Sunday, July 18, 2010

(कहानी) एवटाबाद हाउस


छ: हज़ार फ़ीट की ऊँचाई पे बर्फ़ीली पहाड़ियों की गोद में बसी गढ़वाल राइफ़ल्स की ख़ूबसूरत छावनी ‘लैन्सडाउन’ अपनी स्वच्छता, सहज सँवरेपन व अलौकिक प्राकृतिक सौन्दर्य के लिए मशहूर थी। उसका नाम अँग्रेज़ अधिकारी ‘लॉर्ड लैन्सडाउन’ के नाम पर रखा गया था। उस शान्त और सुरम्य छावनी की ‘चेटपुट लाइन्स‘ में शहर से 3 किलोमीटर दूर, चीड़ और देवदार के घने पेड़ों के बीच अनूठी शान ओढ़े एक बंगला था जो ‘एवटाबाद हाउस‘ के नाम से जाना जाता था। ब्रिटिश राज में म्युनिसिपल कमिश्नर उस बंगले में बड़े ठाट-बाट के साथ रहता था। कहा जाता है कि इससे पहले कोई गढ़वाली अफ़सर अपने परिवार सहित उसमें रहता था जिसकी एक हादसे में मृत्यु हो गई थी। बरसों पुराने उस गिरनाऊ बंगले को तुड़वाकर अँग्रेज़ों ने, उसे कुशल आर्किटैक्ट से ख़ास ढंग से बनवाया था। सम्भवत: इसलिए ही उसमें कुछ तो ऐसा था जो उसे उस इलाके के अन्य बंगलों से अलग करता था। 1947 में भारत के आज़ाद होने पर, लैन्सडाउन के नामी डॉक्टर शाह ने उस बंगले को अँग्रेज़ अधिकारी से ख़रीद लिया था। उसमें पाँच बड़े –बड़े कमरे, एक पूरब सामना ड्रॉइंग रूम, जिसके साथ सर्दियों के लिए एक बहुत ही खूबसूरत ग्लेज़्ड सिटिंग रूम था। हर कमरे के साथ अटैच्ड बाथरूम थे। एक ओर पैन्ट्री सहित एक बड़ी किचिन थी। बंगले के चारो ओर पत्थरों का एक सिरे से दूसरे को छूता हुआ गोलाकार बराम्दा था। बराम्दे से तीन सीढ़ी नीचे उतरने पर,चारों ओर खुली जगह में रंग-बिरंगे फूलों की क्यारियाँ थी।वहाँ से सामने दूर पश्चिम में जयहरीखाल गाँव दिखाई देता था। इस गाँव के पार्श्व से उत्तर की ओर हिमालय की बर्फ़ीली पहाड़ियाँ पसरी हुई थी। सुब्ह उगते सूरज की सुनहरी किरणें उन पे बिखरती तो वे चन्द्रहार जैसी चकमक-चकमक करती। नीलकंठ और चौखम्भा की चोटियाँ तो उस बर्फ़ीली श्रृंखला का इन्द्रधनुषी गहना थीं। उसके नीचे दाएँ-बाँए लहराते सीढ़ीदार खेत उस दृश्य की शोभा को द्विगुणित करते। उत्तर की ओर फलों के पेड़ थे, जो मौसम में आड़ू और काफ़ल से लदे रहते थे। दूसरी ओर ऊँचे-ऊँचे भीमकाय बनस्पति से भरे दूर से नीले से दिखने वाले हरिताभ पहाड़ एक के ऊपर एक सटे मन में भय सा उपजाते। उन पे कोटद्वार, दुगड्डा और जयहरीखाल से आती जाती बसें दूर से रेंगती खिलौने जैसी दिखती। यदा कदा बसों की आवाजाही उस नीरव स्तब्धता में कुछ स्पन्दन का एहसास कराती। बंगले के दक्षिण में दूर लोहे का मेनगेट था जिससे होकर पथरीला रास्ता बंगले के बराम्दे तक आता था। इस लम्बे रास्ते के दोनो ओर भी फूलों की क्यारियाँ और रात की रानी की झाड़ियाँ थी जो पथरीले रास्ते को राज मार्ग की सी भव्यता प्रदान करती। इस मुख्य रास्ते से लगा हुआ, हल्की सी ऊँचाई पर, यानी बंगले के दाहिनी ओर मखमली लॉन था और दूसरा लॉन मेनगेट से अन्दर आते ही बाईं ओर पड़ता था। यह लॉन अपेक्षाकृत अधिक फैला हुआ था। इससे लगा हुआ, दूर तक पसरा बुरांस, बेड़ू के पेड़ों और रसभरी की झाड़ियों का घना जगंल था, जिसमें एक प्राकृतिक बटिया स्वत: बन गई थी। अक्सर गढ़वाली औरतें लकड़ी बीनतीं उस जंगल में आती जाती दिखती, तो कभी साल में एक बार कॉरपोरेशन वाले उस जंगल की थोड़ी बहुत काट-छांट कर जाते। वरना वह जंगल बेरोक टोक फलता फूलता रहता और अपने में मस्त रहता। पूरे वर्ष चिड़ियों की चहचहाहट और मधुमास में कोयल की कुह-कुह, पपीहे की पीहू-पीहू उसे गुलज़ार रखती। बंगले के नीचे थोड़ा हटकर 13 सरवेन्ट क्वार्टर्स थे, जिसमें चौकीदार बलबहादुर, खानसामा शेरसिंह, सफाई कर्मचारी गोविन्दराम और उसका परिवार, दफ़्तरी बाबू, शमशेर बहादुर आदि कुल मिलाकर 6-7 नौकर रहते थे। शेष कमरे खाली पड़े थे।

डॉक्टर शाह का अस्पताल उस बंगले से काफ़ी दूर पड़ता था, इसलिए उन्होंने उसे उन टीचर्स के लिए किराये पे दे दिया था, जो लैन्सडाउन के सरकारी हायर सेकेंडरी स्कूल में पढ़ाती थी और बाहरी शहरों से उनकी पोस्टिंग उस स्कूल में होती थी। प्रत्येक कमरे को तीन-तीन टीचर्स शेयर करती थी और सबसे बड़े कमरे में प्रिंसिपल मिस जंगपांगी अपनी छोटी बहन और अपने प्यारे एलसेशियन ‘नवाब’ के साथ रहती थीं। आज के ज़माने के कोलाहल के विपरीत, लगभग पाँच दशक पहले का ज़माना, उस पे भी पहाड़ पे बसा, वह भोलाभाला सुशान्त शहर इतनी नीरवता ओढ़े था कि दूर की हल्की सी आहट भी बंगले तक तैर जाती थी। कभी कभार मेन गेट के पास से प्रैक्टिस करते फ़ौजी सैनिकों की क़तारों के भारी बूटों की आवाज़े, तो कभी आस पास के गाँवों से शहर जाने वाले उधर से गुज़रते तो उनकी गढ़वाली बोली के अस्फुट स्वर, उस स्तब्ध वातावरण को छेड़ते से हवा के झोंके के साथ लहराते ‘एवटाबाद हाउस’ तक पहुँचते।

सभी टीचर्स हँसती, ढेर बातें करती, इकठ्ठी पैदल जाती और शार्टकट पकड़ती हुई तीन कि.मी. का रास्ता एक घंटे में तय कर स्कूल पहुँच जातीं। शाम के चार बजे छुट्टी होने पर, पाँच बजे तक बंगले पे पहुँचती। उसके बाद सब फ़्रैश होकर हवादार बराम्दे में इज़ी चेयर्स में, छोटी मूढ़ियों और सीढ़ियों पे बैठी शेरसिंह की बनाई, अदरक और इलायची के एरोमा से भरपूर गरमागरम चाय और स्थानीय बेकरी के ताज़े बिस्कुटों का स्वाद लेती। शेरसिंह पौड़ी का रहने वाला था। भोलाभाला, सीधा सा ख़ानसामा बड़े समर्पित भाव से अपनी दीदी लोगों की सेवा में लगा रहता। उसे खाना बनाते समय एक्सपैरीमैन्ट करने की बुरी आदत थी और इसके लिए वह कई बार डाँट भी खा चुका था। एक बार उसने मटर, टमाटर, आलू अजवाइन से छौंक कर बनाए। जब सब खाने बैठी तो पहला ही कौर मुँह में डालते ही सबका मुँह बन गया। तुरन्त शेरसिंह को आवाजें पड़ने लगीं। बेचारा दौड़ा- दौड़ा आया और चेहरे पे लकीर सी खिंची आँखों को हैरत से मिचमिचाता बोला –
“जी दीदी जी, क्या हुआ........?”
“अरे ये अजवाइन क्यों डाली मटर आलू में.........?”
मिसेज़ दुबे न आँखे तरेर कर उससे पूछा। वह घबराया सा सबका बिगड़ा मूड देख कर ईमानदारी से सच्ची बात बताते बोला –
“दीदी जी आप लोगों को बढ़िया, नए ढंग सब्ज़ी बनाकर खिलाना माँगता था मैं, सो अजवाइन से छौंक कर “एक्सभैरीमैन्ट“ किया था।“
सब भूख से तिलमिलाई एक साथ बोली –
“ले जाओ अपने इस “एक्सभैरीमैन्ट“ को और तुम्ही खाओ।“
इसी तरह एक बार उस भोले भंडारी ने प्याज़ लहसुन का मसाला पीस कर बड़े जतन से दम आलू बनाए। इतवार का खुला धूप भरा दिन था। जब सब उस छुट्टी के दिन का स्पेशल लंच खाने बैठी तो डोंगे में रखे दम आलू और उसके मसाले की खुशबू से सबकी भूख दुगुनी हो गई। लेकिन जैसे ही उन्होंने अपनी-अपनी प्लेट में दम आलू रोटी के टुकड़े से तोड़ना चाहा तो लाख दम लगाने पर भी वो बेदर्द न टूटा, न फूटा और पत्थर सा प्लेटों में पड़ा सबको मुंह चिढ़ाता रहा। फिर से शेरसिंह पे चिल्ला - चिल्ली मची। बेचारा अपने “एक्सभैरीमैन्ट“ के फ़ेल होने से रुआंसा हुआ दम आलू का डोंगा उठाकर रसोई में भाग गया। उसके उस तरह के भयंकर “एक्सभैरीमैन्ट“ से दुखी टीचर्स ने तय किया कि हर छुट्टी के दिन शेरसिंह को एक-एक डिश बनानी सिखाई जाएगी। रविवार को और अन्य किसी भी छुट्टी के दिन कोई एक टीचर शेरसिंह को तरह-तरह की सब्ज़ी बनाना सिखाती। धीरे-धीरे वह एक एक्स्पर्ट कुक बन गया। पाक-कला में पारंगत होने से उसकी चाल ढाल में भी अकड़ आ गई। सब उसमें आए इस हास्यास्पद बदलाव को देखकर हँसती। तब एक दिन जब मिसेज़ गुप्ता से रहा नहीं गया तो उन्होंने उसे प्यार से समझाते हुए कहा –
“अरे, शेरसिंह अपनी सीधी चाल चला कर, ये पहलवान की तरह अकड़ के क्यों चलता है।“
यह सुनते ही बेचारा झेंप गया और तुरंत झुका से हो गया। इस तरह जाने अंजाने फ़ुर्सत में बनाया गया वह ईश्वर का अनोखा नमूना सभी का मनोरंजन करता रहता था।
गोविन्दराम बंगले की सफ़ाई करता और उसकी पत्नी सबके कपड़े धोती। महीने में एक बार वह बेडशीट्स और कमरों के पर्दे भी धोती। जितनी देर वह बंगले पे काम कर रही होती, उसके बच्चे भी इधर से उधर किलकते खेलते रहते और उनका कलरव, उस 'एकान्तवासी बंगले' की नीरवता को जैसे पी जाता। मिस उप्रेती के कमरे से अक्सर मधुर गीत के स्वर उभरते और सर्द हवा में विलीन हो जाते। सुरीला स्वर मिस उप्रेती को ईश्वर का वरदान था। उसे संगीत का बहुत चाव था। इसलिए एक उसी के कमरे में बैटरी वाला रेडियो था, जिस पे अक्सर सभी टीचर्स रात को रेडियो सीलोन पे फ़िल्मी गाने सुनतीं।बीच वाले कमरे में मिस शीलांग, मिसेज़ वर्मा और मिस जोशी रहती थी, वे अपने-अपने लिहाफ़ों में दुबकी देर रात तक गप्पें लगाती, तो बराम्दे के कोने में बने सिंगल रूम में एकान्त प्रिय मिस लोहानी अपनी दुनिया में रहना पसंद करती। सबसे पहले कमरे में मिस सौलोमन, मिसेज़ गुप्ता और मिसेज़ दुबे की आपस में ख़ूब जमती। पढ़ने की शौकीन गुप्ता सिराहने मेज़ पर चमचमाती चिमनी वाला मिट्टी के तेल का लैम्प जलाए रात के 2-3 बजे तक उपन्यास-कहानी पढ़ती रहती। सबको सुब्ह बर्फ़ीली सर्दी में अपना-अपना गुनगुना बिस्तर छोड़ना और नहाना बुरा लगता। नहाना तो अक्सर ही नलों में पानी जम जाने के कारण मुँह हाथ धोने तक सीमित होकर रह जाता। बिजली का तब तक पहाड़ पे नामोंनिशां नहीं था, सो शेरसिंह सुब्ह पाँच बजे से सबके लिए बड़े भगौने में कई बार पानी गर्म करता। वे कितने भी स्वेटर पे स्वेटर, कोट, शॉल, मफ़लर लपेटतीं, फिर भी सबके हाथ पैर ठिर-ठिर काँपते रहते। स्कूल में पढ़ाते समय एक हाथ कोट की जेब में और एक हाथ में किताब थामे क्लास में बामुश्किल पढ़ातीं और स्टाफ़ रूम में जाने की प्रतीक्षा करती, क्योंकि वहाँ लकड़ी के कोयलों की अँगीठी दिन भर जलती रहती और खाली पीरियड में टीचर्स वहाँ अपने सर्द हाथ-पैरों में गर्माहट लाने में लगी रहती। बीच – बीच में गरम चाय के कप भी एक दूसरे को पकड़ाती रहती, फिर भी 'काटती सर्दी' सबको जकड़े रखती। एवटाबाद हाउस में हर काम के लिए नौकर होने के कारण टीचर्स को सर्दी अधिक नहीं खलती थी। ईश्वर की कृपा से सभी नौकर बड़े ईमानदार और ख़ूब काम करने वाले थे। अँग्रेज़ों के ज़माने का एक रिटायर्ड जमादार सवेरे ठीक सात बजे बंगले के बराम्दे से लेकर बाहर क्यारियों, दोनों लॉन में झाड़ू लगाने आता। कोई जागे या न जागे, देखे या न देखे, वह अपने नियम से आता और काम करके चला जाता। टीचर्स को उसे तनख़्वाह भी नहीं देनी पड़ती थी क्योंकि इस सफ़ाई के लिए उसे आर्मी हेड ऑफ़िस से तनख़्वाह और अपनी पिछली 30 साल की फ़ौजी नौकरी के लिए पेंशन मिलती थी। रात में चौकीदार बलबहादुर लम्बे भारी कोट का लबादा पहने, पैरों में गमबूट, सिर पे फ़र वाली मंकी कैप, उस पे मफ़लर लपेटे, हाथ में लाठी और लालटेन लिए मुस्तैदी से बंगले के चारों ओर चक्कर काटता रखवाली करता और सभी टीचर्स बेफ़िक्र होकर सोती। मिसेज़ दुबे नम्बर पाँच कमरे की मिसेज़ शाह से अक्सर कहती कि “देखो यहाँ हम कितने ठाट से रहते हैं। जब छुट्टियों में अपने घर जाते हैं तो वहाँ तो हमें माँ का हाथ बटाने की वजह से झाड़ू लगानी पड़ जाती है, पर यहाँ तो झाड़ू क्या झाड़न भी नहीं उठाना पड़ता।“

रविवार और तीज त्यौहार की छुट्टी के दिन एवटाबाद हाउस बातचीत, गीतों, कतार में सूखते कपड़ों, बैडमिन्टन खेलती, यहाँ तक कि कभी-कभी पाटिका खेलती टीचर्स की खिलखिलाहट से गुंजायमान रहता। छुट्टी का सारा दिन वे बंगले के बाहर धूप से तनिक भी न हटतीं। उस दिन नाश्ते के बाद से लॉन में कोई दरी बिछाकर, तो कोई ईज़ी चेयर में कोई बड़े- बड़े मूढ़ों में बैठी नहा धोकर सिर सुखाती, तो कोई ट्रांज़िस्टर लगाए नाटक, गाने सुनती, तो कोई कॉपी जाँचती, मतलब कि सब अपना कुछ न कुछ तामझाम लेकर वहाँ शाम तक के लिए जम जाती। इसी तरह बंगले की चाँदनी रातें भी रौनक से भरी होती। दिसम्बर और जनवरी को छोड़ कर शेष महीनों में, ख़ासतौर से फागुन के भावभीने, रुमानी महीने में टीचर्स 9-10 बजे तक चाँदनी रात में लॉन में बातें करती टहलती, कभी-कभी अन्त्याक्षरी का भी दौर चलता। रुपहली चाँदनी में बंगला कुछ ज़्यादा ही रमणीय और एक अजीब रहस्यमय सौन्दर्य से घिरा नज़र आता। जून की हल्की गरम और ख़ुश्क रातों में बंगले के आसपास कई किलोमीटर गहरी खाइयों में शेर की मांद थीं। रात में अक्सर प्यासा शेर, मांद से निकलकर बंगले पर पानी की तलाश में आता और पानी न मिलने पर बंद कमरों के दरवाज़ों पे पंजे मारकर दहाड़ता हुआ जैसे पानी मांगता, फिर थोड़ी देर में कहीं और चला जाता। पर दिन में वह कभी बाहर नहीं आता था।

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खिले फूलों की ख़ुशबुओं से भरपूर मधुमास की सुहानी चाँदनी रात थी। रात के 2 बजे थे। मिस सौलोमन की नींद टूटी और वे पानी पीने के लिए उठी तो उन्हें मेज़ के पास कुर्सी पे 'कोई' सफेद कपड़ों में उजाले से भरपूर बैठा दिखा। उन्होंने आँखें मल कर फिर से देखा तो फिर उन्हें वही आकृति दिखी। उनके मुँह से सहसा निकाला –
“कौन”…..??
और इसके बाद पलक झपकते ही वह आकृति ग़ायब हो गई। मिस सौलोमन घबरा गई । इसके बाद वे सो न सकीं और सारी रात करवट बदलते कटी। सुब्ह होने पे उन्होने किसी से कुछ न बताना ही ठीक समझा। मिस सौलोमन अन्य टीचर्स से उम्र में बड़ी व गम्भीर, शान्त और मूक स्वभाव की थीं। उन्होंने सोचा कि यदि रात की घटना टीचर्स को बता दी, तो वे छोटी उम्र की लड़कियाँ ही तो हैं, डर जायेंगी और दुबे तो वैसे भी ज़रा-ज़रा सी बात में मूर्छित हो जाती है, मिसेज़ वर्मा का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगता है। इसलिए उन्होंने चुप रहना ही ठीक समझा।

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उसी महीने 15 दिन बाद एक और रहस्यमयी घटना घटी। शाम का समय था, सूरज ढल रहा था। मन्द-मन्द हवा बह रही थी। मार्च के महीने में अपने आप जगह-जगह खिल पड़ने वाले बासन्ती रंग के फूल बंगले के चारों ओर लहलहा रहे थे। क्यारियों में गुलाब, पैन्ज़ी, पौपी, ग्लैडुला के रंग बिरंगे फूल ग़ज़ब का सौन्दर्य बिखेरे हुए थे। तभी दफ़्तरी बाबू बराम्दे में फूलों को निहारती बैठी मिसेज़ गुप्ता के पास आकर बोले –
“गुप्ता बहिन जी, क्या आप मुझे थोड़ी देर के लिए चाकू देगी, सब्ज़ी काटनी है और मेरा चाकू मिल नहीं रहा।“
गुप्ता ने कमरे से लाकर उन्हें चाकू पकड़ा दिया। 2 घंटे बाद खानसामा ‘शेर सिंह’ मिसेज़ गुप्ता के पास चाकू लेने और यह पूछने आया कि रात को क्या सब्ज़ी बनेगी। यह सुनकर मिसेज़ गुप्ता ने सबसे पूछकर रात के लिए सब्ज़ी बताई और कहा -
“चाकू दफ़्तरी बाबू के पास है, दो घन्टे पहले वे माँगने आए थे, नीचे सर्वैन्ट्स क्वार्टर में उनसे जाकर ले आओ।“
शेरसिंह क्वार्टर में जब दफ़्तरी बाबू से चाकू माँगने गया तो वे बोले –
“ मैं तो गुप्ता बहिन जी के पास चाकू लेने गया ही नहीं।“
शेरसिंह फिर बोला –
“वे कह रही थी कि आप दो घन्टे पहले उनसे सब्ज़ी काटने के लिए लेकर आए थे।“
यह सुनते ही दफ़्तरी बाबू सच का खुलासा करते बोले कि –
“वह तो अभी - अभी बाज़ार से लौटे हैं, दो घन्टे पहले तो वे यहाँ थे भी नहीं।“
और उन्होंने ऊपर जाकर मिसेज़ गुप्ता से जब सारी बात बताई तो वे हैरान होती बोली –
“तो फिर हूबहू इन्हीं कपड़ों में आप के जैसा कौन मेरे पास आया था, जो चाकू माँग कर ले गया ?”
इस पहेली का जवाब किसी के भी पास न था। दफ़्तरी बाबू सोच में डूबे नीचे क्वार्टर में चले गए, मिसेज़ गुप्ता दिल में उथल पुथल लिए कमरे में चली गई और शेरसिंह मिस लोहानी से चाकू उधार लेकर शाम के खाने की तैयारी में लग गया।
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नवम्बर का सर्द महीना था। मिस शिलांग को तेज़ बुखार चढ़ा था। इसलिए उसने फ़िलहाल 3 दिन की “सिक लीव” ली। बंगले से बाज़ार काफ़ी दूर था। उसने स्कूल जाने के लिए तैयार अपनी रूममेट मिस जोशी से शेरसिंह को साथ ले जाकर, उसके हाथ दवा और कुछ फल भेजने के लिए कहा। 9 बजे तक सब टीचर्स चली गई। मिस शिलांग बुखार की तपन में लेटी न जाने कब सो गई। 2 घन्टे बाद उठी तो देखा कि साइड में लगी टीक वुड की ड्रेसिंग टेबल पर लाल-लाल सेब, अनार और रसीले अंगूर रखे थे। शिलांग को फल देखते ही स्फूर्ति महसूस हुई, स्वाद ख़राब होने से कुछ भी खाने का मन नहीं था सिवाय के फलों के। सो उसने एक सेब लेकर खाना शुरु किया, इतना मीठा सेब उसने आज तक नहीं खाया था, साथ ही कुछ अंगूर उसने एक छोटी प्लेट में बिस्तर के पास स्टूल पर रख लिए। सेब के साथ-साथ ज़ायका बदलने को वह बीच-बीच में अंगूर भी खाने लगी। अंगूर भी बड़े रसीले और शहद से मीठे थे। अच्छी चीज़ खाकर आधी बीमारी यूँ भी ठीक होती लगने लगती है। कुछ ऐसा ही मिस शिलांग को लगा। उसने बेहतर महसूस किया। लिहाफ ओढ़कर लेटी रही और न जाने कब फिर से नींद की आगोश में चली गई। कुछ समय बाद आँख खुली तो देखा एक बजा था। धीरे से उठी और पैन्ट्री में जाकर शेरसिंह को आवाज़ दी। वह बंगले से दो कदम नीचे बनी रसोई से अपनी रोटियाँ सेंक रहा था। तुरंत बाहर निकल कर बोला -
“जी दीदी जी।“
शिलांग ने पूछा - “तुम दवा लाए ? “
“जी लाया हूँ और जोशी दीदी ने केले भी भेजे हैं, सेब की ताज़ी पेटियाँ दोपहर में खुलेगी, इसलिए वे सेब ख़ुद शाम को लेकर आएगीं। आप सोई थीं, मैंने आपका दरवाज़ा एक- दो बार खटखटाया था, जब नहीं खुला तो मैं समझ गया कि आप सोई होगी।”
शिलांग को लगा कि शेरसिंह ने भांग तो नहीं खा ली कहीं, ये क्या कह रहा है कि केले लाया है, सेब जोशी शाम को लेकर आएगी, तो फिर मेरे कमरे में वे फल कौन रख गया ? उसे कुछ समझ नहीं आया। कमज़ोरी के कारण उससे खड़ा नहीं हुआ जा रहा था, इसलिए उसने शेरसिंह से दवा के साथ एक गिलास गुनगुना पानी लाने को भी कहा। वह जब कमरे में पानी और दवा लेकर आया तो शिलांग ने दवा खाकर फलों की ओर इशारा करते उससे पूछा –
“ये फल ड्रेसिंग टेबल पे कहाँ से आए ? मैं तो समझी तुम ही पैन्ट्री से आकर रख गए होगें।“
“नहीं दीदी, पैन्ट्री का दरवाज़ा भी तो अंदर से बंद था। मैं अंदर आया ही नहीं।“
कुछ डरा, सकुचाता, हैरान सा हुआ शेरसिंह बोला। मिस शिलांग बुखार के कारण सिर भारी होने के कारण दवा खाकर लेट गई।
“2 बजे अदरक की चाय ले आना“ – मिस शिलांग ने कहा।
वह सिर हिलाता चला गया। लेटते ही बुख़ार की गफ़लत में मिस शिलांग फिर से ऐसी सोई कि 5 बजे उसकी नींद खुली। उसने देखा कि उसकी साथिनें आ गई थीं। सब अपना-अपना काम करते बैठी थीं। मिस शिलांग को लगा कि उसके माथे पे बाम की चिपचिपाहट और खुशबू है, उसने समझा कि ये ज़रूर जोशी ने लगाया होगा। मिस शिलांग पास के बिस्तर पे बैठी कॉपियाँ जाँचती जोशी से बोली –
“थैंक्स, अच्छा हुआ कि तुमने मेरे बाम लगा दिया। अब सिर का भारीपन काफ़ी ठीक है। बड़ा हल्का महसूस कर रही हूँ।“
यह सुनकर जोशी बोली – “अरे, मैंने कब बाम लगाया तेरे शिलांग !! तूने सपने में देखा क्या मुझे बाम लगाते और वह हँसने लगी।“
मिस शिलांग आँख फैलाए जोशी को शक़ से देखती बोली– “देख बीमार से मज़ाक अच्छा नहीं, मेरे माथे पे इतना बाम क्या कोई भूत लगा गया फिर ? “
जोशी इस बार गम्भीरता से उसे समझाती बोली – “ सच शिलांग, क़सम से, तेरे बाम लगाना तो दूर, मैंने तुझे छुआ तक नहीं।“
यह सुनकर शिलांग अनमनी सी हो गयी और मुँह ढक कर लेट गई। सोचने लगी, पहले फल, अब ये बाम..... ये क्या चक्कर है, या कोई जादू है,या ईश्वर धरती पे उतर आया है...!!!
फिर जोशी बोली – “ सुन-सुन तेरे लिए सेब भी ले आई हूँ, पर ये ड्रेसिंग टेबल पे इतने फल कहाँ से आए ? “
मिस शिलांग तो ख़ुद यह राज़ जानना चाहती थी, बोली -
“ मैं तो हैरान हूँ, जब ये फल न तुमने ख़रीदे, न शेरसिंह ने तो फिर ये यहाँ कैसे आए ? “
उनकी बातें सुनकर पास वाले कमरे से मिसेज़ गुप्ता, मिसेज़ दुबे और मिस सौलोमन भी आ गई। सबको कुछ भी समझ नहीं आ रहा था कि इसे किसी की शरारत कहें या इत्तेफ़ाक.....। सबने शिलांग से आराम करने के लिए कहा और ख़ुद भी काम में लग गई। तीसरे दिन मिस शिलांग का बुखार उतर गया। दो दिन और आराम करके, उसने भी सोमवार से स्कूल ज्वाइन कर लिया। स्कूल के ढेर कामों और नियमित व्यस्त दिनचर्या में धीरे-धीरे वह घटना सबके दिमाग से निकल गई, लेकिन अवचेतन मन में ज़रूर सवालिया निशान बनकर चिपक गई।

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जनवरी की कोहरे भरी ठंड, हर दूसरे दिन बर्फ़ गिरती। सारी प्रकृति बर्फ़ से ढकी हुई, पेड़, शाख़ें, पत्ते, क्यारियाँ सब पे बर्फ़ जमी हुई थी। बंगले की लाल टीन की छत, बर्फ़ की मोटी तह बिछ जाने से चाँदनी की मानिन्द शफ़्फ़ाक नज़र आ रही थी। ऐसी कड़क सर्दी में सुब्ह झाड़ू लगाने वाला बूढ़ा जमादार बीमार पड़ गया। एक हफ़्ते तक काम पे न आ सका। लेकिन इस बात की किसी को ख़बर न थी। इतवार के दिन वह अपना फौजी लम्बा कोट पहने, कानों पे मफ़लर लपेटे एवटाबाद हाउस में सबसे मिलने और सलाम करने आया और सबसे पहले लॉन में टीचर्स के साथ ईज़ी चेयर में लेटी, धूप सेकती, प्रिंसिपल मिस जंगपांगी के सामने हाथ जोड़कर बोला –
“ मेमसाब, मैं एक हफ़्ते से बीमार था, इसलिए सबेरे झाड़ू लगाने नहीं आ सका। कल से (सोमवार) मैं काम पर आना शुरु करुँगा।“
यह सुनकर सब चकित होती एक साथ बोली –
“ हमें तो पता ही नहीं चला कि तुम नहीं आ रहे हो क्योंकि हमें तो बराम्दे, लॉन, सब जगह झाड़ू लगी मिलती थी, कहीं भी कचरा, एक भी पत्ता, तिनका पड़ा नहीं मिला और तुम बता रहे हो कि तुम बीमार होने के कारण आए नहीं, तो फिर रोज़ कौन सफ़ाई करके जाता था। तुमने किसी को भेजा था क्या सफ़ाई के लिए ? “
यह सुनकर जमादार बोला – “नहीं मेमसाब, मैंने किसी को नहीं भेजा।“
मिस जंगपांगी ने अनुमान लगाते हुए कहा –
“ कहीं गोविन्दराम या शेरसिंह ने तो अपने आप यह काम नहीं सम्भाल लिया, तुम्हारे न आ पाने से... ? “
यह सुनकर जमादार भी ख़ामोश, निरुत्तर खड़ा रह गया। उसे भी कुछ समझ नहीं आया कि ऐसे कैसे हो सकता है कि उसके न आने पे भी सफ़ाई होती रही... ?!! ख़ैर, वह अंजाने ही सबको सोचने का एक अटपटा सा विषय दे गया जिसका दूर-दूर तक कोई ऐसा छोर नहीं मिल पा रहा था कि जिससे गुत्थी सुलझे। मिस जंगपांगी ने कुछ देर बाद शेरसिंह को बुलाकर बंगले की सफ़ाई के बारे में पूछा तो उसने इंकार किया। फिर वे बोली –
“जाओ, सर्वैन्ट क्वार्टर्स में जाकर सबसे पता करके आओ कि 4-5 दिन तक सुब्ह बाहर की सफ़ाई किसने की ? “
शेरसिंह सिर हिलाता क्वार्टर्स में गया और पता करके आया कि किसी ने भी सफ़ाई नहीं की। अब तो यह रहस्य एक अनबूझ पहेली बन गया – टीचर्स से लेकर सभी नौकरों तक के लिए।
रात के 10 बजे थे। शेरसिंह पानी का जग लेकर दीदी लोगों के कमरे में रखने जा रहा था, जैसे ही वह रसोई से निकला, उसे फूलों की क्यारियों के पास सफेद कपड़ों में एक ऊँचे क़द का आदमी नज़र आया। सहसा वह डर के चीखा –
“भूत.........भूत..... भूत ..............“
तभी नीचे क्वार्टर से रात की ड्यूटी के लिए ऊपर आता चौकीदार शेरसिंह की डरी चीख़ सुनकर रसोई की ओर तेज़ी से लपका और बोला –
“अरे, क्या हुआ, कहाँ है भूत.......? “
शेरसिंह के चेहरे पे हवाईयाँ उड़ी हुई थी, वह झाड़ी की तरफ़ इशारा करता घिघयाए गले से बोला –
“वो देखो, उधर.........“
पर तब तक वहाँ कोई नहीं था। चौकीदार उसे शेरसिंह का वहम समझ कर हँसता हुआ बोला –
“चल डरपोक कहीं का। आ, मैं चलता हूँ तेरे साथ कमरे तक।“
कमरे में शेरसिंह के साथ चौकीदार को आया देख मिसेज़ गुप्ता ने पूछा –
“शेरसिंह के साथ तुम इस समय कैसे चौकीदार।“
इस पर चौकीदार फिर से हँसता हुआ बोला -
“इस डरपोक को झाड़ी के पास भूत दिखा, तो मैं इसके साथ आया हूँ।“
यह सुनकर गुप्ता ही नहीं और टीचरों के भी कान खड़े हो गए। उन्हें, शेरसिंह को इस तरह भूत का दिखना, कोई वहम नहीं बल्कि सच लगा। सबको लगा कि एवटाबाद हाउस में जो रहस्यमय ढंग से कुछ-कुछ, जब-तब घटता रहता है, उसके पीछे हो न हो, भूत ही है। पर सब खौफ़ से भरी चुप रहीं और अपने-अपने बिस्तरों में ऐसे दुबक के लेटी कि जैसे भूत से छुप रही हों।

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कुछ दिन बाद सभी ने मिस जंगपांगी से गम्भीरतापूर्वक इस बारे में बात की और डॉ.शाह को एक दिन बंगले पे बुलाकर इस विषय में विस्तार से बताकर कोई निदान निकालने का निवेदन किया। अगले रविवार को डॉ. शाह लंच पर आए। उन्होने टीचर्स की सब बातें बड़े धैर्य से सुनकर उस राज़ का खुलासा किया जिसका ज़िक्र वे बेबात ही किसी से करना ठीक नहीं समझते थे। लेकिन जब प्रगट रूप से एवटाबाद में रहस्यमय घटनाएँ घट ही रही थीं तो उन्होने भी बताना उचित समझा। वे सबको शान्ति से समझाते बोले –
“देखिए, घबराने की या डरने की कोई बात नहीं। यह बंगला अँग्रेज़ों से पहले एक गढ़वाली अफ़सर का था। वही इसका मालिक था। सुना गया है कि एक बार परिवार के साथ पिकनिक पर गए हुए उस अफ़सर की एकाएक पहाड़ी से पैर फिसल जाने के कारण असमय दर्दनाक मृत्यु हो गई थी। ज़ाहिर है, उसे अपने इस बंगले से बड़ा लगाव रहा होगा, ऊपर से अचानक असमय मौत, तो ऐसे में कई बार इंसान की आत्मा भटकती है, उसकी मुक्ति नहीं होती। लैन्सडाउन में रहने वाले पुश्तैनी लोगों का कहना है कि आज भी उस अफ़सर की आत्मा अपने प्यारे घर के आसपास रहती है।वह इस बंगले और इसमें रहने वालों को कभी नुक़सान नहीं पहुँचाता, वरन उनका भला ही करता है, मदद करता है। जैसे जब मैं अपने परिवार सहित यहाँ रहता था तो एक बार रात 9 बजे के लगभग मुझे एक इमरजैन्सी केस देखने शहर जाना पड़ा। लौटने में देर हो गई। रात के यही कोई 11 बजे होगें। मैं पैदल बड़ी टॉर्च की रौशनी दूर तक फेंकता तेज़ कदमों से बंगले की ओर चलता चला आ रहा था कि तभी पीछे से एक छोटी कार मेरे पास आकर रुकी और उसमें बैठे सज्जन ने मुझे यह कहकर लिफ़्ट दी कि वह भी चेटपुट लाइन्स जा रहा है अगर मुझे भी उधर ही कहीं जाना है तो वह छोड़ सकता है। थका हुआ तो मैं था ही, तो मैं उसकी इस उदारता का शुक्रिया अदा करता कार में बैठ गया। रास्ते में हमारे बीच कोई ख़ास बातचीत नहीं हुई। मैं अपने परिवार के पास पहुँचने की जल्दी में था। गेट पर कार के पहुँचते ही, मैं धन्यवाद देता कार से उतरा और गेट के अन्दर आते ही, जैसे ही शिष्टाचारवश मैं उस व्यक्ति को ' बॉय बॉय' कह कर हाथ हिलाने को मुड़ा तो पाया कि उस एक क्षण के अन्दर वह कार सहित ग़ायब हो चुका था। दूर तक कार कहीं भी दिखाई नहीं दे रही थी। मैं ठगा सा खड़ा रह गया।“
इसी तरह एक बार वह भूत मेरी बेटी जया के हाथ में फ़्रैक्चर होने पे मेरे घर के नौकर प्रेमसिंह के रूप में मेरे अस्पताल के कमरे में आया और जया के फ़्रैक्चर के बारे में बता कर ग़ायब हो गया। मैंने तुरंत अस्पताल से चार कर्मचारियों को स्ट्रैचर लेकर कंपाउडर सहित इस बंगले पे भेजा और इस तरह उचित समय पर जया के प्लास्टर वगैरा चढ़ गया। शाम को घर लौटने पर मैंने जब अपनी पत्नी से कहा कि ये तुमने अच्छा किया कि प्रेमसिंह से जया के फ़्रैक्चर की मुझे सूचना अस्पताल में भिजवा दी, वरना इसके हाथ में बहुत सूजन आ जाती, तो वह अचरज से भरी मेरी ओर देखती बोली –
“मैंने कब प्रेम सिंह को भेजा, उल्टे मैं ही आप से पूछने वाली थी कि आपको 3 कि.मी. दूर अस्पताल में किससे सूचना मिली कि आपने कर्मचारियों को स्ट्रैचर लेकर कंपाउडर सहित यहाँ बंगले पे भेजा।“
पत्नी से यह सुनते ही डॉ. शाह को समझते देर नहीं लगी कि प्रेम सिंह का रूप में उन्हें सूचना देने वाला कोई और नहीं, बल्कि 'उपकारी भूत' ही था, जो एवटाबाद में रहने वालों का शुभचिन्तक और निस्वार्थ मददगार था। सो आप लोगों को मेरी नेक़ राय है कि आप निश्चिन्त होकर यहाँ रहिए और ज़रा भी उस भली आत्मा से डरने की ज़रूरत नहीं। आपको तो बिन माँगे एक अदृश्य शक्तिशाली रक्षक मिला हुआ है। आपको तो सुरक्षित महसूस करना चाहिए। आप अपना काम कीजिए, उस उपकारी को अपना काम करने दीजिए। इसमें परेशानी क्या है। साल भर के अदंर आप लोगों की सरकारी स्कूल बिल्डिंग बनने वाली है और साथ में 15 कमरों का टीचर्स हॉस्टल भी, तो वैसे भी स्थायी रूप से आपको इस बंगले में रहना नहीं है। कुछ देर बाद डॉ.शाह चले गए। सब टीचर्स भी कमरों में लौट आई। डॉ.शाह से बात करके वे काफ़ी आशस्वत हुई, फिर भी भूत शब्द ही ऐसा है जो अच्छे-अच्छे हिम्मत वालों के पसीने छुटा दे, तो फिर उन कम उम्र युवतियों का भय स्वभाविक था। लेकिन अब वे अपने भय को दूर के लिए दिल से कोशिश में थी।
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इधर छ महीने से बंगले में कोई भी रहस्यमय घटना नहीं घटी थी। जबकि अब सभी टीचर्स उस बंगले के असली भूतपूर्व मालिक उपकारी भूत के एक बार दर्शन करने को मन ही मन इच्छुक रहती थी क्योंकि डॉ.शाह के द्वारा उसके गुणगान सुनकर, वह उन्हें अपना दोस्त लगने लगा था। सभी महीने में एक दो बार उसका ज़िक्र करके याद करती, पर वह जैसे बंगले पे आना भूल गया हो, उन्हें ऐसा लगता। तभी 25 जुलाई को, मिस सौलोमन के जन्म दिन पर उसने बहुत दिनों बाद अपनी उपस्थिति का भान कराया। उस दिन सुब्ह उठते ही सभी टीचर्स ने बारी-बारी से सबकी चहेती मिस सौलोमन को “मैनी हैप्पी रिटर्न्स ऑफ़ द डे” कहा और ढेर शुभकामनाएँ दी। शाम को बर्थ डे केक, समोसे, मिठाईयाँ, गरम-गरम पकौड़ी और स्पेशल चाय वाली छोटी सी पार्टी बंगले पर रखी गई। प्रिंसिपल को भी मिस सौलोमन के कमरे में स्कूल के बाद आने का निमंत्रण दे दिया गया। शाम को जब टीचर्स स्कूल से लौटी तो, देखा कि मिस सौलोमन के कमरे में मेज़ पे बेहद ख़ूबसूरत फूलों का बड़ा सा गुलदस्ता रखा हुआ था । कमरा फूलों की ख़ुशबू से महक रहा था। सभी ने उस गुलदस्ते का राज़ तो भांप लिया था फिर भी अपने अनुमान को पक्का करने के लिए शेर सिंह से पूछा -
“कोई पीछे आया तो नहीं था ?”
शेरसिंह ने बताया – “कोई भी नहीं ”
इससे सब जान गए कि ये उस भले भूत की तरफ़ से मिस सौलोमन को बर्थ डे का तोहफ़ा था। मिस सौलोमन ने उसे एक बड़े फ़्लावर वाज़ में पानी भर कर बड़े प्यार और सम्मान से लगाया और उसके आगे हाथ जोड़कर विनम्रता से “थैंक्स” कहा। इस तरह हर दूसरे तीसरे महीने छोटी-बड़ी मदद उसकी ओर से होती रहती। सबको अब उसकी मदद भली लगती और सब उसे खामोशी से शुक्रिया देती। उन सबका उस अदृश्य दोस्त से एक आत्मिक रिश्ता क़ायम हो गया था। वे तो अब नए हॉस्टल में जाने को भी पहले जैसी उतावली नहीं थी। ये भी जानती थी कि एक दिन तो उस एवटाबाद हाउस से उन्हें विदा लेनी ही है, लेकिन अदृश्य दोस्त से उनमे से कोई भी विदा नहीं लेना चाहती थीं। एवटाबाद हाउस और उसका “केयर टेकर” वह ख़ामोश उपकारी भूत हमेशा के लिए उनके दिल में जगह बना चुका था।

(कहानी) आस्था

करुणा हैरान थी, सोच में पड़ी थी कि यह इत्तेफ़ाक है या दैवी कृपा या चमत्कार है या कोई अनहोनी है ? वास्तुशात्र में गहरी रुचि के कारण उसने नौकरी के साथ – साथ इस विषय पर प्रसिध्द वास्तुशात्रियों की पिछले दो वर्ष से अनगिनत किताबें पढ़ डाली। साथ ही, उत्सुक्तावश करुणा ने चाइनीज़ वास्तुशात्र “फ़ैन्ग-शुई” पर भी ख़ासा अध्ययन चाइनीज़ और भारतीय वास्तुशात्र की समानता और असमानता की थाह लेने की दृष्टि से किया। इसके उपरान्त उसने अपने घर में दोंनो वास्तु का प्रयोग करके परीक्षण करना शुरू किया। उसने अनुभव किया कि कुछ चीज़ों में उसे लगभग एक महीने के अन्दर परिणाम मिलने शुरू हुए, जबकि कुछ में एक सप्ताह में ही अप्रत्याशित रूप से सकारात्मक घटने लगा। वह इस विज्ञान के माध्यम से,घर में आए परिवर्तनों से ख़ुश होने से ज़्यादा, चकित अधिक थी। इतने कम समय में परिणामों की तो उसने तनिक भी उम्मीद नहीं की थी। स्थायी घर मिलने में उसे लगभग एक साल का समय लगा, जो सही था। इतना समय तो लगना भी चाहिए। इससे उसकी आस्था वास्तुशात्र के तर्कयुक्त विज्ञान में और भी गहरी हो गई। करुणा का अटल विश्वास था कि कोई भी काम ढंग से करने के लिए लगन और परिश्रम ज़रूरी होता है, जीवन में सुख – शान्ति इंसान के सकारात्मक कर्मों, सच्ची और अच्छी जीवन शैली पर निर्भर करती है । लेकिन यह भी निर्विवाद सत्य है कि यदि हम वास्तुविज्ञान को जीवन में एकनिष्ठता से अपनाए तो सुख – शान्ति, और सम्पन्नता- समृध्दि दुगुनी हो सकती है। जीवन के वास्तु से आवृत्त होने पर कठिन से कठिन काम भी सरलता से अच्छे परिणाम देने वाले हो जाते हैं। करुणा ऑफ़िस में भी लंच टाइम या कभी भी खाली समय मिलने पर वास्तुशात्र की पुस्तकें पढ़ती और उन पढ़ी-गुनी बातों को परीक्षण हेतु एप्लाई भी करके देखती। उसने भारतीय और चाइनीज़ वास्तुशात्र का मिश्रित प्रयोग करके अनेक सकारात्मक परिणाम घटते अनुभव किए। उसने लाफ़िंग बुध्दा, मैटल चाइम, क्रिस्टल, सिक्के, आदि वॉटर ज़ोन, वुड ज़ोन, मैटल ज़ोन आदि में “फ़ैन्ग-शुई” के नियमानुसार घर में रखे। वह इन चीज़ों के रखने के दिन से लेकर, परिणाम मिलने के दिन तक की अवधि भी नोट करती। कभी परिणाम एक सीमा पे आकर रुक जाते और अटके से रहते। करुणा उन प्रतीक चिन्हों को एक ख़ास अवधि के बाद फिर से उर्जित करती और पाती कि उर्जा चक्र सक्रिय होता जाता व परिणाम करवट लेने लगते। उसने अपने घर के अलावा ऑफ़िस रूम में भी अपेक्षित प्रयोग इस तरह से किए कि कोई नोटिस न कर पाए क्योंकि वह अपने इन आस्थापरक प्रयोगों को सब की नज़र से परीक्षण अवधि तक बचा कर रखना चाहती थी। धीरे-धीरे उसने अपने संबंधीजनों व परिचितों को भी उनकी आवश्यक्तानुसार छोटी-बड़ी बातों में वास्तु अपनाने के सुझाव यदा कदा देने शुरू किए। वह जानती थी कि इस तरह के आध्यात्मिक, तर्कयुक्त एवं भावनात्मक आस्था से जुड़े तथ्यों को ऐसे ही किसी पर थोपा नहीं जा सकता। उचित समीकरण का ध्यान रखते हुए, सही प्रयोग द्वारा ही उनकी अर्थवत्ता को सिध्द किया जा सकता है। इसलिए जब संबंधीजनों व परिचितों को सकारात्मक परिणाम मिले तो, उन सबका भी विश्वास प्राचीन शास्त्रों में उल्लिखित इस विज्ञान के प्रति सक्रिय हुआ और उन्होंने करुणा से अपने घरों में मिश्रित वास्तु के आधार पर व्यवस्थाएँ करवाई। वास्तु के बारे में इतना सुनने के बावजूद भी वे इसे अपनाने की हद तक आस्थावान नहीं थे। किन्तु करुणा की वजह से उन सबकी भी वास्तु में रुचि जागी और इच्छित परिणाम पाकर उनका विश्वास भी क़ायम हुआ।
करुणा ऑफ़िस लौटकर, बिस्तर पे रिलैक्स्ड मूड में पसरी आराम ही कर रही थी कि तभी ट्रिंग- ट्रिंग फ़ोन की घंटी बज उठी। उस समय वह पूरी तरह अपने साथ होना चाहती थी, सो घंटी से वह थोड़ी खीझी सी, लेकिन दूसरे ही पल उसके संस्कारी मन ने उसे फ़ोन की ओर बढ़ा ही दिया और फ़ोन उठाकर वह बोली –
“यैस, करुणा हियर”।
“करुणा गर्ग” ? उधर से किसी बुज़ुर्ग का भारी स्वर उभरा।
“जी हाँ बोल रही हूँ.... “
“बेटा, मैं राजेन्द्र कुलकर्णी बोल रहा हूँ। कुछ लोगों से तुम्हारी वास्तु कन्सल्टैन्सी की तारीफ़ सुनी है। पता चला है कि तुम वास्तु और फैन्ग शुई दोंनो को मिलाकर बड़े कामयाब सुझाव देती हो।“
“जी, थोड़ा बहुत कुछ कर लेती हूँ “– करुणा सोचती सी बोली।
“क्या हमारे घर आ सकोगी ? “
बुज़ुर्गवार के ममत्व भरे विनम्र निवेदन को करुणा टाल नहीं सकी और उसने उनका घर का पता, फोन नम्बर वगैरा लेकर, उन्हें रविवार का दिन दिया।
दो दिन से ऑफ़िस में वर्कलोड अधिक होने के कारण करुणा कुछ थोड़ी थकान सी महसूस कर रही थी। लेकिन उसका दिमाग चुस्त था। शारीरिक थकान तो वह जब-तब महसूस करती थी पर उसने मानसिक रूप से कभी भी थकान नाम की चीज़ नहीं जानी थी। अपनी क्षमता से अधिक घर बाहर का काम करने के कारण ही वह थकती थी, वरना वह एक्टिव, बल्कि ओवरएक्टिव ही रहती थी। नीलिमा उससे अक्सर कहती कि – “मैं तो कोई काम किए बिना ही, नैकरों-चाकरों की सेवा में रहती हुई भी थकी रहती हूँ और एक तू है कि इतने काम करके भी उफ़ तक नहीं करती, जब बिल्कुल ही हद हो जाती है तभी तू थकती है, क्या राज़ है डियर मैडम तुम्हारी इस ताज़गी और चुस्ती का ?“ यह सुनकर करुणा हमेशा मुस्कुरा भर देती। आज करुणा ने सोचा कि नीलिमा के घर धावा बोला जाए, वह पिछले कई दिनों से उसे उलाहना भी दे रही है कि घर नहीं आती, सो उसने सीधे नीलिमा के घर की ओर कार मोड़ दी। कोरेगाँव पार्क आते ही उसने नीलिमा के बेटे के लिए “जर्मन बेकरी“ से “ब्लैक फ़ॉरेस्ट“ पेस्टरीज़ ली और झटपट अपनी “बालेनो“ को उसने लेन नंबर सात के अन्दर दौड़ा दिया। कार पार्क करके फ़र्स्ट फ़्लोर पे पहुँच कर करुणा ने तत्परता से कॉल बैल बजाई। सामने नीलिमा की ‘डॉमेस्टिक हैल्प’ मंगला खड़ी थी, हँसते हुए नमस्ते करती बोली – “अइला दीदी जी आप ! कितने दिन में आया आप ?“ अरे “आया“ नहीं “आई आप“ बोलो, करुणा उसे सुधारती सोफ़े पे बैठ गई, तभी अचानक उसे यूं सामने देख नीलिमा ने खिलखिलाते हुए गले से लगाया “वाह, क्या बात है, व्हाट ए ग्रेट सरप्राइज़, - तो आज याद आ ही गई मेरी। अब खाना खाए बिना नहीं जाने दूँगी, पहले ही बताए दे रही हूँ।“ करुणा भी घोषणा करती बोली कि - “इसी इरादे से तो अचानक धावा बोला है कि चाय से लेकर खाने तक, सब खाकर, तुझे निहाल करके ही जाऊँगी। सच तो ये है नीलू कि पिछले दो दिनों से ऑफ़िस में वर्कलोड अधिक होने के कारण आज मेरा घर जाने का, फिर अकेले – अकेले खाना बनाने का मन ही नहीं था सो तुझसे बिना पूछे, दोस्ती के पूरे अधिकार के साथ मैंने तेरे घर पे धावा बोल दिया। सोचा मिलना भी हो जाएगा और तुझसे मिलकर थकान भी छूमन्तर हो जाएगी।“
नीलू ने प्यार में आकर करुणा के गले में बांहे डाल दी और मंगला से चाय नाश्ता लाने के लिए कहा। कब रात के 10 बज गए, करुणा और नीलू, उसके पति व बेटे को पता ही नहीं चला। करुणा ने सबसे विदा ली और 11 बजे घर पहुँच कर, हाथ –मुंह धोकर, ब्रश करके बैडरूम में मोपासां की कहानियों की किताब लेकर लेट गई। पढ़ते – पढ़ते कब उसकी आँख लग गई, सवेरे आँख खुली तो देखा घड़ी 8 बजा रही थी। “ओफ़्फ़ो, इतनी देर हो गई“ – बुदबुदाती हुई, वह हड़बड़ा कर उठी और तौलिया लेकर बाथरूम में घुस गई। शॉवर लेकर बिना सांस लिए रफ़्तार से तैयार हुई। पूजा करी और किसी तरह लपट झपट कर चाय बनाई, पी और ऑफ़िस के रवाना हो गई। देर होने की वजह से नाश्ता भी न कर सकी, ख़ैर वह तो ऑफ़िस कैंटीन से भी मंगा लेगी। रास्ते में मिलने वाले गिल्लू से उसने रोज़ की तरह छोटी सी माला ख़रीदी और कार में रखे गणेश जी पर माला चढ़ा दी। इतने में ग्रीन सिग्नल हो गया और उसने भी रफ़्तार से कार दौड़ा दी। कई दिनों से कार का थर्ड गियर ठीक से नहीं लग रहा था, कहीं कुछ अटकाव सा था। सोचा शाम को लौटते समय मिकैनिक को दिखायेगी। कार की सर्विसिंग भी ड्यू थी। ऑफ़िस में उसका सारा दिन फ़ाइलों से जूझते हुए बीता। शाम को कार वर्कशॉप में ले जाकर, उसने मिकैनिक को सौंपी और ईस्ट इट्रीट की दुकानों में फ़ैंग शुई का सामान खोजने लगी। अंत में एक दुकान पे उसे “वुडेन चाइम्स“ और सिरेमिक का फव्वारा मिल गया। वह उत्साहित सी डिलीवरी ब्वाय को कार तक साथ लाई। मिकैनिक ने ऑयल वगैरा चैक करके गियर ठीक कर दिया था, साथ ही ज़रूरी चीज़े भी चैक कर ली थी। पीछे के दरवाज़े का हैंडल भी उसने बिना कहे ठीक कर दिया था। करुणा ने एक के बाद एक चारों गियर डाल कर देखे और मिकैनिक को रुपये देने के लिए जैसे ही पर्स खोला, तो वह बोला – “मैडम, आप परसों कार वर्कशॉप में छोड़ दीजिए सर्विसिंग के लिए । आज तो कोई काम ही नहीं था – इसका कुछ नहीं बनता “। करुणा भी उस भलेमानुस पे मुस्कुराये बिना न रह सकी। “ठीक भय्या, थैंक्स तो दे सकती हूँ“। वह भी ‘हाँ’ में सिर हिलाकर, सलाम ठोकता चला गया।
महानगर की सबसे बड़ी त्रासदी है शाम का उमड़ता ट्रैफ़िक और पौल्यूशन के घुमड़ते बादल। ऑफ़िस घर से इतना दूर नहीं था जितना कि वाहनों की घनछत भीड़ के कारण दूर लगता था। ऐसी भयंकर रेलपेल में कार चलाना किसी टॉर्चर से कम नहीं था। घर का एक घंटे का रास्ता वह दो घंटे में तय कर पाती थी। उसकी कार चौराहे के पास थी कि तभी ग्रीन लाइट बंद हो गई और रेड लाइट दमदमा उठी। इतने में सीट पर रखा मोबाइल झनझना उठा। करुणा ने देखा कि कोई अजनबी नंबर उस पे झलक दिखला रहा था। कार रुकी थी तो उसने जल्दी से बात करना ठीक समझा। उधर से कोई खुरदुरा पुरुष स्वर मोबाइल से उसके कान में टकराया,
“मे आइ स्पीक टू करुणा गर्ग“ ?
“स्पीकिंग- मे आइ नो हू इज़ ऑन द लाइन “ ?
“दिस इज़ समीर सिन्हा “
“जी कहिए“
“मैं अपने एपार्टमैन्ट में आपसे वास्तु संबंधी कंसल्टैन्सी चाहता था। आपको कब सुविधा रहेगी आने की ?“
“देखिए प्लीज़ मैं प्रोफ़ैशनल वास्तुशास्त्री नहीं हूँ। मैं तो शौकिया यूं ही थोड़ा बहुत कर लेती हूँ।“
“तो आप शौक को संजीदगी से व्यवसाय में बदल दीजिए। गैरों का भला भी हो जाएगा और आपको आर्थिक लाभ भी, प्लीज़।“
करुणा चाहते हुए भी ‘गैरों का भला’ इसके आगे कुछ न कह सकी। फिर बोली –
“आप मुझे 7 बजे फ़ोन करें कृपया, इस समय मैं ट्रैफ़िक में फँसी हूँ।“
6:30 तक वह फ्रैश होकर बालकनी में बैठी शिकंजी का स्वाद ले रही थी। मौसम बड़ा सुहाना हो रहा था। ड्रॉइंगरूम से मोगरे की अगरबत्ती की भीनी भीनी ख़ुशबू उसे ताज़गी का एहसास करा रही थी। अस्ताचल को ख़ामोशी से जाता सूरज, आकाश के पश्चिमी छोर को गहरे नारंगी और हल्के पीले रंग से भरता हुआ, पल-पल धरती की आग़ोश में समाता जा रहा था। सुरमई शाम बड़ी नज़ाक़त के साथ अपने आंचल से आसमान के पूर्वी हिस्से को ढांपती लहराती चली आ रही थी। ठीक 7 बजे करुणा का मोबाइल बज उठा। एकाएक उसे ध्यान आया कि यह वही व्यक्ति होगा। उसने झटपट प्रोफ़ैशनल एटीट्यूड में उतरते हुए ‘हैलो’ कहा।
“जी, मैं समीर सिन्हा “
“ओ, यैस...... वैसे मि. सिन्हा आपको मेरी वास्तु संबंधी कंसल्टैन्सी के बारे में कहाँ से पता चला ? “
“आपके ऑफ़िस के मिलिन्द देशमुख से।“
“ओह, आइ सी.......मिलिन्द देशमुख, लेकिन उनसे इस विषय पर मेरी कभी किसी तरह की चर्चा नहीं हुई, न ही मैंने ऑफ़िस में किसी को अपने इस शौक के बारे में कुछ बता रखा है। फिर उन्हें कैसे पता चला ? एनी वे, आप मुझे अपना पता लिखा दें। रविवार लंच से पहले मैं आती हूँ।“
करुणा नीलू को 2 -3 दिन से फ़ोन करना चाह रही थी। कुछ “फ़ैन्ग-शुई” संबंधी प्रयोग उसे बताना चाहती थी। पर वह और घरवाले माने या न माने, यह सोचकर अपने को रोक लेती थी। करुणा ने अपने को बहुत रोका, लेकिन अंत में उससे रहा नहीं गया तो उसने नीलू को फ़ोन कर ही डाला।
“हैलो, हैलो, नीलू, ये मैं करुणा..... “
“हाँ करुणा, कैसे याद किया ? “
“नीलू , एक बिन माँगा सुझाव देना चाहती थी; तू अपने बैडरूम के परदों का रंग बदल दे और वो जो लकड़ी का शेल्फ़ उत्तर दिशा में रखा है, उसे पूरब वाली दीवार से लगा कर रख।“
“पर क्यों करुणा ? “
“ये मैं तुझे कुछ दिन बाद बताऊँगी.....देख अभी जानने की ज़िद मत करना प्लीज़।“
क्षण भर के लिए कुछ और बातें करके, करुणा ने फ़ोन रख दिया।

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आज रविवार था। करुणा को आज राजेन्द्र कुलकर्णी और समीर सिन्हा के घर जाना था। सौभाग्य से दोनों अपरिचितों के घर एक ही दिशा में थे, इसलिए उसका कीमती समय ड्राइविंग में अधिक बरबाद नहीं होगा, यह सोचकर वह खुश थी। नाश्ते के बाद तैयार होकर वह पहले बंडगार्डन कुलकर्णी जी के घर पहुँची। उसने कॉल बैल बजाई तो एक प्यारी सी लड़की ने उसका स्वागत किया। उसे समझते देर नहीं लगी कि वह कुलकर्णी जी की बेटी होगी। वह सीधे उसे ड्रॉइंगरूम में ले गई और कुलकर्णी जी को सूचित किया। कुलकर्णी जी दाएँ पैर पे ज़ोर देकर चलते ड्रॉइंगरूम में दाख़िल हुए। करुणा ने उठकर नमस्कार किया, बदले में सरल स्वभाव कुलकर्णी जी ने उसका स्वागत करते हुए आराम से बैठने का संकेत किया। करुणा ने बिना समय गंवाएँ, पहले घर का निरीक्षण करने का निवेदन किया। कुलकर्णी जी साथ चलने के लिए मुख़ातिब हुए तो करुणा ने उनके ठीक से न चल पाने की समस्या का ख़्याल करते हुए उन्हें बैठने के लिए कहा और उनकी बेटी के साथ सारे घर का भलीभांति निरीक्षण किया। तभी उसके पीछे-पीछे मिसेज़ कुलकर्णी बड़े प्यार से यह कहती आई –
“बेटा, पहले कुछ चाय वगैरा ले लेती, बाद में घर देख लेती।“
“आन्टी, आप परेशान न होएं, चाय भी पी लूँगी, लेकिन पहले काम, फिर आप जैसा चाहें।“
घर का बारीकी से निरीक्षण करके, उसने एक काग़ज़ माँगा और उस पर वास्तु के तहत अपेक्षित सुझाव लिख दिए। मि. कुलकर्णी के स्वास्थ्य के बारे में, मिसेज़ कुलकर्णी और उनकी बेटी के बारे में औपचारिक बातें करके, कुछ देर बाद उसने जाने की इज़ाज़त ली और समीर सिन्हा के घर – “बोट क्लब रोड“ की ओर उसकी कार दौड़ने लगी। 10 मिनट में वह मि. सिन्हा की सोसायटी में दाख़िल हो गई थी। वाचमैन से उसने बिल्डिंग का “बी विंग“ पूछा और लिफ़्ट से मि. सिन्हा के फ़्लैट के सामने पहुँच गई। कॉल बैल बजने पे किसी पुरुष ने दरवाज़ा खोला, शायद वह मि. सिन्हा ही थे। तभी वह व्यक्ति बोला –
“आइए आइए, मिस गर्ग न ? “
“आप मि. सिन्हा !“
“जी जी, आइए बैठिए।“
बैठने से पहले, करुणा बोली – “अगर आप पहले मुझे अपना घर दिखा दें, तो ठीक रहेगा।“
“जैसा आप चाहें... “
करुणा ने निरीक्षण करते हुए पैनी नज़र से देखा कि घर बड़ा बेतरतीब सा था। बैडरुम में तो जैसे गदर मचा हुआ था। कोई भी चीज़ ढंग से जगह पर रखी हुई नहीं थी। मेज़ पे किताबें बिखरी पड़ी थी। बिस्तर भी सुब्ह उठने के बाद से शायद बनाया नहीं गया था, कंबल नीचे लटक रहा था, चादर, तकिया सब उबासी ले रहे थे। बिस्तर के नीचे से शराब की बोतल की गर्दन झांक रही थी। बालकनी तो जैसे कबाड़ख़ाना ही थी। लगता था उसमें झाड़ू लगे 15 -20 दिन हो गए थे, छत में लटके जाले हवा से लहरा रहे थे। वह न चाहते हुए भी अनायास पूछ बैठी –
“क्या घर की सफ़ाई के लिए कोई नौकर वगैरा नहीं है क्या आपके पास ?”
“क्यों नहीं, बाई आती है न“
“तो फिर घर की ऐसी हालत क्यूँ “
“मैं तो काम पर चला जाता हूँ, वह मेरे जाने के बाद, बस अपने मन के अनुसार काम आधा अधूरा करके चली जाती है।“
करुणा ने उसके साथ असहज सा महसूस करना शुरु कर दिया था। घर की तरंगे, समूचा वातावरण करुणा को रुग्ण सा बनाने लगा था। अब तक किसी तरह वह अपने को सम्हाले थी।
वापिस ड्रॉइंगरूम में आकर वह बैठने के बजाए, वह उखड़ी-उखड़ी सी खड़ी रही, तो उसको तिरछी नज़रों से चोरी से देखता सिन्हा बोला – “आप खड़ी क्यूँ हैं, कुछ ठंडा या गरम क्या लेगीं आप ? बताइए तो कुछ कि आपने क्या देखा। “
“नहीं, कुछ नहीं लेना, प्लीज़, आप परेशान न होए ।“
“देखिए मिस गर्ग, मेरा बिज़नैस पिछले 6 महीने से बड़ा डाउन चल रहा है। कुछ समझ नहीं पा रहा हूँ कि ऐसा किस कारण से हो रहा है। हर तरह से ध्यान दे रहा हूँ, फिर भी नहीं सम्हल पा रहा।“
करुणा को मन हुआ कि उससे कहे कि सम्हलने की ज़रूरत तो बिज़नैस के साथ-साथ उसे ख़ुद को भी है। पर वह ख़ामोश रही। उतने में सिन्हा फ़्रिज से कोल्ड ड्रिंक निकाल लाया और गिलास में पलटते हुए बीच-बीच में कुछ अजीब तरह से करुणा की ओर देखने लगा। करुणा के मन में ख़तरे की घंटी बजने लगी। उसे लगा कि कहीं वह चक्कर खाकर न गिर पड़े। धीरे-धीरे उस घर का ‘सिक’ वातावरण उसकी परेशानी बढ़ाता जा रहा था।
“बताइए न करुणा जी,मुझे क्या करना चाहिए ? सुना है कि आपके द्वारा की गई वास्तु बड़ी रिज़ल्ट ओरिएंटैड होती है। हम पर भी थोड़ा करम कर दीजिए।“
उसका यह लहज़ा करुणा को वाकई आपत्तिजनक लगा। ग़म खाती सी वह बोली –
“आइ एम सॉरी मि. सिन्हा, मैं आपके घर में कुछ भी नहीं कर सकूँगी।“
“बट व्हाय ? “ कुछ तो आपको करना ही पड़ेगा। मुझे तो हर हाल में आपसे वास्तु करानी ही है।“
करुणा ने उसे समझाने की कोशिश की..... “देखिए मि. सिन्हा, परिणाम बहुत सी बातों पे निर्भर करते हैं। ये सब हासिल करना इतना आसान नहीं है, या कोई जादू नहीं है, जैसा कि आप समझ रहे हैं।“
लेकिन सिन्हा तो अपनी ज़िद पे अड़ा था कि करुणा को उसके गिरते बिज़नैस को उठाना है।
मरती क्या न करती, यह सोच कर, करुणा ने उसे वास्तु के हिसाब से अपेक्षित परिवर्तन करने के लिए कहा और क्रिस्टल, चाइम्स आदि टांगने, कछुवा जल पात्र में रखने, गोलाकार चौड़े पत्ते वाला पौधा गमले में ईशान कोण में रखने की अपनी ओर से नेक़ सलाह दी। लेकिन उसे अन्दर ही अन्दर पता था कि परिणाम “ढाक के तीन पात“ ही रहने वाले हैं। फिर भी उसने कहा कि एक महीने बाद सिन्हा फ़ोन करके उसे बताए कि क्या कुछ सुधार हुआ।
किसी तरह वह उस दम घोटू घर से निकल कर बाहर आई तो खुले आकाश के नीचे जैसे उसकी सांस में सांस आई। रात में उसे बड़ी देर में नींद आई। वह अभी तक असहज थी। इतने कम समय में सिन्हा के घर से वह कितनी ढेर नकारात्मकता अपने अन्दर समेट लाई थी। उसे पूरे चार दिन लगे अपने को पूरी तरह ठीक करने में।
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नवम्बर की गुलाबी सुब्ह थी। न जाने वर्षा किस खुशी में शरद से मिलने आई थी... हल्की-हल्की बूँदे पड़ने लगीं। मिट्टी की सोंधी ख़ुशबू उसे बालसुलभ उल्लास से भरने लगी। आज से दीवाली की दो दिन की छुट्टी थी। वह क्रॉसवर्ड लाइब्रेरी जाकर वास्तु पर सुब्रहम्णयम की नई प्रकाशित पुस्तक पढ़ना चाहती थी। कमरे में रखा फ़ोन बज उठा, और उसके साथ वह भी उठ खड़ी हुई। मि. कुलकर्णी का फोन था। करुणा के मस्तिष्क में विचार कौंधा कि अभी तो एक महीना होने में सात दिन बाकी हैं, सब ख़ैरियत तो है मेरे बुज़ुर्ग क्लाइन्ट के साथ, यह तर्क वितर्क करते हुए करुणा ने फ़ोन रिसीव किया तो उधर से मि. कुलकर्णी का प्यार और आशीष भरा स्वर कानों में गूँजा –
‘’अरे, बेटा, मान गए, तुम्हारे वास्तु निदान ने तो वाकई मेरे घर में तो जैसे चमत्कार सा कर दिया। बैडरूम में पलंग की दिशा बदलते पर, एक महीना पूरा होने से पहले ही मैं तो बेहद स्वस्थ महसूस कर रहा हूँ। मेरे पैर का दर्द, जो दवा और मालिश से भी नहीं जा रहा था, वो न जाने कहाँ, कब और कैसे चला गया आज सबेरे से। दूसरी बड़ी ख़ुशख़बरी यह कि मेरी बिटिया को विप्रो कम्पनी से एक ऊँचा ऑफ़र आया है - उसके पहली नौकरी के अनुभव के आधार पर।‘’
करुणा की ख़ुशी का ठिकाना न था। उसने उन्हें ढेर सारी बधाई दी। आज उसके अनुभव में यह बात एक बार और निर्धारित हो गई कि यदि इंसान का कर्म जगत उत्तम और स्वच्छ हो तो वास्तु के सकारात्मक परिणाम बड़ी ज़ल्दी मिलने शुरू हो जाते हैं। जैसा कि मि. कुलकर्णी के घर में घटा। चाहे भारतीय वास्तुशास्त्र हो या चाइनीज़, इन शास्त्रों के भी परिणाम देने के कुछ मानदण्ड होते हैं। ये हर इंसान, हर घर में यूँ ही आशीर्वादों की बरसात नहीं करते । पहले व्यक्ति की सुपात्रता जाँचते, परखते हैं, तब मेहरबान होते हैं, वह भी थोड़े- थोड़े विराम के साथ।
सिन्हा के घर जाए करुणा को एक महीना कल पूरा होने वाला था। कुपात्र सिन्हा के माध्यम से करुणा के अनुभव में एक नई कड़ी जुड़ने वाली थी, उसके लिए वह मन ही मन तैयार थी। पूरा दिन निकल गया, अगला दिन भी बीत गया,पर सिन्हा का कोई फोन नहीं आया। तीसरे दिन निराश, हताश सिन्हा का फ़ोन आ ही गया। वह तड़कता, भड़कता सा बोला –
“बेकार है आपका वास्तुशास्त्र, आप बेकार, आपकी फ़ैंग शुई बेकार....न घर में शान्ति, न बाहर शान्ति। बिज़नैस वैसा ही ठप है। दो कौड़ी की है आपकी फ़ैंग शुई, आपका वास्तुशास्त्र,....... “
करुणा बड़े धैर्य से अपनी और वास्तु की शान में सिन्हा के ज़हरीले शब्द सुनती रही। वह तो उसी दिन उसके घर में महसूस कर रही थी कि यहाँ वास्तु भी कामयाब होने वाली नहीं, जब तक उस आदमी के दिलो-दिमाग़ का और उसके घर का कचरा साफ़ नहीं होगा। अब इस नासमझ को वह कैसे समझाए कि वास्तु भौतिक और आध्यात्मिक जगत का एक ऐसा अनूठा विज्ञान है जो भारतीय ऋषियों, दिव्य द्रष्टाओं के हज़ारों वर्षों के अनुभवों व अलौकिक आन्तरिक दृष्टि के समागम से विकसित होता हुआ अस्तित्व में आया। सृष्टि के पंचतत्वों, सौरमंडल के ग्रहों की उर्जा, अद्भुत शक्तियों की महत्ता को समझते हुए ही भारतीय ऋषियों ने , जीवन में सुख –शान्ति, सम्पन्नता – समृध्दि हेतु, प्रकृति और मनुष्य तथा उसके द्वारा निर्मित रचनाकृतियों में समरसता व सन्तुलन बनाए रखने की दृष्टि से विशिष्ट सिध्दान्त ‘वास्तुशास्त्र’ नाम से विकसित किए। जीवन में उनका कितना महत्व है, उसे सिन्हा कैसे महसूस कर सकता है। प्राकृतिक उर्जा से जुड़े वास्तु और फ़ैंग शुई को जीवन में उतारने पर शत प्रतिशत परिणाम
तभी मिल सकते हैं जब इंसान की ख़ुद की जीवन शैली भी स्वच्छ और पारदर्शी हो, उसके कर्म उजले हों – शत प्रतिशत नहीं तो, कम से कम 70% का अनुपात तो सही कार्यो का हो। वरना जाने अंजाने किए गए ग़लत और निकृष्ट कर्मों की ‘नकारात्मकता’ शरीर में , समूचे जीवन में इतनी सघनता से जमा हो जाती है कि ‘वास्तु और फ़ैंग शुई‘ को उस कचरे को व्यक्ति के जीवन और घर से साफ़ करते करते एक लम्बा समय लग जाता है। जब तक स्वार्थ, चालबाज़ी, धोखेबाज़ी, ईर्ष्या, लालच, हिंसात्मक रुझान से भरे व्यक्ति के अन्त:करण व रुढ़ प्रवृत्ति के नकारात्मक अंशों का निष्कासन नहीं होता, तब तक चाहे वह ईश्वर की पूजा – अर्चना हो या वास्तु हो, सबकी शक्ति इच्छित परिणाम देने के बजाय, व्यक्ति के जीवन का कचरा निकालने में लग जाती है।
सात महीने पहले अनुराग गुप्ता की पत्नी ने जब उससे अपनी समस्या बताई कि वे लोग उनके घर से लगा हुआ फ़्लैट पिछले तीन साल से ख़रीदने की कोशिश में लगे, मकान मालिक को छ लाख भी दे दिए हैं, शेष दो लाख घर के काग़जात हाथ में आने पर देने की बात भी तय है, ज़रूरी लिखत पढ़त भी हो चुकी है, लेकिन मकान मालिक घर की चाबी देने में तंग कर रहा है। देने के लिए मना भी नहीं करता और किसी न किसी बहाने से टालता रहता है। तीन साल से इतना महत्वपूर्ण मामला अधर में बिना बात ही लटका हुआ है। पैसा भी फँसा हुआ है। इससे तो वो राशि कहीं अच्छी स्कीम में लगाई होती तो ख़ासा ब्याज ही मिलता। करुणा ने एक दिन का समय मांगा और उस सच्चे, सरल पड़ौसी युगल के लिए ‘फ़ैंग शुई’ की सिर्फ़ दो चीज़े वह ख़ुद ख़रीद कर लाई, उन्हें नमक के पानी में डुबोकर रखा। फिर धोकर, पोंछकर अगले दिन पूजा के समय अपनी अंजलि में लेकर दिल की गहराईयों से प्रार्थना करते हुए ऊर्जित किया। मिसेज़ गुप्ता के घर दस बजे जाकर, समस्या के निदान देने वाली दिशा औऱ कोण में उन ऊर्जित वस्तुओं को कायदे से रखा। सम्भवत: अगले ही दिन से गुप्ता जी के घर में ऊर्जित वस्तुओं का ऊर्जा चक्र इस तेज़ी से सक्रिय हुआ कि एक सप्ताह बीतते- बीतते पास वाले फ़्लैट की चाबी उनके हाथ में आ गई। दोनों पति-पत्नी मिठाई लिए उसके पास यह ख़ुशख़बरी लेकर आए और भाव विह्वल मिसेज़ गुप्ता तो उसके पैर ही छूने लगी। करुणा ने तेज़ी से पैरों की ओर बढ़ते उनके हाथों के थाम कर, उन्हें प्यार से समझाया कि इसके हक़दार वे दोनो ख़ुद हैं क्योंकि वे दोनों इतने साफ़ दिल के हैं कि वास्तु उनके सकारात्मक तरंगों से भरपूर घर में तुरंत सक्रिय हो गई और उनका अटका काम बन गया। इस पर ‘’ना,ना’’ करते अनुराग जी बोले कि –
“देखिए करुणा जी, ईमानदारी से, 80 % श्रेय तो आपको जाता है, क्योंकि आप दिल से प्रार्थना करके, ऊर्जित करके जिस नेक भावना से हमारे लिए वो दो चीज़े लाई, उन्हें सही स्थान पे रखा, वो सब हम नहीं कर सकते थे। 20% श्रेय हम सिर झुका कर लेने को तैयार हैं कि हम सीधे सरल हैं तो आपकी साधना ‘वास्तु के दैवी प्रताप’ से सफल हो गई।‘’
“हाँ तो देखिए न पूरा टीम वर्क है – खाली किसी एक को श्रेय नहीं जाता, सबकी अपनी – अपनी भूमिका है इस उपलब्धि में” – करुणा ने हँसते हुए कहा।
“पर आपके हाथ में शफ़ा है। आपका दिल भी तो सरल व स्वच्छ है, तभी तो ये संभव हुआ। जैसे डॉक्टर बहुत मिलेगें – एक से एक डिग्री होल्डर, लेकिन रोग को दूर भगाने का हुनर कुछ खास-ख़ास डॉक्टरों में सहज ही होता है। उनके तो हाथ रखते ही जैसे मरीज़ ठीक होने लगता है “– अनुराग ने खुशी- खुशी तर्क देते हुए कहा।
“चलिए, अब जो भी है, आपकी समस्या हल हो गई, हमें तो इस ख़ुशी में ईश्वर को शुक्रिया देना चाहिए बस” – करुणा चर्चा को विराम देने के इरादे से बोली।
करुणा को एक और वाक़या याद आया। ठीक इसी तरह दुबे जी का बेटा ऑस्ट्रेलिया से एम.बी.ए. करने की सारी औपचारिकताएँ पूरी कर चुका था, लेकिन वीज़ा मिलने में इतनी परेशानियाँ, एक के बाद एक अड़ंगे आ रहे थे कि निराश होकर उसने जाने का इरादा ही छोड़ सा दिया था। जबकि ऑस्ट्रेलियन इन्स्टिट्यूट में दुबे जी 10 लाख फ़ीस भी जमा कर चुके थे। ऐसे में काम न हो तो निराश तो होता ही है इंसान। पता चलते ही करुणा ने उनके बेटे को एक ‘क्रिस्टल’ ऊर्जित करके दिया और जैसे उसने बताया, पूजास्थल में उसे रख कर रोज़ मिसेज़ दुबे ने और बेटे ने प्रार्थना की। ठीक 8 दिन के अन्दर उसका बाधित काम बन गया। वह नई पीढ़ी का युवक चकित हुआ करुणा को “थैंक्स” कहते नहीं थका। ये अटका काम इसलिए ही बना कि दुबे परिवार की ओर से कहीं कोई कमी थी ही नहीं, एम्बैसी वाले कभी- कभी यूं ही एटीट्यूड फेंका करते हैं, सो वास्तु शक्ति ने उस निरर्थक एटीट्यूड और अकारण के अड़ंगों का सफ़ाया कर दिया और बच्चा अपने भविष्य के रास्ते पे आगे बढ़ गया।
अब करुणा वास्तु शक्ति के इन अलौकिक महीन बिन्दुओं को सिन्हा जैसे जड़ बुध्दि लोगों को कैसे समझाए ? सिवाय इसके कि ऐसे लोगों को उनके हाल पे छोड़ दिया जाए और जो इन बारीकियों के समझने, जीवन में उतारने की दिली इच्छा रखते हैं, उनका भला किया जाए। यह सोचकर करुणा स्फूर्ति से भर उठी और ऑफ़िस जाने की तैयारी में जुट गई। सिन्हा ने जो उसकी शान में फोन पर कसीदे पढ़े थे, उन्हें याद करके उसे हँसी आने लगी। उसे लगा कि कई बार नासमझ इंसान की कड़वी बातें भी किस तरह मनोरंजन का साधन बन जाती हैं। काश कि वह सिन्हा को समझा पाती कि जीना एक कला है – ‘’मूरख रो के जीता है और अक्लमंद हँस कर’’- क्या खूब कह गए ‘संत कबीर’। ईश्वर ने प्रकृति में चारों ओर इतनी सम्पदा हमें बख्शी है, उसका सदुपयोग करना, सीखना चाहिए न सबको ! काश कि ईश्वर के एश्वर्य में, प्रकृति की दिव्य शक्तियों में आस्था उपज जाए सभी लोगों की.....!!









(कहानी) दर्पण में झाँकते चेहरे


प्रकाश और नेहा के घर शादी के 15 साल बाद बच्चे का जन्म हुआ था। नेहा ने इन बीते सालों में माँ बनने के लिए कौन से इलाज नहीं करवाए, कहाँ-कहाँ मन्नत नहीं माँगी, क्या-क्या दान पुण्य नहीं किया, मतलब कि जो भी बन सका, सब किया। तब जाके ईश्वर ने सुनी और उसे एक प्यारा सा बच्चा दिया। प्रकाश की ख़ुशी सातवें आसमान पे थी। प्रकाश के माता-पिता को परलोक सिधारे 7 वर्ष हो गए थे। इस ख़ुशी के क्षण में प्रकाश के मन में रह-रह के यह ख़्याल आता कि काश आज माँ-बाबू जी होते तो कितने ख़ुश होते। अस्पताल में डॉक्टर नर्स उसे जो बताते, वह दौड़ -दौड़ कर वे दवाईयाँ, फल और ज़रूरत का सामान लाता। एक पल को भी नेहा और अपने बेशकीमती नन्हे से बेटे से वह दूर न होता। आधुनिक सुख सुविधाओं से भरपूर उस अस्पताल के प्राइवेट वार्ड में प्रकाश के रात के सोने का भी प्रबन्ध हो गया था। एक हफ्ते बाद नेहा अस्पताल से डिस्चार्ज हुई। घर में उसके ख़ास दोस्त सुधीर और उसकी पत्नी किरण ने नेहा और नन्हे मुन्ने मेहमान के स्वागत की ज़ोरदार तैयारी करके रखी थी। माँ बनने की ख़ुशी में नेहा के तो जैसे पाँव ही ज़मीन पे न पड़ते थे। वह अन्दर ही अन्दर अपनी ख़ुशी सँजोती अद्भुत स्फूर्ति से भरी थी।वह कभी बच्चे का मुख चूमती तो कभी उसके सिर पे प्यार से हाथ फेर कर दुलराती। प्रकाश बच्चे के लिए बड़ा ख़ूबसूरत पालना, उसमें बिछाने की आसमानी रंग की मुलायम गद्दी, तकिया व तमाम चीज़े लाया था।पालने में अपने सलोने से बिस्तर पे जब उनका नन्हा राजकुमार सोता, तो दोनों प्यार से भरकर अपलक उसे देखते न थकते।

प्रकाश काम से लौटते ही, नेहा के साथ बच्चे की नैपी बदलने, बोतल से दूध पिलाने, हर तरह से से उसे सम्हालने में पिता होने का फ़र्ज़ पूरी तरह निबाहता। दोंनो की जान था वह बच्चा। स्वभाविक भी था क्योंकि शादी के पन्द्रह साल बाद ढेर ख़ुशियाँ लेकर वह उन के जीवन में आया था। कुछ दिन बाद नेहा प्रकाश ने बच्चे के नामकरण सँस्कार के उपलक्ष्य में पूजा-पाठ रखा। उनके निकट संबंधी और मित्रगण सभी आयोजन में शामिल हुए और ढेर आशीर्वादों, शुभकामनाओं व रौनक के बीच पूजा-पाठ सम्पन्न हुआ। बच्चे का नाम “अनुभव” रखना तय हुआ। प्यार से वे उसे ‘अनु’ पुकारते। उसकी किलकारी के साथ किलकते, सोने पे सोते, जागने पे जागते, रोने पे बेचैन होते। देखते ही देखते दिन, महीने, साल बीतते गए और अनुभव ढाई वर्ष का हो गया।
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“अनु बेटा कहाँ है तू.....जल्दी से आ मेरे राजा, देख तेरे लिए क्या बनाया है मम्मी ने....।” लाडले अनु ने माँ की पुकार सुनी
वह - “अबी नई, अबी नई”... बोला और अपने खेल में मगन रहा। हार कर नेहा ही उसे उठाकर ले गई, उसके बिब बाँधा और उसका मनपसन्द दूध-कॉर्नफ़्लैक्स खिलाया। अनु देखने में बेहद खूबसूरत, बड़ा बुध्दिमान, चपल और होनहार था। अपनी उम्र के बच्चों से कुछ अलग ही था। उसके चेहरे पे एक ऐसी सलोनी समझदारी थी जो सबको उसकी ओर खींचती थी।

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प्रकाश ऑफ़िस के लिए तैयार हो रहा था। तभी नेहा ने उसे याद दिलाया कि आज शाम अप्पू घर जाना है। बहुत दिन हो गए। अनु पहले भी वहाँ जाकर बहुत ख़ुश हुआ था।
“ठीक है, ज़रूर चलेगें, मैं ऑफ़िस से थोड़ा जल्दी आने की कोशिश करूँगा, तुम तैयार रहना। अपने इस ‘कुनमुने’ को अप्पू घर की सैर करा के लायेगें” -
यह कहते हुए प्रकाश ने अनु के गाल थपथपाए। अनु ने उसका हाथ अपने गाल से खींचकर मुँह में लेकर काटना चाहा। प्रकाश ने उसकी इस बालसुलभ शरारत पर, उसे गोद में उठाया और उसे प्यार करता बोला –
“पाजी, पापा के कट्टी करेगा…..।“ फिर उसे नेहा को सौंपते हुए बोला –
“ लो सम्भालो अपने लाडले को” - और झटपट ऑफ़िस के लिए निकल गया।
नेहा ने अनु के लिए रीडर्स डाइजेस्ट का 2 से 4 वर्ष तक के बच्चों के लिए रंग –बिरंगे चित्रों वाला एक विशेष आकृतिमूलक ‘किट’ मंगाया था जिसमें मम्मी, पापा, आदि शब्द बोल्ड अक्षरों में अलग-अलग पट्टियों पे लिखे हुए थे। दो से चार वर्ष का बच्चा जो ए, बी सी डी, अ, आ इ,ई भी नहीं जानता वह उन शब्दों को एक-एक करके दिखाकर और उनका उच्चारण करके बताने पर जान जाता था कि यह शब्द मम्मी है, यह पापा है। वह मात्र अक्षरों की आकृतियों से तालमेल बिठाकर सही तरह से शब्द पढ़ सकता था। नेहा दिन मे खाली समय में अनु को वे आकृतियाँ दिखाकर उनके माध्यम से शब्द पढ़ना सिखाती। होनहार अनु शीघ्र ही वे सारे शब्द पढ़ने सीख गया। वह पहली बार में ही हर शब्दाकृति के उच्चारण को बड़े ध्यान से सुनता और अपने मस्तिष्क में प्रिन्ट की तरह अंकित कर लेता। अगली बार जब नेहा शब्द दिखाकर उससे पूछती जाती तो वह सारे शब्द सही पढ़ता जाता। नेहा उसकी तेज़ बुध्दि और स्मरण शक्ति पे मुग्ध हो उठती। एक रविवार को नेहा ने प्रकाश से कहा कि –
“देखो आज मैं तुम्हें बेटे की अद्भुत प्रतिभा दिखाती हूँ। मालूम है, वह शब्द पढ़ लेता है, बड़े-बड़े।“
प्रकाश बोला - “अरे, क्यों बेवकूफ़ बना रही हो - ए, बी, सी, डी पढ़ना तो दूर, अभी बोलना भी नहीं जानता, तुम कहती हो कि यह बड़े-बड़े शब्द पढ़ लेता है...।“
नेहा कुछ जवाब देने के बजाय डाइजेस्ट का किट निकाल लाई। उसने पापा, फादर, मदर, कैट, बुक, एप्पल, बैलून, वूमन, हाउस आदि शब्द एक एक करके अनु को दिखाए और वह उन्हें सही-सही पढ़ता गया। माँ बेटे का यह करतब देख कर प्रकाश हैरान रह गया। वह मान गया कि बनाने वाले ने अक्ल का अच्छा इस्तेमाल किया है और सफल प्रयोग कि शब्द आकृतियाँ हैं तो जो नाम उस आकृति को हम देगें, बच्चा उसे उसी नाम से उन्हें पुकारेगा। बाद में वर्णमाला सीखने पे वह उन शब्दों को स्वयं पढ़ भी सकेगा।
“वाह, नेहा तुमने यह किट मँगाकर पहली बार अपनी अक्ल का सही प्रयोग किया है” – नेहा को छेड़ता प्रकाश बोला।
नेहा आँखें तरेरती बोली – “हाँ हाँ, मुझे पता था तुम यही इनाम दोगे...।“ और हँसकर अनु को प्यार से गले लगाकर चूमने लगी।
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हर वर्ष अनुभव का जन्मदिन नेहा और प्रकाश उत्सव की तरह मनाते। सुब्ह से दान-दक्षिणा, हवन, पूजा-पाठ के बाद, वे अनाथ आश्रम और पास की बस्ती में ज़रूरत की चीज़ें अनु के हाथ से दिलवाते। शाम को मित्रों और उनके बच्चों के साथ पार्टी का आयोजन होता। अनुभव ख़ूब ख़ुश सबके बीच में खिला- खिला फिरता। सबके जाने के बाद फुर्सत में अनुभव को वे दोनों एक-एक करके सारे उपहार खोल कर दिखाते और सम्हालकर रखते जाते। इस तरह हँसी ख़ुशी में सारा दिन कैसे निकल जाता पता ही न चलता।

अनुभव की चाल-ढाल, उठना-बैठना कुछ अलग ही था। वह अपने उम्र की बच्चों की तरह चंचल नहीं था बल्कि अधिक समझदार और चिन्तनशील था। कभी-कभी नेहा और प्रकाश को उसमें एक विकसित समझदार आदमी की झलक आती, पर वे इस बात को अधिक तूल न देते। वह कभी भी और बच्चों की तरह खिलौनें के लिए नहीं मचलता। नेहा और प्रकाश के साथ कहीं घूमने जाता तो हर चीज़, हर जगह को बड़े ध्यान से निरीक्षण करता सा देखता, जैसे उसके अन्दर अपनी एक दुनिया थी – जिसमें में वह सांस लेता, जीता था और एक खोज में डूबा रहता था। अनुभव का अपने में मशगूल रहने का एहसास 24 घन्टे उसके साथ रहने वाली नेहा को अक्सर होता था, पर उसने हमेशा उसे अपना वहम समझ कर टाल दिया। जब वह अपने जन्मदिन पे अनाथाश्रम के बच्चों को एक-एक करके उपहार देता तो, इस तरह सलीके से सम्हाल कर देता जैसे कि कोई बड़ा पुरुष दयाभाव व प्रेम से भरकर छोटे बच्चों को दान दे रहा हो। मतलब कि उसके सारे हाव-भाव बड़प्पन से भरपूर थे।

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अनुभव जून में 4 वर्ष का होने जा रहा था। प्रकाश ने देहली पब्लिक स्कूल में एल.के.जी में उसका एडमीशन करवा दिया था। गर्मियों में नेहा और प्रकाश अनुभव को शिमला घुमाकर लाए। एक महीना कैसे बीत गया उन्हें पता भी न चला। जुलाई से अनुभव स्कूल भी जाने लगा। स्कूल का पहला दिन था, पर नन्हा अनुभव न रोया, न मचला, न डरा और स्कूल बस में बच्चों के साथ बैठकर आराम से स्कूल चला गया। दोपहर बड़ी सहजता से ख़ुशी-ख़ुशी लौट भी आया। धीरे-धीरे सब बच्चों से वह हिल-मिल गया। अपनी टीचरों का भी बड़ा चहेता बन गया था वह।उसकी क्लास टीचर सिस्टर रोज़ी उसे कई बार प्यार से उसे ‘फ़ादर अनुभव’ बुलाती। इस सम्बोधन को सुनकर अनुभव अपनी टीचर को बड़ी-बड़ी आँखें झपका कर ऐसे देखता जैसे सच में वह फ़ादर हो और टीचर एक बच्ची।
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रविवार का दिन था। नेहा ने अनुभव को नहलाकर, नीले रंग की चैक की शर्ट और नेवी ब्लू निकर पहनाकर आदमक़द शीशे के सामने खड़ा करके बाल बनाये और किचन के काम में लग गई। अनुभव अभी भी वैसे ही शीशे के सामने खड़ा था। एकाएक वह रोने लगा। जो बच्चा यूँ ही कभी रोता न हो, वह इस तरह शीशे के आगे खड़ा-खड़ा रोने लगे – यह अजीब बात थी। नेहा और प्रकाश उसका रोना सुनकर दौड़े-दौड़े आए, उसे गले लगाया, प्यार से पूछा कि क्या हुआ – कहीं दर्द है, या भूख लगी है, तमाम सवालों की झड़ी, प्यार-दुलार क्या कुछ नहीं किया दोनो पति-पत्नी ने, पर अनुभव – ‘ना, ना’ करता सुबकता रहा। फिर धीरे-धीरे शान्त होकर बोला-
“मुझे अपने घर जाना है।“
“अपने घर जाना है..........''
नेहा तुरन्त समझाते हुए बोली –“पर बेटा तुम तो अपने ही घर हो।“
इस पर अनुभव बोला – “नहीं मेरा घर तो रजौरी में है।“
यह कहते-कहते वह प्रकाश की गोद से उतर कर फिर से शीशे के सामने खड़ा हो गया और दोनों को दिखाने लगा कि देखो -
“वो रहा मेरा घर, वो देखो, कन्नू, पिंकी, चिंकी.......”
नेहा चकित सी बोली – “कौन हैं ये कन्नू, पिंकी, चिंकी.......तुम्हारे दोस्त”? “नहीं मेरे बच्चे...”
शीशे में तर्जनी से दिखाता अनुभव बोला –
“वो देखो कन्नू, पिंकी, चिंकी.....की मम्मी गौरी.. “ और उसकी आँखों से आँसू झरने लगे।
नेहा और प्रकाश को यह सुनकर पहले तो हँसी आई कि 4 साल का बच्चा कैसी बातें कर रहा है, लेकिन जब उसकी जिद थमी नहीं तो उन्होंने उसे शान्त करने के लिए कहा –
“ठीक है, कल चलेगें, अब तुम चुप हो जाओ।“
इस आश्वासन पे अनुभव चुप हो गया। उसके बाद सारे दिन वह पहले की तरह नॉर्मल रहा। खाया-पिया, सोया, प्रकाश के साथ खेला। रात को टी.वी. पे कार्टून फ़िल्म देखी और 9 बजते –बजते गहरी नींद में सो गया। सुब्ह रोज़ की तरह तैयार होकर स्कूल गया। स्कूल में उस दिन वह अपनी क्लास के एक बच्चे से बोला –
“तुम्हारे बच्चे कहाँ रहते हैं ?”
वह भोला बच्चा अनुभव के इस अटपटे से प्रश्न का क्या जवाब देता, सो वह चुप रहा। उसके ख़ामोश रहने से खीझा अनुभव थोड़ी देर बाद चीखता सा उससे बोला -
“तुम्हारे बच्चे कहाँ रहते हैं ?”
ब्लैकबोर्ड पर कुछ लिखती टीचर के कानों में भी अनुभव के ये शब्द पड़े, वह तुरन्त पलटी और उसने हैरत से अनुभव को देखा, और दूसरे सहमे बच्चे पर भी नज़र डाली। फिर बोली –
''अनुभव ये तो ख़ुद बच्चा है,जैसे तुम, उसके बच्चे नहीं हैं।''
इस पर अनुभव तपाक से बोला –
''मेरे तो बच्चे हैं, रजौरी में रहते हैं।''
उसकी इस बात को सुनकर सारे बच्चे हँसने लगे। हँसी तो टीचर को भी आई, पर दूसरे ही क्षण वह सोच में डूब गई। उसने कई वर्ष पहले पूर्व जन्म की यादों के बारे में कई सच्चे क़िस्से पढ़े थे। टीचर को लगा कि अनुभव का इस तरह बेहिचक अचानक अपने बच्चों की बात कहना पूर्व जन्म की यादों का तो मामला नहीं है।ख़ैर टीचर ने इस घटना का कहीं ज़िक्र न करके , उसे मन में ही रखा और अनुभव को अक्सर ऑब्ज़र्व करने लगी। इधर नेहा और प्रकाश भी अनुभव की हर बात पर गौर करते।
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एक दिन फिर वैसी ही घटना घटी। शाम का समय था। अनुभव शीशे के सामने खड़ा हुआ सुबकने लगा। साथ ही साथ वह अस्फुट स्वर में कहता जाता –
“गौरी मुझे तुमसे मिलना है। मुझे कन्नू, पिंकी, चिंकी की बहुत याद आती है।“
उसकी शीशे के साथ ये बातचीत सुनकर नेहा पास वाले कमरे से अन्दर आई तो उसका दिल आशंका से भर उठा। वह खामोशी से लौट गई और बालकनी में बैठे प्रकाश से अनुभव की पिछली यादों के ताज़ा होने के बारे में बताया। दोनों चिन्ताग्रसित हुए अन्दर आए और किसी तरह अनुभव को चुप कराया। एक मनोवैज्ञानिक चिकित्सिक से समय लेकर शुक्रवार को अनुभव को उसके पास लेकर गए। विस्तार से बातचीत करने पर, डॉक्टर नें अलग में प्रकाश से कहा –
“ ये और कुछ नहीं, पूर्वजन्म की यादें है जो जब-तब अनुभव के दिमाग़ में तैरने लगती हैं। जैसे-जैसे यह बड़ा होता जायेगा, यादें भी धुंधली पड़ती जायेगीं। पर अभी जब-जब इसे यादें परेशान करें तो आपको थोड़ा सब्र से काम लेना होगा। जब भी ऐसा हो तो आप प्यार से इसका ध्यान बँटाने की कोशिश करें।“
नेहा और प्रकाश सोच में डूबे घर लौटे। रात में कई बार नेहा की नींद खुली। प्रकाश भी करवटें बदलता देर में सो पाया। नेहा के दिल में तो ये डर घर कर गया कि यदि अनुभव को पिछले जन्म की यादें इतने स्पष्ट रूप से आती रहीं – यहाँ तक कि उन लोगों के नाम तक भी उसे नहीं भूले हैं, तो कहीं हम अनुभव को न खो दें। अगर वह नहीं भूला तो क्या होगा...वगैरा, वगैरा।
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अब अनुभव को हर 15 दिन में पिछले परिवार की याद सताने लगी। समस्या विकटतर होने लगी। नेहा और प्रकाश का दिल तो बैठा जाता था। कितनी मुश्किलों से यह एक बच्चा उनके जीवन में ख़ुशियाँ लेकर आया और अब वही किसी दूसरी दुनियाँ में जीने लगा था। दोनो को अपनी दुनियाँ उजड़ती नज़र आई। फिर भी दोंनो ने कमर कसके उस समस्या का डॉक्टर के परामर्श अनुसार मनोवैज्ञानिक ढंग से सामना करने की ठानी। उनकी ख़ुशियाँ, उनका वर्तमान, उनका भविष्य, सबका केन्द्र अनुभव था। वही अनुभव, उनकी आँखों का तारा, पर 15 दिन में रो-रो कर हंगामा खड़ा करने लगा।
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फरवरी की गुलाबी सर्दी थी। खुला दिन था। अनुभव स्कूल से आकर खाना खाकर सोया हुआ था। नेहा आराम कुर्सी पे बैठी पत्रिका पढ़ रही थी। घड़ी में 4 बजा था। अनु नींद पूरी होने पर उठ गया था। उसके उठते ही नेहा ने पत्रिका उठा कर रख दी और अनु को गोद में बैठाकर चुमकारने लगी।
“मेरा बेटा क्या खायेगा......पेस्ट्री खायेगा, पापा लेकर आए तुम्हारे लिए।“
पेस्ट्री के नाम से नींद की सुस्ती से धीरे-धीरे उबरता अनु हौले से मुस्कुराया और बोला –
“पेस्ट्री चाहिए अनु को।“
नेहा उसे गोदी से उतार कर, रसोई से पेस्ट्री लेने चली गई। साथ ही उसने अपने लिए चाय भी बनने रख दी। वह ट्रे में चाय का सामान लगा ही रही थी कि उसे अनु के रोने की आवाज़ आई। नेहा का दिल धड़क उठा। उसका दिल काँपा कि कहीं यह फिर वही पिछली यादों का तो झमेला नहीं है..!! वह तुरंत गैस बन्द करके कमरे में पहुँची तो जिसकी आशंका थी वही बात हुई। अनु शीशे के सामने खड़ा किसी से बात करता रोता जाता था। नेहा ने डॉक्टर की हिदायत याद करते हुए, उसका ध्यान बटाते हुए, तमाम खिलौने, तस्वीरों की सुन्दर सुन्दर किताबें उसे दिखानी शुरू की, म्यूज़िक लगाया, टी.वी. टॉम एन्ड जैरी की कार्टून फ़िल्म लगायी, पर अनु शीशे में से झाँकते चेहरों से अस्पष्ट सी बातें करता सुबकता खड़ा रहा। एक घंटा हो गया, नेहा भी परेशान हो गई। किसी भी तरह अनु बहला ही नहीं। तब अन्त में नेहा को प्रकाश के ऑफ़िस फ़ोन करना ही पड़ा। प्रकाश ने घर पहुँचते ही अनु को चुप कराने की नाकामयाब कोशिश की। अनु तब तक चुप नहीं हुआ जब तक दोनों ने उसे गौरी, कन्नू, पिंकी, चिंकी से मिलाने की बात नहीं कही। उस दिन तो अनु ने घर का पता, स्ट्रीट नंबर, फ़्लैट नम्बर वगैरा भी बता दिया। दोनों ने निर्णय लिया कि खोज करके देखी जाए कि जो पता अनु ने बताया है वह घर, फ़्लैट है भी कि नहीं। अगले दिन शाम को प्रकाश ऑफ़िस से सीधा रजौरी गार्डन की स्ट्रीट नं. 20, फ़्लैट नं. 116 पे पहुँचा। धड़कते दिल से कॉल बैल बजाई और सोचने लगा कि इस घर में सच में गौरी, कन्नू, पिंकी, चिंकी निकल आए तो, वह क्या करेगा...? वह उन्हें सच बताये या कुछ झूठ बोल दे। नहीं सच बताने से कहीं ये लोग अनु को उससे छीनने को तैयार हो गए तो...नहीं नहीं, ये तो सरासर मूर्खता होगी। अपने बच्चे को अपने ही हाथों खोना क्या अक्लमंदी होगी। वह झूठ बोल देगा कि उसे लगा यहाँ उसके एक पुराने परिचित रहते हैं, वह ग़लती से इस फ़्लैट पर आ गया और इस तरह वह इन लोगों के नाम वगैरा जानकर चला जाएगा। इतने में, इस अन्तर्द्वन्द्व में डूबे प्रकाश के सामने, एक महिला सकुचाई सी दरवाज़े से झाँकती खड़ी थी। सफ़ेद साड़ी में खड़ी उस सौम्य सी महिला ने प्रश्न सूचक दृष्टि से प्रकाश को देखते हुए कहा –
“जी, आपने ही घन्टी बजाई ?”
प्रकाश असमंजस से उबरता बोला – ''जी, जी मैंने ही। जी यहाँ गौरी रहती हैं क्या ?”
न चाहते हुए भी प्रकाश की ज़ुबान पे सच आ ही गया। अब वह भी मन ही मन तैयार हो गया कि बात घुमाने से अच्छा है कि सच बोल कर मामला एक तरफ़ा किया जाए। वह महिला बोली –
''जी मैं ही गौरी हूँ''
यह सुनते ही प्रकाश के मन पे हथौड़ा सा पड़ा। जी मैं आपसे कुछ ज़रूरी बात करना चाहता था। अगर आप थोड़ा समय दें तो हम बैठकर बातें कर सकते हैं। गौरी ने सिर से पाँव तक एक गहरी नज़र डालते हुए इतना समझ लिया कि आदमी शरीफ़ है और कुछ सोच में डूबा, परेशान सा भी है। सो उसने आश्वस्त होते हुए प्रकाश को ड्रॉइंगरूम में बैठाया। अंदर जाकर एक गिलास पानी लेकर आई और सामने कुर्सी पे बैठ गई। महिला समझदार और शालीन थी। उसकी समझदारी के कारण प्रकाश उससे सच कहने की हिम्मत जुटा पा रहा था। प्रकाश हिचकता सा बोला –
“आपके बच्चों के नाम कन्नू, पिंकी और चिंकी हैं ?”
गौरी यह सुनकर हैरान होती बोली –
“जी, ये मेरे बच्चों के नाम हैं पर आपको कैसे पता ?”
अब तो प्रकाश को पक्का विश्वास हो गया था कि वाकई अनु की पूर्व जन्म की बातें सच्ची हैं... वे एक अबोध बच्चे का प्रलाप नहीं हैँ। प्रकाश अपने को साधते हुए बोला –
''देखिए गौरी जी, जो मैं आपसे बताने जा रहा हूँ, वह सुनने में आपको अटपटा और अविश्वसनीय लगे, पर वह सच और सच के सिवा कुछ भी नहीं।''
यह सुनकर गौरी प्रकाश को आश्वासन देती बोली –
'' भाईसाहब, आप निश्चिन्त होकर कहें। मैंने पिछले 4-5 सालों में, जीवन में इतना कुछ देखा है, ऐसे अप्रत्याशित हादसों से गुज़री हूँ कि अब मुझे कुछ भी अटपटा और अविश्वसनीय नहीं लगता।''
प्रकाश ने पहले से अधिक आश्वस्त होकर, बिना किसी संकोच के अनुभव की पूर्व जन्म की यादों के बारे में, नेहा और उसके मन में अनु को खो देने की आंशकाओं के बारे में सच-सच बता दिया। यह सुनकर कुछ पल के लिए गौरी विचलित हुई इसकी आँखें नम हो आई। स्वयं को सम्हालते हुए उसने प्रकाश से बताया कि 5 वर्ष पूर्व सड़क दुर्घटना में उसके पति की मृत्यु हो गई थी। इस हादसे से वह विक्षिप्त प्रा:य हो गई थी। लेकिन किसी तरह घरवालों के सहारे, वह उस दर्दनाक़ हादसे से उबरी और अपने बच्चों पे अपना ध्यान और जीवन का लक्ष्य साधा। प्रकाश को गौरी के पति की असामयिक मौत के बारे में जानकर दुख हुआ। सब सुनने और बताने के बाद, अन्त में प्रकाश ने गौरी पर सब छोड़ते हुए कहा कि -
''अब आप ही बताएँ कि ऐसी स्थिति में, नेहा और मैं क्या करें''
गौरी बेहद शान्ति से, ज़रा भी विचलित हुए बिना सब सुनती रही। फिर धैर्यपूर्वक सधे मीठे स्वर में प्रकाश को समझाती बोली –
''आप क्यों इतनी चिन्ता कर रहे हैं। आपको इतने सालों बाद, ढेर प्रार्थनाओं और मन्नतों के बाद एक बच्चा ईश्वर ने दिया, वह आपकी अमानत है, ऊपर वाले की आप दोंनो को भेंट है, वह आपके ही पास रहेगा। भले ही पहले जनम में उससे हमारा नाता था, वह नाता उस जनम तक ही सीमित था, इस जनम में वह आपका बेटा है और आपका ही बेटा रहेगा।''
प्रकाश गौरी की फुहार सी शीतल इन समझदारी भरी बातों को सुनकर गदगद हुआ बोला –
'''आपने तो नेहा की और मेरी उलझन ही सुलझा दी। आप एक माँ के दिल की परेशानी, उसका दर्द बख़ूबी समझ सकती हैं। नेहा का तो खाना-पीना, सोना सब कुछ छुट सा गया है। वह रात दिन अनु को लेकर, उसकी यादों के कारण उससे बिछड़ जाने की कल्पना से बेहद उखड़ी हुई है।''
गौरी फिर से रस घोलती बोली –
''भाईसाहब, डॉक्टर ने आप लोगों को बताया ही है और भी आपको पूरा सहयोग दूँगी अनु को पिछले जीवन से छुटकारा दिलाने में। मैं एक बच्चे को उसके माँ-बाप से अलग करने का पाप नहीं कर सकती। तो यह डर तो आप लोग अपने मन से निकाल फेंके कि हम आपके बेटे को पिछले जनम के रिश्ते के कारण छीन लेगे। ऐसा करके न बच्चे के साथ, न आपके साथ और न हमारे साथ न्याय होगा। इसलिए बेहतर यही है कि अनु पिछली यादों को भूल जाए धीरे-धीरे और वर्तमान में जिए। सहज वर्तमान ही उसके उज्ज्वल भविष्य का मार्ग प्रशस्त करेगा।उसका हमारे पास रहना कोई सही निदान नहीं है। एक अंतराल के बाद पिछली यादों का उभरना तो एक अस्थायी स्थिति है, बीत जायेगी। मैं चाहती हूँ कि आपकी ख़ुशी अनुभव के रूप में सदा बनी रहे।''
इसके बाद प्रकाश और गौरी ने एक योजना पर विचार किया कि ज़रूरत पड़ी तो अनु के लिए ऐसा कुछ किया जाएगा कि वह पूर्व जन्म से पूर्णतया बाहर निकल कर अपने वर्तमान में जीने लगेगा। प्रकाश के मना करने पर भी मेहमाननवाज़ गौरी ने उसे चाय पिलाकर ही विदा किया। विदा लेने से पहले प्रकाश ने कन्नू,पिंकी और चिंकी को देखने की इच्छा ज़ाहिर की । गौरी ने तीनो बच्चों को बुलाया। उन तीनों में चिंकी प्रकाश को अनु से काफी मिलता जुलता लगा। अनु पहले जनम की यादें ही नहीं अपितु उस परिवार के सदस्यों की शक्लो सूरत भी अपने चेहरे में सँजोये था। प्रकाश को घर पहुँचते- पहुँचते 8 बज गया था। प्रकाश ने नेहा को गौरी के साथ हुई सारी बाते विस्तार से बताई। सुनकर नेहा गौरी के प्रति प्यार और सम्मान , भर उठी।

अगले दिन प्रकाश अनु की क्लास टीचर से भी मिला और अलग बैठकर अनु की समस्या पे थोड़ी चर्चा की। टीचर ने उस दिन पहली बार क्लास में घटी उस घटना का ज़िक्र किया जब अनु ने चीख कर दूसरे बच्चे से उसके बच्चों के बारे में पूछा था और फिर अपने तीन बच्चों के नाम बताए थे। प्रकाश ने टीचर से कहा कि अब यदि कभी अनु अपने अतीत के बारे में बात करे तो वह किसी और चीज़ में या खेल में अनु का ध्यान बटाए और इस तरह उसे सहज बनाने में मदद करे टीचर ने प्रकाश को पूरा आश्वासन दिया कि वह ऐसी स्थिति आने पर अनु को ज़रूर सम्भालेगी, क्योंकि वह भी अनुभव जैसे होनहार बच्चे को उसके ‘आज’ से जोड़ना चाहती है। वर्तमान परिवार में, अपने माता-पिता का प्यार पाते हुए, बचपन को बचपन की तरह जीते हुए सहजता से बड़ा होना अनु के स्वस्थ भावी जीवन के लिए अपेक्षित था।

नेहा, प्रकाश, गौरी, और टीचर अब अनु के सहज मनोवैज्ञानिक इलाज के लिए तैयार थे। 14 अप्रैल, बैसाखी का दिन था। जगह-जगह बैसाखी का ज़ोर-शोर था। प्रकाश के भी ऑफिस की छुट्टी थी। नेहा लंच लगाने जा रही थी कि अनु कमरे में दर्पण के सामने खड़ा गौरी, कन्नू, चिंकी, पिंकी से बातें करने लगा। जब तक उनकी झलक दर्पण में दिखती रही, वह ख़ुश रहा पर जैसे ही उनकी छवियाँ ओझल होने लगी, अनु ज़ोर-ज़ोर से रोने लगा। नेहा और प्रकाश ने पहले तो अनु को समझाया कि रजौरी में गौरी, कन्नू, चिंकी, पिंकी नहीं रहते। फिर दोनों ने कहा –
''चलो हम अभी तुम्हे रजौरी लेकर चलते हैं और वहाँ कोई कन्नू, चिंकी, पिंकी, गौरी नहीं रहते।''
नेहा ने चुपचाप गौरी को फ़ोन कर दिया कि अनु ज़िद पकड़े है और वे उसे लेकर पहुँच रहे हैं। गौरी और तीनो बच्चों ने भी पूर्व निश्चित योजना के अनुसार सब इन्तज़ाम कर लिया। जब नेहा और प्रकाश अनु के साथ रजौरी पहुँचे और गौरी के फ़्लैट की कॉलबैल बजाई तो वहाँ गौरी की जगह एक दूसरा ही परिवार स्वागत के लिए तैयार मिला। उन अजनबी चेहरों को देख कर अनुभव ख़ामोश रहा। फिर इस कमरे से उस कमरे में कुछ खोजता सा घूमता रहा। प्रकाश ने अनु को दुलारते हुए कहा –
''देखा बेटा, मैंने कहा था न कि रजौरी में कोई गौरी, कन्नू, चिंकी, पिंकी नहीं रहते हैं.....''
जी भर के तसल्ली कर लेने पर, वह नेहा और प्रकाश से बोला –
''चलो मम्मी-पापा ‘अपने घर’ चलते हैं...''
नेहा और प्रकाश को अनु के मुँह से ‘’अपने घर चलते हैं’’ यह सुनकर मन ही मन चैन पड़ा और उन्हें लगा कि अब अनु के दिलो दिमाग में यह बात धुंधली पड़ने लगेगी कि गौरी और बच्चे रजौरी में रहते हैं।
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बीतते दिनों के साथ, अब अनु को गौरी, कन्नू, चिंकी, पिंकी के चेहरे कभी-कभी दर्पण में दिखाई तो पड़ते, पर वह पहले की तरह रोता या मचलता नहीं था। उसके मन में ये बात घर कर गई थी कि रजौरी में कोई गौरी, कन्नू, चिंकी, पिंकी नहीं रहते। वह उनकी छवियों को सहजता से लेने लगा था और दर्पण के सामने से हट जाता था। क्योकि उसके मस्तिष्क वे अजनबी चेहरे उभरने लगते थे, जो वह नेहा और प्रकाश के साथ रजौरी के घर में देख कर आया था। इस तरह जब-जब गौरी, कन्नू, चिंकी, पिंकी के चेहरे जब कभी दर्पण में से झाँकते नज़र आते तो उन्हे नए अजनबी चेहरे ढाँप लेते। एक दिन नेहा देखा कि अनु स्कूल से लौटकर कपड़े बदलने के बाद दर्पण के सामने खड़ा कुछ हौले-हौले बुदबुदाया, थोड़ी देर जैसे प्रतीक्षा करता खड़ा रहा नेहा ख़ामोशी से पर्दे के पीछे से उसकी प्रतिक्रिया देखती रही। शायद गौरी, कन्नू, चिंकी, पिंकी के चेहरे या तो दर्पण में उभरे नहीं थे या उभर कर तुरंत ओझल होने लगे थे। क्योंकि अनु हौले से मुस्कुराया और बोला -
“बॉय, बॉय.....” पहले अस्फुट लघु वार्तालाप और फिर बिना रोए “बॉय, बॉय” कहना, सम्भवत पिछली यादों से “बॉय, बॉय” की सूचना थी – ऐसा नेहा को महसूस हुआ। नेहा ने खुशी से आँखें मूँद कर मन ही मन ईश्वर को नमन किया दिल की गहराईयों में निशब्द प्रार्थना करने लगी कि –
“हे ईश्वर, इसी तरह मेरे बेटे को धीरे-धीरे पिछले जीवन से निकाल कर पूर्णतया इस नए जीवन में ले आइए। वह हमारा बेटा बनकर जिए। यही उसके और हमारे लिए सुखकर और हितकर है.....“
यह प्रार्थना करते-करते नेहा कमरे में अनु के पीछे आकर खड़ी हो गयी। दर्पण में सहसा मम्मी देखकर अनु एकाएक खिल उठा और ''मम्मी, मम्मी ......''' कहता नेहा की गोद में चढ़ गया।
अनु, नेहा और प्रकाश के भरपूर प्यार के कारण भी अपनी पिछली यादों से दूर होता जा रहा था। वह जैसे-जैसे बड़ा होता गया, अतीत की यादों से बड़े ही स्वभाविक ढंग से दूर होता गया। नेहा और प्रकाश के धैर्य और डॉक्टर की सलाह व सुविचारित योजना से अनुभव रफ़्तार से अपने वर्तमान में जीता हुआ, अपनी पढ़ाई और रचनात्मक क्रियाओं में मशगूल रहने लगा। उसमें आए सकारात्मक परिवर्तन से नेहा और प्रकाश के जीवन में फिर से सुख और सुकून का सुनहरा उजाला भरने लगा था।
अलगाव से लगाव तक

‘ मुझे पता था तुम यही कहोगी’
‘पता था तो आपने पूछा ही क्यूँ ‘
‘क्यूँ का क्या सवाल, पति हूँ तुम्हारा, पूछना मेरा हक़ है ‘
‘हक़ तो आप ख़ूब जानते हैं कभी कर्तव्यों पे भी नज़र डाली है ‘
‘ओफ़्फो, तुमसे तो कुछ भी कहना बेकार है, ठीक है एक कप चाय दो जल्दी से ‘
‘ये घर है कि धरमशाला ? जब देखो कभी ताई, कभी मौसी, कभी चाचा-चाची चले आते हैं और दो दिन नहीं बल्कि दो-दो हफ़्तों तक जाना भूल जाते हैं ‘
‘चाय के साथ कुछ लोगे क्या ‘
‘पूछ क्या रही हो, अपने आप से कुछ नहीं ला सकती क्या ‘
‘अरे, अजीब बात करते है, आप अक्सर ही खाली चाय पीते हैं दफ़्तर से आकर ‘
‘तो फिर पूछा ही क्यों ‘
‘यूँ ही कभी-कभी आपका चाय के साथ कुछ हल्का फुल्का खाने का मन कर आता है, सो...’
‘तुम या तो समझदार ही हो जाओ या नासमझ ‘
‘मैं तो समझदार ही हूँ, अब तुम्हें नज़र नहीं आती – वो अलग बात है ‘
ये कपड़ों का ढेर बिस्तर पे क्यों पड़ा है, देखो सारा कमरा कैसा बेतरतीब है ‘
‘क्या करूँ सारे दिन चक्की की तरह पिसती रहती हूँ – सफ़ाई, झाड़ू, खाना,बर्तन. कपड़े धोने – सुखाने – सारा दिन ऐसा निकल जाता है कि साँस लेने की भी फ़ुर्सत नहीं मिलती, फिर भी काम नहीं निबटते ‘
‘हुँह काम नहीं निबटते......तुम हो ही फूहड़ ’
‘चलो फूहड़ ही सही, पर घर तो सम्भाल ही रही हूँ। महीनो भर ढेरों मेहमानों की आवभगत, सेवा टहल ये फूहड़ ही कर रही है ‘
‘बबली को एडमीशन के लिए कल स्कूल लेकर गई ? ’
‘गई थी, हो गया दाखिला, उसकी स्कूल ड्रेस और कॉपी – किताब आनी हैं ‘
‘ठीक है, शाम को ले आऊँगा। और कुछ ?’
‘मेरठ वाली ताई जी परसों जाने वाली हैं। उनके लिए चौड़े किनारे वाली हैन्डलूम की एक साड़ी लानी है ‘
‘हे भगवान, अगर मैं इसी तरह लेन- देन की साड़ियाँ लाता रहा तो महीने का खर्च कैसे चलेगा ‘
‘मैं क्या जानूँ, अम्मा जी नाराज़ हो जायेगी। दस बात मुझे सुननी पड़ेगी। कुछ भेंट तो ताई जी को देनी ही है, अम्मा जी चाहती हैं कि हैन्डलूम की एक साड़ी दी जाए‘
‘घड़ी ने 8 बजाए। बाबू जी कमरे से बोले – ‘बहू खाना बन गया क्या ?’
कला ने झटपट थाली लगाकर बबली के हाथ बाबू जी के कमरे में भिजवाई। फिर बारी-बारी से ताई जी, अम्मा जी, कपिल,बबली, ननद और देवर को गरम-गरम खाना खिलाया। अंत में बचा खुचा खाना किसी तरह जल्दी-जल्दी निगल कर, चौके की सफाई की और ग्यारह बजते-बजते दिन भर की थकी हारी बिस्तर पे पड़ते ही सो गई।
सुब्ह चार बजे कला जगह-जगह से दुखते बदन को किसी तरह समेटती हुई उठी। दिल और शरीर साथ नहीं दे रहे थे। तभी दिमाग ने कला के निढाल शरार में कर्तव्यनिष्ठता की चाबी भरी और वह एकाएक उर्जा से भर कर घर की झाड़ू, साज-सफाई में लग गई। रोज़मर्रा की तरह मशीनी रफ़्तार से नहा धोकर, रसोई में घुस गई। सबके उठने से पहले, सुब्ह की गरम-गरम अदरक और तुलसी की चाय बनाई और सबको कमरों में दे आई। फिर पूजाघर में धूप बत्ती जलाकर ‘रामरक्षा स्त्रोत’ का जाप किया। इसके बाद खुद ने रसोई में चलते फिरते, सब्ज़ी बिनारते, दाल-चावल बीनते-धोते, गरम से गुनगुनी हुई अपनी चाय टुकड़ा-टुकड़ा पी। नौ बजे कपिल को लंच बॉक्स तैयार करके दिया और बबली को भी स्कूल बैग, लंच बॉक्स, वाटर बॉटल देकर कपिल के हवाले किया जिससे वह रास्ते में उसे स्कूल में छोड़ सके। इसके बाद सारे दिन इस काम, उस काम में रोबोट की तरह लगातार लगी रही।
‘अरे कला,गुसलख़ाने में अभी तक मेरे धुले कपड़े ऐसे ही रखे हैं....फैलाए नहीं तुमने।‘ आजकल की बहुएँ भी न बस.....अम्मा जी उलाहना देती गुसलख़ाने के पास से गुजरी तो चावल पकाती कला अपने दिलोदिमाग़ को साधती मृदुता के साथ बोली – ‘अभी फैलाए देती हूँ अम्माजी। रसोई के काम में भूल गई।‘
कला रोनी-रोनी सी कपड़े झटकती, सन्न सी सोचती रही कि सबकी ज़रूरत पूरी करती हूँ। बहू, पत्नी, भाभी और माँ के सारे कर्तव्य कभी भी उफ़ किए बिना निबाहती हूँ, पर कोई मेरी ज़रूरत, एक मुठ्ठी ख़ुशी, एक पल के आराम का ज़रा भी ख़्याल करता है ? बड़ी कठिन है ज़िन्दगी...!
तीन बजे ऑफ़िस से कपिल का फ़ोन आया कि आज शाम को वह साथ चलने को तैयार रहे, एक साथी के घर बच्चे के जन्मदिन पे ज़रूरी जाना है। कला कुछ कह पाती, इससे पहले कपिल ने फोन काट दिया। कला को बहुत बुरा लगा। सोचने लगी इतनी बेइज़्ज़ती तो किसी मातहत की भी नहीं होती, फिर वह तो पत्नी है। उसकी स्थिति तो एक मातहत से भी गई गुज़री हो गई.... ? वह दासी है, या ख़रीदी हुई गुलाम, क्या है वह.... ? उसका दिल कसैला हो उठा। वितृष्णा की तीखी लहर सिर से पाँव तक उसे कड़ुवाहट से भर गई। विवाह प्रेम-बंधन है या गुलामी का अनुबंध ?

शाम को कपिल ने आते ही चाय बाद में पी, पहले कला को ताना मारा – ‘अभी ऐसे ही उधड़ी-उधड़ी फिर रही हो! कब तैयार होओगी जाने के लिए,जब दोस्त के घर पार्टी ख़त्म हो जाएगी ? सबके आदेश का पालन करती हो, बस मेरा ही कहना मानने में ज़ोर पड़ता है...! पति का साथ देना आता है तुम्हें.....घर के काम तो कभी ख़त्म होंगे नहीं...कुछ अक्ल से काम लेना सीखो।‘
कला रुआं सी हो गई। किसी बहस में न पड़कर, किसी तरह ताक़त बटोरती सी बोली –
‘बस अभी तैयार होती हूँ।‘
गति से तार पे फैले कपड़ों को समेटती, उन्हें कमरे के कोने में रखे मूढ़े पे रख कर वह बामुश्किल तैयार हो पाई। इस दौरान अम्मा, बाबू जी, ताई जी सभी की एक बाद एक मांगें तीर की तरह उस पे पड़ती रहीं। कपिल घर वालों पे मन में घुमड़ते नपुंसक क्रोध को दबाता हुआ, कुढ़ता बैठा रहा। छ: बजते-बजते दोनों किसी तरह घर से निकले। रास्ते भर वह स्कूटर चलाता कला से जली भुनी बातें करता रहा। दोस्त के घर पहुँचने तक उसका दिल कला पे अपनी खीझ निकाल कर काफ़ी हल्का हो चुका था और कला का दिल पनैले बादल की मानिन्द भारी जो कहीं भी, कभी भी फट सकता था। लेकिन समझदार और साहसी कला ने उपने मन को सहेज समेट कर व्यवहारिकता का चेहरा ओढ़ा और कपिल के पीछे-पीछे जन्मदिन के हर्षोल्लास से भरे घर में दाख़िल हुई। दोनों बड़ी नम्रता और मुस्कुराहट के साथ सबसे मिले। बातें, चाय-नाश्ता, बच्चों के नाच-गाने, इन सबके बीच भी होकर भी कला दिलो-दिमाग से अपनी ससुराल में ही थी। उसका ध्यान घर के अधूरे पड़े कामों में ही अटका था। वे उसके जीवन का न चाहते हुए भी ऐसा हिस्सा बन चुके थे कि वह मानसिक और शारीरिक रूप से उन्हें ही समेटने में लगी रहती थी। आठ बजे तक सबसे विदा लेकर दोनों घर के लिए रवाना हुए। कपिल रास्ते भर मेजबान मिसेज़ सेठी की आवभगत, व्यवहार कुशलता, रूप-गुण की तारीफ़ों के पुल बाँधता रहा।

उस रात कपिल पहली बार कला की ओर रूखेपन से करवट लेकर सोया। कामों के बोझ से थकी हारी कला ने उस पल सच में अपनी हार को मानो कपिल की पीठ से अपने पर बेदर्दी से हावी होते हुए देखा। कोमा में अवचेतन पड़े इंसान की तरह वह सुन्न पड़ी रही। इससे पूर्व आज तक कपिल ने कितनी भी कड़वी बातें उसे कही, पर कभी इस तरह करवट लेकर सारी रात अजनबी बनकर नहीं सोया। कितना भी थका,खीझा या कड़वाहट से भरा हो वह, किन्तु सोने से पहले कला को आगोश में ज़रूर लेता था। इन दस सालों में कपिल की कड़वी से कड़वी बातों ने उसे ऐसा आहत नहीं किया जैसा कि आज उसकी करवट ने तोड़ डाला। कला किसी अप्रिय अनहोनी की आहट से भयभीत न जाने कब कैसे सो पाई।

अगले दिन कला को कुछ याद न था सिवाय के कपिल का चेतावनी देता रूखापन। पिछले दस सालों में उसकी सारी उर्जा, ताकत इस कदर चुक गई थी कि उसमें प्रतिरोध करने की क्षमता शून्य हो चुकी थी। कल रात की घटना से तो जैसे उसकी जिजीविषा ही मर गई थी। कपिल उसका पति, उसका जीवन, जीने का सहारा था, पर आज वह उसके होते हुए भी कितनी बेसहारा और मृतप्राय: थी.....! उसने अपने को इतना तिरस्कृत, इतना एकाकी कभी नहीं पाया था। कला का मन भयावह आशंका से बोझिल था।

कई दिनों तक कपिल का वही रवैया रहा, जैसे कला से कोई मतलब नहीं। कुछ दिनों तक तो वह उखड़ा सा तनावग्रस्त रहा, लेकिन लगभग एक सप्ताह से कला महसूस कर रही है कि वह अपने में बड़ा सन्तुष्ट और शान्त दिख रहा है जैसे वह किसी उलझन से निकलकर, एक समाधान पे पहुँच गया हो। हर बीतते दिन के साथ कला शीत युध्द के भँवर में गहरे धंसती जा रही है। जैसे-जैसे कपिल एक निशब्द उलझन से निकलता नज़र आ रहा है, वैसे-वैसे कला मानो उस निशब्द उलझन में उलझती जा रही है। उन दोनो के बीच वैवाहिक संबंध की आत्मीयता और भावनात्मक एकात्मता मुठ्ठी से रेत की भाँति फिसलती जा रही है। वह अपनी आँखों के सामने कपिल और अपने बीच तैरते हर भाव को पल-पल डूबते देख रही है और कुछ भी नहीं कर पा रही है। ये कपिल को अचानक क्या हो गया…?? वह उसकी दयनीय स्थिति और विवशता को सहानुभूतिपूर्वक क्यों नहीं समझ रहा है। वह कौन सी जादू की छड़ी घुमा दे कि सब कुछ कपिल का मन चाहा हो जाए। पति की इच्छानुसार चले या घरवालों के आदेशों का पालन करे ?

इस शीत युध्द में डूबते उतराते एक दिन कपिल ने रात को कला को अपना कठोर फैसला सुनाते हुए कहा – ‘मेरे लिए तुम्हारे साथ इस तरह निबाह करना अब और सम्भव नहीं। मैंने फैसला कर लिया है कि हमें अलग हो जाना चाहिए। तुम तो कभी बदलोगी नहीं। तुम चाहती तो मेरे मन चाहे अनुसार अपने को ढाल सकती थीं, पर तुम मेरी भावनाओं, मेरी चाहत, मेरी पसन्द को इस क़दर नज़रअन्दाज़ करती रही हो कि तुम्हारे इस बेपरवाह रवैये से मेरी हर भावना, हर संवेदना ख़ुद-ब-ख़ुद इतनी कुचल गई कि अब मैं तुम्हारे साथ अजनबी महसूस करने लगा हूँ। तुम्हारी निकटता में असहज हो जाता हूँ। न जाने मेरे सारे दोस्तों की बीवियाँ कैसे गृहस्थी भी और ख़ुद को भी इस ख़ूबसूरती से सम्भालती है कि मेरे दोस्त उनके गुण गाते नहीं थकते। सो मैं तो उस दिन का इन्तज़ार करते-करते थक गया जब तुम घर की बहू ही नहीं, मेरी सुघड़-सलोनी पत्नी भी बन सको। बहुत सोच-समझ के मैंने यह निर्णय लिया है कि हमें तलाक़ ले लेना चाहिए। कोर्ट के नियमानुसार तलाक़ से पहले तुम्हें कम से कम छ: महीने मुझसे दूर रहना होगा। इसलिए तुम जल्द से जल्द अपने मायके चली जाओ। फिलहाल बबली को ले जा सकती हो, पर बाद में उसकी कस्टडी मुझे मिलेगी।
ये सब सुनकर कला सकते में आ गई। उसे लगा कि वह किसी अँधेरी गुफा में चलती जा रही है। कोई ओर-छोर नज़र नहीं आ रहा है। आँखें खुली हैं पर वह कुछ भी देख पाने में असमर्थ है। वह निपट अँधेरे में भटक गई है। टूट के बिखरने को है, फिर भी न जाने कैसे अपने को सम्भाले है। तभी वह एक झटके से चेतना में आई और करुणा से भरे डूबते स्वर में कपिल से बोली –
‘कपिल प्लीज़ ऐसा मत करना। मैं जीते जी मर जाऊँगी।भले ही मैं तुमसे ज्यादा तुम्हारे घरवालों के कामों को समर्पित हूँ, लेकिन मेरे दिल में हर क्षण तुम और सिर्फ़ तुम ही समाए हो। मुझे ऐसा निरीह मत बनाओ प्लीज़। मुझे तलाक मत देना कपिल....’
‘क्यों न दूँ ? आज तक कभी सोचा तुमने इस बारे में ? धीरे-धीरे पनपती भावनात्मक एकरसता पे कभी गौर किया तुमने ? अब रोने गिड़गिड़ाने से क्या फ़ायदा कला। तुम सिर्फ़ नाम की ही कला हो। तुम्हें जीने की, जीवन को प्यार से भरने की कला आती है ? आती होती तो वैवाहिक जीवन को इस तरह बंजर न होने देती। सिर्फ मेरे अकेले के कोशिश करने से कुछ नहीं हो सकता। तुमने तो मेरी भी सारी उर्जा राख करके रख दी। तुम्हारे साथ तुम्हारी तरह मेरा जीवन भी फूहड़ और उबाऊ हो गया है। इससे तो मैं अकेला भला।‘
कला फफक उठी। सिवाय बार-बार अनुरोध करने के वह कुछ भी नहीं कर पा रही थी। वह बारम्बार अपनी मजबूरी, अपनी स्थिति, घरवालों के लिए अपना सेवाभाव, कपिल के लिए दिल में अथाह प्यार – इस सब को समझाने की वह नाकामयाब कोशिश करती रही। पर कपिल जैसे चट्टान बन चुका था – एकदम संवेदनाशून्य। वह अपनी ही बात पे अड़ा रहा।

अगली सुब्ह आई। दोनों ख़ामोशी ओढ़े अपनी-अपनी दिनचर्या में रोज़ की तरह लग गए। कामों में लगी कला अपने मन को ढाढस बँधाने में लगी रही, दिल में रखे भारी बोझ से जूझती रही।शाम तक वह काफ़ी तटस्थ हो चुकी थी। कपिल की इच्छानुसार, इस मामले में वह उसके निर्णय की बलि चढ़ने को मजबूर थी। उसने सब किस्मत पे छोड़ दिया था। इतना सब करने पे भी यदि पति से अलगाव लिखा है तो न चाहते हुए भी उसे वह स्वीकारना होगा। सारे दिन वह घर के आंगन, कमरों, दीवारों को नज़र भर-भर के देखती, मन ही मन उनसे दूर होने की जंग लड़ती और जब भी, जहाँ भी उसे एकान्त मिलता, रो लेती। उसे जी भर के रोने की भी फुर्सत नहीं मिल पाती थी। ताई जी चली गई और जाते-जाते उस पर तानों की बौछार कर गई।
अगले दो दिनों में कपिल की नागपुर वाली बुआ और फूफा जी आने वाले हैं। कला सोच रही थी कि वह उनके स्वागत की तैयारी करे या इस घर से अपनी विदाई की.....!!
‘बहू परसों निम्मो बहनजी आ रही हो। तुम्हे पता है न उनका तेज़ स्वभाव...ज़रा उनके लिए कमरा वगैरा ठीक से साफ कर लो। भाईसाहब तो फिर भी शान्त है,पर निम्मो बहनजी को एक एक चीज़ टिप-टॉप चाहिए’ – अम्मा जी ने अपने कमरे से कला को आदेश दिया।
‘जी अम्मा जी आज शाम तक सब तैयारी कर दूँगी’ – कला मरी सी आवाज़ में बोली।
शाम को कपिल के ऑफ़िस लौटने पर अम्मा जी कला की शिकायत करती बोली –
‘आजकल बहू का ध्यान न जाने कहाँ रहता है, आज उसने दाल में इतना नमक भर दिया कि मेरे तो हलक के नीचे ही नहीं उतरी और मुझे सूखी सब्ज़ी सो रोटी खानी पड़ी। तेरे बाबू जी की किताबों की शैल्फ़ दस दिन से बिना सफाई के धूल से भरी पड़ी है। दोपहर के खाने के बाद ये चाहे तो क्या साफ नहीं कर सकती ? पर चाहेगी, तभी तो करेगी न...। अपने मथन में रहती है।‘
कपिल चुपचाप सुनता रहा, फिर उठ कर कमरे में चला गया।
आज सलिल खीझता हुआ सबेरे माँ से बोला –
‘माँ तीन दिनों से लगातार भाभी से शर्ट के बटन लगाने को कह रहा हूँ, पर अभी तक बटन नहीं लगे। अब कौन सी शर्ट पहन कर कॉलिज जाऊँ? वही दो दिन की मैली शर्ट पहन कर जाऊँ क्या ?’
दूसरे कमरे में जाते कपिल ने छोटे भाई की कला के ख़िलाफ़ शिकायत सुनी तो न जाने क्यों उसे अच्छा नहीं लगा।
कल दोपहर शीला बराम्दे में बाबू जी से कपिल की चुगली करती कहने लगी –
‘ बाबू जी, मैंने पिछले महीने भय्या से भाई-दूज पे एक सलवार सूट बनवाने को कहा था लेकिन भय्या टाले जा रहे हैं। दुनिया भर के खर्चे करते हैं पर मेरे लिए सूट नहीं बनवा सकते ?’
उधर से गुज़रती कला के कानों में जब ननद की यह उलाहना पड़ी तो वह एक पल को ठिठकी, फिर एक कटीले क्रोध से भरी तेज़ कदमों से रसोई घर में चली गई। उसका मन बड़बड़ाने लगा – ‘यहाँ सबको अपनी ज़रूरतों की पड़ी है। महीना मुश्किल से खिंच पाता है, ऊपर से सलिल, शीला और बबली की फीस, बेवक्त टपक पड़ने वाले मेहमानों के खर्चे....। कपिल रात-दिन ऑफिस में कमर तोड़ मेहनत और ओवर टाइम करता है, तब कहीं जा के इतने बड़े परिवार की ज़रूरते पूरी कर पाता है। उसकी मेहनत और सेहत की किसी को परवाह नहीं, बस किसी की ज़रूरत पूरी नहीं हुई कि लगे सब शिकायत करने।‘ फिर उसने तर्क किया कि वह क्यों कपिल के ख्याल में इस तरह घुल रही है ? उधर ऑफिस के काम में व्यस्त होने पर भी कपिल को बीच-बीच में अपने घर वालों के दोगले रूप और “बहू” नाम के प्राणी के प्रति अन्यायपूर्ण नीति का ख्याल विचलित कर जाता था। तड़के चार बजे से उठकर रात ग्यारह बजे तक कला मशीन की तरह सबकी सेवा में खपी रहती है, यहाँ तक कि इन सबको खुश रखने के चक्कर में मेरा और उसका रिश्ता भी बलि चढ़ गया, लेकिन ये हैं कि उसके प्रति सराहना और सहानुभूति का भाव रखने के बजाय निरन्तर कमियाँ बीनते हैं और कठोरता भरा अन्यायपूर्ण रवैया रखते हैं। हद है..!

दो दिन बाद नागपुर वाली बुआ जी और फूफा जी आ गए। कला ही नहीं, सारा घर उनके नाज़-नखरे उठाने में लग गया। एक दिन बाद ही और सब तो वापिस अपनी-अपनी रूटीन में चले गए, लेकिन कला, बुआ जी और फूफा जी की सेवा की स्थायी ज़िम्मेदारी ओढ़े, बिना थके उनके सत्कार में जुटी रही। हर दिन उनकी ख़ातिर में कुछ खास पकाती। उनके नहाने के गरम पानी से लेकर कपड़े धोने, सुखाने और तह बनाकर रखने तक के सारे काम सचेत होकर करती। फिर भी छिद्रान्वेषी बुआ जी अक्सर खासतौर से कपिल के ऑफिस लौटने पर ही, अम्मा जी से कला के काम में मीन-मेख निकालती हुई, ज़ोर-ज़ोर से कपिल को सुनाती। कपिल को कला के प्रति सबका तानाशाही रूप इतना नागवार लग रहा था कि कई बार तो वह भड़कते-भड़कते रह गया। बड़ों के सामने ज़ुबान न खोलने और ग़म खाने के मध्यम वर्गीय सँस्कार उसके विद्रोह के आड़े आ जाते थे, वरना मन तो करता कि सबके अन्याय का करारा जवाब दे।
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रविवार का दिन था। सभी के घर में होने से घऱ में खूब चहलपहल थी। नाश्ते में कला ने सूजी का हलुवा और गरम-गरम पकौड़ियाँ बनाई थी। सब साथ बैठे खा रहे थे और बबली व शीला रसोई से गरमागरम चाय और पकौड़ियाँ लाकर सबको खिली रहीं थीं। तभी फूफा जी ने शोशा छोड़ा – ‘कला, पकौड़ियाँ कुछ ज़्यादा तेज़ जली-जली सी तल रही है। मिर्च भी कुछ चटक है।‘ इस पर अम्मा भला कैसे चुप रहती। उन्होंने भी तुर्रा छोड़ा –
‘हलुवा कुछ कच्चा सा लग रहा है। सूजी थोड़ी और भुननी चाहिए थी।‘
जब कि कपिल को हलुवा गुलाबी भुना हुआ, सोंधी खुशबू से भरा बेहद स्वादिष्ट लगा। इलायची, बादाम और नारियल ने उसके स्वाद को और भी दुगुना कर दिया था। पकौड़ी भी खस्ता और करारी बनी थी। मिर्च तो ज़रा भी तेज़ नहीं थी।कपिल पकौड़ी और हलुवे के साथ-साथ सबकी तीखी और जली भुनी बातों का स्वाद भी लेता जा रहा था। उसे लगा कला की कड़क ड्यूटी के आगे तो उसकी ऑफिस ड्यूटी कुछ भी नहीं। दूसरे उसे अच्छा काम करने पर बॉस से सराहना और प्रमोशन तो मिलता है, लेकिन कला को तो सिर्फ तानों और फटकार के कुछ भी नहीं मिलता। इससे तो उसके ऑफिस का चपरासी बेहतर स्थिति में है। पुराना होने के कारण कभी-कभी तो बॉस पर भी रौब जमा लेता है। कला घर में दस साल पुरानी होने पर भी डरी, मरी, खामोश रहती है।
इस सबके बावजूद भी कपिल कला के प्रति अपने दिल में पहले जैसे प्यार और अपनेपन की कमी पाता था।परन्तु घर का कोई प्राणी कला की ग़लत आलोचना करता तो, कपिल को तनिक भी बर्दाश्त न होता। इसी तरह कपिल से उपेक्षित होकर भी कला को कपिल के ख़िलाफ़ दूसरों द्वारा कही गई बातें बड़ी चुभती। कला यह भी सोचती कि अब तो वह इस घर में कुछ ही दिनों मेहमान है। कपिल तो उससे रुष्ट रहता ही है, तो वह और सबसे उसकी बुराई सुनकर मन ही मन ख़ुश होता होगा।
पिछले आठ दिनों से रात को अपने कमरे में, कला से दूर एक तरफ पड़े सोफे पे सोता, कपिल अक्सर सोने से पहले सोचता कि उसे ख़ुद को कला ख़ामियों का भंडार नज़र आती है तो घर के दूसरे लोगों से कला की बुराई क्यों नहीं सुन पाता....! उसे इतना बुरा क्यों लगता है ? इसी उधेड़ बुन में वह न जाने कब सो जाता।

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आज तलाक की अर्ज़ी देने उसे वकील के पास जाना था। हांलाकि उसने कला को अपना फैसला सुना दिया था। फिर भी अन्दर उसे कुछ कचोटता रहता था। कला निर्जीव हुई, ढेर ज़िम्मेदारियों के बोझ से दबी, किसी तरह दिन काट रही थी। मन में एक धुंधली आशा कभी-कभी चटक हो उठती थी कि शायद कपिल उसे जाने से रोक ले, शायद कपिल का मन पिघल जाए। पर ऐसा न हुआ।
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एक दिन मौका देख कर कपिल ने घर में सबको बता दिया कि वह और कला अब साथ नहीं रह सकते और तलाक ले रहे हैं। कपिल के मुँह से ये अप्रत्याशित घोषणा सुनकर सब अवाक् उसका मुँह देखते रह गए। सास-ससुर को बेटे-बहू के अलगाव का दुख कम, घर के काम करती आज्ञाकारी नौकरानी के जाने की चिन्ता अधिक सताने लगी। सबके अपने-अपने स्वार्थ उन पे हावी थे। सबने उसे अपने-अपने ढंग से कारण पूछा, बेदिली से थोड़ा समझाने का भी प्रयास किया, लेकिन कपिल अपने निर्णय पे अटल रहा।
वो दिन भी आ ही गया जब कला अपना सूटकेस लेकर मायके चली गई। कोर्ट ऑर्डर के अनुसार दोनों को तलाक से पूर्व छ: माह तक अलग रहना था।

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इधर कला के घर में भी सबका वही हाल था। सब जी भर कर कपिल की बुराई करते। जो अवगुण उसमें नहीं थे, वे भी कला के घर वाले कपिल पे थोपते। कला की माँ तो कपिल को बदचलन तक कहने से नहीं चूकती। भय्या उसे नकारा और दब्बू कहते। यह सुनकर कला दिल मसोस कर रह जाती। वह जानती थी कि कपिल ऐसा बिल्कुल नहीं है। ठीक है, वह उससे तलाक चाहता है पर वह उसके लिए उल्टे सीधे आरोप स्वीकार नहीं कर सकती थी। कपिल के घर में उसकी माँ, बहन, कला को फूहड़, औघड़, मूर्ख और न जाने क्या-क्या कहती न अघाती। शीला ने तो एक दिन यह भी कह दिया कि भाभी को तो भय्या से प्यार ही नहीं था। नाटक करती थी उनके ख्याल का। उन्हें शादी तोड़नी थी तो कैसी चुपचाप बिना विरोध के अलग होने को तैयार हो गई। यह बात कपिल के कानों में पड़ी तो वह आग बबूला हो उठा। उसने शीला को जमकर डाँटा। ये तक चेतावनी दी कि वह देखेगा कि अपनी ससुराल में जाकर शीला कैसे और कितने प्रेम से निबाह करती है। शीला अपने भाई का वह रौद्र रूप देखकर भौंचक रह गई। उसे लगा कि भाभी से अलग होने को तैयार भय्या, भाभी के ख़िलाफ़ उसकी बातें सुनकर खुश होंगे, पर वहाँ तो उल्टी गंगा बहने लगी.....!? उसकी तो समझ से परे था कपिल का यह रूप और प्रतिक्रिया...।
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कला को घर से गए हुए चार महीने बीत गए थे। उसकी अनुपस्थिति में सबको अपने-अपने काम करने पड़ रहे थे। सारा घर कला के बिना बिखरा सा हो गया था। अम्मा जी, बाबू जी, सलिल, शीला सबको कला याद आती थी, उससे किसी भावनात्मक संबंध के कारण नहीं अपितु अनगिनत कामों के कारण। अनगिनत काम और कला मानो एक दूसरे के पर्यायवाची थे। उन ढेर कामों को सहेजने वाली अब वहाँ नहीं थी। वे काम भी उसके बिना बेतरतीब मुँह बाए पड़े रहते थे और सबको तरह-तरह तंग करते व चिढ़ाते थे। घर के नियत ढर्रे के मुताबिक आजकल इन्दौर से कपिल के चाचा-चाची आए हुए थे। कल रात सोने से पहले उन्होंने कपिल को अपने कमरे में बुलाया। अम्मा-बाबूजी वहीं बैठे हुए थे। चाचा-चाची ने बिना सोचे समझे कपिल को बिन माँगी राय दी कि वह कला के वे जेवर रोक ले, जो शादी के समय उसे ससुराल से दिए गए थे। इतना ही नहीं, सबने मिलकर कला के घर वालों की कोर्ट से खर्चा-पानी लेने के बहाने चालाकी भरी लालची नीयत के ख़िलाफ़ भी कपिल को सावधान किया। अपने इस महाभारती व्याख्यान को विराम देने से पहले उन सबने कला को जाहिल, फूहड़ और न जाने क्या-क्या कह डाला। सँस्कारों का मारा कपिल सिर झुकाए क्रोध पीता ख़ामोशी से उन सब समझदार बुज़ुर्गों की दुनियावी बातें सुनता रहा। वे सब अपने विचारों, सोचों और ज़ुबान की कुरूपता से अन्जाने ही उसे कला से दूर नहीं वरन् कला के निकट ले जा रहे थे। जितनी वे कला की आलोचना करते उतना ही कपिल कला के प्रति अपनेपन से भरता जाता। ठीक यही कला के घर में उसके साथ घट रहा था। खैर, वह तो कपिल से अलग होना ही नहीं चाहती थी किन्तु कपिल के रूखे और अन्याय भरे रवैये से उसके प्रति भावना शून्य सी हो गई थी। लेकिन अपने घर वालों की कपिल के लिए जली कटी बातें सुन-सुनकर वह पुन: उसके प्रति सघन प्यार और ख्याल से भरने लगी थी।
कला और कपिल एक दूसरे से दूर, अपने-अपने घरों में आत्मविश्लेषण करते हुए रह रहे थे। घर से लेकर बाहर तक का हर इंसान कला की बुराई कपिल से और कपिल की बुराई कला से करता नज़र आता था। दुनिया के इस तिक्त बर्ताव ने दोनों को अधिक परिपक्व, संवेदनशील और एक दूसरे के लिए भावुक बना दिया था। तलाक होने तक बबली कला के ही पास थी। कला और बच्ची की कमी कपिल को रह-रह के खलती थी।
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एक दिन जब कपिल से नहीं रहा गया तो उसने कला से मिलने की ठानी। उसने ऑफ़िस से कला के घर फोन किया और उसे इन्दिरा पार्क में शाम 5 बजे मिलने के लिए बुलाया। कला तो ख़ुद उससे मिलने को बेचैन थी। उस दिन कपिल को लगा कि समय बहुत धीरे-धीरे खिसक रहा है। जैसे ही शाम के चार बजे कपिल झटपट ऑफिस से 20 कि.मी. दूर पार्क की ओर रवाना हो गया जिससे ठीक पाँच बजे वह पार्क पहुँच सके। वह पाँच से पंद्रह मिनट पहले ही पार्क में पहुँच गया और यह देख कर उसकी ख़ुशी का ठिकाना न रहा कि कला भी समय से पहले वहाँ पहुँच चुकी थी। कपिल ने इतने समय बाद कला को देखा तो वह उसे बड़ी अपनी लगी। पहले से काफ़ी कमज़ोर भी दिख रही थी, पर एक कमनीयता उसे आवृत किए थी जो कपिल को मोहित कर गई। कला कपिल को देखकर न जाने क्यों लजा गयी और उसके स्वागत में बेंच से उठकर खड़ी हो गई। कपिल को उसका यह तकल्लुफ़ प्यारा लगा। बोला –
‘ अरे बैठो-बैठो ‘
कला सकुचाई सी बेंच के कोने में सिमट कर बैठ गई। कपिल उसके पास ही बैठा, पर थोड़ी सी भद्र दूरी बनाकर। मन तो चाह रहा था कि उससे सट कर बैठे। कला को कपिल नया-नया प्यार भरा लगा। कहाँ तो ‘रूठी राधा’ यह सोचकर आई थी कि वह कपिल से एक भी बात नहीं करेगी, बस ख़ामोशी से उसकी ही सुनेगी, क्योंकि उसे कपिल से कुछ कहना ही नहीं है। उसे जो कहना था वह कपिल से रो-रोकर पहले ही कह चुकी थी, और कपिल ने उसकी प्रार्थना, अनुरोध सब बेदर्दी से ठुकरा दिया था। सो अब कहने को बचा ही क्या था उसके पास। आज तो वह कपिल की निकटता को साँसो में भर लेना चाहती थी जिससे आगे आने वाले दिनों में वह उस निकटता के एहसास के साथ जी सके। धीरे-धीरे वह अकेले जीने का भी साहस जुटा लेगी। ख़ामोश, विनम्र, सिर झुकाए बैठी कला पे कपिल को बड़ा प्यार आया। आज दोनों को लग रहा था कि वे एक दूसरे के बिना अधूरे हैं। वे एक दूसरे के जितना करीब हैं उतना घर में किसी के भी नहीं। अपने-अपने घरवालों के रौद्र और तीखे हावभाव, बेग़ैरत रवैये से आहत वे दोनों एक दूसरे को इतने अपने लगे कि उन्होंने – ख़ासतौर से कपिल ने तलाक का इरादा बदल दिया। कपिल और कला एक जैसी भावनात्मक स्थिति में थे। दोनों की समरसता भरी कोमल तरंगे ख़ामोशी से एक दूसरे तक पहुँच रही थीं। दोनों की प्यार भरी नज़रे एक दूसरे से मिलती और मीठा-मीठा बहुत कुछ कह जाती। आँखों ने आँखों की भाषा पढ़ी और कपिल ने कला का हाथ अपने हाथ में थाम कर, निशब्द ही न जाने क्या-क्या कह डाला कि भावुक हो आई कला की आँखें झर-झर बरसने लगीं। उसकी सारी पीड़ा, वेदना, असुरक्षा मानो आँखों से बह चली थी। ये आँसू एक ओर दर्द और पीड़ा को मन से बाहर बहा रहे थे, तो दूसरी ओर पति के प्रति सघन प्रेम और आश्वासन को दिल की गहराईयों में समो रहे थे। उसने हौले से कपिल के कंधे पे अपना सिर टिका कर कपिल के साथ फिर से एक हो जाने की अपनी इच्छा की तीव्रता जताई। दोनों हाथ थामे पार्क से बाहर निकलकर घर की ओर चलते गए – पीछे छूटे वैवाहिक जीवन की बागडोर सम्हालने....।

Saturday, July 17, 2010

(कहानी) फ़िनिक्स

जून की कड़कती गर्मी, बोर्ड परीक्षाओं के परिणामों की प्रतीक्षा की तपन से
और अधिक तपता महीना, 14 वर्ष की प्रीति के जीवन की पहली बोर्ड परीक्षा
और हर दिन, हर पल बेताबी से रिज़ल्ट की बाट जोहता प्रीति का नन्हा, धड़कता
दिल। वह तरह - तरह की आशंकाओं, यहाँ तक कि फ़ेल हो जाने के काल्पनिक भय
से ग्रस्त रहती । उस छोटी उम्र में लाख मेहनत करने पर भी, अपनी योग्यता,
अपनी क्षमता पर विश्वास न होना एक सहज किशोर भाव था। शायद हर
परीक्षार्थी, पहली बोर्ड परीक्षा का रिज़ल्ट आने से पहले, इस भावनात्मक डाँवाडोल मन:स्थिति से गुज़रता है। आख़िर राम-राम करके परिणाम घोषित होने का दिन
भी आ ही गया। किस मुश्किल से प्रीति की वह रात करवटें बदलती बीती और सुब्ह
होते- होते जागने के बजाय, वह गहरी नींद की आगोश में खो गई। सवेरे - सवेरे सड़क पर रिज़ल्ट आउट होने की गहमा गहमी थी। अख़बारवालों की चाँदी ही चाँदी
थी, लोग उन्हें मुँह माँगे दाम देकर अख़बार ख़रीद रहे थे। तभी प्रीति के मामा उछलते, शोर मचाते घर में दाखिल हुए और ख़ुशी से चीख़ते हुए बोले -

"अरे कहाँ है यह सिलबिली लड़की, देख, प्रीति तू फ़र्स्ट डिवीज़न में पास हुई है। दो दिन से तेरे गले में एक भी कौर नहीं उतरा, अब तू जम के मिठाई खा बस।"

यह खुशख़बरी सुनते ही माँ - पिता जी, सभी दौड़ पड़े। उनकी ख़ुशी तो सातवें आसमान पर थी। पर रात भर की जगी प्रीति गहरी नींद में बेख़बर सोई पड़ी थी। तभी माँ ने सिर पर हाथ फेर कर, प्यार से थपथपाते हुए प्रीति को जगाया-

“उठ - उठ बेटा, देख, तेरा रिज़ल्ट आ गया,.........,”

प्रीति ने आँखें खोली तो उसे लगा वह बेहोशी में माँ को कुछ कहते सुन रही है, लेकिन तभी मामा और पिताजी के गुरु गम्भीर स्वर ने उसकी तन्द्रा तोड़कर, उसे परीक्षाफल सुनाया तो जैसे एक पल को उसे दिल की धड़कन रुकती सी लगी। फिर एकाएक मुँह से निकला - "सच !" और किस -किस की फ़र्स्ट डिवीज़न आई है ?"

पिता जी बोले - "बस, एक तेरी ही बेटा।"

"नहीं, ऐसा कैसे हो सकता है। कुछ साइंस की लड़कियों की भी फ़र्स्ट डिवीज़न
होगी......." प्रीति को विश्वास ही नहीं हुआ ।

दूसरे ही पल उसे अपनी प्रथम श्रेणी गड़बड़ नज़र आने लगी। उसे शक़ हुआ कि ग़लती से उसका रोल नम्बर प्रथम श्रेणी में तो नहीं छप गया। वह आर्ट साइड की छात्रा - अकेली फ़र्स्ट डिवीज़न में ! ख़ुश होते - होते वह मुरझाने लगी। और तब तक उसे विश्वास नहीं हुआ, जब तक कुछ दिनों बाद कॉलिज से उसकी मार्कशीट नहीं आ गई। तब उसे लगा कि वाकई जीवन की पहली बोर्ड परीक्षा ईश्वर ने प्रथम श्रेणी में पास कराके, उसे अपनी प्रतिभा और क्षमता को पहचानने का मौका दिया और सबको इस बात का प्रमाण भी दिया कि वह शिक्षा के श्रेत्र में ऊँचाईयों तक पहुँचने की खासी क्षमता रखती है। उसका किशोर मन कभी आई.ए.एस बनने के तो कभी प्रोफैसर बनने के सपने देखता। शहर के सर्वोत्तम स्कूल में वह अब इंटरफ़र्स्ट ईयर की छात्रा थी । वह माँ - पिता जी, मामा, प्रिन्सिपल, समूचे स्कूल का गर्व थी।

अनूठी लगन से पढ़ते लिखते, हँसते खेलते, नोट्स बनाते, रेडियो पे गाने, नाटक सुनते
सहेलियों के साथ ऊँचे ख्वाब बाँटतें प्रीति के दिन बड़े प्यार से गुज़र रहे थे।
देखते ही देखते समय बीतता गया और वह 11वीं कक्षा में भी अधिकतम अंक प्राप्त
करके बारहवीं कक्षा में आ गई। इसी वर्ष एक लम्बे अन्तराल के बाद बेटे की चाह में, उसकी माँ ने एक और बेटी को जन्म दिया। प्रीति अपनी नन्ही सी, गुड़िया जैसी
बहन को पाकर बेहद खुश थी। उसके लिए तो वह पढ़ाई के बाद खाली समय में
खेलने के लिए सच में प्यारी, हँसती, किलकती गुड़िया थी। अब उसे जमकर इंटर की
बोर्ड परीक्षा की तैयारी करनी थी। पूरे वर्ष प्रीति ने जी तोड़ मेहनत करके इंटर
भी प्रथम श्रेणी में पास करके अपनी अद्भुत योग्यता को एक बार फिर सिध्द कर
दिखाया।
मख़मली उम्र, मख़मली ख़्वाब, मख़मली ख़्याल, मख़मली दिन, सुनहरी आभा से भरा प्रीति का जीवन बड़े सुख-चैन से गुज़र रहा था। तभी एक दिन जैसे बम विस्फोट सा हुआ। पड़ौस के एक नामी गिरामी, धनी परिवार के लड़के प्रकाश ने प्रीति को लेकर अपने घर में हंगामा खड़ा कर दिया कि या तो प्रीति से उसकी शादी कर दो, वरना
वह जान दे देगा। न जाने कब कहाँ उसने प्रीति की एक झलक देखी और वह उसकी सुन्दरता, उसके भोलेपन पर मर मिटा। प्रीति उसके दिल में ऐसी समा गई कि भुलाए नहीं भूलती। अन्जाने ही प्रीति उसकी बेचैनी का सबब बन गई। सरल,मासूम प्रीति इस सबसे एकदम अन्जान अपनी पढ़ाई - लिखाई की एक अलग ही दुनिया में खोई रहती थी। उधर प्रकाश पढ़ाई - लिखाई को तिलांजलि देकर, उस कच्ची उम्र में प्रीति से शादी करने के लिए हंगामा मचाए था। माँ - बाप के समझाने और बाद में थोड़ा सख़्ती से डाँटने पर हताश होकर, उसने दो बार आत्महत्या का असफल
प्रयास भी किया। कॉपी, किताब पर हर जगह प्रीति का नाम लिखता रहता, न खाता, न पीता। प्रकाश की माँ का तो रो- रो कर बुरा हाल कि क्या होगा ? प्रकाश के माता पिता, रिश्तेदारों ने उसे काफ़ी समझाने का प्रयास किया लेकिन सबकी कोशिशें नाक़ाम रहीं। हार कर, प्रकाश के घरवालों को प्रीति के घर जाना पड़ा। प्रकाश के पिता डा. स्वरूप ने झिझकते हुए अपने बेटे से प्रीति के विवाह का प्रस्ताव रखते हुए योगेन्द्र जी और कुसुम जी से कहा –
‘’भाईसाहब हमने प्रकाश को हर तरह से समझाया, डाट - फटकार भी की, तो जैसा आपने शहर में चर्चा सुना होगा, वह आत्महत्या करने पे उतारू हो गया. अब आप ही लोग बताएं कि बेटे की जान पे बन आए- ऐसा कौन से माँ बाप चाहेंगे...? हम चाहते है कि आप अपनी बेटी के साथ हमारे बेटे की शादी के दें I हम यह एहसान कभी नहीं भूलेंगे I’’
प्रीति के माता-पिता इस प्रस्ताव को सुनकर स्तब्ध से रह गए। फिर भी योगेन्द्र जी बात को सम्हालते हुए, सहानुभूति से भरे बोले –
‘’नहीं नहीं....अपने बच्चे किसे प्यारे नहीं होते I प्रकाश यदि नासमझी में कुछ कर बैठे तो, आपको क्या, हमें भी दुःख होगा, कष्ट होगा I’’

डा. स्वरूप दुखी होते बोले –
‘’बेटे की वैरागी की सी दशा देखी नहीं जाती I कहते हुए शर्म भी आती है, पर क्या करें....जिस मानसिक स्थिति से आजकल प्रकाश गुजर रहा है,यदि वह लगातार ऐसे ही तनावग्रस्त रहा तो मानसिक रोगी भी बन सकता है I’’

कुसुम भावुक होती बोली –
‘’ईश्वर न करे कि कभी ऐसा हो भाईसाहब ! हमें भी अपनी बेटी बड़ी प्यारी है I इस पर वह पढाकू भी अति की है I न वो,न हम अभी तो शादी के बारे में झूठे को भी हम
में से किसी ने नहीं सोचा I फिर भी हमें आपके साथ पूरी सहानुभूती है I
फिर अपने पति योगेन्द्र जी की ओर देख कर बोली –

‘’आप ही कुछ समस्या का हल निकालिए न....!!’’

इतने में प्रीति स्कूल से आई और जैसे ही उसने ड्राइंगरूम में कदम रखा, तो कुछ अजनबी मेहमानों को देखकर, शरमाई सी, नमस्ते करके झटपट अंदर चली गई I उसकी यह शर्मीली सी ख़ूबसूरत झलक देखकर डा. स्वरूप और उनकी पत्नी लीला जी मुग्ध से रह गए I

प्रीति की पढ़ाई लिखाई और गुणों की चर्चा अक्सर पड़ोसियों से सुनकर वे पहले ही काफी प्रभावित थे । आज उसे देख कर उन्हें लगा कि लड़की वाकई बहुत अच्छी है I पर प्रीति और प्रीति के माता- पिता अभी शादी के लिए तनिक भी तैयार न थे। एक पल को भी उन्होने अभी तक प्रीति के विवाह के बारे में नहीं सोचा था। उनकी प्रतिभाशाली बेटी के ख़्वाब ही कुछ और थे। दोनों परिवारों में अन्तर भी बहुत था। प्रकाश का परिवार धन धान्य और भौतिक सुख सुविधाओं से भरपूर, तो प्रीति का परिवार उदात्त मूल्यों और संस्कारो से सम्पन्न मध्यम वर्गीय था, जहाँ सब मेहनत और कर्मठता के बलबूते पर मानवीय और सामाजिक सीमाओं के दायरे में एक दूसरे के सुख-दुख का ख़्याल रखते हुए रहते थे। संवेदनशीलता के कारण ही, प्रीति के घरवालों ने अपने पड़ौसी परिवार की समस्या पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करते हुए और अपना पक्ष भी ध्यान में रखते हुए बहुत ही सधा हुआ जवाब दिया कि वे प्रकाश से कहे कि वह पढ़ लिखकर, नौकरी कर ले, तब तक प्रीति का भी ग्रेजुएशन पूरा हो जाएगा, तो फिर शादी कर दी जाएगी। दोनों परिवारों ने परस्पर यह भी तय किया कि यदि नौकरी हासिल करने तक प्रकाश का प्यार इसी तरह बरकरार रहा तो दोनों बच्चों की शादी कर दी जायेगी, वरना यह बात वहीं पर समाप्त हो जायेगी। प्रकाश को सम्हालने का यह निदान कामयाब रहा, पर प्रकाश का प्रीति के लिए प्यार समय के साथ मरा नहीं, वरन् ज्यों का त्यों कायम रहा। लेकिन जिसे सब प्रकाश का प्रेम समझ रहे थे, वह प्रेम नहीं बल्कि किशोरावस्था में अक्सर हावी हो जाने वाला इनफ़ेचुएशन था ।

अक्सर प्रीति यह सोच- सोच कर हैरान थी कि किसी लड़के को कैसे उससे एकाएक
इस तरह एक तरफ़ा इतना प्यार हो सकता है कि वह अपनी जान भी उसके
लिए देने से पीछे न हटे ? १४ -१५ साल की नाज़ुक सी उम्र, अपरिपक्व सोच,
रुमानी ख़्वाब वाली प्रीति इस घटना से जैसे एकाएक ‘समझदार’ हो गई थी। प्रकाश की जान देने की बात प्रीति के मन में कहीं गहरा असर कर गई थी। इस बीच प्रकाश की सगी फुफेरी बहन अनिता प्रीति के पास कभी-कभी मिलने आ जाती थी। प्रीति की हमउम्र थी, सो दोनों अच्छी दोस्त भी बन गई थी। उसके माध्यम से
प्रीति प्रकाश से भावनात्मक रूप से गहराई से जुड़ गई थी। अनिता से भोली प्रीति
जब तब अपने मन की बातें भी बाँट लेती थी। प्रीति के आदर्शों से भरपूर सच्चे - अच्छे मन को जीतने के लिए प्रकाश का जुनून में आकर जान देने का कदम
उठाना, उसके दिल पर प्यार की मानो अमिट छाप छोड़ चुका था। उसने मन ही
मन निश्चय कर लिया था कि अगर उसकी शादी होगी तो सिर्फ़ प्रकाश
से। क्योंकि उस छोटी उम्र में कहानी क़िस्सों, आस पास के रिश्तेदारों आदि के
माध्यम से प्रीति ने इतना तो जान लिया था कि लड़की को धनी,सम्पन्न, ऊँचे ओहदे वाला पति तो मिल सकता है पर समर्पित और जान कुर्बान करने वाला एकनिष्ठ जीवन साथी दिया लेकर खोजने से भी नहीं मिलता। प्रीति के लिए एकनिष्ठता, वफ़ादारी किसी भी रिश्ते की पहली शर्त थी। बीतते समय के साथ प्रकाश ने किसी तरह एम. ए. करके अपने पिता के रुतबे के बल पर स्थानीय कॉलिज में प्रवक्ता की नौकरी हासिल कर ली। अब तक सब रिश्तेदारों के समझाने पर कि अच्छा ऊँचा ख़ानदान है और फिर जब इतने प्यार और सम्मान से प्रीति को माँग रहे हैं तो
उन्हें वहाँ प्रीति की शादी ख़ुशी- ख़ुशी कर देनी चाहिए, प्रीति के घरवाले भी
शादी के लिए तैयार हो चुके थे। नौकरी लगते ही प्रकाश के घर से बिना
किसी देरी के फिर से शादी का प्रस्ताव आने लगा। ससुराल के नाम से डरने वाली प्रीति ने हिचकते हुए एक इच्छा सबके सामने रखते हुए एक दिन माँ से कहा –

‘’माँ ! वे लोग शादी के बाद मेरी पढ़ाई बन्द न करे. मैं खूब पढना चाहती हूँ ’’

कुसुम ने अपनी बेटी यह इच्छा जब डा.स्वरूप के घर तक पहुंचाई कि क्या वे उसका उच्च शिक्षा का ख़्वाब पूरा होने देगें....तो यह सुनकर तो प्रकाश के घरवालों
को उल्टे प्रीति पर नाज़ हुआ और उन्होनें आश्वासन दिया कि वह जब तक चाहे, जितना चाहे पढ़ सकती है, उस पर किसी तरह की पाबन्दी नहीं होगी। पाँच महीने बाद ही, बड़े धूमधाम से प्रकाश, प्रीति को दुल्हन बनाकर अपने घर ले आया।

प्रीति और प्रकाश के जीवन में मानों खुशियाँ बेतहाशा बरस पड़ी थीं। प्रीति वफ़ादार पति पाकर बेहद ख़ुश थी। उसने जो सबसे बड़ा गुण प्रकाश में देखा था- वह था वफ़ादारी। वह पति की अयोग्यता, निर्धन हालात, साधारण व्यक्तित्व - सब कुछ सिर आँखों स्वीकार कर सकती थी, पर वफ़ादारी से शून्य इंसान के साथ वह समझौता नहीं कर सकती थी। अपने जीवन साथी द्वारा सँस्कारों और मूल्यों के साथ तोड़ मरोड़ उसकी बर्दाश्त से बाहर था। इसलिए भले ही प्रकाश ने एक इन्टर कॉलिज में साधारण सी प्रवक्ता की नौकरी कर ली थी, या उसका व्यक्तित्व साधारण था, इससे प्रीति को कोई फ़र्क नहीं पड़ता था - उसके लिए तो प्रकाश की एकनिष्ठता और ढेर प्यार काफ़ी था। प्रीति को मूल्य व सँस्कारविहीन व्यक्ति के साथ जीना गंवारा न था। जब वह प्रकाश की नज़र में उसकी जीवन साथी होने के मानदंड पर खरी उतरी थी और प्रकाश अपने बारे में उसकी राय जाने बिना उससे विवाह के लिए मचल पड़ा था, तो इतना हक़ तो प्रीति का भी बनता था कि अधिक कुछ नहीं तो, अपने मनचाहे कम से कम एक गुण की तो वह भी प्रकाश से अपेक्षा कर सकती थी। सो प्रकाश में अपने प्रति इतनी एकनिष्ठता -वफ़ादारी
को पाकर वह ईश्वर की हृदय से शुक्रग़ुज़ार थी।


जल्द ही प्रीति ने अपनी कर्मठता और आज्ञाकारिता से ससुरालवालों का दिल और अधिक जीत लिया । सारे घर को उसने इतनी सुघड़ता से सम्हाल लिया था कि वे उस पर छोटी -छोटी बात के लिए निर्भर करते थे। सबकी लाडली, सबकी चहेती प्रीति की ख़ुशी का पारावार न था। इतना कुछ पाने के बाद भी वह अपने पढ़ाई के लक्ष्य से तनिक भी न भटकी थी। कुछ वर्ष बाद उसने पी.एच-डी. करके डॉक्टरेट की उपाधि भी प्राप्त कर ली। इतना ही नही, प्रकाश की इजाज़त पाकर स्थानीय डिग्री कॉलिज के हिन्दी विभाग में प्रवक्ता के पद पर भी नियुक्त हो गई थी। प्रीति की हर काम को लेकर लगन, समर्पण, कर्मठता पर सबको गर्व था। प्रकाश भी प्रीति जैसी सुघड़, सलोनी पत्नी पाकर अपने को कम भाग्यशाली न समझता था। पर न जाने दोनों के प्यारे से वैवाहिक जीवन को किसकी बुरी नज़र लग गई कि एक अनहोनी घटना के कारण उनका सुख - चैन से भरा नीड़ तिनके - तिनके हो गया।


अक्सर ज़रूरत से ज़्यादा खाली समय इंसान को ख़ुराफ़ात की ओर ले जाता है। उसकी बुध्दि भ्रष्ट कर देता है। कुछ ऐसा ही प्रकाश के साथ हुआ। अदूरदर्शी आरामतलब, विचारहीन प्रकाश, प्रीति को पाकर बेहद सन्तुष्ट, भरपूर सम्पन्नता में आकण्ठ डूबा हुआ न जाने किन कमज़ोर क्षणों में अपनी सगी फुफेरी बहन अनिता से शारीरिक संबंध बना बैठा। प्रीति ने भाई - बहन की निकटता को कभी शक़ की नज़र इसलिए भी नहीं देखा, क्योंकि उसके मूल्य और सँस्कार कभी भी इस पवित्र रिश्ते पर किसी भी तरह के सन्देह की गर्द डाल ही नहीं सकते थे। वैसे भी वह अपने प्रकाश पर अटूट विश्वास करती थी। दूसरे अनिता विवाहित थी, अत: दोनों के बीच किसी भी तरह के अवैध संबंध की कल्पना वह सपने में भी नहीं कर सकती थी। ऐसे संबंध की गुंजाइश कम से कम प्रीति की नज़रों में नहीं थी। पर यह सोच तो प्रीति का था। एकबार ग़लती करके, प्रकाश पश्चाताप करने के बजाय, बार-बार उस घिनौनी ग़लती को दोहराता रहा । बहन ने भी शायद अपने संस्कारों को उठाकर ताक पे रख दिया था। दोनों में से किसी की भी आत्मा ने एकबारगी उन्हें नहीं फटकारा। लेकिन कुकर्म एक न एक दिन अपना खुलासा अपने आप ही कर देता है और कुकर्मियों को कहीं का नहीं छोड़ता। एक दिन प्रकाश और अनिता का देह संबंध सबके सामने उजागर हो गया। घरवाले तो आगबबूला हो ही उठे थे, पर प्रीति तो एक पल में जैसे हज़ार मौत मर गई थी । जीवन में मूल्य और संस्कारों को सबसे ऊँचा स्थान देने वाली प्रीति के लिए, प्रकाश की यह घटिया हरकत, एक कभी न भुलाया जा सकने वाला आघात थी। उसका दिल, आत्मा, रोम - रोम सभी कराह उठा था। वह लम्बे समय तक विक्षिप्त सी अवस्था में रही। प्रकाश
के जिस एक गुण के कारण, वह उसकी दुल्हन बनकर इस घर में आई थी, उसकी ही प्रकाश ने बेदर्दी से बलि चढ़ा दी थी। वह मर जाना चाहती थी। इतना बड़ा छल उसके साथ ? ! उसके प्यार, समर्पण, वफ़ादारी का यह पुरस्कार दिया था उस पर मर मिटने वाले प्रकाश ने ! वह कुछ भी समझ पाने में असमर्थ थी कि आख़िर प्रकाश जैसा बेहद चाहने वाला पति अनिता जैसी ख़्याल करनेवाली सहेली सी ननद- दोनों ने मिलकर उसे यूं किस बात की सज़ा दी ? प्रकाश के माता-पिता प्रीति की बिखरी मानसिक व भावनात्मक स्थिति को लेकर बड़े चिन्तित रहते और उसका विशेष ध्यान रखते। बेटे ने उन्हें कहीं का न छोड़ा था। जो प्रीति पे जान छिड़कता था, जिस प्रीति के बिना जिसका पलभर साँस लेना मुश्किल था, उसी प्रकाश ने प्रीति को ऐसा गहरा घाव दिया था जिसके नासूर बन जाने का डर घरवालों को सताने लगा था। प्रीति जो रिश्तों की गरिमा, चरित्र की उच्चता में दृढ़ विश्वास करती थी,उसके लिए तो प्रकाश की यह हरकत किसी पाप से कम न थी। सुना था और उसने किताबों में भी पढ़ा था कि पुरुष ‘पर नारी’ देह का लोभी होता है। अपनी पत्नी कैसी भी उर्वशी, मेनका जैसी रूपवती क्यों न हो, पर पराई औरत उसे बड़ी भाती है। एकाएक प्रीति के ज़हन में प्रसिध्द एन्थ्रोपॉलोजिस्ट ‘डॉ हेलेन फ़िशर’ की किताब “व्हाय वी लव’’(why we Love ) की मनोवैज्ञानिक बातें घूमने लगी कि इंसान के अन्त:करण में प्रेम के तीन धरातल मौजूद होते हैं - भावनात्मक, वासनात्मक और रागात्मक । जिसमें ये तीनों धरातल सक्रिय होते हैं, वह एक समय में एक से अधिक लोगों से संबंध बनाता हैं।ऐसा करे बिना वह रह ही नहीं सकता। ऐसा व्यक्ति तीनों स्तर पर अलग-अलग लोगों से रिश्ते क़ायम करता रहता है। व्यक्ति का मस्तिष्क इन तीनों मनोभावों के पीछे दौड़ता है। ये तीनों वांछाएँ, “टेन्डम” यानी एक के बाद एक के क्रम में संचालित नहीं होती, अपितु उनकी पूर्ति व्यक्ति अलग-अलग व्यक्ति में खोजता है। इस तरह एक ही समय में उसके एक से अधिक लोगों से प्रेम संबंध कायम रहते हैं। किसी से भावनात्मक, तो किसी से सिर्फ़ शारीरिक और कुछ से सामान्य रागात्मक लगाव।
घर में मनचाही पत्नी होते हुए भी पुरुष का घर से बाहर इधर - उधर देह सुख बटोरना क्या पुरुषत्व है ! ? एक तो परनारी से देह संबंध ही प्रीति की नज़र में ग़लत था, उस पर प्रकाश की ‘परनारी’ - उसकी अपनी सगी फुफेरी बहन होना - यह और भी घृणित और निंदनीय बात थी। प्रीति को अनिता में इतालवी उपन्यासकार ‘एलबर्टो मोराविया’ के उपन्यास “द एम्पटी कैनवास” की “निम्फ़ोमैनियक” नायिका ‘सिसिलिया’ नज़र आई, जो अपनी ऊब और बोरडम को दूर करने के लिए यन्त्रवत शारीरिक संबंध बनाती है, यन्त्रवत अपने को संवारती है, कपड़े पहनती है, मतलब कि किसी भी क्रिया से उसका लेशमात्र भी भावनात्मक लगाव नहीं है। मशीन की तरह वह सारे काम शरीर के तल पर अपने मनोरंजन के लिए करती नहीं अघाती। इसलिए ही ‘एलबर्टो’ कामक्षुधा को विकृति न मानकर, एक स्वभाविक इच्छा की संज्ञा देता है। एक से अधिक लोगों के साथ देह संबंध बनाकर “निम्फ़ोमैनियक” स्त्री को मानो दूसरे के होने से, ज़िन्दगी अर्थपूर्ण लगती है और बोरडम दूर होती लगती है। यद्यपि यह एहसास क्षणिक होता और ऐसे इंसानों की ऊब का स्थायी निदान नहीं होता, इसलिए ही उनके बार-बार यंत्रवत देह संबंध बनते रहते हैं। प्रीति ने ‘एलबर्टो’ द्वारा स्थापित धारणा को अनिता में मानो साकार रूप में देख लिया था। वह बुरी तरह घबरा उठी। एक अजीब सी लिजलिजी गिलगिलाहट उसे वितृष्णा से भर गई। प्रीति को सारी दुनिया “एम्पटी कैनवास” की तरह एम्पटी - खाली खाली लगी। हर नारी “निम्फ़ोमैनियक” और घर उजाड़ने पे उतारु दिखाई दी। उसने घबराकार तकिए से अपना मुँह ढक लिया। इस धारणा को सोचने मात्र से उसका दम घुटने लगा। जो स्त्रियाँ इस पे अमल करती हैं उनका दम भला क्योंकर नहीं घुटता, उन्हें ये सब एम्यूज़मैन्ट कैसे लगता है ? ऐसा सोचते-सोचते न जाने वह कब नीम बेहोशी की गिरफ़्त में आ गई। जब वह पुन: सचेतन हुई तो देखा घड़ी में 6 बजे थे।
उधर घरवालों का अब एक ही बात पर ध्यान केन्द्रित था कि घर उजड़ने से बच जाए। अनेक बार मौत को गले लगाने का ख़्याल प्रीति को बडे जादुई ढंग से अपनी ओर खींचता। इतना आहत होने पर भी प्रीति ने अपने माँ बाप से इस घटना का ज़िक्र तक भी नहीं किया था क्योंकि प्रकाश के उस घटिया कुकर्म का ज़िक्र करने में प्रीति के आत्मसम्मान पे चोट लगती थी। प्रकाश की बेइज़्ज़ती जैसे मानो उसकी अपनी बेइज़्ज़ती थी। इसलिए उसने उस गरल को ख़ामोशी से धीरे - धीरे ख़ुद पी लिया।

प्रकाश के माता-पिता उससे इतने नाराज़ रहने लगे थे कि एक दिन दोनों ने प्रकाश को अपना अन्तिम फैसला सुनाया –
‘’हमारे इस बुढापे में तुमने जो चोट हमें दी है, उसके लिए तुम्हें जितनी भी सज़ा दी जाए कम है I तुम्हारे लिए हमने क्या नहीं किया I प्रीति और उसके माँ बाप ने, न चाहते हुए भी तुम्हारे असमय शादी के प्रस्ताव को स्वीकार किया और तुमने क्या इनाम दिया उस बेचारी लड़की को ?? तुम हमारी नज़रों से दूर रहो तो बेहतर है I प्रीति उनके साथ रहेगी। वह घर छोड़ जहाँ चाहे रहे, चाहे तो शहर भी छोड़ दे।‘’

यह सुनकर प्रकाश बड़ा तिलमिताया, लेकिन उसका विरोध करने का हक़ और हिम्मत सब खत्म हो चुकी थी। अपनी दुर्बुध्दि और विचारशून्यता से वह अपने ही घर में अजनबी बन गया था। सब उसे तिरस्कार भरी नज़रो से देखते। उसे भी इस तरह घर में रहना एक-एक पल भारी पड़ रहा था। सो एक दिन वह अपना सामान लेकर दिल्ली चला गया हमेशा के लिए। कुछ दिनें तक तो उसकी कमी अखरी घरवालों को, लेकिन शीघ्र ही सब उस मन:स्थिति से उबर गए। अब प्रीति उनकी बेटी, बेटा सब कुछ थी। प्रीति के लिए भी माँ और पापा सिर्फ़ माँ और पापा ही नहीं थे अपितु उसका मनोबल थे, ऐसा भावनात्मक सहारा थे जिसके बल पर वह जीवन की अंधी खाई से बाहर निकल आई थी। उनके सहारे ने प्रीति को स्वस्थ दृष्टि और सही दिशा दी थी।

प्रीति सम्भलने पर मन ही मन तर्क करती कि मरने से अधिक चुनौती, जीवित रह कर आघातों का सामना करने में है, अपनी अच्छाईयों, पॉज़िटिव एटीट्यूड को बनाए रख कर, जीवट से जीने में है। बेवफा जीवन साथी को झेलने से कई गुना बेहतर है इज़्ज़त और हिम्मत से अकेले जीना I उसने समझदारी से सोचा कि वह ईश्वर के वरदान इस 'जीवन' को प्रकाश जैसे बेवफ़ा, सँस्कारहीन, मूल्यविहीन व्यक्ति के लिए क्यों नष्ट करे ? क्रिएटिव होकर उसे जीना चाहिए और जीवन में ऊँचाईयों को छूना चाहिए। उस आदमी के पाप की सज़ा ख़ुद को क्यों दे वह ? वह क्योंकर कमज़ोर बने, दर्द और क्रोध के आवेश में आकर आत्महनन जैसा काम करके क्या सिध्द करना चाहती थी -अपनी बुध्दिहीनता और मूर्खता ? इस मंथन से उसे लगा कि उसके अन्तस में एक जीवन्त चिन्गारी फूट रही है। वह एक अजीब सी ऊर्जा से भर रही है। धीरे- धीरे वह ऊर्जा जैसे उसके समूचे वजूद में छा गई। एकाएक प्रकाश की बेवफ़ाई की आग में जलकर राख हुई प्रीति हिम्मत करके अपनी ही राख के ढेर से फ़िनिक्स की तरह फिर से जी उठी - बहादुरी से जीवन के झंझावातों का सामना करने के लिए, उन्हें धराशाही करने के लिए...।