृत्व कर रही थी “तेजस्वी वारांगनाएँ “ और सम्मान राय व ज्ञानेश्वर द्विवेदी बारम्बार
वीरगति को प्राप्त होने से बच-बच निकलते असहाय बालकों की भाँति अपना बचाव करने में लगे थे। ये
था ऐसे छद्मवेषी लम्पट दरिन्दों के साथ जनता का “जनवादी न्याय “ जिसे हमेशा रंगे हाथों पकड़े जाने
वाले गुनहगारों को मौके पे उपस्थित जनता स्वयं हाथों हाथ देती है और जो बहुत स्वभाविक भी है। ये
तो “एक्शन-रियेक्शन कैमिस्ट्री” होती है जो स्वत: घटती है और उद्रेक के उपरान्त शान्त हो जाती है।
जो न्याय स्वत: घटित होता है, वही सच्चा और खरा होता है तथा गुनहगारों को सबसे अधिक ग्लानि
से भरने वाला होता है। कुछ ऐसी ही ग्लानि से अभिभूत थे उस समय, उस रात के नायक - सम्मान
राय और ज्ञानेश्वर द्विवेदी। तभी संयोगिता ने कहीं से एक तौलिया और चादर खोजकर दोंनो को तन
ढकने का एक मौका दिया।
मीडिया फोटोग्राफ़र्स ने हर कोण से, उन दोंनो के हर हाव-भाव के भरपूर फोटो कैमरे में कैद किए।
पत्रकार, एन.जी.ओ कार्य कर्ताओ और टी.वी. रिपोर्टर्स सम्मान राय और ज्ञानेश्वर द्विवेदी की शान में
छंटे-छंटे कसीदे पढ़ रहे थे। उस आधी रात में उस शानदार बंगले में ज़लज़ला आया हुआ था।
सम्मान राय और ज्ञानेश्वर द्विवेदी जो अब तक कई बार संयोगिता व अन्य सब लोगों के सामने
हाथ जोड़-जोड़कर दया की भीख माँग चुके थे, अब जड़प्राय: से, सिर झुकाए दोंनो हाथों से माथा
पकड़े बैठे थे। लगता था नारी शक्ति के आगे वे दोंनो गूँगे हो गए थे, उनके सारे शब्द चुक गए थे।
अब तक भीड़ में से कुछ सचेत लोग पुलिस को भी फोन कर चुके थे। सो उस इलाके के थाना इंचार्ज
वहाँ पहुँच चुके थे। वे व्यंग्य और तिरस्कार से सम्मान राय और समाज में उतने ही इज़्ज़तदार,
बल्कि उनसे उधिक सुशिक्षित ज्ञानेश्वर द्विवेदी को देख रहे थे। उन्होंने अपना फ़र्ज़ निबाहते हुए, सबसे
पहले उन गुनहगारों को अपनी बाहरी नग्नता को ढकने के लिए कपड़े पहनने का आदेश दिया। फिर वह
वहाँ उपस्थित उत्तेजित भीड़ से बोले –
“देखिए आप लोगों ने अपना कर्त्तव्य निबाह लिया, अब मुझे अपनी कार्यवाही करने दीजिए और इसके
लिए उन मुझे मैडम के बयान दर्ज़ करने होगे, जो इनकी आज की एक-एक हरकत की चश्मदीद गवाह हैं।“
तभी संयोगिता आगे आकर बोली - “चश्मदीद गवाह तो हूँ ही, इन दोनो का एक-एक सम्वाद भी मेरे
इस मोबाइल मे कैद है, इंस्पैक्टर साहब। “
थाना इंचार्ज संयागिता को उसकी हिम्मत और समझदारी के कारण सराहना भरी नज़रों से देखता, बड़े
अदब से बोला –
“बहुत ख़ूब मैडम। आप निश्चिन्त रहें, इनको इनके किए की सज़ा ज़रूर मिलेगी। थोड़ी दिर के लिए
आपको भी थाने चलना होगा रिपोर्ट लिखाने के लिए। कानून की मदद करने वाले की हम बड़ी क़द्र करते
हैं।“ यह कह कर थाना इंचार्ज ने अपने कांन्स्टेबल को इशारा किया और उसने तुरंत सम्मान राय व
उनके परम् हितैषी मित्र ज्ञानेश्वर द्विवेदी के हाथों में हथकड़ी पहना दी। ये सब कार्यवाही होते-होते रात
का 1 बज गया था। ज्ञानेश्वर द्विवेदी और सम्मान राय अब सरकारी मेहमान बन गए थे। अगले दिन
सम्मान राय और ज्ञानेश्वर द्विवेदी अख़बार की सुर्ख़ियाँ बन चुके थे। सभी प्रमुख चैनलों पे कल रात उनके
बैडरूम और ड्रॉइंगरूम में उमड़े ज़लज़ले का कवरेज बार-बार ज़ोरदार कमेन्टरी के साथ दिखाया जा रहा
था। उनके सिर से पाँव तक के सारे हाव-भाव को कैमरा बारीकी से टीवी स्क्रीन पर तैराता था।हर घर में
उनकी काली करतूतो पे थू थू हो रही थी। उनके साथ-साथ हर कोई टी.वी. पर संयोगिता की झलक पाने
को उत्सुक था। संयोगिता रातों-रात सेलिब्रिटी सोशल एक्टिविस्ट बन गई थी। बहरहाल अगले दिन
इतवार होने के कारण उनकी ज़मानत भी सम्भव नहीं थी, इसलिए दोनों महाशयों को जेल में ही समय
काटना था। ज्ञानेश्वर द्विवेदी और सम्मान राय के परिचित उनकी ज़मानत न करवा पाने के कारण
बिलबिला रहे थे। वे ‘सम्माननीय’ गुनहगार शनीवार की रात से लेकर सोमवार की दोपहर तक सलाख़ों
के पीछे अपमान के बड़े-बड़े घूंट पीते रहे।
इसके बाद वकील, कानून, अदालत –जैसा कि सब जानते ही है, इनकी कार्यवाही, वकालत के स्याह को
सफ़ेद, सफ़ेद को स्याह करने के दाँव-पेंच, इन सबकी की एक लम्बी प्रक्रिया जन्म लेने वाली थी,लेकिन
उन शातिर लम्पटों के ख़िलाफ़ “जनवादी न्याय” तो हो ही गया था। अदालत का न्याय लम्बी चौड़ी
प्रक्रिया का मोहताज होता है, पर जनता का न्याय तमाम सत्यों को समेटे हुए - त्वरित और खरा
होता है।
आने वाले समय में एक नंबर के मक्कार, चालबाज़ ज्ञानेश्वर द्विवेदी और सम्मान राय अपने बचाव में
वकील के द्वारा कितनी भी दलीलें पेश करते रहे, अपने को बेगुनाह साबित करने की नाकामयाब कोशिश
करते रहे, फ़िलहाल उनका असली सच तो दुनिया के सामने उजागर हो ही गया था। कैमरे में कैद
उनके निर्वस्त्र शरीर, उनके रिकॉर्डेड सम्वाद, उनके खिसयाये चेहरे, संयोगिता से दया की भीख माँगते
उनके कांपते हाथ – किस-किस चीज़ की वे कानून के बल पर काट करेगे। इसके आगे अपने बचाव के
लिए कुछ भी करते रहे, उससे किसी को कुछ लेना देना न था। “जनवादी न्याय” उन दोंनो को गुनहगार
सिध्द कर चुका था। वे किसी को मुँह दिखाने लायक नहीं रहे थे। उनकी अन्तरात्मा अन्दर ही अन्दर
उन्हें धिक्कार रही थी।
X X X X X X X X X X X X X X X
विपक्ष के वकील ने सम्मान राय और ज्ञानेश्वर द्विवेदी के पिछले अनेक ‘’ रेप ‘’अपराधों का कच्चा चिठ्ठा
भी, संयोगिता के एवं महिला एन.जी.ओ और नेशनल वुमेन कमीशन के सहयोग से बीन-बीन कर
इकठ्ठा कर लिया था और सबूतों व गवाहों सहित उनका भी खुलासा अदालत में कर दिया गया था।
ज्ञानेश्वर द्विवेदी और सम्मान राय के ख़िलाफ़ सबूत इतने ठोस और इतने प्रत्यक्ष थे कि कानूनी कार्यवाही
के बाद कुछ माह उपरान्त, इंडियन पीनल कोड की धारा 6 Immoral Traffic (Prevention) Act, धारा 354
( Molestation) धारा 376 व 377 ( Rape) के तहत वे दोनों अदालत द्वारा अपराधी घोषित किए गए।
सम्मान राय का जनवादी, समाजवादी, क्रान्तिकारी कार्यकर्ता, स्थानीय तीन विद्यालयों के संस्थापक,
महिला एवं बालोध्दार गैरसरकारी संस्था के अध्यक्ष वाला बहुआयामी रूप हमेशा के लिए ढेर हो गया
था और उसके लिए, उसकी घटिया करतूतों के कारण आजीवन कारावास का सम्मान घोषित किया गया
था। ज्ञानेश्वर द्विवेदी को विश्वविद्यालयी आचार संहिता के आधार पर रेप जैसे अक्षम्य आरोप के
सिध्द हो जाने के कारण कॉलेज के गरिमामय पद से तो हाथ धोना ही पड़ा, साथ ही सम्मान राय के
साथ उसे भी आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई गई।
अदालत के इस न्याय ने भले ही देर से, पर उस दिन हादसे के तुरन्त बाद हुए “जनवादी न्याय” के
औचित्य पे पक्की मोहर लगा दी थी।
हैरान हूँ मैं
हैरान हूँ मैं,
रहगुज़र में ’रहनुमाओ’ को देखा है, भटकते हुए,
‘सधे क़दमों’ को देखा है, लड़खड़ाते हुए,
‘उसूलवालों’ को देखा है, गिरते हुए,
हैरान हूँ मैं,
फौलादी सीने वालों को देखा है, रोते हुए,
दोस्त को देखा है, बेगाना बनते हुए,
सँवरे जीवन को देखा है, बिखरते हुए
हैरान हूँ मैं,
ईमानदार को देखा है, बेईमानी से गले मिलते हुए,
उमड़ती नदी को देखा है, तिल - तिल सूखते हुए,
किलकते बचपन को देखा है, चुप- चुप सुबकते हुए,
हैरान हूँ मैं,
पत्थरों को देखा है, चटकते हुए,
नाज़ुक किरणों के परस से,बर्फ़ीले ‘जड पर्वत’ को देखा है पिघलते हुए,
कोसो दूर चाँद को देखने भर से, शांत समन्दर देखा है उमडते हुए,
हैरान हूँ मैं,
कोमलता को देखा है, चट्टान बनते हुए,
कटुता को देखा है, मीठी वाणी में घुलते हुए,
अपनों को देखा है, घाव देते हुए !
मुक्तक
१) ख़ुशी ज़रूरी है जीने के लिए
ग़म भी ज़रूरी है ज़िन्दगी के लिए
2) हर बात यहाँ दर्दनाक़ है
दिल को बचा के रखो
ज़माने की हवा ख़तरनाक़ है
3) तूफ़ां के सामने दीपक को रखने की आदत पुरानी है
तासीरे दुआ से तूफ़ां को मोड़ देना फ़ितरत हमारी है
4) आज भी तहज़ीब आपके अख़लाख़ से झलकती है
नरमदिली अभी खोई नहीं, रह - रह के उभरती है
किसी की देख के तक़लीफ़, तभी आपकी आँख बरसती है
5) कितना आसान है, दिल को तोड़ देना
कितना दुश्वार है,उसे फिर से जोड़ देना
6) दिल में उबाल, आँखों में सवाल लिए, जब मन्दिर मैं जाती हूँ
सीढियों के परस से ही , कुछ सम्भल मैं जाती हूँ
तेरे चरणों में झुक के फिर, ख़ुशी से भर मैं जाती हूँ
अगर की खुशबू सांसों में, दिए की लौ को आँखों में लिए
जब घर मैं आती हूँ तेरे प्रति विश्वास को और गहरा मैं पाती हूँ
7) बुरा क्या है अग़र हम अक्ल से काम लेते हैं
आप भी तो बेअक्ली के पैग़ाम भेजते हैं
8) राम रहीम, नबीए-क़रीम कोई तो पन्हा दे मुझको
ज़िन्दग़ी तंग करती है दिन रात बेइन्तहा मुझको
9) पतझड़ झेला है इस आस में
होगा बसन्त कभी तो पास में
परवरदिग़ार
कहते तो हैं कि एक ही परवरदिग़ार है
हर सूं, कारसाज़ी, उसकी बेशुमार है
दुखों की धूप में, शीतल सी छाँव वो
तूफ़ाने ग़म में वो, दिले बेक़रार है
शीरी का फ़रहाद, राधा का किशना वो,
दिल की लगी में वो, दिल का क़रार है
गुलाब की महक, चम्पा की ख़ुशबू वो
पतझड़ में ख़ार वो, बसन्त में बहार है
अनाथ से जीवन में, ममता का साया वो
रक़ीबों में ख़्वार वो, अपनों में प्यार है
दोहों में कबीर के, अल्लाह नेक वोह,
ख़य्याम की रुबाई में, इश्क औ ख़ुमार है
वेदों में ज्ञान वो, आयत की शान वो,
दिल की तपिश में वो ही, शीतल फुहार है
बनवास राम का, दशरथ का त्याग वो
काँटों की रहगुज़र में, सुकूँ की बयार है
बरसात
जब भी आती है बरसात, बीती यादें लाती साथ,
बचपन में देखी थी मैंने, पानी की झम - झम बरसात,
काग़ज़ की कश्ती तैराकर, खिल खिल खिल खिल हँसती थी
दौड़ - दौड़ कर आँगन में, खुश होकर भीगा करती थी,
अँजुरी में नन्हे हाथों की, टप - टप बूँदें भरती थी,
तरुणाई ने दस्तक दी, देखा बदल गई बरसात !
जब भी आती है.........................................
कोमल भावों की बरसात, सुन्दर ख्वाबों की सौगात,
मख़मल से नाज़ुक ख्यालों की,झड़ी लगी थी दिन और रात
यह बरसात अनोखी थी, हर पल दिल भिगोती थी,
हरदम भीगे रहना उसमें, ज़रा नहीं अखरता था,
उस बरसात में डूबे- डूबे, पलक झपकते बीता यौवन,
‘सोच-समझ’ ने दस्तक दी, देखा बदल गई बरसात !
जब भी आती है.........................................
चिन्ताएँ और उलझा जीवन, सपने टूटे, टूटा था मन,
आहत थे आदर्श बेचारे, चिटका था मूल्यों का यौवन,
सुकुमार भाव थे डरे - डरे, तार - तार, झिर्रे - झिर्रे
पीड़ा मन में थी सिसक रही, खामोशी से लब सिले-सिले,
पीड़ा को यूँ सहते - सहते, पलक झपकते बीता जीवन,
जीवन - संध्या ने दस्तक दी, देखा बदल गई बरसात !
जब भी आती है.........................................
जीवन
उमड़-उमड़ कर बहता जीवन एकाएक रुक जाता कैसे समझ नहीं आता है मुझको कोई बदल जाता है कैसे छाँव धूप बन जाती कैसे प्यार मर जाता है कैसे
उमड़-उमड़ कर बहता जीवन...... निकट बहुत जो होते हैं दिल की धड़कन जो होते हैं अन्जाने हो जाते कैसे दूर चले जाते हैं कैसे
उमड़-उमड़ कर बहता जीवन..... पल-पल छिन-छिन जिनको चाहा मधुमास है साथ बिताया वे पतझड़ बन जाते कैसे शुष्क भाव हो जाते कैसे
उमड़-उमड़ कर बहता जीवन..... जीवन की राहों पे संग भरे थे हमने सुन्दर रंग रंग फीके पड़ जाते कैसे जीवन बदरंग होता कैसे
उमड़-उमड़ कर बहता जीवन.....
अकेले – अकेले
ख़रामा – ख़रामा अकेले – अकेले
घूम आए हम ख़ारों के मेले
कहा था उन्होने न जाना अकेले
लिपट जायेगें ख़ार दामन से मेरे
मुस्कुराए थे हम मन में बड़े ही
उन्हें क्या पता हम हैं ख़ारों के जैसे
आयेगें ग़र वे नज़दीक हमारे
जायेगें लौट, वे आए थे जैसे
ख़रामा – ख़रामा...........
नहीं जानते वे, आँधियों से झगड़ते
बेरहम ख़ौफ़नाक तूफ़ां से लड़ते
मौजे तलातुम ख़ुद बन गई हूँ
मैं एक ख़ार बन के रह गई हूँ
नहीं लगता डर अब ख़ारों से,तूफ़ा से
दफ़न कर चुकी ऐसे कितने झमेले
ख़रामा – ख़रामा.....................
पहुँचे वहाँ तो पाया कि गुल भी
ख़ारों के मेले में आए हुए थे
खड़ी थी तहज़ीब दूरी पे उनसे
सलीके से बेख़ुद, वे अकड़े हुए थे
सरापा सियासत में डूबे हुए थे
हँसे थे तब हम उन पे हौले-हौले
ख़रामा – ख़रामा........................
हमें गुल से बेहतर, तहज़ीब से तर
दुनियां में बदनाम काँटें लगे तब
गुलोशाख़ की दिलसे करते हिफ़ाजत
उनसे कभी न होते जुदा हैं
रस्मे मुहब्बत वफ़ा से निबाहते
मुहब्बत के मारे ये कितने निराले
ख़रामा – ख़रामा.......................
हैरान हूँ मैं,
रहगुज़र में ’रहनुमाओ’ को देखा है, भटकते हुए,
‘सधे क़दमों’ को देखा है, लड़खड़ाते हुए,
‘उसूलवालों’ को देखा है, गिरते हुए,
हैरान हूँ मैं,
फौलादी सीने वालों को देखा है, रोते हुए,
दोस्त को देखा है, बेगाना बनते हुए,
सँवरे जीवन को देखा है, बिखरते हुए
हैरान हूँ मैं,
ईमानदार को देखा है, बेईमानी से गले मिलते हुए,
उमड़ती नदी को देखा है, तिल - तिल सूखते हुए,
किलकते बचपन को देखा है, चुप- चुप सुबकते हुए,
हैरान हूँ मैं,
पत्थरों को देखा है, चटकते हुए,
नाज़ुक किरणों के परस से,बर्फ़ीले ‘जड पर्वत’ को देखा है पिघलते हुए,
कोसो दूर चाँद को देखने भर से, शांत समन्दर देखा है उमडते हुए,
हैरान हूँ मैं,
कोमलता को देखा है, चट्टान बनते हुए,
कटुता को देखा है, मीठी वाणी में घुलते हुए,
अपनों को देखा है, घाव देते हुए !
मुक्तक
१) ख़ुशी ज़रूरी है जीने के लिए
ग़म भी ज़रूरी है ज़िन्दगी के लिए
2) हर बात यहाँ दर्दनाक़ है
दिल को बचा के रखो
ज़माने की हवा ख़तरनाक़ है
3) तूफ़ां के सामने दीपक को रखने की आदत पुरानी है
तासीरे दुआ से तूफ़ां को मोड़ देना फ़ितरत हमारी है
4) आज भी तहज़ीब आपके अख़लाख़ से झलकती है
नरमदिली अभी खोई नहीं, रह - रह के उभरती है
किसी की देख के तक़लीफ़, तभी आपकी आँख बरसती है
5) कितना आसान है, दिल को तोड़ देना
कितना दुश्वार है,उसे फिर से जोड़ देना
6) दिल में उबाल, आँखों में सवाल लिए, जब मन्दिर मैं जाती हूँ
सीढियों के परस से ही , कुछ सम्भल मैं जाती हूँ
तेरे चरणों में झुक के फिर, ख़ुशी से भर मैं जाती हूँ
अगर की खुशबू सांसों में, दिए की लौ को आँखों में लिए
जब घर मैं आती हूँ तेरे प्रति विश्वास को और गहरा मैं पाती हूँ
7) बुरा क्या है अग़र हम अक्ल से काम लेते हैं
आप भी तो बेअक्ली के पैग़ाम भेजते हैं
8) राम रहीम, नबीए-क़रीम कोई तो पन्हा दे मुझको
ज़िन्दग़ी तंग करती है दिन रात बेइन्तहा मुझको
9) पतझड़ झेला है इस आस में
होगा बसन्त कभी तो पास में
परवरदिग़ार
कहते तो हैं कि एक ही परवरदिग़ार है
हर सूं, कारसाज़ी, उसकी बेशुमार है
दुखों की धूप में, शीतल सी छाँव वो
तूफ़ाने ग़म में वो, दिले बेक़रार है
शीरी का फ़रहाद, राधा का किशना वो,
दिल की लगी में वो, दिल का क़रार है
गुलाब की महक, चम्पा की ख़ुशबू वो
पतझड़ में ख़ार वो, बसन्त में बहार है
अनाथ से जीवन में, ममता का साया वो
रक़ीबों में ख़्वार वो, अपनों में प्यार है
दोहों में कबीर के, अल्लाह नेक वोह,
ख़य्याम की रुबाई में, इश्क औ ख़ुमार है
वेदों में ज्ञान वो, आयत की शान वो,
दिल की तपिश में वो ही, शीतल फुहार है
बनवास राम का, दशरथ का त्याग वो
काँटों की रहगुज़र में, सुकूँ की बयार है
बरसात
जब भी आती है बरसात, बीती यादें लाती साथ,
बचपन में देखी थी मैंने, पानी की झम - झम बरसात,
काग़ज़ की कश्ती तैराकर, खिल खिल खिल खिल हँसती थी
दौड़ - दौड़ कर आँगन में, खुश होकर भीगा करती थी,
अँजुरी में नन्हे हाथों की, टप - टप बूँदें भरती थी,
तरुणाई ने दस्तक दी, देखा बदल गई बरसात !
जब भी आती है.........................................
कोमल भावों की बरसात, सुन्दर ख्वाबों की सौगात,
मख़मल से नाज़ुक ख्यालों की,झड़ी लगी थी दिन और रात
यह बरसात अनोखी थी, हर पल दिल भिगोती थी,
हरदम भीगे रहना उसमें, ज़रा नहीं अखरता था,
उस बरसात में डूबे- डूबे, पलक झपकते बीता यौवन,
‘सोच-समझ’ ने दस्तक दी, देखा बदल गई बरसात !
जब भी आती है.........................................
चिन्ताएँ और उलझा जीवन, सपने टूटे, टूटा था मन,
आहत थे आदर्श बेचारे, चिटका था मूल्यों का यौवन,
सुकुमार भाव थे डरे - डरे, तार - तार, झिर्रे - झिर्रे
पीड़ा मन में थी सिसक रही, खामोशी से लब सिले-सिले,
पीड़ा को यूँ सहते - सहते, पलक झपकते बीता जीवन,
जीवन - संध्या ने दस्तक दी, देखा बदल गई बरसात !
जब भी आती है.........................................
जीवन
उमड़-उमड़ कर बहता जीवन एकाएक रुक जाता कैसे समझ नहीं आता है मुझको कोई बदल जाता है कैसे छाँव धूप बन जाती कैसे प्यार मर जाता है कैसे
उमड़-उमड़ कर बहता जीवन...... निकट बहुत जो होते हैं दिल की धड़कन जो होते हैं अन्जाने हो जाते कैसे दूर चले जाते हैं कैसे
उमड़-उमड़ कर बहता जीवन..... पल-पल छिन-छिन जिनको चाहा मधुमास है साथ बिताया वे पतझड़ बन जाते कैसे शुष्क भाव हो जाते कैसे
उमड़-उमड़ कर बहता जीवन..... जीवन की राहों पे संग भरे थे हमने सुन्दर रंग रंग फीके पड़ जाते कैसे जीवन बदरंग होता कैसे
उमड़-उमड़ कर बहता जीवन.....
अकेले – अकेले
ख़रामा – ख़रामा अकेले – अकेले
घूम आए हम ख़ारों के मेले
कहा था उन्होने न जाना अकेले
लिपट जायेगें ख़ार दामन से मेरे
मुस्कुराए थे हम मन में बड़े ही
उन्हें क्या पता हम हैं ख़ारों के जैसे
आयेगें ग़र वे नज़दीक हमारे
जायेगें लौट, वे आए थे जैसे
ख़रामा – ख़रामा...........
नहीं जानते वे, आँधियों से झगड़ते
बेरहम ख़ौफ़नाक तूफ़ां से लड़ते
मौजे तलातुम ख़ुद बन गई हूँ
मैं एक ख़ार बन के रह गई हूँ
नहीं लगता डर अब ख़ारों से,तूफ़ा से
दफ़न कर चुकी ऐसे कितने झमेले
ख़रामा – ख़रामा.....................
पहुँचे वहाँ तो पाया कि गुल भी
ख़ारों के मेले में आए हुए थे
खड़ी थी तहज़ीब दूरी पे उनसे
सलीके से बेख़ुद, वे अकड़े हुए थे
सरापा सियासत में डूबे हुए थे
हँसे थे तब हम उन पे हौले-हौले
ख़रामा – ख़रामा........................
हमें गुल से बेहतर, तहज़ीब से तर
दुनियां में बदनाम काँटें लगे तब
गुलोशाख़ की दिलसे करते हिफ़ाजत
उनसे कभी न होते जुदा हैं
रस्मे मुहब्बत वफ़ा से निबाहते
मुहब्बत के मारे ये कितने निराले
ख़रामा – ख़रामा.......................
1) वरदान
ईश्वर के दरबार में एक बार धरती से लाए गए व्यक्ति से जब जवाब तलब किया गया तो, उसके उत्तर सुनकर ईश्वर स्वयं वरदान बनकर उस पर न्यौछावर होने को कुछ इस तरह तैयार हो गया -
ईश्वर ने पूछा - धरती पर तुमने क्या किया
इंसान - कर्म
ईश्वर - क्या सिखाया
इंसान - धर्म
ईश्वर - क्या मिटाया
इंसान - जुर्म
ईश्वर - क्या बटोरा
इंसान - नेकी
ईश्वर - क्या बाँटा
इंसान - दूसरों का दुख
ईश्वर - क्या तोड़ा
इंसान - गुरूर
ईश्वर - क्या जोड़ा
इंसान - दिल
ईश्वर - क्या कायम किया
इंसान - सद्भाव
ईश्वर - क्या खोया
इंसान - दुर्भाव
ईश्वर - क्या पाया
इंसान - सुकून
ईश्वर - तुम्हारी जमा पूँजी
इंसान - इंसानियत
(ईश्वर को लगा यह ज़रूर कोई संत या फक्क़ड साधु होगा, लोगों को प्रवचन देता होगा)
ईश्वर - जानते हो ऐसे भारी - भारी काम कितने कठिन है ?
इंसान - जी आसान है !
ईश्वर - ऐसी कौन सी जादू की छड़ी रखते हो तुम ?
इंसान - जी छोटी सी कलम !
ईश्वर - छोटी सी कलम .....?
ईश्वर - तुम हो कौन...... ?
इंसान - लेखक !
ईश्वर - लेखक ?
इंसान - जी
ईश्वर - लेखक , छोटी सी कलम .....?
इंसान - जी, सच ! जी, उसी में है इतना दम !
ईश्वर - उसे कैसे चलाते हो
इंसान - स्याही में डुबोकर काग़ज़ पर चलाता हूँ ।
ईश्वर - फिर उससे क्या होता है ?
इंसान - बड़े- बड़े ह्रदय परिवर्तन, जीवन परिवर्तन, दिशा परिवर्तन यानी ‘क्रान्ति’
ईश्वर - क्या कहते हो, क्रान्ति तो तलवार और कटार की धार पर होती हैं,
इंसान - जी, पर क़लम इन सब से पैनी होती है।
सोए को जगाती है, निराश को उठाती है,
उदास को हँसाती है, दमित को दम देती है
नासमझ को समझाती है, क्रूर को कोमल बना
प्यार का पाठ पढ़ाती है, जीवन की परतें खोल
गहरे अर्थों का परिचय कराती है,
क्या कहूँ, क्या - क्या न कहूँ
यह अनोखी सबसे है.....................!
वेद, क़ुरान, बाइबिल, सब इसी के दम से है !
सच कहता हूँ मेरे भगवन, मेरा लेखन भी इसी के बल पे है
इसी से क, ख, ग ध्वनियों को, शब्दों में ढालता हूँ
अर्थों से भरता हूँ और वे ज़रूरी काम करके
समाज और जीवन के प्रति, अपना दायित्व निबाहता हूँ
जिन्हें सुनकर आप हैरान हैं !!
‘सृष्टा’ ने ऐसे 'दृष्टा' को वरदान देते हुए कहा
ठीक है आज के बाद, जब भी मुझे धरती पर
कुछ परिवर्तन लाना होगा, तो मैं तुम्हारी क़लम में उतर आऊँगा,
तुम्हारी क़लम को दिव्य और धरती को स्वर्ग बनाऊँगा !
इंसान बोला - “और मैं धन्य हो जाऊँगा” !!
2) कश्मकश
खिंच गई चेहरे पे लकीरें आके टूटे दिल से
छुपा रखा था जो दर्द परतों में
रह - रह के लगा रिसने फिर से !
चाहा था जितना दूर रहना
जुड़ती गई उतना ही गहरे उन से
उनकी ओर दौड़ता रहा मन
जाती जितना, पीछे मैं तेज़ी से !
खिंच गई चेहरे पे लकीरें आके टूटे दिल से
छुपा रखा था जो दर्द परतों में
रह - रह के लगा रिसने फिर से !
बीते समय की दीवारों में कैद
रिश्ते मुस्कुराते हैं - हौले से
आलों, झरोखों में बसी यादें,
उदासी में खिलखिलाती हैं - शोखी से !
खिंच गई चेहरे पे लकीरें आके टूटे दिल से
छुपा रखा था जो दर्द परतों में
रह - रह के लगा रिसने फिर से !
समय के साथ कदम से कदम मिला के
चलती रही यूँ तो हिम्मत से
पर, बीतते समय के साथ
अब थके पाँव देखते हैं मुझे हैरत से !
खिंच गई चेहरे पे लकीरें आके टूटे दिल से
छुपा रखा था जो दर्द परतों में
रह - रह के लगा रिसने फिर से !
न पीछे लौटना मुमकिन
न आगे बढ़ना आसान
एक ठहराव पे ठिठक गई है
ज़िन्दगी जैसे एक मुद्दत से !
खिंच गई चेहरे पे लकीरें आके टूटे दिल से
छुपा रखा था जो दर्द परतों में
रह - रह के लगा रिसने फिर से !
3) ऐसा होता है अक्सर !
एक दिन समाज के दर्शन करने घर से निकली
तो देखा समाज दौड़ रहा था........
धुएँ का ग़ुबार था, शोर का उबाल था,
मैंने पूछा - क्या पाने के लिए दौड़ रहे हो ?
लक्ष्यविहीन समाज का जवाब क्या होता !
बोला - पता नहीं !
पता नहीं तो ये दौड़ क्यों, आपाधापी क्यों ?
सबको दौड़ते देख, मैं भी दौड़ में शामिल हो गया,
यह कहते-कहते, जैसे वह एकाएक दौड़ के जुनून से बाहर आया,
बोला - पर मैं क्यों रहा हूँ दौड़, पैर सिर पे रख कर ?
मैंने कभी सोचा क्यों नहीं इस पर !
मैंने कहा - आज के ज़माने में ऐसा होता है अक्सर !
आगे बढ़ी तो चीख पुकार का ज़ोर था,
समाज हिंसा से सराबोर था,
कुछ लोग हिंसा के चक्रव्यूह में हो रहे थे ढेर,
वार कर रहे थे लोग, उन्हें चारों ओर से घेर,
मैंने पूछा - ये मार पीट क्यों ?
उद्देश्यविहीन समाज का जवाब क्या होता !
बोला - पता नहीं !
पता नहीं तो ये हिंसा क्यों ?
सबको वार करते देख, मैं भी हिंसा में शामिल हो गया,
यह कहते-कहते जैसे वह एकाएक हिंसा के जुनून से बाहर आया
बोला - पर मैं क्यों कर रहा हूँ वार उस पर ?
मैंने कभी सोचा क्यों नहीं इस पर !
मैंने कहा - आज के ज़माने में ऐसा होता है अक्सर !
आगे बढ़ी तो देखा समाज हँसते-हँसते लोट पोट था,
कोई मुँह दबाकर, तो कोई मुँह फाड़कर,
एक निरीह पागल की हरकतों को देखकर
पेट पकड़ के हँसने को जैसे मजबूर था,
हँसी के चक्रवात में चक्रम में बने समाज से,
मैंने पूछा – किस पर हँस रहे हो और क्यों ?
बुध्दिविहीन समाज का क्या जवाब होता !
बोला - पता नहीं !
सबको हँसते देख मैं भी हँसी में शामिल हो गया,
यह कहते-कहते जैसे एकाएक वह हँसी के जुनून से बाहर आया,
बोला - पर मैं क्यों हँस रहा हूँ उस पर ?
मैंने कभी सोचा क्यों नहीं इस पर !
मैंने कहा - आज के ज़माने में ऐसा होता है अक्सर !
आगे बढ़ी तो देखा गली के नुक्क्ड़ पर,
फटेहाल घर के नीचे खड़ा समाज,
एक दीन हीन औरत को लांछित कर रहा था,
पुण्यात्मा समाज से मैंने पूछा - उसे क्यों धिक्कार रहे हो ?
विचारहीन समाज का क्या जवाब होता,
बोला - पता नहीं !
पता नहीं तो तुम्हें उसे धिक्कारने का कोई अधिकार नहीं,
सबको धिक्कारते देख, मैं भी ‘धिक्कार’ में शामिल हो गया,
यह कहते-कहते जैसे एकाएक वह धिक्कारने के जुनून से बाहर आया,
बोला - पर मैं क्यों कर रहा हूँ शब्दों के वार उस पर ?
मैंने कभी सोचा क्यों नहीं इस पर !
मैंने कहा - आज के ज़माने में ऐसा होता है अक्सर !
ईश्वर के दरबार में एक बार धरती से लाए गए व्यक्ति से जब जवाब तलब किया गया तो, उसके उत्तर सुनकर ईश्वर स्वयं वरदान बनकर उस पर न्यौछावर होने को कुछ इस तरह तैयार हो गया -
ईश्वर ने पूछा - धरती पर तुमने क्या किया
इंसान - कर्म
ईश्वर - क्या सिखाया
इंसान - धर्म
ईश्वर - क्या मिटाया
इंसान - जुर्म
ईश्वर - क्या बटोरा
इंसान - नेकी
ईश्वर - क्या बाँटा
इंसान - दूसरों का दुख
ईश्वर - क्या तोड़ा
इंसान - गुरूर
ईश्वर - क्या जोड़ा
इंसान - दिल
ईश्वर - क्या कायम किया
इंसान - सद्भाव
ईश्वर - क्या खोया
इंसान - दुर्भाव
ईश्वर - क्या पाया
इंसान - सुकून
ईश्वर - तुम्हारी जमा पूँजी
इंसान - इंसानियत
(ईश्वर को लगा यह ज़रूर कोई संत या फक्क़ड साधु होगा, लोगों को प्रवचन देता होगा)
ईश्वर - जानते हो ऐसे भारी - भारी काम कितने कठिन है ?
इंसान - जी आसान है !
ईश्वर - ऐसी कौन सी जादू की छड़ी रखते हो तुम ?
इंसान - जी छोटी सी कलम !
ईश्वर - छोटी सी कलम .....?
ईश्वर - तुम हो कौन...... ?
इंसान - लेखक !
ईश्वर - लेखक ?
इंसान - जी
ईश्वर - लेखक , छोटी सी कलम .....?
इंसान - जी, सच ! जी, उसी में है इतना दम !
ईश्वर - उसे कैसे चलाते हो
इंसान - स्याही में डुबोकर काग़ज़ पर चलाता हूँ ।
ईश्वर - फिर उससे क्या होता है ?
इंसान - बड़े- बड़े ह्रदय परिवर्तन, जीवन परिवर्तन, दिशा परिवर्तन यानी ‘क्रान्ति’
ईश्वर - क्या कहते हो, क्रान्ति तो तलवार और कटार की धार पर होती हैं,
इंसान - जी, पर क़लम इन सब से पैनी होती है।
सोए को जगाती है, निराश को उठाती है,
उदास को हँसाती है, दमित को दम देती है
नासमझ को समझाती है, क्रूर को कोमल बना
प्यार का पाठ पढ़ाती है, जीवन की परतें खोल
गहरे अर्थों का परिचय कराती है,
क्या कहूँ, क्या - क्या न कहूँ
यह अनोखी सबसे है.....................!
वेद, क़ुरान, बाइबिल, सब इसी के दम से है !
सच कहता हूँ मेरे भगवन, मेरा लेखन भी इसी के बल पे है
इसी से क, ख, ग ध्वनियों को, शब्दों में ढालता हूँ
अर्थों से भरता हूँ और वे ज़रूरी काम करके
समाज और जीवन के प्रति, अपना दायित्व निबाहता हूँ
जिन्हें सुनकर आप हैरान हैं !!
‘सृष्टा’ ने ऐसे 'दृष्टा' को वरदान देते हुए कहा
ठीक है आज के बाद, जब भी मुझे धरती पर
कुछ परिवर्तन लाना होगा, तो मैं तुम्हारी क़लम में उतर आऊँगा,
तुम्हारी क़लम को दिव्य और धरती को स्वर्ग बनाऊँगा !
इंसान बोला - “और मैं धन्य हो जाऊँगा” !!
2) कश्मकश
खिंच गई चेहरे पे लकीरें आके टूटे दिल से
छुपा रखा था जो दर्द परतों में
रह - रह के लगा रिसने फिर से !
चाहा था जितना दूर रहना
जुड़ती गई उतना ही गहरे उन से
उनकी ओर दौड़ता रहा मन
जाती जितना, पीछे मैं तेज़ी से !
खिंच गई चेहरे पे लकीरें आके टूटे दिल से
छुपा रखा था जो दर्द परतों में
रह - रह के लगा रिसने फिर से !
बीते समय की दीवारों में कैद
रिश्ते मुस्कुराते हैं - हौले से
आलों, झरोखों में बसी यादें,
उदासी में खिलखिलाती हैं - शोखी से !
खिंच गई चेहरे पे लकीरें आके टूटे दिल से
छुपा रखा था जो दर्द परतों में
रह - रह के लगा रिसने फिर से !
समय के साथ कदम से कदम मिला के
चलती रही यूँ तो हिम्मत से
पर, बीतते समय के साथ
अब थके पाँव देखते हैं मुझे हैरत से !
खिंच गई चेहरे पे लकीरें आके टूटे दिल से
छुपा रखा था जो दर्द परतों में
रह - रह के लगा रिसने फिर से !
न पीछे लौटना मुमकिन
न आगे बढ़ना आसान
एक ठहराव पे ठिठक गई है
ज़िन्दगी जैसे एक मुद्दत से !
खिंच गई चेहरे पे लकीरें आके टूटे दिल से
छुपा रखा था जो दर्द परतों में
रह - रह के लगा रिसने फिर से !
3) ऐसा होता है अक्सर !
एक दिन समाज के दर्शन करने घर से निकली
तो देखा समाज दौड़ रहा था........
धुएँ का ग़ुबार था, शोर का उबाल था,
मैंने पूछा - क्या पाने के लिए दौड़ रहे हो ?
लक्ष्यविहीन समाज का जवाब क्या होता !
बोला - पता नहीं !
पता नहीं तो ये दौड़ क्यों, आपाधापी क्यों ?
सबको दौड़ते देख, मैं भी दौड़ में शामिल हो गया,
यह कहते-कहते, जैसे वह एकाएक दौड़ के जुनून से बाहर आया,
बोला - पर मैं क्यों रहा हूँ दौड़, पैर सिर पे रख कर ?
मैंने कभी सोचा क्यों नहीं इस पर !
मैंने कहा - आज के ज़माने में ऐसा होता है अक्सर !
आगे बढ़ी तो चीख पुकार का ज़ोर था,
समाज हिंसा से सराबोर था,
कुछ लोग हिंसा के चक्रव्यूह में हो रहे थे ढेर,
वार कर रहे थे लोग, उन्हें चारों ओर से घेर,
मैंने पूछा - ये मार पीट क्यों ?
उद्देश्यविहीन समाज का जवाब क्या होता !
बोला - पता नहीं !
पता नहीं तो ये हिंसा क्यों ?
सबको वार करते देख, मैं भी हिंसा में शामिल हो गया,
यह कहते-कहते जैसे वह एकाएक हिंसा के जुनून से बाहर आया
बोला - पर मैं क्यों कर रहा हूँ वार उस पर ?
मैंने कभी सोचा क्यों नहीं इस पर !
मैंने कहा - आज के ज़माने में ऐसा होता है अक्सर !
आगे बढ़ी तो देखा समाज हँसते-हँसते लोट पोट था,
कोई मुँह दबाकर, तो कोई मुँह फाड़कर,
एक निरीह पागल की हरकतों को देखकर
पेट पकड़ के हँसने को जैसे मजबूर था,
हँसी के चक्रवात में चक्रम में बने समाज से,
मैंने पूछा – किस पर हँस रहे हो और क्यों ?
बुध्दिविहीन समाज का क्या जवाब होता !
बोला - पता नहीं !
सबको हँसते देख मैं भी हँसी में शामिल हो गया,
यह कहते-कहते जैसे एकाएक वह हँसी के जुनून से बाहर आया,
बोला - पर मैं क्यों हँस रहा हूँ उस पर ?
मैंने कभी सोचा क्यों नहीं इस पर !
मैंने कहा - आज के ज़माने में ऐसा होता है अक्सर !
आगे बढ़ी तो देखा गली के नुक्क्ड़ पर,
फटेहाल घर के नीचे खड़ा समाज,
एक दीन हीन औरत को लांछित कर रहा था,
पुण्यात्मा समाज से मैंने पूछा - उसे क्यों धिक्कार रहे हो ?
विचारहीन समाज का क्या जवाब होता,
बोला - पता नहीं !
पता नहीं तो तुम्हें उसे धिक्कारने का कोई अधिकार नहीं,
सबको धिक्कारते देख, मैं भी ‘धिक्कार’ में शामिल हो गया,
यह कहते-कहते जैसे एकाएक वह धिक्कारने के जुनून से बाहर आया,
बोला - पर मैं क्यों कर रहा हूँ शब्दों के वार उस पर ?
मैंने कभी सोचा क्यों नहीं इस पर !
मैंने कहा - आज के ज़माने में ऐसा होता है अक्सर !
1) ‘मृत्यु से पहला परिचय’
पहला परिचय तुमसे, बचपन में हुआ था तब
मैं थी अबोध - अन्जान, बेबस भोली सी जब
पार्थिव शरीर में दादी के
तुम उतरी 'भगवान' बन के
निश्चेष्ट दादी को पड़ा देख
पूछा मैंने रोक संवेग -
'दादी बोलती क्यों नहीं ?
आँख खोलती क्यों नहीं ? '
माँ बोली - आँचल में मुँह कर
ले गए 'भगवान' दादी को अब घर,
वहीं रहेगी दादी हर पल !
मैं उदास, खामोश, लगी रोने फिर झर-झर,
रोते - रोते लुढ़क गयी दादी पर
सुबक - सुबक कर कहती थी डर कर
'दादी, कहना मानूँगी
मिट्टी में नहीं खेलूँगी
टॉफी तुमको दे दूँगी..'
तभी उठाया मुझे किसी ने
तुरत लगाया गले किसी ने
कहा प्यार से थपक - थपक
वहीं रहेगी दादी अब बस
विदा करेगें हम तुम मिल सब
‘भगवान’
इस नाम से ‘तुमको’ जाना था तब !
2) 'मृत्यु से मेरा दूसरा परिचय'
मेरे आँगन में चिड़िया का बच्चा निष्प्राण पड़ा था,
और मेरा चुनमुन नन्हा मन खेल में पड़ा था,
आँगन में उछलती कूदती,
मैं एकाएक गम्भीर हो गयी,
'दादी' मुझको याद आ गयी,
जोर से चीखी,और बौंरा गयी,
माँ और नानी दौड़ के आयीं
पूछा - क्यों चीखी चिल्लायी ?
नन्ही अँगुली उठी उधर
पड़ा था 'वो' निश्चेष्ट जिधर
काँपे था तन मेरा थर-थर
हौले से मैं बोली,
यह बोलता नहीं....
आँख खोलता नहीं.....
इसे भी भगवान जी... कहते-कहते
माँ से लिपट गई मैं कस कर,
उस नन्हे बच्चे को,
निर्ममता से तुम ग्रस कर
मुझे बना गई थी पत्थर !
3)'मृत्यु से मेरा तीसरा परिचय'
पहाड़ी लड़कियों की टोली
जिसमें थी मेरी, एक हमजोली
नाम था - उसका ‘रीमा रंगोली‘
सुहाना सा मौसम, हवा थी मचली
तभी वो अल्हड़ 'पिरुल' पे फिसली
पहाड़ी से लुढ़की,
चीखों से घिरती
मिट्टी से लिपटी
खिलौना सी चटकी !
चीत्कार थी उसकी पहाड़ों से टकरायी
सहेलियां सभी थी बुरी तरह घबराई
पर -
मैं न रोई, न चीखी, न चिल्लाई
बुत बन गई, और आँखे थी पथराई,
मौत के इस खेल से, मैं थी डर गई,
दादी का जाना, चिड़िया का मरना
उसमें थी, एक नयी कड़ी जुड़ गई,
पहले से मानों मैं अधिक मर गई,
लगा जैसे मौत तुम मुझमें घर कर गईं,
दिलो दिमाग को सुन्न कर गईं
मुझे एकबार फिर जड़ कर गईं !
4) सहेली
'जीवन' मिला है जब से,
तुम्हारे साथ जी रही हूँ तब से,
तुम मेरी और मैं तुम्हारी
सहेली कई बरस से,
तुम मुझे 'जीवन' की ऒर
धकेलती रही हो कब से,
"अभी तुम्हारा समय नहीं आया"
मेरे कान में कहती रही हो हँस के,
जब - जब मैं पूछती तुमसे,
असमय टपक पड़ने वाली
तुम इतनी समय की पाबंद कब से ?
तब खोलती भेद, कहती मुझसे,
ना, ना, ना, ना असमय नहीं,
आती हूँ समय पे शुरू से,
'जीवन' के खाते में अंकित
चलती हूँ, तिथि - दिवस पे
'नियत घड़ी' पे पहुँच निकट मैं
गोद में भर लेती हूँ झट से !
'जीवन' मिला है जब से,
तुम्हारे साथ जी रही हूँ तब से !
5) सूक्ष्मा
तू इतनी सूक्ष्म , तू इतनी सूक्ष्म कि
तुझे देखा नहीं जा सकता
छुआ नहीं जा सकता
बस तुझे महसूस किया जा सकता है,
जब तेरा अस्तित्व तन मन में समा जाता है,
हर साँस बोझिल, दिल बुझा-बुझा हो जाता है,
तू "सूक्ष्म" पर तेरा बोझ कितना असहनीय !
6) 'बोलो कहाँ नहीं हो तुम '
बोलो कहाँ नहीं हो तुम ?
बोलो कहाँ नहीं हो तुम ?
जगाया सोई मौत को कह कर मैने -
बोलो कहाँ नहीं हो तुम !
बोलो कहाँ नहीं हो तुम !
अचकचा कर उठ बैठी सचमुच ,
देखा मुझे अचरज से कुछ,
बोली –
मैं तो सबको अच्छी लगती - सुप्त-लुप्त
मुझे जगा रही तुम, क्यूं हो तप्त ?
मैं बोली - जीवन अच्छा, बहुत अच्छा लगता है
पर, बुरी नहीं लगती हो तुम
बुरी नहीं लगती हो तुम !
ख्यालों में बनी रहती हो तुम
जीवन का हिस्सा हो तुम,
अनदेखा कर सकते हम ?
ऐसी एक सच्चाई तुम
जीवन के संग हर पल, हर क्षण,
हर ज़र्रे ज़र्रे में तुम,
बोलो कहाँ नहीं हो तुम ?
बोलो कहाँ नहीं हो तुम ?
जल में हो तुम, थल में हो तुम,
व्योम में पसरी, आग में हो तुम,
सनसन तेज़ हवा में हो तुम,
सूनामी लहरों में तुम,
दहलाते भूकम्प में तुम,
बन प्रलय उतरती धरती पे जब,
तहस नहस कर देती सब तुम,
अट्ठाहस करती जीवन पर,
भय से भर देती हो तुम !
उदयाचल से सूरज को, अस्ताचल ले जाती तुम,
खिले फूल की पाँखों में, मुरझाहट बन जाती तुम,
जीवन में कब - कैसे, चुपके से, छुप जाती तुम
जब-तब झाँक इधर-उधर से, अपनी झलक दिखाती तुम,
कभी जश्न में चूर नशे से, श्मशान बन जाती तुम,
दबे पाँव जीवन के साथ, सटके चलती जाती तुम,
कभी पालने पे निर्दय हो, उतर चली आती हो तुम
तो मिनटों में यौवन को कभी, लील जाती हो तुम,
बाट जोहते बूढ़ों को, कितना तरसाती हो तुम,
बोलो कहाँ नहीं हो तुम ?
बोलो कहाँ नहीं हो तुम ?
7) चिरायु
मृत्यु तुम शतायु हो, चिरायु हो !
तभी तो इन शब्दों के समरूप हो, समध्वनि हो,
शतायु, चिरायु, मृत्यु
तुम अमर हो, अजर हो,
तुम अन्त हो, अनन्त हो,
तुम्हारे आगे कुछ नहीं,
सब कुछ तुम में समा जाता है,
सारी दुनिया, सारी सृष्टि
तुम पर आकर ठहर जाती है,
तुम में विलीन हो जाती है,
तुम अथाह सागर हो,
तुम निस्सीम आकाश हो,
इस स्थूल जगत को अपने में समेटे हो,
फिर भी कितनी सूक्ष्म हो
संसार समूचा तुमसे आता, तुम में जाता,
महिमा तुम्हारी हर कोई गाता,
रहस्यमयी सुन्दर माया हो
आगामी जीवन की छाया हो !!
8) 'मौत में जीवन'
मौत में मैने जीवन को पनपते देखा है !
सूखी झड़ती पत्तियों के बीच फूल को मुस्कुराते देखा है,
मौत में मैने जीवन को पनपते देखा है !
दो बूँद सोख कर नन्हे पौधे को लहलहाते देखा है
मौत में मैने जीवन को पनपते देखा है !
'पके' फलों के गर्भ में, जीवन संजोये बीजों को छुपे देखा है,
मौत में मैने जीवन को पनपते देखा है !
मधुमास की आहट से, सूनी शाखों में कोंपलों को फूटते देखा है
मौत में मैने जीवन को पनपते देखा है !
राख के ढेर में दबी चिन्गारी को चटकते, धधकते देखा है।
मौत में मैने जीवन को पनपते देखा है !
सूनी पथराई आँखों में प्यार के परस से सैलाब उमड़ते देखा है,
मौत में मैने जीवन को पनपते देखा है !
बच्चों की किलकारी से, मुरझाई झुर्राई दादी को मुस्काते देखा है,
मौत में मैने जीवन को पनपते देखा है !
9) जीवन स्रोत
जीवन के दो छोर
एक छोर पे जन्म
दूसरे पे मृत्यु
जन्म से आकार पा कर ‘जीवन’
एक दिन मृत्यु में विलय हो जाता है
ऐसा तुम्हे लगता है,
पर मुझे तो कुछ और नज़र आता है,
"मृत्यु जन्म की नींव है "
जहाँ से जीवन फिर से पनपता है,
मृत्यु वही अन्तिम पड़ाव है,
जिस से गुज़र कर, जिसकी गहराईयों में पहुँचकर
सारे पाप मैल धो कर, स्वच्छ और उजला हो कर
जीवन पुनः आकार पाता है !
'मृत्यु' उसे सँवार कर, जन्म की ऒर सरका देती है,
और यह 'संसरण' अनवरत चलता रहता है !
फिर तुम क्यों मृत्यु से डरते हो, खौफ खाते हो ?
अन्तिम पड़ाव, अन्तिम छोर है वह,
जन्म पाना है तो सृजन बिन्दु की ऒर प्रयाण करना होगा,
इस अन्तिम पड़ाव से गुज़रना होगा,
उस पड़ाव पे पहुँचकर, तुम्हे जीवन का मार्ग दिखेगा,
तो नमन करो - जीवन के इस अन्तिम, चरम बिन्दु को
जो जीवन स्रोत है, सर्जक है !
10) अन्तिमा
हे अन्तिमा जब दिल में समा जाती है तू
तो अजब सी शान्ति, ठन्डक का एहसास बन जाती है तू,
जीवन्तता से आपूरित मन,
अद्भुत शक्ति, ठसक से भरा होता है तन,
तन मन को आलिंगन करने के तेरे ढंग निराले,
कभी तू हँसते हँसते आ जाती है,
कभी तू खेलते खेलते आदमी से लिपट जाती है,
कभी तू खाने वाले के ग्रास में छुप कर बैठ जाती है,
कभी तू सोए हुए को चिरनिद्रा में ले जाती है,
तू बड़ी नटखट है .....
नहीं आती तो देह से लाचार, धुंधली नज़र से टटोलती,
खटिया पर गुड़ी मुड़ी पड़ी दादी के
बुलाने, मिन्नते करने पर भी नहीं आती,
कभी तू किसी की इच्छा के बिना, उसके जीवन में
इस तरह बैठ जाती है कि जीवन एक चलती फिरती लाश लगता है,
कभी तू मरने वाले के लिए उत्सव बन जाती है,
न जाने कितनी लालसाएँ लिए वह तेरी बाँहों में समा जाता है,
दूसरा जन्म पाने की आशा में खुशी खुशी मर जाता है,
कभी तू अमृत को विष और विष को अमृत बना देती है
कभी तू कंस का काल बन जाती है,
कभी तू रावण के तीर भोंक देती है,
तू सर्वशक्तिमान, सर्वद्रष्टा, सर्वव्यापी है
इसलिए तू सन्मति, सद्गति और अन्तिम परिणति है !
11) जब भी आऒ, अपनो की तरह आऒ
तुम जब भी आऒ, अपनो की तरह आऒ
मैं नहीं चाहती कि तुम ‘अतिथि’ की तरह आऒ,
पहले से – ‘तारीख – समय’ बता कर आओ,
बिल्कुल मेरी अपनी बन कर आऒ,
पर, जब भी आऒ अपनो की तरह आऒ
तुम जब भी आऒ अपनो की तरह आऒ
ले कर विदा सबसे, गले तुम्हारे लग जाऊँगी
लेकर होठों पे मुस्कान, जाने को तैयार रहूँगी
मुड़कर पीछे न देखूँगी, रुदन न हाहाकार करूँगी
पर, जब भी आऒ अपनो की तरह आऒ
तुम जब भी आऒ अपनो की तरह आऒ
बच्चों को, अपने घर को, पन्नों पे कविता छन्दों को
आँगन के कोने -कोने को, गमले में खिलते फूलों को
जाने से पहले देखूँगी, एक बार जी भर कर सबको
पर, जब भी आऒ अपनो की तरह आऒ
तुम जब भी आऒ अपनो की तरह आऒ
12) परम समाधि'
युगों - युगों से सन्तो ने
आत्मिक मन्थन कर के
अनन्त अमरता साधी
पर मैनें, तुमने, हमने,
झेली तन की हर व्याधि,
ढेली मन की हर आधि !
जीवन - यात्रा करते - करते,
और इसमें ही जीते मरते
काटी ज़िन्दगी आधी !
लीन हो गए मन से,
मुक्त हो गए तन से,
मृत्यु बनी परम समाधि
मृत्यु बनी परम समाधि !
13) "मुक्ति का द्वार"
अब मैं समझ गई हे!मौत,
तुम कहीं भी, कभी भी आ सकती हो,
तुम्हारा आना निश्चित है, अटल है,
जीवन में तुम ऐसे समाई हो,
जैसे आग में तपन, काँटे में चुभन !
सोच-सोच हर पल तुम्हारे बारे में,
मैं निकट हो गई इतनी,
सखी होती घनिष्ठ जितनी,
तुम बनकर जीवन दृष्टि,
लगी करने विचार- सृष्टि
भावों की अविरल वृष्टि !
मैं जीवन में 'तुमको', तुम में लगी देखने 'जीवन'
इस परिचय से हुआ अभिनव 'प्रेम मन्थन'
प्रेम ढला "श्रद्धा" में
"श्रद्धा" से देखा भरकर
तुम लगी मुझे तब "सिद्धा" !
तुम्हारे लिए मेरा ये "प्यार"
बना जीवन "मुक्ति का द्वार" !
पहला परिचय तुमसे, बचपन में हुआ था तब
मैं थी अबोध - अन्जान, बेबस भोली सी जब
पार्थिव शरीर में दादी के
तुम उतरी 'भगवान' बन के
निश्चेष्ट दादी को पड़ा देख
पूछा मैंने रोक संवेग -
'दादी बोलती क्यों नहीं ?
आँख खोलती क्यों नहीं ? '
माँ बोली - आँचल में मुँह कर
ले गए 'भगवान' दादी को अब घर,
वहीं रहेगी दादी हर पल !
मैं उदास, खामोश, लगी रोने फिर झर-झर,
रोते - रोते लुढ़क गयी दादी पर
सुबक - सुबक कर कहती थी डर कर
'दादी, कहना मानूँगी
मिट्टी में नहीं खेलूँगी
टॉफी तुमको दे दूँगी..'
तभी उठाया मुझे किसी ने
तुरत लगाया गले किसी ने
कहा प्यार से थपक - थपक
वहीं रहेगी दादी अब बस
विदा करेगें हम तुम मिल सब
‘भगवान’
इस नाम से ‘तुमको’ जाना था तब !
2) 'मृत्यु से मेरा दूसरा परिचय'
मेरे आँगन में चिड़िया का बच्चा निष्प्राण पड़ा था,
और मेरा चुनमुन नन्हा मन खेल में पड़ा था,
आँगन में उछलती कूदती,
मैं एकाएक गम्भीर हो गयी,
'दादी' मुझको याद आ गयी,
जोर से चीखी,और बौंरा गयी,
माँ और नानी दौड़ के आयीं
पूछा - क्यों चीखी चिल्लायी ?
नन्ही अँगुली उठी उधर
पड़ा था 'वो' निश्चेष्ट जिधर
काँपे था तन मेरा थर-थर
हौले से मैं बोली,
यह बोलता नहीं....
आँख खोलता नहीं.....
इसे भी भगवान जी... कहते-कहते
माँ से लिपट गई मैं कस कर,
उस नन्हे बच्चे को,
निर्ममता से तुम ग्रस कर
मुझे बना गई थी पत्थर !
3)'मृत्यु से मेरा तीसरा परिचय'
पहाड़ी लड़कियों की टोली
जिसमें थी मेरी, एक हमजोली
नाम था - उसका ‘रीमा रंगोली‘
सुहाना सा मौसम, हवा थी मचली
तभी वो अल्हड़ 'पिरुल' पे फिसली
पहाड़ी से लुढ़की,
चीखों से घिरती
मिट्टी से लिपटी
खिलौना सी चटकी !
चीत्कार थी उसकी पहाड़ों से टकरायी
सहेलियां सभी थी बुरी तरह घबराई
पर -
मैं न रोई, न चीखी, न चिल्लाई
बुत बन गई, और आँखे थी पथराई,
मौत के इस खेल से, मैं थी डर गई,
दादी का जाना, चिड़िया का मरना
उसमें थी, एक नयी कड़ी जुड़ गई,
पहले से मानों मैं अधिक मर गई,
लगा जैसे मौत तुम मुझमें घर कर गईं,
दिलो दिमाग को सुन्न कर गईं
मुझे एकबार फिर जड़ कर गईं !
4) सहेली
'जीवन' मिला है जब से,
तुम्हारे साथ जी रही हूँ तब से,
तुम मेरी और मैं तुम्हारी
सहेली कई बरस से,
तुम मुझे 'जीवन' की ऒर
धकेलती रही हो कब से,
"अभी तुम्हारा समय नहीं आया"
मेरे कान में कहती रही हो हँस के,
जब - जब मैं पूछती तुमसे,
असमय टपक पड़ने वाली
तुम इतनी समय की पाबंद कब से ?
तब खोलती भेद, कहती मुझसे,
ना, ना, ना, ना असमय नहीं,
आती हूँ समय पे शुरू से,
'जीवन' के खाते में अंकित
चलती हूँ, तिथि - दिवस पे
'नियत घड़ी' पे पहुँच निकट मैं
गोद में भर लेती हूँ झट से !
'जीवन' मिला है जब से,
तुम्हारे साथ जी रही हूँ तब से !
5) सूक्ष्मा
तू इतनी सूक्ष्म , तू इतनी सूक्ष्म कि
तुझे देखा नहीं जा सकता
छुआ नहीं जा सकता
बस तुझे महसूस किया जा सकता है,
जब तेरा अस्तित्व तन मन में समा जाता है,
हर साँस बोझिल, दिल बुझा-बुझा हो जाता है,
तू "सूक्ष्म" पर तेरा बोझ कितना असहनीय !
6) 'बोलो कहाँ नहीं हो तुम '
बोलो कहाँ नहीं हो तुम ?
बोलो कहाँ नहीं हो तुम ?
जगाया सोई मौत को कह कर मैने -
बोलो कहाँ नहीं हो तुम !
बोलो कहाँ नहीं हो तुम !
अचकचा कर उठ बैठी सचमुच ,
देखा मुझे अचरज से कुछ,
बोली –
मैं तो सबको अच्छी लगती - सुप्त-लुप्त
मुझे जगा रही तुम, क्यूं हो तप्त ?
मैं बोली - जीवन अच्छा, बहुत अच्छा लगता है
पर, बुरी नहीं लगती हो तुम
बुरी नहीं लगती हो तुम !
ख्यालों में बनी रहती हो तुम
जीवन का हिस्सा हो तुम,
अनदेखा कर सकते हम ?
ऐसी एक सच्चाई तुम
जीवन के संग हर पल, हर क्षण,
हर ज़र्रे ज़र्रे में तुम,
बोलो कहाँ नहीं हो तुम ?
बोलो कहाँ नहीं हो तुम ?
जल में हो तुम, थल में हो तुम,
व्योम में पसरी, आग में हो तुम,
सनसन तेज़ हवा में हो तुम,
सूनामी लहरों में तुम,
दहलाते भूकम्प में तुम,
बन प्रलय उतरती धरती पे जब,
तहस नहस कर देती सब तुम,
अट्ठाहस करती जीवन पर,
भय से भर देती हो तुम !
उदयाचल से सूरज को, अस्ताचल ले जाती तुम,
खिले फूल की पाँखों में, मुरझाहट बन जाती तुम,
जीवन में कब - कैसे, चुपके से, छुप जाती तुम
जब-तब झाँक इधर-उधर से, अपनी झलक दिखाती तुम,
कभी जश्न में चूर नशे से, श्मशान बन जाती तुम,
दबे पाँव जीवन के साथ, सटके चलती जाती तुम,
कभी पालने पे निर्दय हो, उतर चली आती हो तुम
तो मिनटों में यौवन को कभी, लील जाती हो तुम,
बाट जोहते बूढ़ों को, कितना तरसाती हो तुम,
बोलो कहाँ नहीं हो तुम ?
बोलो कहाँ नहीं हो तुम ?
7) चिरायु
मृत्यु तुम शतायु हो, चिरायु हो !
तभी तो इन शब्दों के समरूप हो, समध्वनि हो,
शतायु, चिरायु, मृत्यु
तुम अमर हो, अजर हो,
तुम अन्त हो, अनन्त हो,
तुम्हारे आगे कुछ नहीं,
सब कुछ तुम में समा जाता है,
सारी दुनिया, सारी सृष्टि
तुम पर आकर ठहर जाती है,
तुम में विलीन हो जाती है,
तुम अथाह सागर हो,
तुम निस्सीम आकाश हो,
इस स्थूल जगत को अपने में समेटे हो,
फिर भी कितनी सूक्ष्म हो
संसार समूचा तुमसे आता, तुम में जाता,
महिमा तुम्हारी हर कोई गाता,
रहस्यमयी सुन्दर माया हो
आगामी जीवन की छाया हो !!
8) 'मौत में जीवन'
मौत में मैने जीवन को पनपते देखा है !
सूखी झड़ती पत्तियों के बीच फूल को मुस्कुराते देखा है,
मौत में मैने जीवन को पनपते देखा है !
दो बूँद सोख कर नन्हे पौधे को लहलहाते देखा है
मौत में मैने जीवन को पनपते देखा है !
'पके' फलों के गर्भ में, जीवन संजोये बीजों को छुपे देखा है,
मौत में मैने जीवन को पनपते देखा है !
मधुमास की आहट से, सूनी शाखों में कोंपलों को फूटते देखा है
मौत में मैने जीवन को पनपते देखा है !
राख के ढेर में दबी चिन्गारी को चटकते, धधकते देखा है।
मौत में मैने जीवन को पनपते देखा है !
सूनी पथराई आँखों में प्यार के परस से सैलाब उमड़ते देखा है,
मौत में मैने जीवन को पनपते देखा है !
बच्चों की किलकारी से, मुरझाई झुर्राई दादी को मुस्काते देखा है,
मौत में मैने जीवन को पनपते देखा है !
9) जीवन स्रोत
जीवन के दो छोर
एक छोर पे जन्म
दूसरे पे मृत्यु
जन्म से आकार पा कर ‘जीवन’
एक दिन मृत्यु में विलय हो जाता है
ऐसा तुम्हे लगता है,
पर मुझे तो कुछ और नज़र आता है,
"मृत्यु जन्म की नींव है "
जहाँ से जीवन फिर से पनपता है,
मृत्यु वही अन्तिम पड़ाव है,
जिस से गुज़र कर, जिसकी गहराईयों में पहुँचकर
सारे पाप मैल धो कर, स्वच्छ और उजला हो कर
जीवन पुनः आकार पाता है !
'मृत्यु' उसे सँवार कर, जन्म की ऒर सरका देती है,
और यह 'संसरण' अनवरत चलता रहता है !
फिर तुम क्यों मृत्यु से डरते हो, खौफ खाते हो ?
अन्तिम पड़ाव, अन्तिम छोर है वह,
जन्म पाना है तो सृजन बिन्दु की ऒर प्रयाण करना होगा,
इस अन्तिम पड़ाव से गुज़रना होगा,
उस पड़ाव पे पहुँचकर, तुम्हे जीवन का मार्ग दिखेगा,
तो नमन करो - जीवन के इस अन्तिम, चरम बिन्दु को
जो जीवन स्रोत है, सर्जक है !
10) अन्तिमा
हे अन्तिमा जब दिल में समा जाती है तू
तो अजब सी शान्ति, ठन्डक का एहसास बन जाती है तू,
जीवन्तता से आपूरित मन,
अद्भुत शक्ति, ठसक से भरा होता है तन,
तन मन को आलिंगन करने के तेरे ढंग निराले,
कभी तू हँसते हँसते आ जाती है,
कभी तू खेलते खेलते आदमी से लिपट जाती है,
कभी तू खाने वाले के ग्रास में छुप कर बैठ जाती है,
कभी तू सोए हुए को चिरनिद्रा में ले जाती है,
तू बड़ी नटखट है .....
नहीं आती तो देह से लाचार, धुंधली नज़र से टटोलती,
खटिया पर गुड़ी मुड़ी पड़ी दादी के
बुलाने, मिन्नते करने पर भी नहीं आती,
कभी तू किसी की इच्छा के बिना, उसके जीवन में
इस तरह बैठ जाती है कि जीवन एक चलती फिरती लाश लगता है,
कभी तू मरने वाले के लिए उत्सव बन जाती है,
न जाने कितनी लालसाएँ लिए वह तेरी बाँहों में समा जाता है,
दूसरा जन्म पाने की आशा में खुशी खुशी मर जाता है,
कभी तू अमृत को विष और विष को अमृत बना देती है
कभी तू कंस का काल बन जाती है,
कभी तू रावण के तीर भोंक देती है,
तू सर्वशक्तिमान, सर्वद्रष्टा, सर्वव्यापी है
इसलिए तू सन्मति, सद्गति और अन्तिम परिणति है !
11) जब भी आऒ, अपनो की तरह आऒ
तुम जब भी आऒ, अपनो की तरह आऒ
मैं नहीं चाहती कि तुम ‘अतिथि’ की तरह आऒ,
पहले से – ‘तारीख – समय’ बता कर आओ,
बिल्कुल मेरी अपनी बन कर आऒ,
पर, जब भी आऒ अपनो की तरह आऒ
तुम जब भी आऒ अपनो की तरह आऒ
ले कर विदा सबसे, गले तुम्हारे लग जाऊँगी
लेकर होठों पे मुस्कान, जाने को तैयार रहूँगी
मुड़कर पीछे न देखूँगी, रुदन न हाहाकार करूँगी
पर, जब भी आऒ अपनो की तरह आऒ
तुम जब भी आऒ अपनो की तरह आऒ
बच्चों को, अपने घर को, पन्नों पे कविता छन्दों को
आँगन के कोने -कोने को, गमले में खिलते फूलों को
जाने से पहले देखूँगी, एक बार जी भर कर सबको
पर, जब भी आऒ अपनो की तरह आऒ
तुम जब भी आऒ अपनो की तरह आऒ
12) परम समाधि'
युगों - युगों से सन्तो ने
आत्मिक मन्थन कर के
अनन्त अमरता साधी
पर मैनें, तुमने, हमने,
झेली तन की हर व्याधि,
ढेली मन की हर आधि !
जीवन - यात्रा करते - करते,
और इसमें ही जीते मरते
काटी ज़िन्दगी आधी !
लीन हो गए मन से,
मुक्त हो गए तन से,
मृत्यु बनी परम समाधि
मृत्यु बनी परम समाधि !
13) "मुक्ति का द्वार"
अब मैं समझ गई हे!मौत,
तुम कहीं भी, कभी भी आ सकती हो,
तुम्हारा आना निश्चित है, अटल है,
जीवन में तुम ऐसे समाई हो,
जैसे आग में तपन, काँटे में चुभन !
सोच-सोच हर पल तुम्हारे बारे में,
मैं निकट हो गई इतनी,
सखी होती घनिष्ठ जितनी,
तुम बनकर जीवन दृष्टि,
लगी करने विचार- सृष्टि
भावों की अविरल वृष्टि !
मैं जीवन में 'तुमको', तुम में लगी देखने 'जीवन'
इस परिचय से हुआ अभिनव 'प्रेम मन्थन'
प्रेम ढला "श्रद्धा" में
"श्रद्धा" से देखा भरकर
तुम लगी मुझे तब "सिद्धा" !
तुम्हारे लिए मेरा ये "प्यार"
बना जीवन "मुक्ति का द्वार" !
Sunday, April 25, 2010
Life is exuberant, it is beautiful if we live it consciously, receiving its wise messages, protective warnings and great experiences which help us grow into a perfect person. For example :
1) Life often says – ‘ learn from Nature to grow, survive and be deep rooted’. But we hardly listen to beautiful & rich Nature around us.
2) A small plant takes years to grow into a tree. It is never in a hurry. Because hurried efforts never give long lasting results. A tiny, small, delicate plant first learns to set it roots (feet) deep in the earth, in the soil. This root setting procedure takes time, but once it is done, all the nature’s richness gets ready to embrace that ‘deep rooted plant’. And then its fabulous growth starts day by day. By night, by day it gradually keeps growing & growing and one day, we see it full of soft green branches, leaves. Still its journey doesn’t stop. It continues. And again the other day, we notice that small flowers have covered it. After it, the next growth in the form of fruits all over the tree fascinates us . So finally that small plant reaps the great result of its steady growth. Now the process of having new leaves, foliage, flowers & fruits every year continues for years. This is called full growth. The tree survives because of its initial bottom journey into the soil, earth first. Then finishing the bottom journey properly and with utter patience, its journey to upper side takes place unbarred. Its high upward branches seem like touching the sky. So we must learn how to grow properly and fully from the Nature’s this part – called ‘TREE’.
3) Nature often tells us - ‘Failure or to be unsuccessful at times - is the part of life, but every unsuccessful effort hides the rays of success’
But we hardly listen to beautiful & rich Nature around us. See the rising sun in the east every day, but at the end of the day, it goes down, it sinks, sets at the horizon. The setting of sun in the evening daily conveys us that tomorrow it will rise with a fresh morning, fill the world with sunshine, make everyone lively & chirpy. So sinking and rising - is the cycle of life. One should not be dishearten when one goes down = faces failures because coming times do have bright & sunny days in the store for us.
4) Summer, winter, rains, fall and spring, these all seasons also convey us secretly wise message. Our life can never be the same. Ups and downs keeps on gripping our life. If happiness is required in life, so the grief too is required to relish the joy of happiness. For its continuous growth, it has to pass through rough & nice phases one after another, so we must keep our patience. May be, as if God tests our patience, our capacity to face the troubles with a smile and of course , with a hope of gorgeous time ahead. We all have hot, sweating, uneasy time in the ‘Summer’. But it is not for ever, slowly it passes away. Then arrives the ‘ Rainy season’ with lots & lots of cool showers to take away the heat and dryness. The earth that got dry in the hot summer days, is run over by velvety greenery all around. Rivers, rivulets, ponds, lakes all get brim full with water. Life seems happy and relieved from the harsh heat .And then cool and quiet ‘Winter’ rolls in. We feel at ease , enjoy the snowy time with a cuppa of hot tea and coffee, relishing cookies and so on. Having continuously two months of flourishing richness in many different ways, the turn of ‘Fall season’ comes. In past two months Nature gives us so much to face the future troubles strongly and bravely that we hardly mind the roughness of ‘fall’ season. Fall season full of dry winds takes away all the leaves and flowers from the lush green trees. Earth is full of dry leaves & figs all over. But nature speaks silently and gives us the message of coming ‘Spring’. When all the trees stand naked - leafless & lifeless, they have no charm, no colour, no beauty - Spring sets in with the bunch of colourful bud, leaves & flowers. Soft fragrance of different flowers fills the atmosphere, colourful migrated tiny cute birds chirp non stop - making the nature’s ambience melodious, lively and lovely. Spring shields the nature with its exuberance, magical charm and lavish beauty. So, thus nature whispers in our ears - never ever mind the rough and lonely phases of life like ‘Fall season’ because ‘Fall’ takes away the old leaves and flowers & makes space for the newones. Every action, every event in Nature and Life has its reason - if it takes, it give us too. We should therefore keep our patience and keep trying, putting our best and the day will come rushing to us to make us successful, lively and joyous again. But we must learn to be modest & humble to survive the achievements, our success. It should not go in our head. So take up the small & big success modestly, the same way take the small & big failure also, modestly and never lose heart.
If winter comes, can spring be far behind………..
Every dark cloud has a silver lining………..
1) Life often says – ‘ learn from Nature to grow, survive and be deep rooted’. But we hardly listen to beautiful & rich Nature around us.
2) A small plant takes years to grow into a tree. It is never in a hurry. Because hurried efforts never give long lasting results. A tiny, small, delicate plant first learns to set it roots (feet) deep in the earth, in the soil. This root setting procedure takes time, but once it is done, all the nature’s richness gets ready to embrace that ‘deep rooted plant’. And then its fabulous growth starts day by day. By night, by day it gradually keeps growing & growing and one day, we see it full of soft green branches, leaves. Still its journey doesn’t stop. It continues. And again the other day, we notice that small flowers have covered it. After it, the next growth in the form of fruits all over the tree fascinates us . So finally that small plant reaps the great result of its steady growth. Now the process of having new leaves, foliage, flowers & fruits every year continues for years. This is called full growth. The tree survives because of its initial bottom journey into the soil, earth first. Then finishing the bottom journey properly and with utter patience, its journey to upper side takes place unbarred. Its high upward branches seem like touching the sky. So we must learn how to grow properly and fully from the Nature’s this part – called ‘TREE’.
3) Nature often tells us - ‘Failure or to be unsuccessful at times - is the part of life, but every unsuccessful effort hides the rays of success’
But we hardly listen to beautiful & rich Nature around us. See the rising sun in the east every day, but at the end of the day, it goes down, it sinks, sets at the horizon. The setting of sun in the evening daily conveys us that tomorrow it will rise with a fresh morning, fill the world with sunshine, make everyone lively & chirpy. So sinking and rising - is the cycle of life. One should not be dishearten when one goes down = faces failures because coming times do have bright & sunny days in the store for us.
4) Summer, winter, rains, fall and spring, these all seasons also convey us secretly wise message. Our life can never be the same. Ups and downs keeps on gripping our life. If happiness is required in life, so the grief too is required to relish the joy of happiness. For its continuous growth, it has to pass through rough & nice phases one after another, so we must keep our patience. May be, as if God tests our patience, our capacity to face the troubles with a smile and of course , with a hope of gorgeous time ahead. We all have hot, sweating, uneasy time in the ‘Summer’. But it is not for ever, slowly it passes away. Then arrives the ‘ Rainy season’ with lots & lots of cool showers to take away the heat and dryness. The earth that got dry in the hot summer days, is run over by velvety greenery all around. Rivers, rivulets, ponds, lakes all get brim full with water. Life seems happy and relieved from the harsh heat .And then cool and quiet ‘Winter’ rolls in. We feel at ease , enjoy the snowy time with a cuppa of hot tea and coffee, relishing cookies and so on. Having continuously two months of flourishing richness in many different ways, the turn of ‘Fall season’ comes. In past two months Nature gives us so much to face the future troubles strongly and bravely that we hardly mind the roughness of ‘fall’ season. Fall season full of dry winds takes away all the leaves and flowers from the lush green trees. Earth is full of dry leaves & figs all over. But nature speaks silently and gives us the message of coming ‘Spring’. When all the trees stand naked - leafless & lifeless, they have no charm, no colour, no beauty - Spring sets in with the bunch of colourful bud, leaves & flowers. Soft fragrance of different flowers fills the atmosphere, colourful migrated tiny cute birds chirp non stop - making the nature’s ambience melodious, lively and lovely. Spring shields the nature with its exuberance, magical charm and lavish beauty. So, thus nature whispers in our ears - never ever mind the rough and lonely phases of life like ‘Fall season’ because ‘Fall’ takes away the old leaves and flowers & makes space for the newones. Every action, every event in Nature and Life has its reason - if it takes, it give us too. We should therefore keep our patience and keep trying, putting our best and the day will come rushing to us to make us successful, lively and joyous again. But we must learn to be modest & humble to survive the achievements, our success. It should not go in our head. So take up the small & big success modestly, the same way take the small & big failure also, modestly and never lose heart.
If winter comes, can spring be far behind………..
Every dark cloud has a silver lining………..
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