Sunday, October 24, 2010

सरहद से घर तक



सकीना खाट पर निढाल पडी थी I जमील मियाँ बरसों पुराने टूटे मूढे में धँसे, घुटनों से पेट को दबाए ऐसे बैठे थे जैसे घुटनों के दबाव से भूख भाग जाएगी I कई दिनों से मुँह में अन्न का दाना नहीं गया था I सकीना और जमील मियाँ का इकलौता बेटा शकूर युवावस्था की ताकत के बल पर भूख से जंग ज़रूर लड़ रहा था, लेकिन निर्दयी भूख उसके चेहरे पर मुर्झाहट बन कर चिपक गई थी I भूखे पेट में मरोड़ उठती, तो तीनों थोड़ा-थोड़ा पानी गटक लेते I उनके साथ-साथ उनके उस छोटे से एक कमरे के घर पर भी मुर्दानगी छाई हुई थी I जिस घर में चूल्हा न जले, रोटी सिकने की खुशबू न उठे, वह घर मनहूस और मुर्दा नही तो और क्या होगा I
तभी कमज़ोर आवाज़ में सकीना शकूर की ओर बुझी आँखों से देखती हुई बोली –
‘बेटा ! अब तो जान निकली जाती है I पड़ोसियों में किसी से कुछ रुपये उधार मिल सके तो, ले आ I’
जमील मियाँ भी कुछ हरकत में आए और सूखे होंठो पे जीभ फेरते बोले –
‘हाँ, बेटा बाहर जाके देख तो, तेरी अम्मी ठीक कहती है, शायद कोई थोड़ी बहुत उधारी दे
दे....’
शकूर नाउम्मीदी से बोला - ‘अब्बू ! पड़ोसियों की हालत कौन सी अच्छी है..वे भी तो हमारी तरह फाके मार रहे हैं......
‘पर बेटा, अल्लादीन भाई ज़रूर कुछ न कुछ मदद करेंगे ‘ - जमील मियाँ उम्मीद का टूटा दिया रौशन करते बोले I
‘या अल्लाह !’ एकाएक कमर में उठते तीखे दर्द को होंठों में भींचती सकीना ने दुपट्टे में मुँह छुपा लिया I बेचारगी से भरे शकूर ने अपने अब्बू- अम्मी पे नज़र डाली I वे दोनों उसे निरीह से गर्दन लटकाए, मौत से सम्वाद करते लगे I शकूर अंदर ही अंदर काँप उठा I उससे अपने माँ बाप के भूख से बेजान चेहरे नहीं देखे जाते थे I उम्र के ढलान पर हर रोज बिला नागा, कदम दो कदम ज़िंदगी से दूर जाते अम्मी-अब्बू, शकूर को भूख की मार से तेज़ी से मौत की ओर लुढकते लगे I उनकी नाज़ुक हालत के आगे वह अपनी भूख भूल गया I वह झटपट अल्लादीन चाचा के घर जाने के लिए उठ खडा हुआ I वह लपक कर अल्लादीन के घर पहुँच जाना चाहता था, लेकिन पैर थे कि जल्दी उठते ही न थे I कई दिनों से पानी पी -पीकर किसी तरह प्राण जिस्म में कैद किए शकूर को लगा कि उसके पाँव कमजोरी के कारण उसकी तीव्र इच्छा का साथ नहीं दे पा रहे हैं I दूर तक रेत ही रेत और रेत के ढूह भी उसे रूखे-भूखे, बेजान से नज़र आए I बस्ती को आँखों से टटोलता जाता शकूर एक झटके से ठिठक गया, उसे लगा कि वहाँ रहने वाले इंसान ही नहीं, घर भी मानो भूख से बिलबिला रहे थे I बस्ती की किस्मत पर मातम सा मनाता वह फिर आगे बढ़ चला I कमजोरी से भारी हुए कदमों से किसी तरह अपने को घसीटता हुआ, शकूर आगे बढता गया, बढता गया I शन्नो को चबूतरे पर मुँह लपेटे बैठे देख वह एक बार फिर ठिठक गया --
‘क्यों फूफी क्या हुआ ? ऐसे मुँह क्यों लपेट रखा है ?’
शन्नो भूख से कडवे मुँह को बमुश्किल खोलती बोली – ‘जिससे ये मुआ मुँह रोटी न मांगे......’
ये भुखमरे शब्द शन्नो की मुफलिसी बयान कर, शकूर की मायूसी को गहराते हुए, सन्नाटे में गुम हो गए I
अधखुले दरवाजों वाले खोकेनुमा मायूसी ओढ़े छोटे-छोटे घर, उनके तंग झरोखे और उनमें से झांकते इक्के-दुक्के चेहरे उन घरों और उनमें रहने वालों की तंगहाली बिन पूछे ही बयान कर रहे थे I वह बस्ती गरीबी की ज़िंदा तस्वीर थी I कहीं-कहीं घरों के बाहर छाया में खटोला डाल कर बैठे, कुछ औंधे लेटे लोगो को देख कर लगता था कि वे एकदूसरे से आपस में उधार लेकर ही नहीं खा रहे, बल्कि ज़िंदगी भी उधार की जी रहे थे मानो I शकूर इन नजारों से निराशा में सीझता-पसीजता आखिर अल्लादीन चाचा के घर पहुँच ही गया I उसने दरवाजे पे हलकी सी दस्तक दी, एक.. दो.. तीन....तीसरी दस्तक पे बेजान दरवाजा चरमराता हुआ एक ओर लटकता सा खुल गया I अंदर हुक्का पीते चाचा बोले – ‘कौन SSS..?’ उत्तर के बदले में अंदर आए शकूर को देख, कर मुहब्बत से छलकते बोले - ‘आ, आ बेटा; कैसा है ? जमील मियाँ और सकीना भाभी कैसी हैं ??’
‘ चाचा SSSSS…’ कहते-कहते शकूर का गला भर आया I फिर किसी तरह अपने पर काबू रखता बोला – ‘चाचा ! क्या कुछ पैसे उधार मिल जाएगे.... कितने दिन बीत गए, अम्मी-अब्बू के मुँह में अन्न का दाना नहीं गया I अब उनकी हालत मुझसे देखी नहीं जाती चाचा.. खुदा उन पे रहम करे ! ‘
इससे पहले कि शकूर आगे कुछ और कहता, अल्लादीन उसे ढाढस बंधाता बोला – ‘ बैठ तो, सांस तो ले ले. अपनी हालत भी देखी है तूने ...? जरा सा मुँह निकल आया है I ‘
अल्लादीन अपनी लंबी झुकी हुई कमर को समेटता उठा और अंदर जाकर टीन का एक पुराना डिब्बा लेकर आया I शकूर को डिब्बा पकडाते हुए उसने कहा – ‘गिन तो कितने पैसे हैं इसमें I शकूर ने नम आँखों को पोंछते हुए पैसे गिने – पूरे बाईस रूपए थे I उसे लगा कि इन रुपयों से आए सामान से कम से कम दो-तीन दिन का काम तो चल ही जाएगा I तब तक वह पास वाले हाट में जाकर कठपुतलियों का तमाशा दिखाकर अगले हफ्ते के लिए थोड़ा बहुत तो कमा ही लेगा I शकूर अल्लादीन चाचा का शुक्रिया अदा करता, बिना देर किए परचून की दुकान से आधा किलो आटा, दो रु. की चाय पत्ती, तीन रु. की चीनी, आधा पाव दूध, पाव भर आलू और बचे पैसो के चने-मुरमुरे लेकर घर पहुँचा I उसका मुरझाया चेहरा खाने के कच्चे सामान को देखकर ही चमक से भर गया था I वह ये सोच कर प्रफ्फुल था कि आज कई दिनों के बाद घर में खाने की महक उठेगी, उसके अम्मी-अब्बू रोटी खाकर आज चैन की नींद सोएगें I वह भी आज जी भर के सोएगा और सुबह भी देर से उठेगा I भूखे जिस्म से नींद भी रूठ गई थी I कल वह अपनी कठपुतलियों को साज-संवार कर ठीक करके रखेगा I
घर में घुसते ही शकूर अम्मी को बहुत बड़ी नवीद सी सुनाता सा बोला – ‘अम्मी उठो, देखो मैं चून, चाय, चीनी सब ले आया I तुम जल्दी-जल्दी आटा गूंथो, तब तक मैं आलू छीलता हूँ I’
शकूर की जिंदादिल बातें कानों में पड़ते ही सकीना के मुर्दा शरीर में जान सी आ गई I उसने बिस्तर से उठना चाहा किन्तु कमज़ोर जिस्म उसके सम्हालते-सम्हालते भी फिर से ढह गया I जिस्म साथ नहीं दे रहा था लेकिन खाना पकाने को ललकता मन इस बार सकीना के जिस्म पर हावी हो गया और वह उठ खडी हुई I दुपट्टा खाट पे फेंक, वह टूटी परात में तीनों केहिस्से का एक-एक मुठ्ठी आटा डालकर पानी के छींटे दे कर गूँथने लगी I इधर खुशी से गुनगुनाते शकूर ने आलू की पतली-पतली फांकें काट कर, उन्हें पानी, नमक और चुटकी भर हल्दी के साथ देगची में डालकर मंद-मंद जलते चूल्हे पर चढ़ा दिया I खाना तैयार होने तक, शकूर ने अम्मी- अब्बू को एक-एक मुठ्ठी मुरमुरे दिए जिससे आँतों से लगे उनके पेट में कुछ हलचल हो, पेट खाना पचाने को तैयार हो जाए I खुद भी मुरमुरो में थोड़े से भुने चने मिलाकर खाने लगा I सात दिन बाद, आज का यह दिन तीनों के लिए जश्न सी रौनक लिए आया था I सब्जी बनते ही सकीना ने जमील मियां और शकूर को गरम - गरम रोटी खाने को न्यौता I दोनों एल्ययूम्यूनियम की जगह-जगह से काली पड़ गई कटोरियों में आलू के दो-तीन बुरके और नमकीन झोल लेकर सिकी रोटी धीरे-धीरे खाने लगे I हफ्ते भर से भूखा मुँह जल्दी- जल्दी कौर चबा पाने के काबिल नहीं था सो बाप-बेटे आराम से हौले हौले खा रहे थे I शकूर ने एक टुकड़ा अम्मी के मुँह में जबरदस्ती दिया I भूखे पेट माँ रोटी बनाए - उससे देखा नहीं जा रहा था I जमील मियाँ तो एक रोटी के बाद इस डर से मना करने लगे कि इतने दिनों बाद पेट में अन्न जाने पर कहीं पेट में दर्द न हो जाए I लेकिन सकीना और शकूर के इसरार करने पर, उन्होंने डरते-डरते दूसरी रोटी ले ली I उनको दो-दो रोटियाँ देकर, सकीना भी एक पुरानी सी प्लास्टिक की प्लेट में रोटी और एक चमचा सब्जी लेकर खाने बैठ गई I लेकिन पहला कौर मुँह में रखते ही उसकी निष्क्रिय जीभ और बेजान दाँत, सौंधी - सौंधी सिकी रोटी का स्वाद लेने के बजाय टीस सी मारने लगे I किसी तरह एक कौर गले से नीचे उतरा I निर्जीव अंगों के कारण, खाने का जोश आरोह से अवरोह की ओर उतर गया I फिर भी सकीना ने बड़े दिनों बाद चाव से अपना खाना खाया I खा-पीकर तीनों अल्लाह का शुक्र अदा करते और अल्लादीन भाई को ढेर दुआएँ देते, आपस में बातें करते हुए, सुकून और उनींदी मिठास से भरे बैठे रहे I तीनों अल्लादीन भाई को दुआ देते न थकते थे I सूखी रोटियाँ और नमक का झोल, जिसमें आलू के बुरके नाम भर के लिए थे - तीनों को शाही खाने से कम नहीं लगे I बहुत दिनों बाद पेट में रोटी गई थी, सो तीनों पे नींद की खुमारी चढने लगी I जब सकीना की आँखें खुली तो देखा कि बाहर अन्धेरा चढ आया था I बस्ती के घरौंदों में रौशन, धुंधली बत्तियाँ टिमटिमा रहीं थीं I सकीना उठी I उसने देखा कि लालटेन में इतना तेल न था कि उसे जलाया जा सकता I उसने मिट्टी के तेल की ढिबरी जलाई और उनकी कोठरी मरियल उजाले से भर उठी, मगर उसमें उभरते तीन चेहरे आज मरियल नहीं थे I
कुछ साल पहले तक जमील मियां हाट, गली मौहल्ले, मेले आदि में कठपुतली का तमाशा दिखाते और शकूर साथ में ढोल बजाकर गाता I सकीना हाट से दिन ढले. बची हुई सस्ती सब्जियाँ लाती और ठेला लगाती I दो-तीन दिन तक अपनी बस्ती में सब्जी बेच कर थोड़े बहुत पैसे कमा लेती I जमील मियां को कठपुतली के तमाशे से कभी अच्छी कमाई होती तो कभी कम, फिर भी सकीना की आमदनी मिलाकर तीनों का गुज़ारा हो जाता I लेकिन पिछले साल से दोनों मियाँ बीवी के कमज़ोर शरीर को खाँसी-बुखार और जोड़ों के दर्द ने ऐसा जकडा कि दोनों का धंधा मंदा पड़ गया I गरीबी के कारण दिन पर दिन कुपोषण का शिकार हुआ उनका शरीर ऐसा जर्जर हो चुका था कि उनमें साधारण बीमारी झेलने की भी ताकत नहीं रही थी I ऐसे संकट के समय में जमील मियां और सकीना को अपनी बुढौती की औलाद ‘शकूर’ उम्मीद का आफताब नज़र आता था I जीवन की बुराईयों और ऐबों से दूर सीधा सादा शकूर अब्बू को तसल्ली देता और दस बजने तक काम पर निकल जाता I वह बिना ढोल के गाना गाकर, कठपुतली का तमाशा दिखाता और कहानी गढ़ कर तमाशे को अधिक से अधिक रोचक बनाने की कोशिश करता जिससे कि खूब कमाई होए I लेकिन बेचारे का तमाशा दूसरे कठपुतलीवालों के सामने फीका पड़ जाता क्योकि दूसरों की कठपुतलियाँ अधिक सजीली और ख़ूबसूरत होतीं, साथ ही ढोल और बाजा बजाने वाले दो-दो साथी भी होते I लिहाज़ा दूसरों के तमाशे पर अधिक भीड़ उमड़ पड़ती और उसके फीके तमाशे की ओर कोई न आता I इस कारण से और कुछ, कदम-कदम पे भाग्य के साथ छोड़ देने से जमील मियां के घर में गरीबी पसरती चली जा रही थी I अब नौबत कई-कई दिनों तक भूखे मरने की आ गई थी I इस सब का ही नतीजा था कि सात दिन तक भूख से जंग लड़ते रह कर, आज पहली बार जमील मियां और सकीना ने शकूर को अल्लादीन भाई के पास उधार लेने भेजा था I
सकीना सोच में घुलती बोली – ‘आज अल्लादीन भाई ने उधारी दे दी I कुछ दिन तक हमारा खींच-खींच कर काम चल जाएगा , पर उसके बाद क्या होगा शकूर के अब्बू..??’

‘अल्लाह करम करेगा ! मैंने तो सोचना ही बंद कर दिया है..... ‘- जमील मियां की आवाज़ में बेइंतहा कर्ब के साए लहरा रहे थे I
शकूर रोज तमाशा दिखाने जाता और कामचलाऊ आमदनी से किसी तरह रोज़मर्रा की ज़रूरते पूरी करता I किसी दिन तो कमाई ‘नहीं’ के बराबर होती I आर्थिक तंगी दिन पर दिन बढती जा रही थी I
पिछले तीन महीनों में धीरे-धीरे सकीना और जमील मियाँ बद से बदतर हालत में पहुँच गये थे I दोनों मियाँ - बीवी की हड्डियाँ निकल आई थीं, लेकिन जान जैसे निकलना भूल गई थी I कठोर हालात के कारण दोनों का जीवन से मोह खत्म हो चुका था, फिर भी साँसे न जाने की किस तरह अटकी थीं I जब तक साँसे हैं तो पेट की गुडगुडाहट भी तंग करने से बाज़ नहीं आती I इस बार तो हद ही हो गई थी I घर में पड़े चने-मुरमुरों का आखिरी दाना भी कल खत्म हो गया था I रोटी की शक्ल देखे फिर से हफ्ता भर बीत गया I बारम्बार अल्लादीन भाई के सामने हाथ फैलाना भी अच्छा नहीं लगता था I गरमी तीखेपन से ज़र्रे-ज़र्रे को भेद कर घर-बाहर, हर जगह धावा बोले बैठी थी I यों तो दोनों मियाँ बीवी इन तंग हालात से बेज़ार होकर मर जाना बेहतर समझते थे, पर जब जिस्म से जान निकलने को होती, तो दोनों में से एक से भी मरा नहीं जाता था I दोनों खिंचते प्राणों को पकडने को बेताब से हो जाते I सकीना, शकूर और जमील मियाँ, सभी की आँतें कुलबुला रहीं थीं I जब बर्दाश्त की हद ही हो गई तो, दिल पे पत्थर रख कर सकीना और जमील मियाँ ने शकूर को किसी तरह भीख माँगने के लिए मजबूर किया I शकूर तैयार नहीं था, पर ‘मरता क्या न करता.....’ दोनों के दिल रो रहे थे, पर आँखें सूखी थीं I शरीर का सब कुछ तो निचुड चुका था तो आँखों में आँसू भी कहाँ से आते ? शकूर माँ-बाप को तसल्ली देता, ज़िंदगी में पहली बार घर से काम पर जाने के बजाय, भीख माँगने जा रहा था I उसका दिल बैठा जाता था I वह चलता जा रहा था I पाँव तले धूल का गुबार उठ रहा था और दिल में बेबसी का..... I शकूर भटके परिंदे की तरह मन ही मन फडफडाता सा चलता चला जा रहा था I चिलचिलाती बेरहम गरमी में दूर - दूर तक डरावना सन्नाटा पसरा हुआ था I भीख माँगता भी तो किससे !?? सब गरमी से छुपे अपने घरों में पड़े थे I एक दो दुकाने खुली हुई थी, दुकानदार पसीना पोंछते बैठे थे I शकूर ने उनके सामने हाथ फैलाया तो उन्होंने उसे टरका दिया I शकूर में आज खाली हाथ घर जाने की हिम्मत नहीं थी, सो वह आगे बढता गया I ऊपर शफ्फाफ आस्मां , नीचे चारों ओर सफेद रेत की चादर लपेटे धरती....सारी कायनात उसे कफ़न ओढ़े नज़र आई I ऊँचे नीचे ढलानों से भरा रेगिस्तान शकूर को खौफनाक लग रहा था या ये उसके खुद के मन के भय थे जो विपरीत परिस्थियों की उपज थे ? भूख और प्यास से बेहाल शकूर को ज़रा भी एहसास नहीं था कि वह बस्ती से कितनी दूर निकल आया है I वह कहीं बैठ कर पल दो पल सुस्ताना चाहता था लेकिन कहीं बैठने का ठिकाना न था, इसलिए उस समय चलना ही उसकी नियति बन चुका था I तभी अनजाने में शकूर भारत-पाक सीमा के उस इलाके में पहुँच गया जहाँ सरहद पर, न तार खिंचे थे और न दोनों देशों की हद तय करने वाले किसी तरह के निशान बने थे I ऐसे में किसी का भी भटक जाना मुमकिन था I शकूर तो पानी की बूँद को तरसता वैसे ही बदहवास सा हो रहा था I उस दीन हीन हालत में वह धोखे में भारत की सीमा में कब घुस गया, उसे पता ही न चला I उसके पाँव उलटे सीधे पड़ रहे थे I थकान से चूर, वह किस ओर बढ़ रहा था - वह इस बात से अंजान था I उसका चलना दूभर हो गया तो पल भर को खडा रह कर, वह इधर - उधर देखने लगा I उसे लगा कि कही वह गश खाकर न गिर पड़े कि तभी पीछे से उसके कंधे पर एक भारी कठोर हाथ पड़ा I शकूर ने ज्योंही मुडकर देखा तो पाया कि एक फ़ौजी सा दिखने वाला आदमी उसे शक की तीखी निगाह से घूरता हुआ, उस पर बन्दूक ताने खडा था I इतने में वैसे ही दो और बन्दूकधारी, न जाने कहाँ से आ धमके I शकूर की रूह काँप उठी I वे ‘सीमा सुरक्षा बल’ के जवान थे, जिन्होंने उसके भारत सीमा के अंदर घुसने के जुर्म में, उस पर गुर्राते और उसे खदेडते हुए, जेसलमेर जेलर के सुपुर्द कर दिया I पहले तो शकूर को कुछ समझ ही नहीं आया, मगर जब सख्त फौलादी हाथ उस पर बेबात ही वार करने लगे तो वह बिलबिला उठा I उसे खुफिया एजेंट, जासूस न जाने क्या-क्या कह कर वे ज़लील करने लगे I तब शकूर को समझ आया कि वह गलती से हिन्दुस्तान की सीमा में घुस आया है I उसे बदकिस्मती अपने पर टूटती लगी I वह खुद-ब-खुद मानो दोजख में चल कर आ गया था I शकूर उन बेरहम जवानों के आगे बहुत गिडगिडाया कि वह कोई जासूस या आतंकी नहीं है, बल्कि वह एक गरीब लड़का है जो भीख माँगने निकला था और भूल से सरहद पार आ गया I पर पडौसी मुल्क के सीमा पर तैनात जवान भला उसकी क्यों सुनने ? वे गैरमुल्क बाशिंदे को छद्मवेशी भोला मुखौटा पहने जासूस ही मान रहे थे, जो दोपहर के सन्नाटे में दबे पाँव उनकी सीमा में घुसने की जुर्रत करी थी I पुलिस इन्सपेक्टर ने देश के प्रति अपना फ़र्ज़ निबाहते हुए, शकूर का नाम, उसके वालिद का नाम, शहर का नाम वगैरा लिखने की ज़रूरी कार्यवाही पूरी करके, उसे कैद खाने में डाल दिया I जेल की छोटी सी कोठरी में पहले से ही बीस-पच्चीस कैदी मौजूद थे I शकूर को अंदर धक्का देकर धकेलते हुए, पुलिस के सिपाही अपने भारी- भारी बूट फटकारते चले गए I भूखा और कमजोर शकूर कैदखाने से उठने वाले गरमी के उफान से उतना नहीं जितना कि अजनबीपन के मनहूस भभके से कंपकंपाया और देखते ही देखते बेहोश गया I कुछ देर बाद उसे होश आया तो, वह रो पड़ा I दूसरे कैदियों ने उसे चुप कराने की लाचार शब्दों से कोशिश की मगर शकूर का दिल था कि सम्हालता ही न था I कुछ देर बाद वह अपने आप चुप हो गया I रह-रह कर रोते-कलपते अम्मी-अब्बू, उसकी आँखों के सामने आ जाते और जैसे उससे पूछने लगते – ‘शकूर तू कहाँ है बच्चे...’ सुबह से भूखे-प्यासे शकूर की भूख और प्यास गायब हो गई थी I उसे बस एक ही बात की फ़िक्र थी कि अब अब्बू- अम्मी का क्या होगा I वे इंतज़ार करते-करते पागल हो जाएगें I वह उन तक अपनी खबर यदि पहुँचाना भी चाहे तो यहाँ उसकी कौन सुनेगा ? वह अंदर ही अंदर हिल गया I अपनी ही लापरवाही और मूर्खता के कारण वह पल भर में अपनी धरती से परायी धरती में चला आया था I इसे कहते हैं ‘बदकिस्मती को गले लगाना I’ शकूर मन ही मन दर्द के समंदर में गोता लगाता दुआ करने लगा – ‘ या खुदा ! मैं यहाँ कैदखाने में और अब्बू-अम्मी अकेले भूखे-प्यासे, मुझसे कोसो दूर पकिस्तान में I अब कौन उनकी देखभाल करेगा ? इस दूरी से तो बेहतर है कि तू हम तीनों को उठा ले.....’ सोच के इस भंवर में डूबे शकूर का चेहरा आँसुओं से तर था मगर इन आँसुओं से बेखबर वह, अपने अम्मी-अब्बू को याद कर करके अनजाने में हुई अपनी गलती पर पछता रहा था I


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एक महीने से ऊपर हो गया था I शकूर के अब्बू-अम्मी को अभी तक उसके बारे में कुछ पता नहीं चला था I सकीना और जमील मियाँ की आँखें इंतज़ार करते-करते पथरा गई थीं I सकीना तो खाट से लग गई थी I हर पल दरवाज़े पर टकटकी लगाए एक ही करवट पडी रहती I हिम्मत करके जमील मियां कंकाल से चलते फिरते, दर-दर भटकते, बस्ती में लोगो से बार-बार पूछते – ‘किसी ने मेरे शकूर को कहीं देखा है, किसी ने देखा हो तो बता दो’......I अपने बेटे की इससे अधिक खोज बीन उनके बस की भी नहीं थी I वह सकीना की खटिया के पास दुआ करते बैठे रहते कि उनका बेटा जहाँ भी हो महफूज़ रहे I सकीना के दिल ने तो जैसे धडकना बंद कर दिया था I उन दोनों को यह अफसोस खाए जाता था कि न वे शकूर को भीख माँगने भेजते और न शकूर उनके साए से दूर होता I एकाएक गायब हुए बच्चे का कोई भी सुराग न मिलने पर माँ-बाप की हालत मौत से भी बदतर होती है I एक अजीब भयानकता उन्हें जकडे थी कि आखिर उनका बच्चा गया तो कहाँ गया....? उनके जिगर का टुकड़ा ज़िंदा भी है कि नहीं..? रात-दिन बुरे से बुरे ख्याल उन पर हावी रहते I शकूर की चिंता में न उनसे जीते बनता है और न मरते I गुमशुदा बेटे के लौट आने की उम्मीद हर पल बनी रहती I धीरे-धीरे बस्ती में यह अफवाह फ़ैल गई कि ‘शकूर को लुटेरे उठा ले गए I पर जब वह ‘शिकार’ फटीचर निकला तो, लुटेरों ने उसे मार दिया I’ अपनी रोज़ी-रोटी की जुगाड में लगी बस्ती को शकूर के बारे में सोचने की फुर्सत नहीं थी I

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शकूर सलाखों के पीछे हताश, निराश हुआ, एक सन्नाटे को पीता बैठा रहता I नींद ने भी उसका साथ छोड़ दिया था I उसे सोए हुए एक अर्सा हो गया था I माँ-बाप के बेजान शरीर, सूनी आँखे उसके ज़ेहन में घूमती रहती I वह मनाता कि काश वह पागल हो जाए ! अपनी तरह बेकुसूर लोगों को उस कोठरी में भेड-बकरियों की तरह साँसें लेते देख शकूर ज़िंदगी से मुँह मोड़ लेना चाहता था I तभी डंडा फटकारता जेलर वहाँ आया कैदियों को टेढी नज़र से देखता बोला –

‘अब पाँच साल तक जेल में चक्की पीसो बेटा ! हमारे देश में घुसने की हिमाकत करने का यही नतीजा होता है I’
उस दिन जेलर के मुँह से -‘पाँच साल’ - यह सुनकर तो शकूर का सिर चकरा गया I पाँच साल में तो अब्बू - अम्मी पर न जाने कितनी बार कैसी - कैसी क़यामत आएगी....!! ‘या खुदा ये क्या हुआ .....? उन्हें तो यह भी नहीं पता कि मैं अपने मुल्क में हूँ या गैर-मुल्क में....?’ यह सोच कर शकूर की आँखों से फिर आँसू बह चले और थमने का नाम ना लेते थे I शकूर आँसू पोंछता जाता और बारम्बार उसकी आँखे भर आती I उसकी आस्तीन आँसुओं से तर हो गई थी I X X X X X X X X X X X

एक दिन शकूर फिर अब्बू - अम्मी को याद करता हुआ रोता बैठा था कि तभी वहाँ से गुज़रता हुआ डिप्टी जेलर उसे देख कर कडका – ‘ऐ ये टसुवे काहे को बहा रहा है तू, यहाँ कोई पिघलने वाला नहीं I क्या समझा ...? चुप कर या लगाऊँ एक !’
शकूर घबराया सा सुबकता हुआ एकदम चुप हो गया I उसका मन, निर्दयी डिप्टी जेलर के हुक्म के बारे में सोचने लगा कि किस बेरहम जमात से वास्ता पड़ गया है कि घर वालों को याद करके आँसू बहाना भी गुनाह है I
बेगुनाह सजायाफ्ता शकूर का एक-एक दिन एक-एक सदी की तरह गुजर रहा था I दिन-रात उसके मन में सवाल उभरते, दबते और उसका दिल बैठा जाता I परेशानी, दुःख-दर्द - वह बेशुमार दर्द के घेरे में कैद होता जा रहा था I एक साल इसी तरह गुज़र गया I उधर सकीना और जमील मियाँ को गरीबी और भूख से ज्यादा बेटे को लेकर, तरह- तरह की चिंताएं खाए जाती थीं I इधर कैदखाने में शकूर अपने से सवाल करता-करता खुद एक सवाल बन के रह गया था I वह अक्सर सोचता कि बिना किसी भारी अपराध के पाँच साल की भारी सज़ा...? अल्लाह, राम-रहीम ! तेरी इस दुनिया में इतनी नाइंसाफी......!! यह दुनिया तेरी बनाई हुई वो दुनिया नहीं है, जिसमें सब प्यार से रहते थे, दूसरे की तकलीफ लोगों को अपनी तकलीफ लगती थी I यह तो तेरी दुनिया पर खुराफाती, चालबाज़ बाशिंदों द्वारा थोपी हुई ऎसी स्याह दुनिया है जहाँ बेकुसूर लोग गुनाहगार करार दिए जा रहे हैं I कोई हल है ऐ मालिक तेरे पास हम बेकस लोगों की समस्या का…..?

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पाँच साल पूरे होने को आए थे I सकीना और जमील मियाँ शकूर की बाट जोहते-जोहते अल्लाह को प्यारे हो गए थे I शकूर पाँच साल बाद रिहा होने जा रहा था पर उसके मन में रिहाई कोई खुशी न थी क्योकि उसे अब्बू-अम्मी के ज़िंदा मिल पाने की तनिक भी उम्मीद न थी I ‘बार्डर सिक्योरिटी फ़ोर्स’ द्वारा पूछ्ताछ की औपचारिक कार्यवाही के बाद शकूर निर्दोष घोषित कर दिया गया था I पन्द्रह साल का शकूर जेल से ‘बीस साल’ का होकर निकला था - निरीह, बुझा-बुझा, लक्ष्यविहीन... I इसके बाद सरकारी नियमानुसार जैसलमेर पुलिस शकूर को दिल्ली स्थित ‘पाकिस्तानी हाई कमीशन’ लेकर गई I अपेक्षित कार्यवाही होने के बाद, शकूर को पाकिस्तान भेजने के लिए, जब भारत स्थित ‘पाकिस्तानी हाई कमीशन’ ने इस्लामाबाद से संपर्क स्थापित किया तो उसके बारे में इस्लामाबाद से बुझे तीर सा यह सवाल उठ कर हिन्दुस्तान की सरज़मीन पर आया कि -
‘इसका क्या सबूत है कि शकूर पाकिस्तानी है??’
दिल चीरते इस सवाल ने शकूर को ऐसी जज्बाती चोट दी कि उसका मन किया कि वह खुदकुशी कर ले, पर किस्मत के मारे को वह भी करने की आजादी नहीं थी I सरकारी हाथों में इधर से उधर उछाला जाता शकूर खिलौना बनने को मजबूर था I बहरहाल उसकी ‘पहचान’ पर सवालिया निशान लगा कर, पाकिस्तानी अधिकारियों ने उसे अस्वीकार कर दिया था और वह फिर से जेसलमेर जेल की सलाखों के पीछे पहुँचा दिया गया I
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एक दिन जयपुर के शिवराम ने सुबह की चाय पीते हुए, अखबार की सुर्ख़ियों पर नज़र डाली तो वह एक खास विस्तृत रिपोर्ट पर अटक के रह गया I भारत में पडौसी देश के निर्दोष कैदियों की दुःख भरी दशा, उनके नाम और हालात सहित, एक रिपोर्टर द्वारा विस्तार से अखबार में पेश की गई थी I अखबार का पूरा पेज ही भारत में सजायाफ्ता बेगुनाह पाकिस्तानी कैदियों और पाकिस्तान जेल में पड़े बेकुसूर हिन्दुस्तानी कैदियों की दुःख भरी दास्ताँ से पटा हुआ था I उन कैदियों में से शकूर की दर्द भरी दास्तान पढकर शिवराम को बड़ी तकलीफ महसूस हुई I अन्य सब कैदी तो पाँच साल कि सज़ा के बाद पाकिस्तान सरकार द्वारा वापिस ले लिए गए थे I उनके घरवाले बेसब्री से उनका इंतज़ार कर रहे थे और लगातार पाँच साल से हाय-तौबा मचाए थे I लेकिन हर ओर से मुसीबतों के मारे अनाथ शकूर को पाकिस्तानी अधिकारियों ने वापिस लेने से इन्कार कर दिया था I पाकिस्तान सरकार के बेरहम रवैये के खिलाफ पाकिस्तान की सरज़मीन से शकूर के लिए कोई आवाज़ उठाने वाला भी न था I बहरहाल अपनी पहचान पर प्रश्न चिन्ह लिए वह वापिस जैसलमेर जेल में रहने के लिए मजबूर शकूर के लिए शिवराम का दिल भर आया I आगे पूरा अखबार भी उससे न पढ़ा गया I शिवराम लगातार दो-तीन दिन तक बेगुनाह शकूर के बारे में सोचता रहा I इस सोच ने उसके मन में सघन बेचैनी और दिमाग में कई प्रश्नों की कतार खडी कर दी I वह ये सोचकर बेकल था कि एक किशोर लड़का जो, सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से तो कमजोर है ही, ऊपर से, उसके देश ने उसे अपना मानने से इन्कार कर दिया - ऐसी शून्य स्थिति में वह बच्चा किस भावनात्मक बिखराव, आक्रोश और बेचारगी के दौर से गुजर रहा होगा ? उसकी जगह अगर उसका अपना बेटा होता तो....... इस कल्पना मात्र से शिवराम का दिल डूबने लगा I वह भावुक हो उठा I धीरे-धीरे दिमाग में उभरते तर्क वितर्क उसके ह्रदय में चुभने लगे I वह विद्रोह से भरे सोच के सेहरा में बड़ी देर तक चलता गया I उसकी संवेदना और तर्क का आकाश व्यापक हो उसके जेहन में उतरने लगा I शिवराम को लगा कि इस तरह का खुला अन्याय युवकों को, चाहे वे भारत के हों या पाकिस्तान के - उन्हें निराशा और खालीपन से भर कर क्या अपराधी बनने को मजबूर नहीं करेगा ?? उस नौजवान के आगे सारी ज़िंदगी पड़ी है, क्या वह निर्दोष होने पर भी राजनीतिक, सामाजिक क्रूरताओं और ऊँचे ओहदे पर बैठे, कुछ अधिकारियों के सिरफिरे निर्णयों व आदेशों के कारण जीने का अधिकार खो देगा ? यह कैसा न्याय है, यह कैसी मानवता है ? इंसान ही इंसान को खा रहा है !! उस रात वह ठीक से सो न सका I सोचते सोचते उसे झपकी लग जाती, फिर आँख खुल जाती और अंजान शकूर रह-रह कर उसके मस्तिष्क में उभरने लगता I कभी शकूर की जगह उसके अपने बेटे की छवि उभर-उभर आती I इस तरह सारी रात सोचते-सोचते बीती I लेकिन नई आने वाली सुबह ने एकाएक उसे अपनी ही तरह एक उजास भरा सुझाव दिया कि क्यों न वह अनाथ शकूर की मदद करे और उसे एक नया जीवन दे ! सवेरे पाँच बजते ही वह इस नेक इरादे के साथ उठा I भले ही शिवराम एक आम आदमी था जिसका अपना सुखी परिवार था, आर्थिक दृष्टि से राजा-महाराजा नहीं, तो कमजोर भी नहीं था I कपडे का चलता हुआ व्यवसाय था I दो उच्च शिक्षा प्राप्त, विवाहित बेटे थे, जो सुखी जीवन जी रहे थे I बड़ा बेटा शिवराम के साथ ही व्यवसाय में हाथ बँटाता था और छोटा बेटा मुम्बई की एक कंपनी में मैनेजर था I आत्मिक बल से भरपूर शिवराम सँस्कारों का धनी था I दूसरों की सहायता करने में सदा आगे रहता I सुबह होते ही शिवराम दैनिक कार्यों से निबट कर, अपनी पत्नी और बेटे से अपने मन में आए विचार पर सलाह-मशविरा करके, अपने खास मित्रों की राय लेने निकल पड़ा जो सरकारी ओहदों पर थे और सरकारी नियमों व कानूनों की जानकारी रखते थे I शिवराम के मित्रों ने, शकूर की मदद करने की, उसकी सद्भावना का सम्मान करते हुए उसे राय दी कि वह सबसे पहले इस सन्दर्भ में राजस्थान के प्रांतीय गृह-मंत्रालय में गृहमंत्री के नाम आवेदन पत्र भेजे और धैर्य के साथ वहाँ से जवाब आने की प्रतीक्षा करे I यह कोई आसान और छोटा-मोटा काम तो है नहीं I प्रत्येक विभाग, हर मंत्री, हर अधिकारी अपने-अपने स्तर पर सोच-विचार करेगें, समय लेगें, मतलब कि धीरे-धीरे ही बात आगे बढ़ेगी, सो शिवराम को भरपूर सब्र से काम लेना होगा I सब के साथ बातचीत करके शिवराम का मनोबल बढ़ा और वह अनेक बाधाओं व उलझनों से भरी इस नेक जंग के लिए मन ही मन तरह तैयार हो गया I इस काम को अंजाम देने के लिए दोस्तों और घरवालों के साथ सोच-विचार करने में सारा दिन निकल गया I किन्तु रात होने तक शिवराम कृत-संकल्प होते हुए भी, त्रिशंकु सी मन:स्थिति में आ गया I अंतर्द्वंद्व में उलझा शिवराम बिस्तर पर लेटा तो, वह सोच के एक नए दरिया में बह चला I शिवराम का दिल शकूर की सहायता के लिए उद्यत था तो, दिमाग उसे राजनीतिक, सामाजिक और मज़हबी आक्षेपों और कटाक्षों के निर्दयी प्रहारों के प्रति सचेत कर रहा था I मस्तिष्क के वार उसके नेक इरादे की धज्जियाँ उड़ा रहे थे I इस तर्क-वितर्क में उसे शकूर को अपनाने की सद्भावना से भरी अपनी सोच बेमानी नज़र आने लगती I हिन्दू और मुसलमानों - दोनों ही पक्षों द्वारा तरह-तरह की आपत्ति का भय उसके दिल में हलचल मचाने लगता तो कभी सरकारी महकमों द्वारा असहयोग की राजनीति, मंत्रियों व नेताओं के शक-ओ- शुबह और दिल को छलनी करने वाले, उस पर उछाले गए तरह-तरह के भावी सवाल हमला करने लगते I वह लगातार करवटें बदल रहा था I फिर उसने उठकर एक - दो घूँट पानी पिया I पास ही बिस्तर पर लेटी पत्नी की आँखें मुदीं थीं, फिर भी वह शिवराम की बेचैनी को लगातार देख रही थी I जब इस उधेड़ - बुन में बहुत देर हो गई तो वह शिवराम के नेक इरादे को मजबूती देती बोली –
‘अब सो भी जाओ, क्यों इतना परेशान होते हो !! ईश्वर का नाम लेकर कल से कार्रवाई शुरू करो I तुम तो पुण्य का काम करने जा रहे हो, कोई पाप तो कर नहीं रहे हो, फिर इतना क्या सोच रहे हो और अपनी तकलीफ बढ़ा रहे हो ? ‘
शिवराम बोला – ‘दुनिया की सोच रहा था कि कहीं लोगों ने मज़हब और देश के नाम पर मेरे इरादे पर बेबात छींटाकशी करी या आपत्ति जताई तो.......’
शिवराम की बात बीच में ही काट कर पत्नी बड़ी सहजता के साथ बोली –
‘अच्छे - भले काम में दुनिया साथ दे ना दे, लेकिन ऊपर वाला ज़रूर साथ देगा और जब सर्वशक्तिमान तुम्हारे साथ होगा तो कैसा डर, कैसी चिंता......??? दुनिया तो हमेशा से बिखेरती और कोंचती आई है, सो उसकी परवाह करोगे तो लीक से नहीं हट पाओगे, लकीर ही पीटते रह जाओगे I ’
शिवराम की पत्नी ने घंटों से बेचैन शिवराम की उलझन को मिनटों में सुलझा कर, उसे दृढ संकल्प का मंत्र दे डाला और उसे डाँवाडोल मन:स्थिति से बाहर निकाल लिया I

सुबह उठते ही शिवराम ने भारत - पाक सद्भावना के तहत प्रांतीय(राजस्थान) गृह-मंत्रालय को रजिस्टर्ड पोस्ट से एक पत्र भेजा और बेताबी से उत्तर की प्रतीक्षा करने लगा I गृह-मंत्रालय की ओर से संभावित प्रश्नों के लिए भी अपने को तैयार करता जा रहा था I एक सप्ताह बीता, दूसरा सप्ताह भी जैसा आया था, वैसा ही चला गया I शिवराम को लगा कि अब तीसरे सप्ताह में उसे अवश्य कुछ न कुछ जवाब ज़रूर मिलेगा , लेकिन आशा के विपरीत, वह सप्ताह भी यूँ ही निकला गया I शिवराम को निराशा घेरने लगी I उसे लगने लगा कि अच्छे-भले काम में संबंधित आला अफसर, पाकिस्तान के साथ शान्ति और सद्भावना वार्ता करने वाली सरकार, कोई भी मदद करने वाला नहीं है क्योंकि वह एक ‘आम’ आदमी है I वे अधिकारी-गण पडौसी देश के परित्यक्त और निर्दोष युवक को ज़िंदगी जीने का हक देने के लिए उसके द्वारा उठाए गए सद्भावना पूर्ण कदम में सहयोग देने के स्थान पर, उसे पीछे हटाने की जोड़-तोड़ में लगा जाएंगें I तभी शिवराम ने अपने से सवाल किया कि वह अभी से इतना निराश क्यों हो रहा है I उसे धैर्य से इंतज़ार करना चाहिए I सरकारी कार्यालयों में और वह भी मंत्रालय में एक उसी के आवेदन पत्र पर कार्यवाही करने के लिए थोड़े ही नियुक्त वहाँ के अधिकारी I उनके पास तो पूरे देश की अनेक समस्याओं, माँगों, आवेदनों और शिकायती पत्रों की भरमार होगी I यह सोचकर उसका दिल थोड़ा सम्हला और आशा की लौ ने उसके अंतस में मध्दम- मध्दम उजाला भरना शुरू किया I तीन हफ्ते बीत चुके थे I महीने का अंत था I तभी मंगलवार को शिवराम को गृह-मंत्रालय द्वारा भेजा हुआ पत्र मिला जिस पर शानदार अक्षरों में उसका पता अंकित था I गृह-मंत्रालय का लिफाफा देखने भर से उसकी खुशी का ठिकाना न रहा I अपनी खुशी को समेट कर, उसने जोश के उदगार से छलकते हुए, पत्र खोल कर पढना शुरू किया तो अपने मन को कसते हुए, दो-तीन बार उसके एक- एक अक्षर और वाक्य को बड़े ही ध्यान से पढ़ा I गृहमंत्री की ओर से उनके सचिव का पत्र था I शिवराम को मंत्री जी से मिलकर बात करने का दिन और निश्चित समय दिया गया था I शिवराम पत्र पढते ही अपने मित्रों से मिलने, ज़रूरी सलाह लेने के लिए उठ खडा हुआ I उसकी पत्नी ने किसी तरह उसे रोक कर, दोपहर का भोजन कराया I दो दिन बाद शुक्रवार को उसे सुबह ग्यारह बजे मंत्री जी से भेंट करनी थी I किसी मंत्री से पहली बार वह इस तरह व्यक्तिगत मुलाक़ात करने जा रहा था I वह शुक्रवार को निश्चित समय पर गृह-मंत्रालय पहुँचा और बेताबी से अपने अंदर बुलाए जाने की प्रतीक्षा करने लगा I थोड़ी देर बाद उसका बुलावा आया और वह धडकते दिल से उनके भव्य वातानुकूलित कमरे में पहुँचा I प्रवेश करते ही, शिवराम के हाथ-पाँव ए.सी. से कम, उसकी खुद की खुशी के उछाह से अधिक ठन्डे हो रहे थे I मंत्री जी ने सबसे पहले उसकी सद्भावना की और उसे क्रियान्वित करने के इरादे की सराहना करी I फिर एक खुफिया सा सवाल दागा –

‘उस युवक की क्या मदद करना चाहते हैं आप ? यह काम आप सरकार या गैर-सरकारी सामाजिक संस्थाओं भी पर छोड़ सकते हैं I’
यह सुनकर शिवराम ने विनम्रता से कहा – ‘सर, यदि उन्हें उस अनाथ बच्चे की मदद करनी होती तो, वे अब तक कर चुके होते I दोबारा जेल में रहते उस बेचारे लडके को एक साल से ऊपर हो गया है I मुझे तो किसी भी ओर से उसकी मदद के कोई आसार नज़र नहीं आते I सर, मै तो एक बेघर को घर देना चाहता हूँ, उस मासूम इंसान को ‘पहचान’ देकर ज़िंदा रखना चाहता हूँ - जिससे उसके अपने ही देश ने ‘पहचान’ छीन ली है I

मंत्री जी ने फिर पेचीदा सी बात छेडी – ‘हो सकता है कि वह लड़का गुनहगार हो शायद इसलिए ही इस्लामाबाद की ओर से मनाही आ गई I’

जानकारी का और खुलासा करता शिवराम थोड़ा भावुक हुआ बोला –
‘नहीं सर ऐसा नहीं है I नामी अखबार की प्रामाणिक और पुख्ता खबर है कि वह युवक बी.एस.एफ. द्वारा बेगुनाह घोषित किया गया है और जब पाकिस्तान हाईकमीशन ने शकूर को वापिस पाकिस्तान भेजने के लिए इस्लामाबाद से सम्पर्क स्थापित किया तो, वहाँ के अधिकारियों ने शकूर की बेगुनाही के इनाम में, उसे बेमुल्क और बेघर बना दिया I जब उसकी मदद करने के लिए अब तक कोई आगे नहीं आया, तो इंसानियत के नाते जीने का हक़ दिलाने की भावना से मैं उसे अपनाना चाहता हूँ और उसकी हर संभव मदद करना चाहता हूँ I सर, इसमे गलत ही क्या है अगर हालात की मार से जीवन से मुँह मोडे उस बेघर को मैं जीने के लिए थोड़ी सी ज़मीन और थोड़ा सा आसमान देने की इच्छा रखता हूँ तो .......!!
इसके उपरांत मंत्री जी ने इस कार्य में आड़े आने वाली बाधाओं का भी व्यावहारिक दृष्टि से ज़िक्र किया I शिवराम तो हर बाधा का सामना करने के लिए कृत-संकल्प था ही I वह विनम्रता से मंत्री जी से बोला –
‘सर, मैं हर मुसीबत, हर बाधा को झेलने को तैयार हूँ, बस आप इस मामले में अपने स्तर पर मेरी अपेक्षित मदद कर दीजिए, मैं ह्रदय से आपका आभारी होऊँगा I

मंत्री जी ने शिवराम के संकल्प को देख कर कहा – ‘ठीक है, मैं केन्द्रीय गृह-मंत्रालय के लिए एक पत्र आपको दिलवाता हूँ और दिल्ली फोन करके भी गृह-मंत्री के सचिव से हर संभव मदद करने के लिए कह दूँगा I प्रक्रिया लंबी और जटिल होगी, इस बात को आप मान कर चलें I’
शिवराम ने आश्वस्ति से सिर हिलाया और धन्यवाद देकर मंत्री जी से मिलने वाले पत्र की प्रतीक्षा में अतिथि कक्ष में जाकर बैठ गया I
थोड़ी ही देर में शिवराम को, मंत्री जी के पी.ए. द्वारा दिल्ली के लिए पत्र मिला और यह भी सूचना मिली कि bिव arे पादेकर मंत्री जी से मिलाउसकी एक प्रति फैक्स द्वारा केन्द्रीय गृह-मंत्रालय, दिल्ली को भी भेज दी गई है I
शिवराम ने घर लौट कर, तुरंत दिल्ली, अपनी ममेरी बहन को, फोन मिलाया और अपने दिल्ली पहुँचने के प्रोग्राम के बारे में सूचित किया I दो दिन बाद जब वह दिल्ली पहुँचा तो, उसने सबसे पहले मंत्रालय फोन मिला कर अपने पत्र के सन्दर्भ में केन्द्रीय गृह-मंत्री के पी.ए. से मंत्री जी से मिलने का समय माँगा तो पता चला कि वे तीन दिन के आफिशियल दौरे पे बाहर गए हुए थे I अत: उसे चौथा दिन मुलाक़ात करने के लिए दिया गया I शिवराम इस तरह की प्रतीक्षाओं के लिए तैयार होकर आया था I इंतज़ार की घडी बीती और वह दिन भी आ पहुँचा, जब वह मंत्री जी से मिलने रवाना हुआ I जब शिवराम मंत्रालय पहुँचा तो मंत्री जी ने शिवराम से ज़रूरी बातचीत के बाद, अपने पी.ए, द्वारा जैसलमेर पुलिस अधीक्षक के नाम एक आदेश पत्र इश्यू करवा कर शिवराम को दिया कि उसे शकूर से मिलने की इजाज़त दी जाए I
आगे की कार्यवाही के बारे में सोचता, खुशी और उत्साह से भरा शिवराम जैसलमेर लौटा और बिना किसी की देरी के अगले ही दिन जैसलमेर पुलिस अधीक्षक से केन्द्रीय गृह-मंत्रालय का अनुमति पत्र दिया तो पुलिस अधीक्षक महोदय ने उसकी भावना की सराहना करते हुए, जेलर को आदेश दिया कि शिवराम को शकूर से मिलवाया जाए I आदेश पाते ही तुरंत दो सिपाही कैदखाने से शकूर को लेने गए I शिवराम ने देखा कि सामने से एक दुबला-पतला, उठते कद का, गेहुएं रंग वाला , लगभग बीस-बाईस साल का युवक धीरे-धीरे थके कदमों से चला आ रहा था I पास आने पर शिवराम ने देखा कि उसके भोले-मासूम चेहरे पर सन्नाटे से भरी आँखें, जीवन के प्रति उसकी निराशा साफ़-साफ़ बयान कर रहीं थीं I अकेलेपन और भय का एक मिश्रित भाव उसके निरीह व्यक्तिव में सिमटा हुआ था I शिवराम और पुलिस अफसर को शकूर ने भयभीत नज़रों से देखा I शकूर मन ही मन डरा हुआ था कि अब न जाने उसे कौन सी नई सज़ा उसे मिलने वाली है I वह कुछ भी समझ पाने में असमर्थ था I शिवराम ने पुलिस अधिकारी की अनुमति से, शकूर के नज़दीक जाकर, प्यार से पूछा –

‘बेटा, इस कैद को छोड़ कर, मेरे घर रहना चाहोगे ? मैंने अखबार में तुम्हारे बारे में पढ़ा था कि तुम बेकुसूर हो और तुम्हारा इस दुनिया में कोई नहीं है I पाकिस्तान हाईकमीशन की रिपोर्ट के मुताबिक़ इस्लामाबाद ने भी तुम्हें पाकिस्तानी मानने से इन्कार कर दिया है I’
शिवराम की बात खत्म होने से पहले ही, एक लंबे समय के अंतराल के बाद प्यार और सहानुभूति के मीठे बोल सुनकर, अम्मी-अब्बू से बिछड़े शकूर की आँखें झर-झर बरसनी शुरू हो गई I शिवराम ने देखा कि शकूर के चहरे पर इतनी वेदना तैर आई थी कि उसे लगा कि उसकी आँखों से आँसू नहीं मानो दर्द बह रहा था I शिवराम का दिल भर आया I उसने ममता से भर, जैसे ही उसके सिर पर हाथ फेरते हुए ढाढस बंधाना चाहा, प्यार की उष्मा से भरे स्पर्श को पाकर, शकूर फफक पड़ा I बेरहम कैद से निकल कर सुकून भरी जिंदगी की चाह को वह टूटे-फूटे शब्दों में सुबकते हुए बाँधता ही रह गया, पर उसके विकल मन की बात उसकी सिसकियों और हिचकियो ने कह दी I उस दिन तो शकूर के आँसुओं पर पुलिसवालों का कठोर दिल भी पसीज उठा था I अब शिवराम से न रहा गया और उसने अनाथ शकूर को गले से लगा लिया I शकूर को लगा मानो एक साथ हज़ारों चाँद उसकी रूह में उतर आए हैं I वह बेहद ठंडक और इत्मिनान से भर उठा I शिवराम ने शकूर को समझाते हुए कहा –
‘देखो मैं तुम्हारी मदद तभी कर सकता हूँ बेटा, जब तुम भी ज़िंदगी जीने के अपने अधिकार की माँग करो और मुझ पर भरोसा करके मेरे साथ रहने की इच्छा ज़ाहिर करो I तुम्हारी रजामंदी के बिना मैं कुछ नहीं कर सकूँगा, समझे !’
शकूर जो अब तक भावनात्मक ज्वार से काफी हद तक उबर चुका था, शिवराम का हाथ अपने हाथ में लेकर अपूर्व आत्मविश्वास के साथ बोला – ‘मेरी रजामंदी सौ फी सदी है, और अपनी इस ख्वाहिश को मैं बेझिझक सबके सामने ज़ाहिर करने को, कहने को तैयार हूँ I आपका यह एहसान मैं ज़िंदगी भर नहीं भूलूँगा I’
शिवराम बोला – ‘बेटा, यह मैं तुम्हें किसी तरह के एहसान के नीचे दबाने के लिए नही कर रहा हूँ, सिर्फ अपना इंसानी फ़र्ज़ निबाह रहा हूँ I मैं आस्तिक हूँ, पर रोज मंदिर नहीं जा पाता, घंटियाँ नहीं बजाता, फिर भी तुम जैसे बेसहारा और हताश लोगों का कष्ट दूर कर ऊपर वाले का आशीर्वाद व दुआएँ लेना ही, ईश्वर की सबसे बड़ी भक्ति मानता हूँ I इसमें एहसान की कोई बात नहीं, बेटा I ’
यह कह कर शिवराम मुस्कुराया और शकूर की हौसला बुलंदी करने लगा I इसके बाद शिवराम ने शकूर को आश्वासन दिया कि वह यहाँ से जयपुर पहुँच कर वकील से कानूनी सलाह लेगा और अपेक्षित कार्यवाही करेगा I वह जल्द ही उसे कैद से छुड़ाएगा I शकूर शुक्रगुजार नम आँखों से शिवराम को तब तक देखता रहा, जब तक वह उसकी आँखों से ओझल नहीं हो गया..

शिवराम ने जयपुर पहुँचते ही सबसे अच्छे वकील को तय किया और शकूर को भारत की नागरिकता दिलाने की कोशिश शुरू कर दी I वकील ने शकूर को भारतीय नागरिकता दिलाने के तीन पुख्ता आधार कोर्ट में रखे –
१) सबसे महत्वपूर्ण कारण जो शकूर द्वारा भारत की नागरिकता पाने के हक में बनता था - वह था - इस्लामाबाद द्वारा उसे ‘पाकिस्तानी’ न मानकर, परित्यक्त कर देना और उसका देशविहीन (स्टेटलेस) हो जाना I
२) दूसरा कारण था - बी .एस.एफ. द्वारा शकूर को निर्दोष घोषित किया जाना,
३) तीसरा दृढ आधार था कि पूरे पाँच साल तक शकूर का भारत की धरती पर रहना I

शकूर हिन्दुस्तानी था नहीं, पाकिस्तान ने उसे अपना मानने से इन्कार कर दिया I ऐसे में सामाजिक, राजनीतिक, राष्ट्रीय अस्तिवहीनता और पहचान के अभाव में शकूर एक शून्य अस्तिस्व के दायरे में माना गया I इन हालात में उसे किसी भी देश की और खासतौर से उस देश की नागरिकता लेने का अधिकार बनता था, जहाँ वह अपनी ज़िंदगी के कीमती पाँच साल गुज़ार चुका था I ‘यूनाइटेड नेशंस चार्टर’ के मुताबिक भी दुनिया के हर इंसान को, मूलभूत अधिकारों के तहत, एक देश पाने का हक है I शकूर का अस्तित्व, उसके अपने ही देश ही द्वारा खत्म किया गया था, इस स्थिति में अगर कोई दूसरा देश उसे मानवाधिकार की दृष्टि से अपनाता है, तो यह उसे जीने का हक दिलाने का ऐसा कार्य था जिस पर किसी भी दृष्टि से कोई भी आपत्ति नहीं कर सकता I वैसे भी अगर कोई इंसान युध्द, विस्थापन, राजनीतिक व सामाजिक आदि किसी कारण से ‘देशविहीन’ हो जाता है तो इसका तात्पर्य है – ‘अस्तित्वविहीन’ हो जाना I यह अस्तित्वविहीनता उसके मूलभूत अधिकारों का हनन है I इस मुद्दे पर शिवराम द्वारा कानून की शरण लेने पर और उसके वकील द्वारा पुख्ता आधार और सकारात्मक मान्य तथ्यों को क़ानून की धाराओं के तहत कोर्ट में प्रस्तुत करने पर, भारत सरकार ने भी भारतीय मूल्यों और मानवता को दृष्टि में रखते हुए, इस विषय पर संवेदनशीलता से गौर करके, साथ ही शिवराम द्वारा शकूर को गोद लेने के प्रस्ताव को ध्यान में रखते हुए , शकूर को भारतीय नागरिकता दी I

नागरिकता मिलने के बाद, शकूर भारत में रहने के लिए स्वतन्त्र था I शिवराम ने उसे एक सुरक्षित और अधिक से अधिक सुविधाओं से भरा जीवन देने की इच्छा से बाकायदा कानूनी ढंग से गोद लिया, जिससे पढ़-लिख कर, नौकरी पाने तक, फार्मों में माता-पिता या अभिभावक के कालम भरते समय शकूर की कलम न रुके और वह बेखटके ऐसे कालमों में शिवराम का नाम लिख निश्चिन्त हो सके I इस तरह अपनी सारी ऊर्जा, शक्ति और समय जीवन को आगे ले जाने में लगाए I मन के रिश्तों में बंधा शकूर, शिवराम के रूप में एक पिता को पाकर मानो फिर से जीवित हो उठा था I वह कभी-कभी सोचता कि वह भूल से हिन्दुस्तान की सरहद के पार, क्या एक नया घर पाने आया था.....शिवराम के रूप में पिता पाने आया था ? इतना तो उसके अपने देश में भी किसी ने उसके लिए नहीं सोचा.....!! अच्छे और नेक इंसान हर जगह हैं – हिन्दुस्तान हो या पाकिस्तान I बस उन्हें पहचानने वाली नज़र और उनके सम्पर्क आने वाली बुलंद किस्मत चाहिए I उसने लंबी श्वास भरते हुए दुआ करी कि काश ! दोनों देशों के बीच मुहब्बत और अपनापन इसी तरह उमड़े, जैसे कि मेरे और शिवराम बाबू जी के बीच उमडा है I




Sunday, July 18, 2010

लघु कथाएँ

‘ निरुत्तर ’

बच्ची – अब्बू ! हिन्दू-मुसलमान क्या होता है ?
अब्बू – क्यों, किसी ने कुछ कहा क्या बेटा तुमसे ?
बच्ची – नहीं, हमने फूफी से कहा कि हम अपना नाम ‘सीता’ रखेगें तो फूफी ने कहा कि हम यह नाम नहीं रख सकते क्योंकि हम मुसलमान हैं I
अब्बू – (बच्ची के सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए) सायरा बेटा ! हम तुम्हारा एक बहुत ही नायाब नाम रख देते हैं - ‘नफीसा’. कैसा लगा तुम्हें ?
बच्ची – अब्बू ! यह नाम हिन्दू है या मुसलमान ?
अब्बू नन्हें मुख से इस भारी सवाल को सुनकर ‘निरुत्तर’ रह गये I


‘बड़ा शहर ’
बेटा - माँ-बाबा ! आप मेरे साथ शहर में रहने क्यों नहीं चलते ?
माँ-बाबा – हम यहाँ खुश हैं बेटा I घर के सारे आराम हैं, अमन चैन है I
बेटा – फिर भी माँ-बाबा, आप एक बार चल कर तो देखिए कि आपका बेटा कितने बड़े ‘महानगर’ में रहता है, कंपनी ने कितना बड़ा घर दिया है I दरवाजा खुलने से लेकर ए.सी और पंखा चलने तक, सारे काम ‘रिमोट’ का बटन दबाते ही हो जाते हैं I जादू है जादू बाबा ! कमरों से लेकर किचिन तक सारे काम मिनटों में….. I
माँ-बाबा – वो तो सब ठीक है बेटा, पर हमें यही रहने दो I
बेटा – पर क्यों माँ-बाबा ? मैं कुछ नहीं सुनूंगा; बस आपको चलना ही पडेगा...या फिर आप मुझे बताइए कि आपको वहाँ और क्या चाहिए, मैं वह भी आपको दूँगा I

बेटे के इसरार से चिंतित और शहर जाने से कतराते माँ-बाबा हौले से बोले –
बेटा ! तुम्हारे महानगर में ‘आकाश’ प्रदूषण से ढक गया है, ‘धरती’ पर कंकरीट का जंगल उग आया है, ‘जल’ में शहर की गंदगी घुल गई है, ‘हवा’ में कचरे की दुर्गन्ध बस गई है, बड़ी-बड़ी इमारतों में ‘घर’ कहीं खो गया है. तुम चाह कर भी वो पहले जैसा नीला आकाश, हरी भरी धरती, मीठा स्वच्छ जल, रिश्तों की गरमाहट से भरा घर कही से भी खोज कर नहीं ला सकोगे क्योकि इन सबको दफ़न हुए एक अरसा हो गया है......! और हम इन सबके आदी हैं I
यह सुनकर बेटे को पहली बार ‘बड़े शहर’ बौना लगा I


‘ बड़े लोग ’
नेता जी – भाईयों और बहनों ! आप मुझे वोट दीजिए और मैं आपके लिए वो करूँगा, जो आज तक किसी नेता ने नहीं किया I मैं आपको बड़े घर दूँगा, बड़ी सुख सुविधाएं दूँगा, आप ‘बड़े लोगों’ की तरह शान से जीवन जिएगें I मैं आपके जीवन को खुशियों से भर दूँगा, ऐशो-आराम से भर दूँगा और..
भीड़ में से एक फक्कड तीरंदाज़ बोला - और, और, और.....‘भष्टाचार’ से भर दूंगा...!
इस शरारती, पर सही ‘उदघोष’ पर भीड़ ने ठहाका लगाया और देखा कि सामने माइक पे खड़े नेता महाशय और उनके साथी भी ‘खिसियाए ठहाके’ लगा रहे थे I
आँखें
वे आँखें महागाथा सी, लंबी कथा सुनाती
निशब्द, किताबी आँखें वे, कितना कुछ कह-कह जाती

उलझे विचार सी लगती, कभी संवेदना बन जाती
कभी बादल की तरह उमडती, कभी नज़र चिंगारी आती
वे आँखें महागाथा सी, लंबी कथा सुनाती..

कभी किलकती शिशु सी, कभी यौवन सी इठलाती
जीवन संध्या जीने वालों सी, कभी एकाकी हो जाती
वे आँखें महागाथा सी, लंबी कथा सुनाती...

कभी कथानक, कभी संवाद, अनगिनत चरित्रों का संसार
पहुँच चरम सीमा पे वे, कभी अमर सन्देश बन जाती
वे आँखें महागाथा सी, लंबी कथा सुनाती...

उठती, झुकती, मुस्काती, कभी इन्द्रधनुष बन जाती
नवरस छुपाए कोरो में, दर्द के कतरे छलका जाती
वे आँखें महागाथा सी, लंबी कथा सुनाती
निशब्द, किताबी आँखें वे, कितना कुछ कह-कह जाती

A View of Lansdowne


Church during Snow Fall


Lansdowne : ' Saint Mary's Church'





टूटे हुए आशियाने के अटूट रिश्ते


मेरे बच्चों की दादी, मेरी सास, जिन्हें मैं ‘अम्मा’ बुलाती थी, हांलाकि आज दुनिया में नहीं हैं, लेकिन दुःख, निराशा, हताशा के पलों में आज भी मेरा संबल बन, वह मेरे ज़हन में उतर आती हैं और मुझे हताशा के पलों से बाहर निकाल कर, प्यार से दुलार कर, एक लंबे समय के लिए स्फूर्ति व उत्साह से भर जाती हैं I हमारे घर में ’टूट कर’ भी ‘अटूट’ बने रहने वाले रिश्तों की कुछ ऎसी अनोखी परम्परा रही है जो पीढ़ी दर पीढ़ी चलती रही I आज मैं उन्हीं अटूट रिश्तों की डोर में बंधी, उन्हें याद करती, अपनी प्यारी ‘अम्मा’ (सास) के बारे में बड़ी शिद्दत के साथ वो सब लिखने जा रही हूँ जो मेरे जीवन की कीमती पूंजी है I मुझे लगता है कि हर निश्छल इंसान ‘अपनों’ से, दिल से नही, वरन आत्मा से जुडा होता है क्योंकि किसी कारणवश चोट लगने पर, दिल के रिश्ते एकबारगी मिट सकते है, पर ‘आत्मा’ में बसे रिश्ते न कभी मरते है और न कभी मिटते है I कुछ ऐसा ही आत्मिक रिश्ता था मेरा ‘अपनी अम्मा’ के साथ I
अक्सर देखा गया है कि जीवन में चोट खाया, धोखा खाया इंसान इतनी कडुवाहट और प्रतिशोध से भर जाता है, इतनी अधिक नकारात्मकता उसमें घर कर जाती है कि वह दूसरों को सताने में आनंद लेने लगता है I लेकिन अम्मा ने इस मिथ को तोड़ कर एक ख़ूबसूरत मिसाल कायम की थी I
१९३८ में अम्मा और पापा का अंतर्जातीय विवाह हुआ था I पापा आर्मी में मेजर डाक्टर थे I उन दिनों वे हिम्मतनगर पोस्टेड थे I अम्मा की बड़ी बहन, जिन्हें हम सब ‘डा.मौसी’ बुलाते थे;वे भी हिम्मतनगर पोस्टेड थीI इन्ही ‘डा.मौसी’ के पास अम्मा उन दिनों रह रही थी I बंबई यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन करके, वे पढाने भी लगी थीं I पापा से अम्मा का परिचय एक परिवार के माध्यम से हुआ था I पापा, अम्मा और उनके परिवारजनों से अक्सर मिलने आते, खूब बातचीत, गाना, खाना होता I पापा और अम्मा में से किसी को भी यह एहसास नहीं था कि उनकी यह जान पहचान आने वाले समय में शीघ्र ही प्यार में बदल जाएगी I होनी
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को कौन टाल सकता है !! ‘आज’ ‘आने वाला कल’ बन जिस गति से आगे बढ़ रहा था, उस गति से ही अम्मा और पापा एक दूसरे के निकट आते जा रहे थे और एक दिन दोनों ने पाया कि वे अंतरंग मित्रता के घेरे में आ चुके हैं I पापा अम्मा के पीछे –पीछे छाया की तरह घूमते थे I अम्मा का लगाव भी कम सघन नहीं था किन्तु वह संस्कारों की शालीनता और सहज लज्जा भाव का झीना आवरण ओढ़े रहा I हिम्मतनगर से पापा की पोस्टिंग कहीं और होने का समय पास आ रहा था, सो दोंनो ने अंतत: शादी का फैसला लिया I दोनों विवाह के बंधन में ज़रूर बंधे, पर घर वालों की मर्ज़ी के खिलाफ जाकर I अम्मा के ‘आई-बाबा’ तो फिर भी एक दफे को तैयार से थे लेकिन‘आजी’ उनकी शादी मराठी परिवार में ही करना चाहती थीं I ऐसा नहीं कि ‘आजी’ को पापा मे कोई कमी नज़र आती थी I उनका आकर्षक व्यक्तित्व, सुख-सुविधाओं और सम्मान से भरा आर्मी में ‘मेजर डाक्टर’ का ओहदा, अति धनाढ्य व शिक्षित खानदान जिसमें पुश्तैनी ‘ज़मीन जायदाद’ के साथ ‘डाक्टरी’ का पेशा भी पुश्तैनी था, वे सब बातें उन्हें ‘सुयोग्य वर’ की श्रेणी में रखती थी I पापा, पापा के पिता, दादा, पडदादा सभी डाक्टर, सी.एम.ओ. रहे थे; एक ऐसा व्यवसाय, जिसमें आदमी रिटायर होकर भी, कभी रिटायर नहीं होता I ‘आजी’ को एतराज़ था तो बस इस बात पर कि लड़का ‘दूर देश’ का है यानी के उत्तर प्रदेश का I लेकिन ‘मियाँ बीवी राजी तो क्या करती आजी’’.......सो अम्मा-पापा ने पहले तो सबको मनाने की बहुत कोशिश की, लेकिन जब बात नहीं बनी तो कोर्ट मैरिज कर ली I
शादी करके जब डा. मेजर पति के साथ अम्मा आधुनिकता से अछूते १९३८ के उस युग में परम्पराओं और रीतिरिवाजों में सख्ती से बंधे उ.प्र. के छोटे से शहर में पहुंची तो, घर भर से लेकर बाहर तक के लोगों के लिए वे एक अजूबा थी क्योंकि वे सिर को पल्ले से नहीं ढकती थी I सास, ससुर, जेठ, जिठानी, ननद, ननदोई सबके आगे वे खुले सिर उठती बैठती, उनकी भरपूर आवभगत, सेवा टहल करती, लेकिन सिर पे पल्ला रखना या पर्दा करने जैसी परम्परा से वे कोसों दूर थी I उस ज़माने में उ.प्र. में शादी शुदा दुल्हिन बड़ों के आगे, खासतौर से बजुर्ग पुरुषों के सामने सिर न ढके तो यह उस घर, उस परिवेश की संस्कृति को मानो चुनौती देना था I पर सीधी, सरल अम्मा तो उस परिवेश,घर और वहाँ की संस्कृति, सभ्यता, रीति-रिवाज़ को चुनौती देने की सपने में भी नहीं सोच सकती थीं I क्योकि वे इस तरह के स्वभाव की थी ही
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नहीं I वे सिर पर पल्ला सिर्फ और सिर्फ इस भावना के कारण नहीं लेती थी क्योकि मराठी संस्कृति और मूल्यों से पोषित उनका मन ऐसा करने की गवाही नहीं देता था I जैसा कि महाराष्ट्र में विधवा स्त्री सिर ढकती है और सधवा सिर खुला रखती है; सो वे अपने पति को किसी भी तरह के अमंगल से बचाने की भावना से सिर पर पल्ला नहीं लेती थीं I आधुनिक या आर्मी आफिसर की पत्नी होने का थोथा भान अथवा नए परिवेश की संस्कृति, परम्पराओं और रीतिरिवाजों से मोर्चा लेने जैसा क्रूर इरादा उन्हें छू तक नहीं गया था I पति की लंबी उम्र, जीवन की सुरक्षा की मंगल कामना के कारण सिर ना ढकने की अम्मा की इस भावना का स्वागत किया उनकी सास यानी मेरी ददिया सास ने I उन्होंने सख्ती से सबका विरोध करके, अम्मा का पक्ष लिया और तब से अम्मा बिना किसी भय और कुंठा के सिर खुला रखा सकी I
महाराष्ट्र के देशस्थ ब्राहमण परिवार की सीधी - सरल, पढ़ी-लिखी अम्मा जब अपने मधुर कंठ से गाना गाती तो, सब सुनते न थकते I इसके अलावा उनका एक और रूप था I लान टेनिस, टेबिल टेनिस खेलना और यदा कदा, मौक़ा मिलने पर घुडसवारी भी करना I बीते ज़माने में कम ही महिलाएं लान टेनिस खेलती होगी और घुडसवारी करती होगी I ये सब उनके जीवन में सामान्य और सहज गतिविधियों के रूप में शामिल था I वे उलटे पल्ले की साडी पहनती और छोटे से पल्लू को टिपिकल मराठी अंदाज़ में दांए कंधे पर इस तरह टिकाती कि पल्लू कंधे से लटकते हुए भी ज़रा सा भी इधर से उधर न होता I रोली कुंकुम की बिंदी लगाती और उसी से थोड़ी सी मांग इस तरह भरती कि कुंकुम मांग से ज़रा सी बाहर माथे पे भी नज़र आती I रोली की मांग और बिंदी में ही उनका सोलह श्रृगार सिमटा था I मैंने उनको न कभी छोटा मोटा जेवर पहने देखा और न इससे अधिक श्रृगार करते देखा I अपनी सादगी में ही वह बड़ी मोहक और गरिमापूर्ण लगती थीं I

पापा की जहां-जहां पोस्टिंग होती, अम्मा हर पल हर कदम पे उनके साथ होती, यहाँ तक कि पापा के साथ उनके मरीजों की देखभाल में अक्सर शौकिया मदद भी करती I इसी बीच वे दो बेटों की माँ बनी I इसी दौरान कुछ घरेलू समस्याएँ भी उठ खडी होने के कारण, पापा ने अपनी

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माँ के (मेरी दादी सास) के कहने पर आर्मी से रिटायरमैंट ले लिया और अपने पुश्तैनी घर लौटकर, अपना एक ‘नर्सिंग होम’ खोला I
अम्मा को अपनी ससुराल में किसी भी तरह की समस्या नहीं थी सिवाय के ‘भाषा ‘ के I वे मराठी और अंग्रेजी तो धाराप्रवाह बोलती थीं, लेकिन हिन्दी उनकी कमजोर थी I अपने हिन्दी ज्ञान पर उन्हें कतई भरोसा नहीं था I जबकि संस्कृत के श्लोक बड़े अच्छे कंठस्थ थे उन्हें I हिन्दी कामचलाऊ बोल लेती थी लेकिन अपनी बात हिन्दी के शब्दों की जानकारी के अभाव में पूरी तरह ठीक से अभिव्यक्त नहीं कर पाती थीं I यों हिन्दी गाने वह बड़े अच्छे गाती थीं क्योकि गीत सुनकर उन्हें हूबहू वैसे ही कोई भी गा सकता है लेकिन जब अपने आप से हिन्दी के वाक्य बनाकर कहने की बात आती, तो अम्मा ठीक से अभिव्यक्त करने में असमर्थ ही रहतीं I हिन्दी लिखना तो बहुत दूर की बात थी I इसलिए उन्होंने जब भी मुझे खत लिखे तो हमेशा अंग्रेजी में क्योकि मुझे मराठी नही आती थी और उन्हें हिन्दी, सो पत्राचार की हम दोनों के बीच कामन भाषा अंग्रेजी रही I इस भाषा समस्या ने उनके जीवन का गणित ही बदल दिया I वो इस तरह कि पापा के समय से पहले रिटायरमेंट लेकर अपने पुश्तैनी घर में आकर बसने पर अम्मा की दोस्ती एक लेडी डाक्टर से हो गई जिनके साथ वे भाषा के बंधन से मुक्त होकर अपने मन की बातों का आदान प्रदान अंग्रेज़ी में करती और इस तरह घरेलू ज़िंदगी से कुछ पल फुर्सत के पाकर, उन्हें पास ही लेडीज़ अस्पताल में शाम को घूमते हुए जाकर अपनी नई- नई सहेली से थोड़ी देर गप शप करके अच्छा लगता I लेकिन न जाने कौन से दुष्ट नक्षत्र – शानी या राहू-केतु की सीधी और तीखी नज़र इस दोस्ती पर पडी कि लेडी डाक्टर से अम्मा की दोस्ती कम और पापा की ज़्यादा होती गई I उन दोंनो के बीच दोस्ती के उस विशिष्ट ‘’अधिकाँश’’ को अम्मा जान ही न पाई I फलत; समय के साथ पापा की यह नई दोस्ती एक बार फिर प्यार में उसी तरह बदल गई जैसे कुछ वर्ष पूर्व अम्मा के साथ प्यार में पनपी थी I लेकिन वह प्यार तो जायज़ था क्योंकि उससे किसी का भी घर उजडने का अंदेशा नहीं था, पर इस बार यह ‘दूसरा’ प्यार, समाज और क़ानून को तो मैं बाद में गिनती हूँ, सबसे अधिक ‘इंसानियत’ की दृष्टि से नाजायज़ था क्योंकि इससे अम्मा और पापा का वैवाहिक जीवन उजडने वाला था I प्यार का ज्वर ऐसा उन आंटी और पापा पर चढ़ा कि न तो अम्मा की एक मात्र सहेली
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‘आंटी’ ने और न ही प्रेमी-पति ‘पापा ने अम्मा से लेकर परिवार तक, किसी की भी परवाह नहीं की और बरेली जाकर चुपचाप १९४८ में कोर्ट मैरिज कर ली I हर दृष्टि से सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, वैधानिक, यह शादी गलत ही नहीं बल्कि एक अपराध थी, लेकिन एक बार फिर ‘होनी’ होकर रही I कोर्ट मैरिज करके पापा अपनी दूसरी पत्नी को लेकर घर वापिस आ गए I इस अनहोनी के समय अम्मा उसी ‘हिम्मत नगर’ गई हुई थी; जहां पापा और वे कभी दस साल पहले, प्यार के और फिर विवाह के बंधन में बंधे थे I यह अपशकुनी खबर तीर सी अम्मा तक पहुंची और उन्हें अंदर तक लकवे की तरह जकड कर बेजान बनाती चली गई I क्योंकि वे अपने पति और सहेली, दोंनो पर ही ज़रूरत से ज़्यादा विश्वास करती थीं I उनका प्यारा रिश्ता अतिविश्वास की बलि चढ़ गया था I दिल के टुकड़े कर देने वाली खबर पा के उनके शब्द कहीं खो गए थे, गला आघात से रुंध गया था I वे कुछ बोल लेती, बोल कर अपनी पीड़ा, अपना क्रोध निकाल लेती तो अच्छा होता, पर वे ऐसा कर नहीं पाई I वे कई दिनों तक भावनाशून्य, किसी भी तरह की प्रतिक्रया रहित ऐसी जड रहीं कि उनके घरवाले सब डर गए कि कहीं वह हमेशा के लिए अपनी चेतना न खो बैठें I ईश्वर कृपा से, धीरे धीरे किस तरह निर्जीवता के फंदो से पल पल जूझती, आत्मिक शक्ति से अपने अंदर प्राणों को फूंकती, बच्चों को हर समय प्यार से अपनी बांहों में समेट-समेट कर मानो जीने की हिम्मत बटोरती, कभी उनकी भोली आँखों में जीवन का सुकून पाने की आशा संजोती, वे किसी तरह अपने को सम्हाल पाई I इसके बाद अंदर से बुरी तरह टूटी,चिटकी हुई अम्मा ने एक दिन अपनी सास को आंसू बहाते बहाते किसी से हिन्दी में खत लिखवाया कि ‘’अब वे वहाँ आना नहीं चाहती I पापा, वह घर, वहाँ के दरों-दीवार उनके लिए बेगाने हो गए हैं I सब कुछ छिन गया, अपनों ने ही छीन लिया I अब वहाँ उनकी जगह ही मिट गई, इसलिए वह वहाँ आकर क्या करेगी...!’
इधर पापा से उनकी माँ, बहने, भाई, बहनोई सभी नाराज़ और आहत बैठे थे I वे सब अम्मा का ऐसा दर्द भरा खत पढ़ कर और भी दुःख में डूब गए I सबने सोच विचार किया I टूटे घर को जितना संभव हो सके, उतना जोडने के लिए, अम्मा को बच्चों सहित ससम्मान घर वापिस लाने का फैसला लिया गया और बुआ व फूफा जी अम्मा को वापिस घर लिवा लाए I उसी घर में वापिस आकर, फिर से दूसरी नई ज़िंदगी जीने के लिए अम्मा ने जैसे ही कदम
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रखा, उनकी सास ने आगे बढकर, उन्हें अपने से चिपटा लिया I १९४८ में उनके इस नए जीवन का मज़बूत सहारा बनी - उनकी सास, जिन्होंने बेटे की ममता और प्यार सबसे ऊपर उठ कर,अपनी बहू को गले लगाकर इज़्ज़त से घर में रखा और मरते दम तक चट्टान की तरह अम्मा का सहारा बनी रहीं I इस तरह भावनात्मक, पारिवारिक, सामाजिक, जंग लड़ती-लड़ती, अम्मा पतिविहीन हुई, सास और बच्चों के सहारे पतिगृह में बिना ‘उफ़’ किए, अपने को सहज बना कर पापा से तहे दिल से वाबस्तगी बनाए हुए जीती रहीं I एक बार आंटी (दूसरी सास) और पापा में किसी बात पर लंबा मनमुटाव हुआ और फलत: आंटी उलटी, पेट दर्द से बेहाल हो, पलंग से लग गई I उस ज़रूरत के समय में अम्मा का ही दम ख़म था कि उन्होंने सब कुछ भुलाकर आंटी की दिनरात तब तक सेवा की जब तक वे पूरी तरह ठीक नहीं हो गई I सारे रिश्तेदार अम्मा द्वारा आंटी की जी जान से कि गई सेवा को देखकर चकित ही नहीं वरन सोच में डूबे थे कि वे इंसान हैं या कोई ‘देवी’....!!!देखते ही देखते अम्मा के दोनों बेटे बड़े हो गए और एक दिन दोंनों की बहुए भी घर आ गईं I अम्मा की दो बहुओं में, मैं छोटी थी और घर भर में छोटी थी I तो भारतीय परम्परा के अनुसार घर में जब भी कोई मेहमान आते, किसी तरह का उत्सव या त्यौहार होता, तो ‘महाराजिन’ के साथ खाने पीने, नाश्ते आदि की खास तैयारी के लिए सबसे छोटी होने के कारण मुझे उठना पडता I मैं तो अपनी पाक कला कि धाक जमाने के लिए खुशी - खुशी रसोई में जाती, पर अम्मा मेरा ख्याल करती, मेरे पीछे पीछे रसोई में आ जाती I मैं उनसे बहुत कहती कि वे चिंता न करें - मैं ‘महाराजिन’ के साथ मिल कर सब सम्हाल लूंगी , पर वे कहाँ मानने वाली; साथ ही लगी रहती I ऐसे ही जब कभी मेरी तबियत ज़रा सी भी खराब होती जैसे बुखार, खांसी जुकाम हो जाता तो वह मुझे आराम करने की सख्त हिदायत देकर, मेरे हिस्से के कामों को खुद सम्हाल लेतीं I कुछ बचे हुए काम नौकर के सुपुर्द कर, मेरे सिरहाने बैठ कर, माथे पे विक्स लगाती, सिर दबाती I जैसे यह सब करना उनका धर्म था I उनके इस ख्याल प्यार पर कई बार मेरी आँखें छलछाला आतीं I
अम्मा हद से ज्यादा सहनशील थीं I उनकी सहनशीलता देखकर मुझे ताज्जुब होता था I मेरी दादी सास बाद के सालों में लगातार बीमार रहने के कारण थोड़ी चिडचिडी सी हो गई थीं, इसलिए कभी-कभी अम्मा से ऊंचा बोल जाती थीं I लेकिन अम्मा कभी भी, ज़रा भी उनकी

तुनकमिजाजी पे खीझती नहीं देखी मैंने I हमेशा खामोशी से उनका काम करती रहती थी I इसी तरह एक दो बार ऐसा हुआ कि परीक्षा पास होने के कारण, मैं पढाई में लगी हुई होती थी, साथ-साथ घडी पे भी नज़र रहती है कि सबके लिए चाय बनानी है, घडी देखती जाती और अन्तिम पेज खत्म करने के चक्कर में ४-५ मिनट की देर हो जाती तो अम्मा मेरी परीक्षा और पढाई की चिंता करती, मेरे उठने से पहले चाय बना लेती और इतना ही नहीं, मेरे लिए कमरे में चाय लेकर भी आ जाती I इस तरह चाय का कप हाथ में लिए खडा देख, मैं हडबडा कर उठ खडी होती और शर्म से गडती हुई बोलती – अरे, अम्मा आपने क्यों चाय बनाई, मैं तो बस बनाने आ ही रही थी.... I’’तो वे तुरंत कहतीं -‘’क्या हुआ...तुम्हें पढाई का कितना काम रहता है आजकल, परीक्षा पास है, तुम्हें भी थोड़ी मदद की ज़रूरत है, सो मैंने बना ली चाय अपनी भी और तुम्हारी भी I ‘भाभी जी’ (दादी सास) तो अभी सो रही हैं. ‘’उनके ऐसे ख्याल व प्यार पर, हमेशा मैं ऊपरवाले का शुक्रिया अदा करती कि उसने मुझे इतनी पुरखुलूस और नेकदिल सास दी कि जिसमें मैं अपनी माँ को देखती और सोचती कि ऐसी ममतामयी सास ज़रूर मेरे पिछले जनम के किन्हीं अच्छे कर्मों के कारण ही मिली है I
अम्मा की उदारता के आगे तो कायनात भी शरमा जाए, इतना बड़ा दिल रखती थी वे I चूंकि आंटी के कोई बच्चा नहीं था और संतान विहीनता उन्हें सताती भी बहुत थी, इसलिए अम्मा आंटी के अंदर की संतान विहीन माँ की वेदना को बखूबी समझते हुए, इस बारे में उनकी भावनाओं का बड़ा ख्याल रखती थीं I भले ही, आंटी ने, अम्मा के अंदर असीम सुख से साँस लेती ‘पत्नी’ की पीड़ा की परवाह किए बिना, पापा से शादी कर ली थी, पर संवेदनशील अम्मा हर छोटे बड़े त्यौहार पर बहू बेटों से मिलने वाले सुख को आंटी पर न्यौछावर करना न भूलती I इसलिए करवा चतुर्थी, बड अमावस, सकट, अहोई अष्टमी आदि पर जब भी मेरा और भाभी (मेरी जेठानी) का उपवास होता तो अम्मा हम में से किसी एक का बयाना आंटी को दिलवाने के लिए कहती - ‘उसके (आंटी के) बच्चा नहीं है, मेरे पास बच्चे तो हैं, इसलिए तुममें से कोई एक अपना बयाना आंटी को दे आओ’ I अम्मा के बड़प्पन और नरम दिली पे मन ही मन कुर्बान होती मैं, अपना बयाना आंटी को ऐसी भावना से अभिभूत होकर देती - जैसे कि लंबे समय से तरसे इंसान को थाली में सजे पकवान ही नहीं, वरन ढेर सारा प्यार, सम्मान और मीठा-मीठा अपनापन परोस कर दे रहीं हूँ I उनके पैर छूती, गले लगती

और वे भी प्यार से आशीर्वाद देती I वाकई मैं देखती कि आंटी की खुशी का पारावार न रहता I एक दिन बाद ही आंटी बायने की थाली मिठाई, फल, गिफ्ट पैकेट के साथ खुद लिए खुशी-खुशी आती I दो-तीन घंटे हमारे साथ बैठती, बातें करती, चाय वगैरा पीती और खूब आशीष देकर जाती I इसके अलावा भी आंटी का जब मन होता अम्मा के पास आकर बैठ जाती और पापा की शिकायतें करती I अम्मा खामोशी से उन्हें दिल की भड़ास निकाल लेने देती और अंत में समझाती कि ’यूं नॉ, ही इज लाइक देट. डोंट फील हर्ट. मोरोवर मेल्स आर केयरलैस. यू सी, आय एम ओवर एंड एबव आल दीज़ थिंग्स, सो यू आलसो टेक इट ईजी.’ यद्यपि आंटी के लिए अम्मा की यह उदारता और सद्भावना मुझे अम्मा के प्रति विशेष आदर भाव से भर देती, पर कभी कभी खल भी जाती I मै सोचती कभी तो अम्मा, आंटी से तीखा बोल सकती हैं, खासकर ऐसे मौकों पे जब वे पापा की शिकायतों का पुलिंदा लिए अम्मा के पास आती हैं जिससे आंटी को उनके खुद के द्वारा, अम्मा के प्रति हुए अन्याय का एहसास हो, उन्हें याद आए कि उन्होंने प्यार के जुनून में किस तरह और क्यों कर अम्मा का घर उजाड दिया था ? दूसरी ओर अम्मा थी कि उनके मुंह से कभी भी मैंने पापा के खिलाफ एक भी शब्द नहीं सुना I अम्मा न जाने कैसी संत सी थी कि उन्हें आंटी से ईर्ष्या, द्वेष, वैर भाव कुछ भी महसूस नहीं होता था I वे शायद इन सब विकारों से ऊपर उठ गई थीं I उन्हें जो कुछ भी महसूस होना था, वह बस तभी हुआ था, जब हिम्मतनगर में उन्हें दिल चीर देने वाली खबर मिली थी I लेकिन उसके बाद जब उन्होंने दोबारा ससुरालवालों के आग्रह और मिन्नतें करने पे, घर में कदम रखा था तो मानों धरती की सहनशीलता, चाँद की शीतलता, समुद्र की विशालता अपने में समेट कर साथ ले आईं थीं I टूटने के बाद मैंने किसी इंसान को इतना शांत, और आर्गेनाइज्ड नहीं देखा था !! अम्मा को झील की मानिंद ठहरा हुआ देख कर, कई बार मेरा अंतर्मन हिल हिल जाता I कभी वे मंदिर जैसी शांत और दिव्य लगती I जैसे पाक साफ़, स्तब्ध, शांत मंदिर में हर तरह का इंसान आकर अपना दुखडा कहता है, अपनी समस्याएँ बयान करता है - ठीक वैसे ही अम्मा के पास आंटी, आसपास रहने वाले रिश्तेदार आते, बैठते, अपनी घरेलू कलह, मानसिक अशांति, दुःख दर्द कहते और अम्मा असीम शांत भाव से सबकी बातें सुन कर,मुस्कुरा कर कुछ समझाती, बुदबुदाती सी सबका ताप हर लेती I उस क्षण तो वे मुझे मंदिर से भी

अधिक पवित्र, शांत और निश्छल लगती I इससे भी अधिक हैरत तो मुझे तब होती जब पापा भी रोज, बिना नागा ११ बजे के लगभग घर आते, अम्मा उन्हें महाराष्ट्र की फ्रेश काफी पिलाती, खुद भी पीती I दोनों मित्रों की तरह; बच्चों, घर के बाग बगीचे, दुनिया की ताज़ा खबरों की चर्चा करते चिडे चिड़िया की तरह चहचहाते बैठे रहते I काफी पीकर, तारो-ताज़ा होकर, एक घंटा बैठ कर, ठीक १२ बजे पापा क्लीनिक में चले जाते I मतलब कि पापा का लंच से पहले का ‘काफी ब्रेक’ पुश्तैनी घर में होता I हम लोगों को भी पापा पुकार-पुकार कर हाल चाल पूछते और मैं पलभर को उनसे मिलकर, बच्चों को समेटती अपने कमरे में ले आती, जिससे सिर्फ अम्मा और पापा, कम से कम सामान्य बातें ही करते हुए, कुछ समय एक दूसरे के साथ गुज़ार सकें I एक बार निकट रिश्ते की फुआ सास ने अम्मा से पापा की खूब आलोचना करी, यह सोच कर कि अम्मा को कुछ भी बुरा नहीं लगेगा क्योंकि वे तो खुद पापा के अन्याय के कारण उनके खिलाफ होगी I शांत,मृदु भाषी अम्मा, अपनी उस ननद से कुछ न बोल कर, चहरे पे मंद मुस्कान लिए पापा की आलोचना का गरल चुपचाप पीती रही I जब वे चलने को उठ खडी हुई तो - वही कम से कम शब्दों में अर्थपूर्ण बात कहना जैसे कि अम्मा की आदत थी; बोली –
‘’जीजी, आई डिड नौट लाइक योर बिटर कमैंट्स अबाउट हिम (पापा) ,नैकस्ट टाइम ट्राय टू स्पीक एबाउट हिज गुडनैस आल्सो . ‘’
यह सुनकर फुआ सास पहले तो मुंह बाए उन्हें देखती रह गई, फिर बेसाख्ता हंसने लगीं और उनकी पीठ पे हाथ फेरती बोली – ‘’ भई मान गए बहूरानी ! तुम जैसी पति भक्त तो तीन लोकों में भी खोजे नहीं मिलेगी I’’ अपने कमरे से निकलते हुए जब फुआ सास के अम्मा की तारीफ़ में ये शब्द मैंने सुने तो मैंने भी हाँ में हाँ मिलाई कि सच में अम्मा जैसी पति भक्त नहीं मिलेगी....!
अम्मा मेरी सास कम और सहेली ज़्यादा थीं I हमारा घर चारों ओर हरियाली से घिरा था I पडदादा की बनवाई हुई अंग्रेजों के जमाने की कोठी, जो कोठी कम बंगला अधिक थी क्योंकि कमरों में सर्दी से बचने के लिए फायर प्लेस बने हुए थे, ऊंची, ऊंची छत वाले कमरों में दो-दो रौशनदान और चार-चार दरवाजे थे I उसकी समूची बनावट बंगले की तरह ‘काम्पैक्ट’
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थी I उसके सामने मखमली लान;लान के इर्द गिर्द फूलों की क्यारियां, आलू बुखारे, नाशपाती, आम, अनार, शरीफे के पेड़, एक ओर अंगूर की बेल, करौंदे की झाडियाँ उसे और खूबसूरत बनाती थी I घर के पीछे, किचन गार्डन, और कटहल के पेड़ I लान और घर के बीच एक परमानेंट बैडमिन्टन कोर्ट बना हुआ था जिसमें घर के पुरुष ही नहीं बल्कि हम सास - बहुएं भी बैडमिन्टन खेलती थीं I अम्मा अक्सर ही मेरे साथ शाम को बिना नागा बैडमिन्टन खेलती थीं I किसी दिन हवा तेज होने के कारण यदि हम बैडमिन्टन नहीं खेल पाते, तो घर के मेन गेट से अंदर तक बने रास्ते पर अम्मा और मैं एक - डेढ़ घंटा बातें करती टहलती रहती I
जब कभी भी घर में संगीत का माहौल जमता और सब बैठ कर बारी बारी से गाने गाते तो हम अम्मा के पीछे पड़ जाते कि उन्हें गाना, गाना पड़ेगा I हमारी जिद देखकर उन्हें हथियार डालने पड़ते और फिर वह अपनी मधुर आवाज़ में जब दिल को सालने वाले अक्सर ये दो गाने सुनाती..........
‘१) तुम मुझे भूल भी जाओ तो ये हक है तुमको, मेरी बात और है मैंने तो मुहब्बत की है...,
२) दिल जलता है तो जलने दे, आंसू न बहा फ़रियाद न कर.....
तो इन्हें सुन कर मेरा दिल बेहद भारी हो जाता और मैं बामुश्किल अपने आंसू पिए अम्मा के दर्द को अंदर ही अंदर महसूस करती बैठी रहती I
अम्मा महीने में एक बार ‘पोरनपोली’ और इलायची मेवा डालकर ‘श्रीखंड’ बनाती और हम सब चाव से खाते नहीं अघाते I इसके अलावा अम्मा लहसुन, तिल,सीन्गदाने और नारियल की सूखी चटनी बना कर भी रखती जो महीने भर चलती I गर्मियों में आंधी चलने पे, बगीचे में कच्चे आमों का ढेर लग जाता I अम्मा मराठी मसाले वाला आम का अचार डालती I वे उपमा और पोहे बहुत अच्छे, खिलेखिले बनाती थी I पानी, नमक, राई, मूंगफली के तेल का इतना परफैक्ट कांबीनेशन होता था कि हम कितना भी खाए, हमारा मन ही नहीं भरता था I बेसन की नमकीन कतली और लडडू तो इतने स्वादिष्ट बनाती थी कि घर

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वालों के साथ साथ आने जाने वाले मेहमानो को भी वे तब तक खिलाए जाते, जब तक खत्म न हो जाते I
मेरे बेटे बेटी को तो वे इतना प्यार करती, इतना लाड लड़ाती कि वे दोंनो उन्हें छोडते ही नहीं थे I हर पल अम्मा के सिर पे सवार रहते I मैं दोंनो को कभी डांटती भी कि अम्मा को आराम करने दो तो वे डांटने भी न देती I उनके इशारों पे नाचती रहती I मुझे अक्सर समझाती कि ‘’अभी दोनों बहुत छोटे हैं, इन पर अधिक पाबंदियां मत लगाओ, बड़े होते होते देखना दोंनो कैसे डिस्प्लिन्ड हो जाएगे, अभी तो इनके राज करने के दिन हैं !’’ मैं चुप हो जाती I वे दोंनो मक्कार मुस्कुराते गर्व से सिर अकडा कर मुझे ऐसे देखते; जैसे कह रहे हों और डाटो हमें, देखा अम्मा हमारी साइड हैं....!! दोनों बच्चों का हर काम – पढाई लिखाई से लेकर खेल कूद तक; सब अम्मा के पलंग से लेकर कमरे में चारों ओर फैला होता I वे बेचारी पंलग से खिसकती खिसकती अपनी आराम कुर्सी में सिमट जाती और शौक से दोनों की क्रिएटिविटी, तरह तरह के खेल देखती बैठी रहती I कभी कभी जब दोनों दुष्ट अम्मा के साथ ताश खेलते, तो शर्त रखते कि अम्मा को उनसे हारना पडेगा, तभी वे ताश खेलेगें I अम्मा उन्हें खुश करने के लिए खूब हारती रहती और खुश होती रहती I सोती हुई अम्मा को मेरे शरारती बेटे न जाने कितनी बार ‘स्पाइडर मैन‘ बन कर सिर से पाँव तक रील के धागे से जाल बना कर कैद किया I सोते इंसान पे वह नटखट ऎसी सफाई से और होशियारी से बारीक जाल तान देता था कि देख कर हैरत होती थी I नींद से एकाएक उठी अम्मा बाथरूम जाना चाहती तो उस जाल में असहाय सी पडी मुझे आवाज़ लगाती कि देखो इस पाजी ने फिर जाल बना दिया, मुझे जल्दी से निकालो I तब मैं आवाज़ सुनकर दौडी जाती और कैचीं से चारों तरफ से उस जाल को काटती जाती और बेटे को सज़ा देने की सोचती जाती I जब तक उसे सज़ा देने की बात आती, वह अम्मा के गले में बाँहें डाल कर, गोदी में ऐसा दुबकता कि अम्मा उस पे प्यार बरसाते न थकती I मैं खीज कर कहती – ‘इन दादी पोते का कोई इलाज नहीं, इनके जो बीच में पड़े,वो ही मूर्ख बने’....और उनके फिर किस्से - कहानी, शैतानियाँ होने लगती I ऐसे ही मेरी बेटी को वे रोज शाम को घुमाने ले जाती थी I तब तक बेटा नहीं हुआ था I उस समय वह ५ साल की रही होगी I उसने न जाने कब अम्मा से खेल खेल में छोटी सलाई लेकर
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थोड़े बहुत फंदे इधर से उधर करना सीख लिया था और बड़ों की तरह बुनाई की नक़ल करती थी I उसे बुनाई का इतना शौक चर्राया कि, जब अम्मा शाम को उसे घुमाने ले जाती तो, वह बुनती हुई आगे आगे चलती और अम्मा को ऊन का नन्हा सा गोला पकड़ा कर पीछे पीछे चलाती I अम्मा भी उसका कहना मान कर वैसे ही करती I मुझे दादी पोती के घूमने का यह अनोखा अंदाज़ पता न था I वो तो मैं एक दिन शाम को कालिज से इन्विजीलेशन करके लौट रही थी तो सड़क पर बाई ओर पैदल रास्ते पर दोनों को इस तरह आगे पीछे चलते, और बेटी को बुनाई करते चलते देखा तो बड़ी हँसी आई और चिंता अधिक हुई कि नीचे देख कर न चलने से अगर वह ठोकर खाकर गिर जाए तो अम्मा कैसे अकेले उसे सम्हालेगी, और वैसे भी वह अम्मा का घूमना कम पोती की हुक्म फरमानी अधिक हो रही थी I फिर मैंने किसी तरह समझा का उन दोनों का इस तरह भीड़ भरी सडक पे घूमने जाना बंद किया I मतलब यह कि अम्मा बच्चों का कहा कुछ भी सिर झुका कर ऐसे मानती थी जैसे वे बादशाह हैं और उनका कहा न मानने से क़यामत आ जाएगी I

अम्मा को उदात्त संस्कार और मूल्य अपने आई - बाबा से विरासत में मिले थे, जिनका प्रमाण अम्मा और उनकी बहनों के उस उदार निर्णय व प्रेम भाव में भी मुझे मिला, जो उन्होंने अपने भाई के लिए जमीन जायदाद के संबंध में लिया था I चूंकि सब बहने पढ़ी लिखी और समर्थ थी, उस पर सौभाग्य से, शिक्षित व संपन्न घरानों में ब्याही गई थी, इसलिए किसी ने भी ज़मीन जायदाद को लेकर कभी भी किसी तरह की मांग या छीन झपट जैसी नीयत नहीं रखी, जबकि मामा चाहते थे कि सब बहनों को बराबर हिस्सा मिले I लेकिन बहनों ने बहुत प्यार और सम्मान के साथ ज़बरदस्ती अपने भाई को सारी जायदाद का मालिक बनाया और अपना हक छोड़ दिया I जबकि कुछ घरों में भाई - बहन, भरपूर सम्पन्नता होने पर भी पाई-पाई के लिए मुकदमे करते देखे गए हैं या कोई एक कब्ज़ा जमा लेता है तो, ताउम्र उस भाई को कोसते नहीं अघाते I लेकिन अम्मा इस तरह की तेर-मेर से दूर एकदम निश्छल और शांत थीं I उनमें सहज ही शालीनता और सभ्यता कूट - कूट कर भरी थी I वही शालीनता और सभ्यता, संस्कार व मूल्य ससुराल में भी उनके हर छोटे बड़े कामों में बने रहे I पापा से उपेक्षित होकर भी पापा के लिए करवा चतुर्थी, सकट, बड अमावस का
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उपवास तहे दिल से रखना उनके संस्कारों का खूबसूरत सबूत था I अपने पूजा स्थान में वे दो तस्वीरें रखती थी, शिरडी साईँ बाबा की और आर्मी ड्रेस पहने हुए पापा की I कमाल थी मेरी अम्मा .....!!
एक बार पापा की पोस्टिंग रांची हुई I वहाँ उनको जो घर मिला था, उसके चारों ओर जंगलनुमा हरियाली फैली हुई थी I अम्मा बताती थीं कि बंगले के बरामदे में पानी का एक कच्चा मटका रखा रहता था I एक बार गर्मियों के दिनों में सांप का एक जोड़ा उसके नीचे ठंडक पाने के लिए आ दुबका I पापा की उस सांप के जोड़े पे नज़र पड़ गई I उन्होंने तुरंत एक मज़बूत डंडा लेकर उस जोड़े को आनन फानन में मार डाला I उस घटना से भावुक और धर्म भीरू अम्मा के मन में भय बैठ गया कि पापा ने सांप का जोड़ा बेदर्दी से मार डाला, घर में आने वाले समय में न जाने क्या अनर्थ होगा I पापा एक तो डाक्टर, ऊपर से फ़ौज में, वह सांप को देवता मानने जैसी धारणा के पक्षपाती नहीं थे I लेकिन अम्मा का तो ऎसी लोक अनुभवों पर आधारित धारणाओं पे अटूट विश्वास था I कुछ वर्ष बाद अम्मा के दिल में बैठा भय ‘सच’ साबित हुआ I कभी ‘अगस्त’ के महीने में ही पापा ने सांप का जोड़ा मारा था और उस घटना के कुछ साल बाद ‘अगस्त’ महीने में ही अम्मा - पापा का अलगाव, आंटी से शादी हो जाने के कारण हुआ I इसे कुदरत की सज़ा कहें या सांप के जोड़े का अभिशाप, लेकिन ठीक उसी महीने में अम्मा पापा के वैवाहिक जीवन में दरार पडी, जो अम्मा के लिए बहुत अधिक अजीयत का कारण बनी I अम्मा से तो जैसे खुशियो ने मुंह मोड ही लिया था, पर पापा भी दूसरी शादी करके कभी खुश न रह सके और न आंटी I
इस सांप की घटना के सन्दर्भ में एक और हैरत में डालने वाली बात अम्मा ने मुझे बताई थीं I अम्मा ने बताया कि १९६० की बात है जब एक दिन वह बरामदे में बैठी हुई थी, तभी एक फक्कड साधु भिक्षा मांगता, भजन गाता दरवाजे पर आ खडा हुआ I अम्मा ने उसे आटा, चावल और कुछ फल दिए, जैसे ही वह जाने के लिए मुडा, अम्मा के मन में एकाएक एक सवाल उठा, वे अपने को रोक न सकी और उस ‘साधु बाबा’ से दिल में बड़ी उम्मीद लिए बोली –
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‘’बाबा ! यह तो बताइए कि मेरी किस्मत में क्या लिखा है....? ‘’
बाबा पलट कर, निश्छल मुस्कान के साथ पहले ऊपर आकाश को और फिर अम्मा के ललाट को भेदती नजरो से देख कर, आँखें मूँदता हुआ बोला –
‘’बेटी ! अब से कुछ साल पहले इस घर के किसी आदमी ने, कहीं एक सांप का जोड़ा मार दिया था; तब से इस घर पर ‘प्रेमी जोड़ो’ के अलग होने का अभिशाप है I तेरी इस पीढ़ी के बाद, आने वाली दो और पीढ़ियों तक, जिस लडके का भी प्रेम विवाह होगा, वह एक तो, लड़की के घरवालों की मर्जी के खिलाफ होगा और कुछ साल बाद उनमें तलाक अवश्य होगा I इसलिए बेटी तेरी किस्मत में दुःख उस आदमी के कारण है जिसने सांप का जोड़ा मारा था I जो गलती हुई सो हुई, इस जनम में तुझे यह दुःख तो देखना ही होगा I भगवान में मन लगा, शान्ति मिलेगी I’’
साधु के मुंह से बरसों पहले सांप के जोड़े को मारने की घटना यों अचानक सुन कर हैरान हुई अम्मा का मन अपने बच्चों को लेकर अशांत हो गया I धीरे धीरे समय के साथ, साधु के शब्द अम्मा के चेतन मन में तो धुंधले होते गए, पर अवचेतन में शायद कुंडली मार कर बैठ गए थे, तभी तो बीस साल बाद मुझसे उन्होंने उस साधु की भविष्य वाणी का ज़िक्र किया I मैंने भी ध्यान से अम्मा की एक - एक बात सुनी और फिर मैं भी उसे भुला बैठी I लेकिन साधु की भविष्य वाणी अम्मा को एकाएक तब सच होती लगी, जब उस घर का दूसरा प्रेम विवाह में बंधा जोड़ा, यानी उनका छोटा बेटा और बहू (मैं), दुर्भाग्य से अलग होने की कगार पर जा पहुंचे I हमारा भी प्रेम विवाह था, लेकिन मेरी माँ बिलकुल नहीं चाहती थी कि यह रिश्ता हो, एकदम खिलाफ थीं I मेरे पर जान कुर्बान करने को तैयार, यहाँ तक कि मेरे मामा और माँ द्वारा मना कर दिए जाने पर दो बार आत्महत्या की सच में ‘जानलेवा’ कोशिश करने वाले‘इनसे’ मैं इतनी आश्वस्त और अभीभूत हो गई थी कि मुझे दुनिया में इन जैसा वफादार कोई नज़र ही नहीं आता था I अपने लिए इनके लगाव और निष्ठा को देखकर, जब मैंने भी अपनी माँ को हिचकते हुए अपना निर्णय सुनाया तो वह बड़ी दुखी हुई, लेकिन बाद में सबके समझाने पर, इनके साथ मेरी शादी करने कि लिए मान गई I शादी हो गई, हमारा जीवन भी बेइंतहा खुशियों से भरपूर था और एक दिन वो आया कि ‘ओशो और पूना
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का ओशो आश्रम’ हमारे तलाक का कारण बन गया I सबके लाख कोशिशे करने के बावजूद भी, तलाक हो कर रहा I जब मैंने अम्मा से आंसू बहाते हुए कहा कि जिस ‘वफादारी’ के कारण, माँ के खिलाफ होने के बावजूद भी मैं इनसे शादी करने को तैयार हो गई थी, जब वो ‘वफादारी’ ही खत्म हो गई तो मेरा इस घर में रहने क्या अर्थ ? न इन्हें बच्चों का ख्याल, ना मेरा ख्याल रहा था, बस ‘आचार्य रजनीश’ और उनका आश्रम ही सब कुछ था I ओशो के चेले - चेलियां और ओशो आश्रम ही इनका घर परिवार बन चुका था I लंबे - लंबे समय के लिए घर से गायब और मै ही नहीं, घर के और सब लोग भी परेशान व आशंकित रहने लगे थे I हममे ही नही बल्कि अपनी नौकरी में भी इनकी रूचि खत्म हो चुकी थी I सब कुछ भुला कर ऐसे ‘ओशोमय’ हुए कि ओशो के हाथों दीक्षित भी हो गए I मेरा तो नामोंनिशा ही मिट चुका था इनकी ज़िंदगी से I
इतिहास ने एक बार अपने को फिर दोहराया हमारे अलगाव के रूप में I मेरी ऐसी घनघोर पीड़ा और तकलीफ के समय में, अम्मा ने मुझे भरपूर सहारा दिया I अलगाव के कष्ट से गुजरी अम्मा ने बेटे से प्यार होते हुए भी, मेरी पीठ पे जिस प्यार और अपनत्व से हाथ रखकर,अनेक बार गले लगा कर जो भावनात्मक सहारा दिया उसे मैं कभी नहीं भुला सकती I सांप के जोड़े का अभिशाप या किस्मत का खेल - अनहोनी होनी बनी और अंतत: हमारा तलाक होकर रहा और तलाक होते ही इन्होने एक ओशो जर्मन चेली से शादी कर ली I
घर के बुज़ुर्ग, बड़े दमदार लोग चाहते हुए भी कुछ न कर सके, जैसे अम्मा पापा के अलगाव के समय कोई कुछ नहीं कर पाया था ठीक वैसे ही इस बार भी कोई कुछ नहीं कर पाया I सबको बड़ा दुःख और अफसोस हुआ I पर मैं तलाक के बाद भी घर भर की चहेती बहू बनी रही और खासतौर से अम्मा की ‘सहेली बहू’ I अलग होने के बाद भी अम्मा मुझे घर बुलाती, खूब प्यार बरसाती, खिलाती पिलाती, पहले की तरह हम बातें करते लकिन जब मैं चलने के लिए उठ खडी होती तो अम्मा का और मेरा - हम दोनों का दिल भर आता I लेकिन हम दोनों बहादुरी से उस पल को झेलते, वह मुझे बिदा करती और फिर बुलाती I मेरे से और बच्चों से उनके लगाव की यह इन्तहा थी कि मेरे घर से अलग हो जाने के बाद भी, अम्मा ने हमारी रिक्तता को भरने के लिए चार - पांच साल तक मेरे बेटे को अपने पास ही रखा I बेटी और मै लगातार उनसे व सब
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घर वालों से मिलने जाते रहे I आज तक मेरे ससुराल वाले मेरे संपर्क में हैं, खूब फोन करते हैं, मिलने आते हैं, शादी ब्याह पर मुझे बुलाते हैं, तीज त्यौहारों पर हमेशा मुझे शुभकामनाएं और समय समय पर उपहार देते हैं I मैं कभी भी अपने ससुरालवालों का और खासतौर से अपनी सास का अपनापन नहीं भूल सकती I तो ऎसी जीवट वाली और मनोबल बढाने वाली थीं मेरी अम्मा I वह मेरे लिए ‘अम्मा’ बन के ही धरती पर आई थी, सास तो नाम भर के लिए ही थीं I भले ही अम्मा वैवाहिक जीवन में, केन्द्र से हट कर हाशिए पर रही किन्तु ससुराल के भरे पूरे पारिवारिक जीवन में, हमेशा घर की धुरी की तरह केन्द्र में बनी रहीं I अम्मा सदा ही सबसे अधिक ‘चहेती बहू’ और बाद में ‘सम्माननीय सास’ के ओहदे पर गरिमा के साथ विराजमान रही I उनके त्याग, उनकी हिम्मत, सहनशीलता, सबके प्रति आदर भाव ने, उन्हें सबकी आँखों का तारा बनाया I अम्मा ने हमेशा आंटी को छोटी बहन की तरह माना इसलिए ही आंटी परेशान होने पर, बेखटके हमेशा अम्मा के पास आती और अपने राज़ उनसे बांटती थी I प्यार से दुश्मन को अपना बनाने की कहावत सुनी ज़रूर थी मैंने पर अम्मा में मैंने उसे सच होते देखा था I अगर मैं कहूँ कि अम्मा इंसान होते हुए भी अलौकिक गुणों से भरपूर थी, तो शायद अत्युक्ति न होगी I आज भी ग्यारह जनवरी को उनके जन्मदिन पर, उन्हें याद करके, मेरी आँखें नम हो आती हैं और मैं दिल में बेइंतहा प्यार लिए, उनके लिए कामना करती हूँ, दुआ करती हूँ कि वे अब जहां भी हो, भरपूर सुख और सुकून में हों ! नई ज़िंदगी में ईश्वर उन पर इतनी खुशियाँ बरसाए कि पिछले जन्म की भी कमी पूरी हो जाए....!!
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